युवा शायर #22 मस्तो की ग़ज़लें

युवा शायर सीरीज में आज पेश है मस्तो की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ======================================================

ग़ज़ल-1

जोडऩे में रात दिन खुद को लगा रहता हूँ मैं
कौन ये कहता है की यक्सर  बना रहता हूँ मैं

आईनों के शोर से हरदम घिरा रहता हूँ मैं
देख के फिर अक्स अपना क्यों डरा रहता हूँ मैं

बस यही इक बात खुद से पूछता रहता हूँ मैं
जब बचा ही कुछ नही क्या सोचता रहता हूँ मैं

उस से मिलने के लिए..या खुद से मिलने के लिए
किस से मिलने के लिए यूँ भागता रहता हूँ मैं

मैं उतर कर ज़िन्दगी में पाक रह सकता नही
घर में खाली बैठ कर मा’बूद सा रहता हूँ मैं

ओढ़ ली मस्तो मियां तुमने ये कैसी रंग-ओ-बू
खैर ! तुमसे क्या गिला खुद से खफा रहता हूँ मैं

ग़ज़ल-2

जो होना था..वो होना था..
मुझे हर हाल रोना था

कहानी में लिखा था क्या
मुझे जंगल में खोना था

बदन फैला रहा था मैं..
मुझे दरिया डुबोना था

लिए फिरते रहे हम रूह
इसे किस जिस्म बोना था

खुदा ने कुछ कहा होता
मुझे क्या क्या  संजोना था

तो आख़िर मर गया मस्तो
तमाशा ख़त्म होना था

ग़ज़ल-3

अचानक धूप मे आई ये बदली कौन है फिर
मिरे अंदर जो हंसती  है..वो बच्ची कौन है फिर

घुटन होती है जब मुझको..मैं बच जाता हूँ कैसे
कहीं भीतर जो खुलती है वो खिडक़ी कौन है फिर

इसी इक बात का खदशा लगा रहता है दिल को
जो रह रह कर चमकती है वो बिजली कौन है फिर

बना कर जिस्म को आंसूं ये तुम निकली हो वरना
भटकती फिर रही परबत मे नद्दी कौन है फिर

तिरे भीतर भी कोई घर बना बैठा है मस्तो
तिरे दर पे जो बैठी है उदासी कौन है फिर

ग़ज़ल-4

ढका उसने मिरी उरियानियों को
कि होती जा रही है साँवली वो

ढली है शाम वादी में मैं चुप हूँ
उठे जो हूक सी दिल में वो तुम हो

समझना है मेरी जाँ! जि़ंदगी को
जऱा चीनी को तुम..पानी में घोलो

मिरे अंदर जो चढ़ती जा रही है
पहाड़ों से उतरती धूप थी वो

बराबर है मिरा होना न होना
तुम्हें कुछ फर्क पड़ता हो तो बोलो

किसी की रूह को क्यों ठेस पहुंचे
यही अच्छा है मस्तो आप रो लो

ग़ज़ल-5

लिपटी हर इक शय यहाँ काली कबा में है
ये जि़न्दगी तमाम उसी दस्ते दुआ में है

तो क्या हुआ की तू भी अगर मुझ से है खफा..
हर शख्स की खुशी यहाँ उसकी अना में है..

मट्टी में दफ्न हो के मैं बरगद घना बनूँ..
इक और इब्तिदा मेरी..इस इंतिहा में है…

कैसे सिमट के धूप..ये चादर में आ गयी..?
इक इंतिहा को छू के सफऱ.. इब्तिदा में है..

मस्तो मैं किसलिए उसे अब ढूंढता फिरूँ
अंदर मेरे वही है..जो बाहर खला में है..

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