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रघुराम जी. राजन की पुस्तक ‘I Do What I Do’ का एक अंश

इन दिनों रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन नोटबंदी और जीएसटी को लेकर अपने बयान से चर्चा में हैं. पिछले साल जब उनकी किताब आई थी तब वह किताब भी बेहद चर्चा में रही. अर्थशास्त्र की किताब बेस्टसेलर सूची में आई. उस किताब में भी वर्तमान सरकार की आर्थिक नीतियों की पर्याप्त आलोचना है. हार्पर कॉलिन्स से प्रकाशित यह किताब इस साल हिंदी में आ गई है. अनुवाद मैंने ही किया है. प्रस्तुत है पुस्तक की भूमिका- मॉडरेटर

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इस किताब के शीर्षक से सार्वजनिक जीवन की आकस्मिक प्रकृति का अंदाजा होता है। मौद्रिक नीतियों से जुड़ी बैठकों के बाद मुझे प्रेस कांफ्रेंस में बोलने में आनंद आता था, खासकर इसलिए क्योंकि मैं अधिकतर संवाददाताओं को जानता था। एक बार जब एक प्रेस कांफ्रेंस समाप्त होने ही वाला था कि एक बार फिर एक जाने पहचाने चेहरे ने सवाल किया। सवाल यह था कि मैं येल्लेन की तरह अपनी अर्थ नीति में उदारता बरतने वाला था या वोल्कर की तरह सख्त नीतियाँ अपनाने वाला। मैं समझ गया कि वह संवाददाता क्या पूछ रहा था, लेकिन मैं खुद को बंधी बंधाई रुढियों में कैद करने की उसकी कोशिश को परे झटकना चाहता था। मैंने कुछ मजाकिया अंदाज में जेम्स बांड की शैली में बोलना शुरू किया, “मेरा नाम रघुराज राजन है…” इस पंक्ति के बीच में मैं घबरा गया क्योंकि मुझे यह नहीं समझ में आ रहा था कि इस पंक्ति को किस तरह से समाप्त करूं जिससे जिससे मौद्रिक नीति के बारे में उनको उससे अधिक कुछ नहीं पता चले जितना कि मैं चाहता था। इसलिए जब टीवी कैमरे मेरी तरफ घूमे तो मैंने धीरे से कहा “…मुझे जो करना होता है मैं वही करता हूँ।” किसी वजह से वह पंक्ति अगले दिन वित्तीय ख़बरों की सुर्ख़ियों में आ गया, जबकि हमारी मौद्रिक नीतियों से सम्बंधित ख़बरें अन्दर के पन्नों में दी गई थी। सोशल मीडिया पर हो रही टिप्पणियों का असर आम तौर पर मेरा समर्थन करने वाली बेटी के ऊपर भी हो गया और उसने मेरी इस बेइरादा टिप्पणी के ऊपर बार बार अंगूठा नीचे दिखाने वाला इमोजी बनाते हुए नकारात्मक प्रतिक्रिया की।

वैसे एक तरह से यह शीर्षक बिलकुल सही था। दो अलग अलग सरकारों ने मेरे ऊपर विश्वास जताते हुए मोटे तौर पर स्वतंत्रता से काम करने का मौका दिया। मैं इस बात को जानता था कि मेरा कार्यकाल तीन सालों का था इसलिए मैं बदलाव के लिए भरपूर कोशिश कर सकता था। धीरे धीरे निहित स्वार्थों का विरोध सामने आने लगता, लेकिन तब तक मेरे ख़याल से आरबीआई के जरूरी सुधार हो चुके होते। और सच में मैंने यही किया। जब मैंने अपना कार्यकाल संभाला उस समय मौद्रिक संकट था, जब भारत को सबसे कमजोर पांच देशों के रूप में देखा जा रहा था। इसलिए मेरा पहला काम यह था कि मौद्रिक स्थिरता लाई जाए। लेकिन मैं आरम्भ से ही इस बात को समझ गया था कि वित्तीय क्षेत्र में किये गए सुधारों से स्थिरता में मदद मिलेगी। भारत निम्न आय से मध्यम आय वर्ग के देश के रूप में संक्रमण कर रहा था इसलिए इन आर्थिक सुधारों की जरूरत का मतलब साफ़ था। जाहिर है, सुधार की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है और उनको वापस भी लिया जा सकता है। इसलिए जरूरी यह था कि नए संस्थानिक तौर-तरीके में आर्थिक सुधारों को जगह दी जाए, साथ ही आरबीआई तथा उससे जुड़ी बाहरी संस्थाओं में आर्थिक सुधारों को लेकर जिम्मेदारी का भाव पैदा किया जाए।

और यहाँ मुझे टीम के साथ काम करने की जरूरत महसूस हुई। प्रबंधन के क्षेत्र में यह मेरा पहला काम नहीं था। लेकिन मैं एक ऐसे संस्थान का प्रमुख बना था जहाँ 17 हजार लोग काम करते थे, जिसकी परिसंपत्तियां 400 अरब डॉलर से अधिक की थी। कोई इतने बड़े संस्थान को किस तरह से चला सकता है? जाहिर है मदद से। मैंने हमेशा इस बात को महसूस किया है कि प्रबन्धन का सबसे महत्वपूर्ण काम होता है अपने मातहत काम करने के लिए अच्छे लोगों का चुनाव करना, और मैं अपने साथ काम करने के लिए बहुत अच्छे लोगों का चयन कर पाने में सफल रहा। मेरी भूमिका सम्पूर्ण दिशा निर्धारित करने की थी(जाहिर है, उनसे राय विचार करते हुए), सरकार से अनुमति लेने के बाद अपने सहयोगियों के विस्तृत अनुभव के आधार पर इस सम्बन्ध में विस्तृत रुपरेखा तैयार की जाये, जिनके बारे में सामान्य तौर पर न करने की राय हो ऐसे कदम न उठाये जाएँ। जरुरत पड़ने  पर अपने संस्थान में उत्साह बढाने सम्बन्धी काम किये जाएँ जिससे कि हम अपनी समय सीमा में काम कर पायें, उसके बाद प्रक्रिया से जुड़ी सारी संस्थाओं के साथ साथ आम जनता के साथ चर्चा के बाद उन प्रक्रियाओं को अमली जामा पहनाया जाए। आर्थिक सुधारों की शुरुआत हमने गोपनीय तरीके से नहीं की। हालाँकि आरम्भ में हमारे द्वारा उठाये गए कुछ क़दमों को पचा पाना विरोधियों के लिए मुश्किल रहा, लेकिन हमने जो भी कदम उठाये उसके लिए पहले आरबीआई द्वारा कई समितियां बनाई गई, सार्वजनिक व्याख्यानों में उनके बारे में चर्चा की गई, और उसके बाद उससे जुड़े लोगों के साथ विचार विमर्श के बाद उनको लागू किया गया। हम लोग हमेशा वैकल्पिक प्रस्तावों को सुनने के लिए तैयार रहते थे, लेकिन किसी भी सुझाव को स्वीकार करने से पहले मैं अपनी आर्थिक या वित्तीय सामान्य बुद्धि के आधार पर उनके बारे में विचार करता था, और मेरे सहकर्मी इस बात के आधार पर उनके ऊपर विचार करते थे कि वह केन्द्रीय और व्यावसायिक बैंकों के प्रचलन के अनुकूल है या नहीं। कुल मिलाकर, इस दोहरी छानबीन के आधार पर हम ऐसे सुझावों नहीं अपनाते थे जो इस काम में सहायक नहीं होते थे। हम जो सुधार कर रहे थे वह वह बाजार की भूमिका को बढाने तथा प्रतिस्पर्धा बढाने से प्रेरित होता था, और इस बात को सुनिश्चित करने के लिए होता था कि हमारे सारे कायदे कानून सही हों और उनको पूर्व-अनुमानित तथा पारदर्शी तरीके से लागू किया जाये, और इसको इस तरह से अंदाजा लगाते हुए धीरे धीरे लागू किया जाए जिससे कि व्यवस्था इसके साथ तालमेल बिठा सके। जैसा कि आगे मैं यह बताऊंगा मोटे तौर पर इन्हीं तरीकों से हमने मुद्रास्फीति के प्रबंधन से लेकर पुराने ऋणों के मुद्दों को निपटाया। इस दौरान, हमारी कोशिश यह थी कि इन प्रक्रियाओं का इस तरीके से संस्थानीकरण भी कर दिया जाए ताकि उनके बारे में पहले से पता हो और वे टिकाऊ भी हो जाएँ। भारत मध्य आय वर्ग का एक बड़ा देश बनता जा रहा है, बेहद जटिल और इतना विविध कि केन्द्रीय तौर पर उसको नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। सरकार को अर्थव्यवस्था को काबू में बनाए रखने की भूमिका से अपने आप को हटाने की जरूरत होगी, उसको अपने आपको सार्वजनिक सेवाएँ देने तथा नियंत्रणकारी ढांचा तैयार करने तक सीमित कर लेना होगा, और आर्थिक गतिविधियों को जनता के ऊपर छोड़ देना होगा। अपनी सामूहिक ऊर्जा को पूरी तरह से काम में लाने के लिए आने वाले सालों में भारत अगर यह चाहता है कि वह तेजी से सतत और समतापूर्ण ढंग से विकास करता रहे तो उसको इस तरह के कई सुधार करने होंगे।

मेरे व्याख्यान स्थिरीकरण तथा आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया के आवश्यक अंग थे, उनके माध्यम से मैं निवेशकों और आम जनता को बदलाव के पीछे के कारणों को समझाता था, आर्थिक सुधारों बन रहे ढांचे के बारे में बताता था और जब किसी तरह के विशेष नियम को बनाया जा रहा होता था तो उस सम्बन्ध में प्रमुख व्यक्तियों के बीच बहस को छेड़ता था ताकि जनमत तैयार हो जाए। हम जो करना चाहते थे उसके बारे में बार बार बताने से आरबीआई को बाजार से जरूरी सुधार का श्रेय उसकी घोषणा के समय ही मिल जाता था, उस काम के निष्पादन से बहुत पहले। बाजार के पुनः अस्थिर होने की स्थिति में यह महत्वपूर्ण हो सकता था। साथ ही, बहुत सारे भाषणों ने बड़े स्तर पर लोगों को अन्तर्निहित वित्त एवं अर्थव्यवस्था के बारे में शिक्षित करने की भी कोशिश की। अगर व्याख्यान को सुनकर कोई व्यक्ति और अधिक सीखने की दिशा में प्रेरित हो गया तो यह वित्तीय एवं आर्थिक साक्षरता की दिशा में बढ़ाया गया एक और कदम होता- मैंने वही किया जो हर अध्यापक चाहता है, एक राष्ट्रीय मंच, जिसको मैंने प्रभावपूर्ण और जिम्मेदार तरीके से आजमाने की कोशिश की।

अपने भाषणों के माध्यम से मैंने कुछ हद तक महत्वपूर्ण आरबीआई की एक और भूमिका का निर्वहन करने का प्रयास किया, देश के लिए समष्टि अर्थशास्त्र के खतरों के प्रबंधन का। इस लक्ष्य के कारण, जैसा कि हम लोग देखेंगे, व्याख्यान अधिक विवादित भी हुए, शायद इस कारण क्योंकि मैं केन्द्रीय बैंकिंग एवं विनियमन के सामान्य क्षेत्र से बाहर निकल कर बात कर रहा था, और शायद इस कारण भी क्योंकि मेरी चेतावनियों को आश्चर्यजनक तरीके से सरकार को दी जाने वाली चुनौती के रूप में देखा गया। बहरहाल, इस भाषणों को मैंने आरबीआई गवर्नर की जिम्मेदारी के रूप में देखा जो देश में समष्टि अर्थव्यवस्था के प्रबंधन के खतरे के लिए जिम्मेदार होता है।

अकादमिक जगत के होने के कारण मैंने अपने सभी भाषण स्वयं लिखे। मेरी पत्नी राधिका मेरे व्याख्यानों के प्रारंभिक प्रारूपों को पढ़कर उनकी रचनात्मक आलोचना किया करती थी। उसके बाद आरबीआई में उस विषय का विशेषज्ञ व्याख्यान के तथ्यों की जांच-परख किया करता था, उसके बाद उस व्याख्यान को मेरे बेहद योग्य कार्यकारी सहायक द्वारा पढ़ा जाता था(पहले, हमेशा विश्वास के काबिल विवेक अग्रवाल और बाद में उनके स्थान पर वैभव चतुर्वेदी आए)। अंत में, अल्पना किल्लावाला, जो हमारे यहाँ संचार विभाग में महाप्रबंधक थीं, उनको पढ़कर यह देखने की कोशिश करती थीं कि उसके कारण किसी तरह का राजनीतिक विवाद तो नहीं हो सकता था। उसके बाद मैं एक बार अपने व्याख्यान में जरूरी संशोधन करता और फिर भाषण देता था।

मीडिया की नजर हमेशा बहुत गहरी रहती थी, यहाँ तक कि ऐसी जगहों पर भी जहाँ मीडिया को बाहर रखा जाता था- वहां मौजूद कोई ऐसा आदमी होता था जो हमेशा मीडिया को बताने के लिए तैयार रहता था या सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखने के लिए तत्पर रहता था। प्रेस का ध्यान शायद इस वजह से बहुत अधिक रहता था क्योंकि उनको ऐसा लगता था कि शायद मैं भविष्य की मौद्रिक नीति के बारे में कोई बात बोल दूँ, लेकिन मीडिया को भी यह बात समझ में आ गई थी कि मैं मौद्रिक नीति की बैठकों के बाहर नई नीति के बारे में कुछ नहीं बोलता था, इसलिए मुझे लगने लगा कि वे इसलिए आते थे क्योंकि मेरे व्याख्यान बहुत दिलचस्प होते थे। खैर जो भी हो, मीडिया द्वारा इस कदर नजर बनाये रखना दोधारी तलवार की तरह था, जैसा कि हम आगे देखेंगे। हालाँकि इसके कारण आरबीआई का सन्देश आसानी से बाहर पहुँच जाता था, लेकिन मेरे व्याख्यान की कोई बात जो समझ में नहीं आती थी या किसी टिप्पणी को गलत तरीके से समझ लेने के कारण बिलावजह का तनाव होता था। मैं इसे सार्वजनिक मेलजोल की न टाली जा सकने वाली कीमत के रूप में देखता था, लेकिन कई बार मैं यह सवाल करता था कि मेरे कथन की गलत व्याख्या के पीछे आकस्मिक कारण होता था या ऐसा जानबूझकर किया जाता था। आरबीआई के गवर्नर का पद एक ऐसा संतोष भरा पद था जिसकी कामना कोई भी भारतीय अर्थशास्त्री कर सकता था। कई बार मैं घर लौटता था तो बहुत थका हुआ रहता था लेकिन मुझे इस बात की ख़ुशी होती थी कि हम बदलाव ला पाए। सार्वजनिक प्रशासन में ऐसे बहुत कम पद हैं जिसके ऊपर बैठा व्यक्ति ऐसा कह सकता हो, क्योंकि उसके ऊपर दूसरे संगठनों के साथ संगति बिठाने का दबाव रहता है, और आपसी खींचतान के कारण आगे बढ़ पाना भी मुश्किल हो जाता है। लेकिन आरबीआई में बहुत सारे मुद्दों को लेकर फैसला केवल हमारा ही होता है, इसलिए संभव थी और निरंतर संभव थी। इसका यह भी मतलब हुआ कि काम का बोझ हमेशा मेरे सर पर बना रहता था, मुझे यह पूछते रहना पड़ता था कि हम और क्या क्या कर सकते थे, क्योंकि इसकी संभावनाएं अनंत थीं। एक नीति निर्माण करने वाले अर्थशास्त्री को गवर्नर बनाए जाने का मतलब यह हुआ जैसे किसी बच्चे को टॉफी की दुकान में मनमानी करने के लिए छोड़ दिया जाए।

यह कहने की बात नहीं है कि इस पद पर काम करना हमेशा आसान और आनंददायक रहा हो। राजनेताओं के साथ मेरी अच्छी समझदारी थी- मैं नियमित तौर पर और सौहार्दपूर्ण माहौल में पहले प्रधानमंत्री डॉ। मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री चिदंबरम से मिलता रहता था, और फिर सरकार बदलने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ भी। यह ऐसा काम था जिसे करते हुए किसी भी अफसर को ख़ुशी महसूस होती, लेकिन मेरे पद का सबसे अनमना करने वाला था उन अफसरों के साथ निपटना जो रिजर्व बैंक को कमजोर करने की कोशिश में लगे हुए थे ताकि उनका रुतबा बढ़ सके। गवर्नर के रूप में अपने अंतिम भाषण में(आगे दिया गया है), मैंने सरकार को इस सम्बन्ध में सुझाव दिया इस तरह के बिलावजह के मनमुटाव को किस प्रकार कम किया जा सकता था।

किसी भी सार्वजनिक पद पर काम करते हुए बिलावजह की तारीफ भी मिलती है और अनुचित आलोचना का भी सामना करना पड़ जाता है। यह इंसान का स्वभाव होता है कि वह यह सोचता है कि तारीफ से अधिक उसकी आलोचना होती है। फिर भी यह आलोचना ही होती है जो आपको अपने सन्देश को और अधिक स्पष्ट बनाने में मदद करती है। इन व्याख्यानों के अधिकतर हिस्से में आलोचकों के लिए जवाब होता था, यह समझाने की कोशिश के रूप में कि क्यों उनको सब कुछ अच्छी तरह से पता नहीं था। इस हद तक तो आलोचना से इसमें मदद मिलती थी उसके जवाब में मैं स्पष्टीकरण देते हुए जो व्याख्यान देता था उससे जनता की समझ साफ़ होती थी, उसमें उम्मीद की किरण होती थी। लेकिन सबसे बड़ा पुरस्कार इस अर्थ में होता है जब अपने काम से निजी तौर पर संतुष्टि मिलती है, मुझे तब बहुत अधिक ख़ुशी होती है जब अनेक विद्यार्थी मुझसे यह कहते हैं कि वे अर्थशास्त्र और वित्त की पढ़ाई पढने के लिए प्रेरित हुए, हवाई जहाज में कोई अनजान मुसाफिर मुझे मेरे काम के लिए शुक्रिया अदा करता है, और यहाँ तक कि मेरे सफ़र के बोर्डिंग कार्ड के ऊपर मुहर लगाने वाला सुरक्षा अधिकारी मुझसे यह पूछता है कि मैं देश में काम करने के लिए वापस कब आ रहा हूँ।

जैसा कि मैंने पहले ही संकेत दिया है कि यह कोई हर बात का खुलासा करने वाली किताब नहीं है। हालाँकि इस भूमिका के समापन से पहले एक बात जिसको लेकर मुझे बहुत सवाल किये गए हैं, जिनके जवाब देने के लिए मैं जान बूझकर तब तक मना करता रहा जब तक कि मेरी चुप्पी का समय पूरा नहीं हो गया,और नवम्बर 2016 में भारत में लागू की गई विमुद्रीकरण की नीति के बारे में है। वे सवाल, जिनके बारे में बताया गया कि संसदीय समितियों ने भी पूछे थे, उनमें विमुद्रीकरण की सम्भावना और उसके बारे में मेरे विचारों को लेकर है। मीडिया ने सरकारी स्रोतों को उद्दृत करते हुए कई बार यह कहा कि मैं इसके खिलाफ था(विमुद्रीकरण की प्रक्रिया के आरंभिक दिनों में) और यह कि मेरी भी इसमें सहमति थी(हालिया रपटों में)।

विमुद्रीकरण के बारे में मैंने सार्वजनिक तौर पर केवल एक बार बोला था जब मैंने अगस्त 2014 में ललित दोषी स्मृति व्याख्यान के दौरान एक सवाल के जवाब में कहा था(बाद में देखें)। तब सरकार ने इस मुद्दे के ऊपर कोई चर्चा नहीं की थी। जैसा कि हिन्दुस्तान टाइम्स में अगस्त में खबर आई थी कि सालाना ललित दोषी स्मृति व्याख्यान के दौरान राजन ने कहा, “मुझे ठीक से समझ में नहीं आया कि आपका मतलब यह है कि पुराने नोटों का विमुद्रीकरण करके उनके स्थान पर नए नोट जारी किये जाएँ। अतीत में काले धन के प्रचलन को रोकने के लिए विमुद्रीकरण के बारे में सोचा गया था। क्योंकि तब लोगों को सामने आकर कहना पड़ता है कि मेरी तिजोरी में दस करोड़ नगद पड़े हुए हैं, तब उनको यह भी बताना पड़ जाता है कि उनके पास वे पैसे आये कहाँ से। इसे समाधान के रूप में पेश किया जाता है। दुर्भाग्य से, मुझे ऐसा लगता है कि चालाक लोग इससे बचाव के रास्ते निकाल लेते हैं।’

*http://www।hindustantimes।com/business-news/rajan-preferred-otherways-

over-demonetisation-to-tackle-black-money/story-vlTbd6oixy

राजन ने कहा, “जिनके पास बहुत सारा काला धन जमा होता है वे उसको छोटे छोटे हिस्सों में बाँटने के रास्ते निकाल लेते हैं। आप पाएंगे कि जो लोग काले धन को सफ़ेद बनाने के रास्ते नहीं निकाल पाते हैं वे उसको किसी मंदिर में हुंडी में जाकर डाल देते हैं। मुझे लगता है कि विमुद्रीकरण से बचने के रास्ते हैं। काला धन निकाल पाना इतना आसान नहीं है।” बिना हिसाब किताब का बहुत सारा काला धन सोने के रूप में होता है और जिनको पकड़ पाना और भी मुश्किल होता है, राजन ने कहा। उन्होंने यह भी कहा कि वह अधिक ध्यान प्रोत्साहनों के ऊपर देना चाहेंगे जिससे काले धन को बनाना और उसको जमा करने की प्रवृत्ति में कमी आये। करों के रूप में बहुत सारे प्रोत्साहन दिए जाते हैं और इस समय देश में करों की दर ठीक ही थी, उन्होंने आगे कहा। चूँकि मुझे लेकर कई हवाले दिए गए, यहाँ तक कि संसद में भी दिए गए, इसलिए मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूँ। फ़रवरी 2016 में सरकार ने विमुद्रीकरण के बारे में मुझसे राय ली थी, जिसका जवाब मैंने मौखिक रूप से दिया था। हालाँकि हो सकता था कि दीर्घ अवधि में इसका फायदा होता लेकिन तत्काल रूप से अर्थव्यवस्था के ऊपर जो भार पड़ता वह उस लाभ के ऊपर भारी हो जाता, इसलिए मुझे ऐसा लगा कि मुख्य लक्ष्य को हासिल करने के लिए बेहतर विकल्प मौजूद थे। मैंने अपने विचार स्पष्ट रूप से जाहिर किये। उसके बाद मुझसे एक नोट तैयार करने के लिए कहा गया, जिसे आरबीआई ने तैयार करके सरकार को दे दिया। इसमें विमुद्रीकरण के संभावित खर्चे और लाभों को रेखांकित किया गया था, साथ ही ऐसे विकल्पों के बारे में भी बताया गया था जिनके द्वारा भी इसी तरह के परिणाम हासिल किये जा सकते थे। अगर सरकार होने वाले लाभों और हानियों का आकलन करके विमुद्रीकरण को आजमाना ही चाहती थी तो ऐसी हालत में उस नोट में इस बात को रेखांकित किया गया था कि किस तरह की तैयारियों की जरूरत थी, और इसकी तैयारी में कितना समय लगता। आरबीआई ने इस बात को बताया था कि अगर तैयारी अपर्याप्त रही तो ऐसी सूरत में क्या हो सकता था। सरकार ने उन बातों के ऊपर विचार करने के लिए एक समिति बिठा दी। समिति की बैठकों में डिप्टी गवर्नर (करेंसी) जाते थे। मेरे कार्यकाल के दौरान किसी भी समय आरबीआई से यह नहीं कहा गया कि वह विमुद्रीकरण के बारे में फैसला ले ले।

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