‘सृजन संवाद’ गोष्ठी में अजय मेहताब की कहानी एवं कहानी कहने पर फ़िल्म प्रदर्शन

जमशेदपुर में एक संस्था है ‘सृजन संवाद‘, जो नियमित रूप से साहित्यिक गोष्ठी करती है और हर बार कुछ विविध करती है. वरिष्ठ लेखिका विजय शर्मा की रपट- मॉडरेटर

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बरसात के बावजूद ‘सृजन संवाद’ की गोष्ठी में लोग पहुँचे। ‘सृजन संवाद’ के छठवें वर्ष की दूसरी गोष्ठी में आज अजय मेहताब के अपनी कहानी ‘इंतजार’ का पठन किया। हमारे समाज के यथार्थ को मुर्दों के माध्यम से दर्शाती कहानी को एक स्वर से सब श्रोताओं ने सराहा। शैलेंद्र अस्थाना ने कहानी की तारीफ़ करते हुए कहा कि कहानी कुछ स्थानों पर थोड़ी और खुल सकती थी। अजय के लेखन में होते विकास पर भी उन्होंने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। मंजर कलीम ने कहा कि उर्दू के शब्दों का प्रयोग सोच-समझ कर किया जाना चाहिए। उन्हें अजय का पढ़ने का अंदाज बहुत भाया। गोष्ठी में पहली बार आए डॉ. राजाराम ठाकुर को कहानी भूत से संबंधित लगी जबकि सबने इसका प्रतिवाद किया। अभिषेक मिश्र ने कहानी में प्रयुक्त यथार्थ और कल्पना को रेखांकित किया। डॉ. आशुतोष झा ने कहानी पर विस्तार से अपनी बात रखते हुए कहानी की भाषा की प्रशंसा की साथ कहानी की त्रुटियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा, थाने में रात को चाय नहीं आती है और न ही बिना नाक पर कपड़ा रखे हुए मुर्दाघर में जाया जा सकता है। कहानी की घटनाएँ अन्य कहानियों को पढ़ने की उत्सुकता जगाती है। अजय ने कहानी में स्थानीय भाषा और मुहावरों का प्रयोग किया है ऐसा उनका कहना था। डॉ. संध्या सिन्हा को लगा कि कहानी में किसान की कथा छोड़ दी गई है, उसके घर-परिवार को भी आना चाहिए था। उन्हें हवा का लोगों की आवाज को आगे बढ़ाना और पुलिस को पीछे ढ़केलना अच्छा प्रतीक लगा। आभा विश्वकर्मा को कहानी सुनते हुए हाल में रोड पर घटी एक घटना याद आई। डॉ. चंद्रावती को कहानी पढ़ने का अंदाज बहुत अच्छा लगा। डॉ. बीनू ने बताया कि दो स्थान पर उन्हें लगा कि अब कहानी समाप्त हो रही है जब कि कहानी आगे चली। मरने के बाद भी जीव इसी दुनिया की उलझनों में उलझा रहता है यह बात उन्हें आश्चर्यजनक लगी। डॉ. विजय शर्मा को कहानी सुनते हुए शुरुआत में फ़िल्म ‘पिपली लाइव’ तथा पंकज सुबीर के उपन्यास ‘अकाल में उत्सव’ की याद आई लेकिन बाद में कहानी दूसरी दिशा में मुड़ गई। कहानी की भाषा कई स्थानों पर काव्यात्मक है। वे संध्या सिन्हा से सहमत नहीं थीं, उन्हें लगा कि कहानी में उपन्यास की भाँति सब कुछ नहीं समेटा जाना चाहिए ऐसा करने से कहानी की अन्वति टूट जाती है। अजय ने कहानी को सकारात्मक नोट पर समाप्त किया है जहाँ आदित्य के गायब होने से जनता एकजुट हो कर थाने के सामने उसकी सच्चाई जानने की माँग कार रही है। उन्होंने कहानी की भाषा, पढ़ने के अंदाज की प्रशंसा करते हुए कुछ शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति जताई। ज्योत्स्ना अस्थाना ने कहा कि कहानी दिखाती है कि हम कितने असंवेदनशील होते जा रहे हैं। अशोक शुभदर्शी तथा सुशांत कुमार ने भी कहानी पर अपनी बात रखी।

कहानी पाठ से पूर्व डॉ. विजय शर्मा ने नीला वेंकटरामन की बनाई फ़िल्म ‘लिविंग स्टोरीज, स्टोरीज टेलिंग ट्रेडिशन्स ऑफ़ इंडिया’ दिखाई। फ़िल्म भारत के विभिन्न प्रदेशों की कहानी कहने की कला को प्रदर्शित करती है। कहीं यह कथकलि के रूप में है तो कहीं बाउल के रूप में, यक्षगान और पंडवानी भी इसी की कड़ी है और कलमकारी भी। कहानी कहने की परम्परा पर चीमामांडा, अशोक बाजपेयी, गीता हरिहरन, विलियम डालरिम्पल, रस्किन बॉन्ड, गुरुचरण दास, के सचिदानंदन, मुज्जफ़र अली आदि देशी-विदेशी साहित्यकारों ने अपने विचार रखे। फ़िल्म संदेश देती है कि एक कहानी कई तरह से कही जा सकती है। कहानी हमारे अस्तित्व से जुड़ी होती है यह संस्कृति का हिस्सा होती है।

ऐसी साहित्यिक गोष्ठियाँ हमें साहित्य में गहरे उतरने में सहायक होती हैं। धन्यवाद ज्ञापन विजय शर्मा ने किया। ‘सृजन संवाद’ की अगली गोष्ठी १० सितंबर को होनी तय हुई है।

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