गिरिराज किराडू की नई कविताएं

गिरिराज किराडू मेरी पीढ़ी के उन कवियों में हैं जिनकी कविताओं ने मुझे हमेशा प्रभावित किया है. उनका अपना एक विशिष्ट मुहावरा है और शब्दों का संयम. आज उनकी कुछ नई कविताएं- प्रभात रंजन 
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मिस्टर के की दुनिया: पिता होने की कोशिश के बारे में कुछ कविताएँ
गिरिराज किराडू
[रघुवीर सहाय की कविता और उसमें व्यक्त ‘वात्सल्य’ के नाम]
नवजात पिता की कल्पनाएँ
वह सो गया है
[इससे बड़ा सुख आपके जीवन में नहीं कि अभी इस पल आप उसे देख पा रहे हैं]
आपके सुनाई कहानियाँ आपको नहीं उसे याद रहती हैं
एक दिन वह आपकी सब कहानियों के फ़रेब के आर-पार देख लेगा
तब वह आपसे वैसे प्यार करेगा जैसे अभी आप उससे
वह सो गया है
आप सुदूर भविष्य में उसे प्रेम में बिलखता हुआ देख रहे हैं    
एक दिन वह जान लेगा उसके जन्म ने आपकी आत्महत्या को हमेशा के लिए स्थगित कर दिया था
उस दिन वह आपको वैसे प्यार करेगा अभी आप उससे
पिता की तरह
आप अपने बेटे के लिए एक कठिन जीवन की कल्पना करते हैं
उसकी माँ से भी कठिन अपनी माँ से भी कठिन
इससे अधिक कठिन आपके अनुभव में नहीं
एक दिन वह इस कल्पना को जान लेगा
उस दिन वह आपको वैसे प्यार करेगा जैसे अभी आप उससे
बेटे की तरह
भविष्य
किसके घर में मरना चाहता हूँ
वीराने में मरने के ख़याल में अब रौनक नहीं
जिसे उसी सुबह पहली बार देखा हो  जिसे देखते हुए कुछ याद नहीं आये जिसके आँखों में फूल हिलते हों जिसकी पलकें बेरहम हों जिसके नक्श-ए-पा में नक्श-ए-पा के सिवा और कुछ न हो जो अलविदा ऐसी ज़बान में कहे कि  मुझे समझ न आये उसके घर में मरना चाहता हूँ
पहले इस ख़याल से सिहरन होती है कि आप एक दिन नहीं रहेंगे
फिर इससे दहशत कि एक दिन आप शव हो जायेंगे
आप लिखते हैं मेरा अंतिम संस्कार आकाश में करना पलट के देखने पर मालूम होता है तब आप पच्चीस बरस के थे मोटर साईकिल पर गृहस्थी आबाद होने के दिन
और अब यह बेचैनी किसके घर में मरना चाहता हूँ 
मेरे घर में मेरी मृत्यु के लिए जगह नहीं
प्रियवर जिन्होंने आपकी कोई फ़िक्र नहीं की जिन्होंने आपकी फ़िक्र करने का फ़रेब किया और जिन्होंने आपकी फ़िक्र के सिवा कुछ नहीं किया
अगले साल की पहली शाम तीनों एक-साथ कविताएँ पढ़ेंगे शहर कोतवाल के घर आप सादर आमंत्रित हैं
शराब और कफ़न अपने लिए खुद साथ लेकर आएं
भविष्य में सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि
भविष्य में भी कुछ लोग इसलिए कविता लिखेंगे कि
उनकी संतान कुत्ते की मौत न मरे*
[* ऐसा रघुवीर ने अपनी एक कविता में कहा है. मेरी यह सब कविताएं नवम्बर २०१४ में लिखी गयीं]

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