‘बहत्तर धडकनें तिहत्तर अरमान’ और एक समीक्षा

समकालीन पीढ़ी की सिद्धहस्त लेखिका आकांक्षा पारे काशिव का कहानी संग्रह आया है ‘बहत्तर धडकनें तिहत्तर अरमान’. आकांक्षा चुपचाप अपना काम करती हैं, बिना किसी शोर शराबे के. उनकी कहानियों में जो ‘विट’ होता है वह किसी समकालीन लेखक की रचनाओं में नहीं है. आज उनके इस संग्रह की समीक्षा सुरेश कुमार की लिखी हुई- मॉडरेटर

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युवा लेखिकाओं ने हिन्दी कहानी को बड़े करीने से संवारा हैं। एक लंबी यात्रा के बाद हिन्दी कहानी का स्वरुप और  कथ्य बदला है। अभी हाल में ही प्रकाशित युवा लेखिका आकांक्षा पारे काशिव का कहानी संग्रह ‘बहत्तर धड़कनें तिहत्तर अरमान’ साधारण जीवन के असाधारण अनुभव और रोजमर्रा के यथार्थ का आख्यान कहा जा सकता है। इस कहानी संकलन को पढ़ते समय आंकाक्षाओं, महात्वकांक्षाओं, नागरिक जीवन के बनते बिगड़ते सम्बन्ध, व्यवाहारिक जीवन की दुविधाओं और संवेदनाओं की छटपटाहट का स्वर स्पष्ट तौर पर सुनाई देता है। अधिकांश कहानियों के मूल में ‘प्रेम’ है और उससे उपजा प्रतिरोध भी शामिल है। ‘बहत्तर धड़कनें तिहत्तर अरमान’ कहानी के पात्र अभय शुक्ला और नौरीन दोनों मार्डन फैमली से हैं। दोनों के धर्म अलग है। इसके बावजूद दोनों विवाह करने का फैसला करते हैं। परिवार की थोड़ी अहसमति के बाद शादी कर भी लेते हैं। इसके बाद उनके जीवन में चढ़ाव -उतार आता हैं जिसके चलते उनके प्रेम की परिणति तलाक में होती है। दरअसल, बात यह है कि जिसे हम आधुनिक समाज कहते हैं वह तमाम तरह की पुरातनपंथी ग्रन्थियों की जकड़बन्दी में धंसा हुआ है। कथनी, करनी में अंतर आधुनिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरने देता हैं। इधर, अभय शुक्ला का परिवार चहता है कि नौरीन उन रीति रिवात और परम्पराओं का पालन करें जिन्हे स्त्री गुलामी का प्रतीक माना जाता हैं। विडबंना देखिए नौरीन स्त्री विरोधी परम्पराओं को तो नकार देती हैं लेकिन वह धर्म की जकड़न से मुक्त नहीं हो पाती है। मशीनरी यन्त्रों ने हमारी संवेदनाओं को कुंद किया है। इनकी गिरफ्त में इस कदर है कि हम रिश्तों को भी कम तरजीह देने लगे है। कंट्रोल ए  डिलीट कहानी यंत्रिक उपकरण से  हमारे मानस पर पड़ दुष्प्रभाव को उजागर करती है। इस कहानी का पात्र सुदीप मलिक जो कमप्यूटर का अच्छा जानकार है। एक तरह से वह गेम का मास्टर है। उससे कोई भी गेम नहीं जीत पता है। वह कमप्यूटर में इस कदर खो गया है कि उसे किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं है। खेल के चलते वह अपनी पत्नी अनुरीता को मौत के घाट उतार देता है। इस बात का उसे दुख तक नही है कि उसने अपनी पत्नी को मारा है। वह मशीन की तरह असंवेदनशील हो गया हैं। दिल की रानी, सपनों का शहजादा दो प्रेम करने वाले जज्बात और संवेदना से मुकर जाने वाले प्रेमियों की कहानी हैं। कहानी के दोनों पात्र विशाल और मंजु अपने प्रेम का इजहार पत्रों के द्वारा करते हैं। एक दुसरे को प्रेम पत्र लिखकर अपनी भावनाओं और भविष्य में  एक दुसरे के साथ जीने मरने की कसमें खाते है। इस कहानी में गजब का मोड़ तब आता है, जब मंजू की शादी किसी और लड़के के साथ तय हो जाती है। जिसके चलते प्रेमी अपने आप का छला से महसूस करता है। प्यार की परिणति इस में तब्दील हो जा कि  एक दूसरे  को ब्लैकमेल भी करते है। मंजू अपने अखिरी पत्र में लिखती हैं, ‘तुम तो बड़े खराब निकले। तुमने संजू को ये सब बता दिया और मेरे को चिट्ठी में भी लिखकर धमका रहे हो। संजू सबको बताता फिर रहा है कि में  तुम्हारे संग  कां-कां गयी थी। में तो परिवार के दबाव में शादी कर रही हूं, पर तुम तो अपने प्यार को ऐसे रुसवा कर रहे हो। अगर मेरी बदनामी हो गयी तो मे कहीं की नी  रहूंगी’। यह समाज का कैसा चलन है कि  हर तरह सके स्त्री को ही गलत ठहरता हैं। हिन्दी साहित्य में प्रेम को लेकर काफी लिखा गया। लेखकों नें अपने अपने तरीके से प्रेम को अभिव्यक्त किया हैं। कठिन इश्क की आसान दास्तान कहानी का ताना -बाना लेखिका ने  प्रेम संबन्धों इर्दगिर्द बुना है। इस कहानी के पात्र अरुणाभ चौहान सु़श्री पालीवाल दोनों एक सरकारी स्कूल में अध्यापक है। सुश्री पालीवाल की उम्र चालीस साल है लेकिन उन्होंने अब तक शादी नहीं की है। इधर, अरुणाभ चौहान उनसे  उम्र में काफी छोटा है। एक दिन दोनों शादी कर लेते है। यह देखकर स्कूल के और अध्यापक बड़े अचंभित रह जाते हैं / इस कहानी का सार यही है कि प्रेम में उम्र माइने नहीं रखती हैं। कहानी का कथ्य और शिल्प गजब का है।

 आकांक्षा पारे काशिव सिद्धहस्त कथाकार हैं. मौन को मुखर करना जानती हैं। पाठक को यह पता ही नहीं चलता है कि कब वह प्रेम की अनकही दास्तान में खो गया है। फूलों वाली खिड़की एक मर्मिक प्रेम को व्यक्त करने वाली कहानी है। इस कहानी की शुरुआती पंक्तियां दिमाग में एक तरह की झनझनाहट पैदा करती है। कुछ इस तरह हैं,‘ वे दिन औंधे लेटकर  प्रेम कहानियां पढ़ने और सीधे बैठकर प्रेम कविताएं लिखने के थे। वे दिन उतने ही सच्चे थे ,जितने प्रेम के रतजगे और उतने ही झूठे जितने प्रेम के वादे।’ रिश्ता वही,सोच नयी कहानी स्त्री मन के परतों को खोलने वाली कहानी है। दरअसल, पुरुषवादी मानसिकता से लैस पुरुष स्त्री को अपने सांचे में ढालकर उसका उपयोग करना चाहते है। प्रभजोत जैसी स्त्रिया अब पुरुषों की मानसिकता को बड़ी गहराई से समझने लगी है। वे नहीं चाहती है की प्रेम के नाम पर बार- बार छली और ठगा महसूस करें। कैम्पस लव, मध्यांतर, प्यार-व्यार,निगहबानी आदि कहानियों में समाज में हो रहे छल और प्रपंच को उजागर किया गया हैं। आकांक्षा पारे काशिव की कहानियां में व्यक्ति के समाजिक और भौतिक जीवन में चल रही बेचैनी और उथल पुथल की आहट को महसूस किया जा सकता है। इतना ही नहीं आकांक्षा पारे कहानियों में स्त्री मन के स्वप्न, प्रेम, यथार्थ और उसकी अकुलाहट को  समझने  में हमारी मदद करती है। कथ्य और शिल्प की दृष्टि से कहानियां बेजोड़ हैं।

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कहानी संग्रह -बहत्तर धड़कनें  तिहत्तर अरमान

लेखिका- आकांक्षा पारे काशिव

प्रकाशक-सामयिक प्रकाशन

मूल्य- 125

संस्करण -2018

mob 8009824098

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