श्रीलाल शुक्ल ने पतनशील समाज की कथा कही

श्रीलाल शुक्ल को श्रद्धांजलि स्वरुप आज प्रस्तुत है प्रसिद्ध अनुवादक  और पत्रकार जितेन्द्र कुमार का लेख- जानकी पुल.


ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित और ‘राग दरबारी’ के लेखक के रूप में बेहद मशहूर श्रीलाल शुक्ल का निधन हो गया। उम्र के लिहाज से उनका जाना कोई इतनी बड़ी बात नहीं है, क्योंकि वे 86 साल की भरपूर जिन्दगी जी चुके थे और साहित्यिक उत्कृष्टता के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ दे चुके थे। लेकिन राग दरबारी के लेखक श्रीलाल शुक्ल का जाना मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।
पढ़ने -लिखने का संस्कार शुरु होने के बाद अगर जिन्दगी को याद किया जाय तो शायद राग दरबारी, सारा आकाश के बाद मेरी जिन्दगी की दूसरी बड़ी रचना है जिसने मुझे इतना प्रभावित किया है। सारा आकाश को पसंद करने का कारण नितांत व्यक्तिगत है (अपनी पृष्ठभूमि के कारण) तो राग दरबारी को पसंद करने का कारण पूरी तरह सामाजिक और राजनीतिक है।
वैसे तो श्रीलाल शुक्ल ने अनेक पुस्तकें लिखी हैं लेकिन जिस रचना की अहमियत सबसे ज्यादा है वह राग दरबारी है। अगर इस उपन्यास को सिर्फ एक रचना के बतौर देखें तब भी यह महान रचना दिखाई देगी लेकिन अगर इसे पंडित जवाहरलाल नेहरु के चमत्कारिक व्यक्तित्व के समानान्तर खड़ी करके देखें तो इस रचना की महानता का बोध तत्काल होने लगता है। राग दरबारी को वर्ष संभवत: वर्ष 196९ में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका था, जबकि यह किताब वर्ष 1967 में छपी थी। जो लोग प्रकाशन व्यवसाय को जानते हैं, वह जानते हैं कि किसी किताब को छपने में कम से कम दो साल का वक्त लग जाता है। इस हिसाब से देखिए तो यह पुस्तक प्रकाशक को छपने के लिए वर्ष 1964-65 में मिली होगी और अगर इसमें पुस्तक के रचना काल को जोड़ दिया जाय तो दो से तीन साल का वक्त भी जरुर लगा होगा। अर्थात इस किताब की रचना प्रक्रिया नेहरु जी जिंदा रहते ही शुरु हुई होगी। कल्पना कीजिए उस दौर को जब नेहरु के समाजवाद और उनकी दूर-दृष्टि का डंका देश में चारों तरफ बज रहा था और बातें और किताबों में लगातार इस तरह की चर्चा हो रही थी कि नेहरु के बाद कौन? उस समय के भारतीय समाज (राजनैतिक से लेकर सामाजिक तक) में किस तरह का गिरावट आ गया था, उसका वर्णन कितनी  बारीकी से श्रीलाल शुक्ल ने अपने उपन्यास राग दरबारी में किया है।
राग दरबारी को पढ़ते समय में बार –बार लगता है कि इस महान उपन्यास का नायक कौन है?  वैद्य जी, रुप्पन बाबू, रंगनाथ, छोटे पहलवान या फिर प्रिंसिपल! हमारे देश का प्रतिनिधित्व करने वाले ये चरित्र कभी-कभी इतने मनोरंजक, विकृत और लिजलिजे हैं कि सामने का हर शख्स रचना के प्रकाशन के लगभग 45 साल बाद भी बिल्कुल वैसा ही दिखने लगा है। शिक्षा के क्षेत्र में अध्यक्षके रुप में वैद्य जी का अवतार सिर्फ बिहार और उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न भागों में नेहरु के समय में ही होना शुरु हुआ। पहले यह सोशल स्टेटस था बाद में निजी कॉलेज का खोला जाना पूरी तरह व्यापार में तब्दील हो गया। अगर पिछले तीस- चालीस साल के इतिहास को देखें तो पाएंगें कि किसी भी धन्नासेठों या पूंजीपतियों द्वारा समाज के लिए कोई स्कूल या कॉलेज नहीं खोला गया है बल्कि अगर उन्होंने शिक्षण संस्थान खोला है तो वह उसका उदेश्य सिर्फ व्यवसायिक हो गया है। पता नहीं, उस समय शुक्ल जी को इस बात का एहसास था या नहीं कि स्कूल-कॉलेज चलाने वाले वैद्यजी रुपी नस्ल एक समय राजनीति पर भी काबिज हो जाएगें (राग दरबारीमें वैद्य जी सिर्फ कॉलेज और ग्राम पंचायत तक चुनावी दिलचस्पी रखते हैं। बिहार, यूपी में यह परिघटना अब लगभग समाप्तप्राय है रामलखन सिंह यादवों और आर पी सिंहों जैसे लोगों राजनीतिक का पतन हो गया है। हांलाकि उनके नाम पर चलनेवाले कॉलेज मालामाल हैं। लेकिन केन्द्रीय राजनीति में दक्षिण और पश्चिम भारत के राजनेतागण राग दरवारी के वैद्य जी के रुप में देश के विभिन्न पदों पर काबिज हैं)।
      राग दरबारी के किरदारों में सबसे सशक्त किरदार सत की लड़ाई लड़ रहा लंगड़ू या लंगड़ परसादलगता है जो मेरी समझ से इस उपन्यास का नायक भी है। अगर राग दरवारीको आप पढ़े तो पाएगें कि हमारे समाज का संपन्न और पढ़ा- लिखा तबका कितनी जल्दीवाजी में है और इतनी ही हड़बड़ी में सबकुछ पा लेना चाहता है जिसके लिए कुछ भी करने को तैयार है। लेकिन समाज का सबसे दीन-हीन लंगड़ परसाद अकेला नियम, कायदे और कानून का पालन करते हुए समाज के संपन्न और सभ्य लोगों के हंसी का पात्र भी बनता है। लंगड़ से जुड़े सबसे महत्वूर्ण वाकया को याद कीजिए जिसमें गंजहे (शुक्ल जी शिवपालगंज के लोगों के लिए इसी शब्द का इस्तेमाल करते हैं) वैद्य जी के दरवाजे पर बैठे होते हैं जिसमें वैद्य जी बताते हैं कि कैसे लंगड़ की समस्या का समाधान करने के लिए वह तैयार हैं (घूस के लिए पैसे देकर) लेकिन लंगड़ है कि इसे मानता ही नहीं है! जिसपर सभी हंस पड़ते हैं।
पता नहीं क्यों, राग दरबारी को व्यंग्य रचना की श्रेणी में क्यों रखा गया। भारतीय समाज के बहुरुपीय क्षरण को राग दरबारी में देखा जा सकता है। जो लोग कहते हैं कि वर्तमान समाज में इतनी गिरावट आजतक कभी नहीं थी, उन्हें आज भी राग दरबारी पढ़ना चाहिए। जिस तरह क्वालिटी एडूकेशन के नाम पर पूरे देश में शिक्षक संस्थान खुले हैं और उसे कानूनी संरक्षण में जिस तरह माफिया चला रहे हैं राग दरबारी आज पहले से ज्यादा प्रासंगिक लगते हैं। उसी तरह समाज के तथाकथित पढ़े-लिखे और संपन्न वर्गों में लगातार बढ़ रहे कदाचार और नैतिक अवमूल्यन को जानने के लिए भी यह रचना सबसे जरुरी है।
     
      राग दरबारी के लेखक का जाना सिर्फ एक लेखक का जाना ही नहीं है बल्कि इस एहसास का खत्म हो जाना भी है कि हमें इतनी ही सशक्त कोई और रचना भी मिलेगी जो आनेवाली तीस-चालीस वर्षों तक लोगों के दिलो-दिमाग पर छाई रहेगी। फिर भी जितनी महान रचना उन्होंने दी है, किसी भी लेखक के लिए गर्व की बात हो सकती है।

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