लुगदी के जासूस और लुगदी के लेखक

कल रायपुर से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘नवभारत’ में हिंदी जासूसी उपन्यास के इतिहास और परंपरा को लेकर मेरा यह लेख प्रकाशित हुआ था. आप पढना चाहते हैं तो यहाँ पढ़ सकते हैं- प्रभात रंजन

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फ़रवरी के महीने में वेद प्रकाश शर्मा का देहांत हुआ तो जैसे हिंदी जासूसी उपन्यासों की एक सदी से भी पुरानी परम्परा का एक विशाल बरगद गिर गया. 1980 और 90 के दशक में जब हिंदी में जासूसी उपन्यास की परंपरा अपने प्रसार और बिक्री के मामले में शिखर पर थी तो उसमें बहुत बड़ा योगदान उनके उपन्यासों का भी था. 90 के दशक के आरंभिक वर्षों में उनके उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ का पहला संस्करण 15 लाख का छपा था. कहते हैं कि अब तक उस उपन्यास की 8 करोड़ से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं. 1980 के दशक में मेरठ हिंदी में जासूसी उपन्यासों के सबसे बड़े प्रकाशन केंद्र के रूप में उभरा. जिसके पीछे वेद प्रकाश शर्मा का बहुत बड़ा योगदान था. करीब 2 दशक तक वेद प्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक हिंदी में जासूसी उपन्यास के पर्याय बने रहे.

हिंदी में जासूसी उपन्यासों का इतिहास बहुत पुराना है. बिक्री और पाठकीयता के इस मुकाम तक पहुँचने से पहले हिंदी जासूसी उपन्यासों का सफ़र तकरीबन सौ साल का रहा. 1900 ईस्वी में गोपाल राम गहमरी ने ‘जासूस’ नामक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया और 38 साल तक उसको हर तरह की मुश्किल उठाते हुए प्रकाशित किया. खुद करीब 200 जासूसी उपन्यास लिखे. अंग्रेजी के डिटेक्टिव नावेल की विधा के भारतीयकरण का श्रेय गहमरी जी को ही जाता है. यही नहीं ऐयार शब्द की जगह जासूस शब्द के प्रचलन का श्रेय भी गोपाल राम गहमरी को ही जाता है. केवल जासूसी उपन्यास ही नहीं जासूसों से हिंदी पट्टी के गाँव देहातों तक लोगों को परिचित करवाने का श्रेय भी उनको ही जाता है.

इस बात को हिंदी आलोचना के विकास के साथ भुला दिया गया कि व्यवस्थित रूप से हिंदी में रचनात्मक गद्य लेखन की शुरुआत और उसकी लोकप्रियता देवकीनंदन खत्री के तिलिस्मी-ऐयारी कथाओं और गोपाल राम गहमरी के जासूसी उपन्यासों से ही हुई. उसी दौर में ‘चन्द्रकान्ता’ के लेखक देवकीनंदन खत्री के पुत्र दुर्गाप्रसाद खत्री ने आधुनिक जासूसी उपन्यासों का लेखन किया जिसकी घटनाएँ और पात्र देशी होते थे. लेकिन उस दौर में अंग्रेजी के प्रसिद्द जासूसी उपन्यासों के अनुवाद हिंदी में बड़ी तादाद में आये. देवकीनंदन खत्री के दूसरे पुत्र परमानंद खत्री ने भी बड़ी तादाद में अंग्रेजी उपन्यासों के अनुवाद किये. जासूसी, रहस्य-रोमांच के विषय पर लिखे गए उपन्यासों के पाठक तो बहुत थे लेकिन उनके लिए भारतीय ढंग के उपन्यासों का अभाव था. देवकीनंदन खत्री और उनके बेटों के इस योगदान की कोई चर्चा करता है कि इन्होंने बड़ी तादाद में हिंदी के पाठक तैयार किये. यह सचाई है कि उस जमाने में हिंदी में हिंदी में अचानक पाठकों की तादाद इतनी अधिक हो गई कि उर्दू के लेखकों ने हिंदी में लिखना शुरू कर दिया. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रेमचंद भी उर्दू से हिंदी में आये थे.

जासूसी उपन्यासों के दूसरे सफल दौर की शुरुआत हुई 1950 के दशक में जब उर्दू गद्य के क्षितिज पर इब्ने सफी का आगमन हुआ. उन्होंने ‘जासूसी दुनिया’ का प्रकाशन आरम्भ किया जो भारत और पाकिस्तान दोनों जगहों से प्रकाशित होता था और उर्दू के साथ-साथ हिंदी में भी उनकी उपन्यासों का प्रकाशन होता था. उनके पहले जो जासूसी उपन्यास प्रकाशित होते थे उनमें अंग्रेजी के जासूसी उपन्यासों की तरह अश्लीलता की छौंक लगाईं जाती थी. लेकिन इब्ने सफी ने जासूसी उपन्यासों को घरेलू उपन्यासों का दर्जा दिलवाया. अर्थात उनके जासूसी उपन्यास स्वस्थ मनोरंजनपूर्ण होते थे जिसको घर के बूढ़े-जवान एक साथ चाव से पढ़ सकते थे. यह दिलचस्प बात है कि इब्ने सफी ने उर्दू जुबान में जिस बड़ी परम्परा की बुनियाद डाली उसका विकास उर्दू में तो उतना नहीं हुआ लेकिन हिंदी भाषा में सामाजिक-रोमांटिक उपन्यासों के बरक्स जासूसी उपन्यासों की विधा की लोकप्रियता का दूसरा दौर शुरू हो गया.

60 के दशक में जासूसी उपन्यासों की धारा को हिंदी में लोकप्रिय बनाने में कर्नल रंजीत के उपन्यासों का बड़ा योगदान है. उनका असली नाम एच. आर. ग्रे था और 1963 से 1995 के दौरान ही हिंदी पॉकेट बुक्स से उनके 70 से अधिक उपन्यास प्रकाशित हुए. हालाँकि प्रसिद्ध जासूसी लेखक ओमप्रकाश शर्मा ने लिखा है कि कर्नल रंजीत महज ट्रेड नेम था. उस नाम से अनेक लेखकों ने उपन्यास लिखे. जबकि कुछ दूसरे स्रोतों का यह मानना है कि हिन्द पॉकेट बुक्स से कर्नल रंजीत के नाम से जो उपन्यास छपे वह उनके यानी एच आर ग्रे के लिखे हुए थे. लेकिन उनके उपन्यासों की ऐसी लोकप्रियता थी कि अन्य कई प्रकाशकों ने भी उनके नाम पर छद्म उपन्यास प्रकाशित किये. उनके समकालीन लेखक वेद प्रकाश काम्बोज भी रहे. जो बाद के दिनों में अपने उपन्यासों से अधिक इस बात के लिए जाने गए कि वे वेद प्रकाश शर्मा के आरंभिक गुरु थे. यह कहा जाता है कि उनकी शैली को आगे बढाते हुए वेद प्रकाश शर्मा ने लिखना शुरू किया और मशहूर हो गए.

उसी तरह से जनप्रिय लेखक के नाम से मशहूर लेखक ओमप्रकाश शर्मा भी थे. ओमप्रकाश शर्मा के योगदान को अब याद नहीं किया जाता. लेकिन हिंदी जासूसी उपन्यासों में उनको कई तरह के नए नए प्रयोगों के लिए याद किया जाना चाहिए. उन्होंने एंटी हीरो के रूप में जासूसी कथाओं को नए किरदार दिए. उन्होंने जगत जैसे किरदार दिए जिसमें सारी बुराइयां थी. फिर भी उसके कुछ उसूल, कुछ आदर्श थे जिसके कारण वह पाठकों को नायक सरीखा लगता था. ये बुरे लोग जरूर होते थे लेकिन इनका मकसद समाज से अपराध, बुराई को सदा के लिए समाप्त कर देना होता था.

आजादी के बाद हिंदी में सामाजिक-रोमांटिक उपन्यासों का दौर अधिक था. कुशवाहा कान्त, प्रेम वाजपेयी, रानू और सबसे अधिक गुलशन नंदा के कारण रोमांटिक उपन्यासों को बेहद लोकप्रियता हासिल हुई. आज जासूसी उपन्यासों के बेताज बादशाह माने जाने वाले सुरेन्द्र मोहन पाठक भी उन दिनों सामाजिक उपन्यास ही लिखा करते थे. वेद प्रकाश शर्मा ने भी उपन्यास लेखन की शुरुआत सामाजिक उपन्यासों से ही की.

लेकिन 70 के दशक के मध्य से जिस दौर में फिल्मों में ‘यंग्री यंग मैन; के रूप में अमिताभ बच्चन को सुपर स्टार का दर्जा मिला हिंदी में जासूसी उपन्यास केन्द्रीय विधा के रूप में स्थापित होने लगी. इसी दौर में ओमप्रकाश शर्मा ने नए सिरे जासूसी उपन्यास लिखने शुरू किये, वेद प्रकाश शर्मा की पहचान बनी और सुरेन्द्र मोहन पाठक भी रौशनी में आने लगे.

अगले करीब 25 सालों तक जासूसी उपन्यास हिंदी के लोकप्रिय लेखन की केन्द्रीय विधा बनी रही. जाने माने लेखक प्रियदर्शन का मानना रहा है कि वह दौर शीत युद्ध का दौर था. दुनिया भर में जासूसी बहुत अधिक हो रही थी. इन उपन्यासों में अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए कहानी का ताना-बाना बुना जाता था और उस ताने बाने में दृष्टि राष्ट्रवादी होती थी. लेकिन 1990 के दशक में जब सोवियत संघ का पतन हुआ तो जासूसी का यह सफल फॉर्मूला भी बिखरने लगा.

अन्तरराष्ट्रीय धटनाओं के ऊपर आधारित जासूसी उपन्यासों के स्थान पर हिंदी में स्थानीय अपराध-कथाओं पर आधारित जासूसी उपन्यासों का दौर शुरू हुआ. वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ की कथा का राजीव गांधी हत्याकांड था. इसी तरह सुरेन्द्र मोहन पाठक ने जासूस जोड़ियों का पुराना फॉर्मूला अपने उपन्यासों में आजमाया जो अगाथा क्रिश्टी आदि अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक लेखिकाओं का आजमाया हुआ सफल फॉर्मूला था.

जासूसी उपन्यासों पर चर्चा के इस क्रम में सुरेन्द्र मोहन पाठक का विशेष उल्लेख किया जाना चाहिए. वे हिंदी के पहले जासूसी लेखक थे जिन्होंने जासूसी साहित्य की धारा को ‘लुगदी उपन्यास’ के विशेषण से मुक्त करवाया. प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन हार्पर कॉलिन्स ने जब हिंदी में प्रकाशन की शुरुआत की तो उनको एक प्रमुख लेखक के रूप में प्रकाशित करना शुरू किया. के जासूसी उपन्यास विधा के मास लेखन के पहले क्लास लेखक हैं. वे हिंदी के पहले लोकप्रिय लेखक हैं जिनकी किताब प्रतिष्ठित प्रकाशक ने न केवल प्रकाशित की बल्कि साहित्य के प्रतिष्ठित मंचों पर उनको गोष्ठियों में बुलाया जाने लगा. उनको सुना गया, उनको पढ़ा गया.

लेकिन इस सच्चाई से आँख नहीं चुराई जा सकती कि यह विधा अब अपने अंतिम दौर में है. जिस विधा की किताबें छापने के लिए दिल्ली से मेरठ तक प्रकाशकों की लाइन लगी रहती थी. आज प्रकाशक नहीं बचे. जैसे-जैसे टीवी का प्रसार समाज में बढ़ता गया है वैसे वैसे गाँव देहातों तक फैला हुआ वह पाठक वर्ग समाप्त हो गया है जिनके कारण लाखों लाखों के संस्करण देखते देखते गायब हो जाते थे. जासूसी उपन्यासों के सबसे बड़े जीवित लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक ने एक बार बड़ी अच्छी बात कही थी कि 90 के दशक में मेरा कोई भी उपन्यास 2 लाख ढाई लाख से कम नहीं बिका अब 35 से 40 हजार छपता और बिकता है. लेकिन असल बात जो है वह यह है कि हिंदी में पाठक पहले से कम होते जा रहे हैं. वास्तव में, एक दौर था जब इस देश के पाठक हिंदी को पहली भाषा के रूप में अपनाते थे अर्थात गाँवों-कस्बों में एक बड़ा वर्ग था जिसको पढने का चस्का हिंदी की इन्हीं किताबों से लगता था जिसको लुगदी साहित्य या सस्ता साहित्य या सड़क छाप साहित्य कहा जाता था. आज आंकड़े बताते हैं कि पढने के लिए पहली पुस्तक के रूप में हिंदी की किताबें चुनने वाला यह वर्ग अब चेतन भगत या रविंदर सिंह जैसे अंग्रेजी लेखकों की किताबें पढता है.

आने वाले समय में इस बात को कौन मानेगा कि वेद प्रकाश शर्मा या सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यासों को लोग किराए पर ले लेकर पढ़ते थे .  मेरे कस्बे सीतामढ़ी में एक पान और दवाई की दुकान चलाने वाले दो दोस्तों में इस बात पर मारपीट हो गई थी क्योंकि पहले ने सुरेन्द्र मोहन पाठक का उपन्यास ‘मैं बेगुनाह हूँ’ किराए पर लेकर समय पर लौटाया नहीं था और दुसरे दोस्त को उपन्यास पढ़े के लिए और इन्तजार करना आखर रहा था.

वह लुगदी जासूसों का सुनहरा दौर था!

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