होरी खेलूंगी कहकर बिस्मिल्लाह

होली पर यह विशेष लेख जनाब सुहैब अहमद फ़ारूक़ी ने लिखा है। होली कल बीत ज़रूर गई लेकिन इस लेख को पढ़ने का आनंद हमेशा रहेगा-

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होरी खेलूंगी कहकर बिस्मिल्लाह,

नाम नबी की रतन चढ़ी,  बूंद पड़ी इल्लल्लाह,

रंग-रंगीली उही खिलावे, जो सखी होवे फ़ना फ़ी अल्लाह,

होरी खेलूंगी कहकर बिस्मिल्लाह…….

यह कलाम पंजाबी सूफी संत सैयद अब्दुल्लाह शाह क़ादरी उर्फ़ अब्दुल्लाह शाह उर्फ़ बुल्ला शाह का है। यह कमाल पंजाबी ज़ुबान का ही है जो ख़ालिस मुहब्बत की ज़ुबान है जहां पर अब्दुल्लाह जैसा अरबी लफ्ज़ प्यार से बुल्लियाह हो जाता है तो कभी  कभी दुल्ला हो जाता है। वही दुल्ला ‘दुल्ला भट्टी’ वाला। खैर बात होली की करनी है। मैं होली बिस्मिल्लाह कह कर तो नहीं खेलता बल्कि मेरी हिम्मत और औक़ात नहीं कि ऐसी पाक और मुअत्तर होली खेल सकूँ जो नबी के  पवित्तर नाम से से मनसूब हो और हर धडकन ख़ुदा रब्बुल इज्ज़त की वाहिद ज़ात पर फ़ना होने का इक़रार करती हो।

मेरे लिए होली एकाकार होने का फ़लसफ़ा है। जैसे सभी वर्णों से मिलकर एक रंग श्याम वर्ण बनता है । यह ‘श्याम’ ही स्थायी है और सभी रंग और कलफ़ धुल और उतर जाने है। यह श्याम अर्थात कृष्ण ही अनेकता में एकता है। फिर सरशार सैलानी को याद करता हूँ:-

चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है

हम ही हम हैं तो क्या हम हैं,  तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो

सभी रंग और सुगंध के फूल और पौधे एकाकार होकर ही एक चमन का निर्माण करते हैं। हम सभी का अभीष्ट अपने प्रियतम को पाना है जिसका एकमात्र मार्ग प्रेममार्ग है और प्रेममार्ग का सीधा रुट आपको आपका ‘मेन्टर’  दिखाता है तभी तो बुल्ला शाह पुकार उट्ठे, “नाम नबी की रतन चढ़ी,  बूंद पड़ी इल्लल्लाह,

रंग-रंगीली उही खिलावे, जो सखी होवे फ़ना फ़ी अल्लाह, होरी खेलूंगी कहकर बिस्मिल्लाह…”  अंग्रेजी में समझने वाले इसे ऐसे समझें:- I will play Holi in the name of the Lord, Cast like a gem in the name of the Prophet, Each drop falls with the rythm  of Illal-lah, Only he may play with these colourful dyes, who has learnt to lose himself in Allah.

तोतीए हिन्द अमीर ख़ुसरो ने अपने  मेन्टर यानी पीर हज़रत ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया को यूँ पुकारा,

आज रंग है ऐ माँ रंग है री,

मेरे महबूब के घर रंग है री।

अरे अल्लाह तू है हर,

मेरे महबूब के घर रंग है री।

मोहे पीर पायो निजामुद्दीन औलिया,

निजामुद्दीन औलिया-अलाउद्दीन औलिया।

ये तो खैर सूफियाना ढंग हुआ प्रेम के रंग में भीगने का वरना हमतो इबादत भी यूँ करते हैं :-

 मंज़रकशी कुछ ऐसी की वाइज़ ने हश्र की

मस्जिद को हम भी खौफ़ के मारे चले गए( सुहैब फ़ारूकी)

(मंज़रकशी=चित्रांकन/वर्णन, वाइज़= धार्मिक उपदेशक,हश्र=न्यायदिवस)

जहां तक मुझे अपने  बचपन की होली वाली यादें हैं तो याद पड़ता है कि…. मेरे आबाई गाँव (जिला मुरादाबाद) जो कि मुस्लिम बहुल था,  मतलब अब भी है। वहाँ पर होली मनाने वाले बिरादरियों की अलग-अलग टोलियाँ निकलती थीं और गाँव के हर चौक  और  बड़े घरों में  फाग और स्वांग  खेलती थीं । जिनको देख औरतें दीवारों और पर्दों के पीछें आनंदित होती थीं। बिना  दाढ़ी टोपी वाले मुसलमान होली के भडुओं पर खुल के ठहाके लगाते थे और  दूसरे क़िस्म के मुसलमान मन में हँसते थे।  हम जैसे छोटी उम्र के बच्चों जिन पर इस्लामी कानून जुविनाइल तौर पर लागू था उनके साथ सूखा रंग खेल सकते थे।  घर के बड़े उनको बुरा भला कहते हुए मगर, नजराना देते हुए बिदा करते थे।  अब सब बदल गया है  या मुझे पता नहीं क्यूंकि अब तो गाँव से सिर्फ शादी ब्याह और मौत-तद्फीन का वास्ता भर रह गया है। हाँ स्योहारा (बिजनौर) जो मेरा दूसरा वतन है वहाँ धुलेंडी से एक महीना पहले से खुलकर होली खेली जाती थी।

तो भाइयों और बहनों! होली के इस प्रेमपूर्ण अवसर पर ख़ाकसार से भी कुछ अशआर हुए हैं:-

होली आयी हसीं नग़मात का मौसम आया

रंग और नूर की बरसात का मौसम आया

(नग़मात= गीत)

गले मिलते हैं सभी आज बहुत ख़ुश होकर

दोस्ती प्यार के जज़्बात का मौसम आया

नूर ओ नकहत का समाँ लाए अबीर और गुलाल

फिर मुसर्रत की इनायात का मौसम आया

(नूर ओ नकहत= रौशनी और सुगंध,  समां=दृश्य, मुसर्रत=ख़ुशी)

होके मसरूर ज़रा प्यार मुहब्बत बाँटो

इत्र  का  रंग  का  सौग़ात  का मौसम आया

(मसरूर=आनंदित, सौगात=भेंट)

आज मिलते हैं गले राम मुहम्मद जोज़फ़

दोस्तदारी का मुसावात का मौसम आया

(मुसावात=मिलने जुलने का)

नफ़रतें आइए होली मे जला दें मिलकर

आज उलफ़त मे धुली रात का मौसम आया

(उल्फत=प्रेम)

देखिए जिसको यहाँ जाम बकफ़ है सुहैब

जामो मीना का मुदारात  का मौसम आया

(जाम बकफ़= प्याले लिए, मीना=मधु, मुदारात= आव-भगत

तो हज़रात आप सभी को ईद-ए-गुलाबी की पुर ख़ुलूस मुबारकबाद। आप खुद और अपनों के साथ होली मनाइए। हम तो खैर आपके मनाने के बाद मनाएंगे। पुलिस वाले जो ठहरे। हर ख़ुशी और त्यौहार आपकी खुशी और त्योहार के बाद।

अपने इस शेर के साथ बिदा लेता हूँ :-

तमाम रात दर-ए-मैकदा खुला रखियो

सुना है कोई तहज्जुद गुज़ार आएगा

दुआओं में याद रखिएगा!

शब्दार्थ:

(तमाम रात दर-ए-मैकदा खुला रखियो

सुना है कोई तहज्जुद गुज़ार आएगा

( दरे मैकदा का शाब्दिक अर्थ मधुशाला है परन्तु यहाँ उस स्थान से तात्पर्य है जहां  ईश्वरीय प्रेम में मदहोश हो जाएँ : पुलिस की नौकरी के कारण  निर्धारित और  यथोचित समय पर इबादत न कर पाने की पीड़ा है)

disclaimer: असहमति और घृणा दोनों अलग बातें हैं।

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