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अपूर्णता के सबसे पूर्ण लेखक के बारे में कुछ अधूरी पंक्तियाँ

लेखक ब्रजेश्वर मदान की मृत्यु की खबर आने के बाद ‘कथादेश’ पत्रिका के जून अंक में उनके ऊपर कई सामग्री दी गई, उनको याद किया गया है. इसी अंक में मैंने भी ब्रजेश्वर मदान साहब को याद करते हुए कुछ लिखा है- प्रभात रंजन 

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मेरी जानकारी में ब्रजेश्वर मदान की आखिरी लिखी कहानी ‘चींटी टाइम्स’ है. यह छोटी सी कहानी उस आदमी के बारे में है जो रोज़ सुबह उठकर चीटिंयों को आटा खिलाने निकल जाता था. एक दिन वह निकला तो वापस ही नहीं आया. कई महीने बाद बिहार के जंगलों में उसकी लाश मिली. उसके क्षत विक्षत शव को चींटियाँ खा रही थीं. उसकी जेब में कागज़ मिले थे जिसमें एक चींटी टाइम्स नामक अखबार निकलाने के लिए एक डिक्लियरेशन फॉर्म भरा हुआ था, साथ में एक आवेदन फॉर्म भी था. उसने सरकार से चींटियों के लिए जमीन मांगने के लिए आवेदन लिख रखा था. वह कहाँ से कहाँ कैसे पहुँच गया कुछ समझ में नहीं आया.

बरसों बाद जब मैंने नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखक जे. एम. कोएट्जी का उपन्यास ‘समरटाइम’ पढ़ा तो मुझे ब्रजेश्वर मदान भी याद आये, उनकी यह कहानी भी जो उन्होंने ‘तद्भव’ पत्रिका में लिखी थी. कोएट्जी का उपन्यास व्यर्थताबोध के ऊपर लिखा गया था. एक बहुत प्रसिद्ध लेखक की मृत्यु के बाद एक युवा लेखक उसकी जीवनी लिखने निकलता है तो पाता है कि इतने बड़े लेखक की मृत्यु के बाद भी जिसकी इतनी चर्चा होती थी, जिसका लिखा इतना पढ़ा जाता था, उस लेखक के बारे में, उसके जीवन के बारे में जानने वाले पांच लोग बड़ी मुश्किल से निकलते हैं. वे भी उसके बारे में बहुत बताकर भी बहुत कुछ नहीं बता पाते.

ब्रजेश्वर मदान बड़े या छोटे तो पता नहीं लेकिन हिंदी के लेखक थे. सिनेमा लेखन के लिए उनको पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. उनकी कहानियां हिंदी के लगभग सभी प्रमुख संचयनों में मौजूद हैं. लेकिन धीरे धीरे वे सबकी नजरों से गायब हो गए. लकवे के बाद उनकी आवाज जाती रही. वे अपने जीते जी किस्से-कहानियों में बदल चुके थे. हमारी बातचीत से वे कभी ओझल नहीं हुए. लेकिन हमने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि उनका क्या हुआ, वे कहा हैं. हम उनके बारे में

कोई एक अच्छी बात करते, सोशल मीडिया पर उनसे अपनी नजदीकी को लेकर एक कोई प्रसंग लिखते और फिर यह मानकर खुश हो जाते कि वे जिन्दा हैं. कहने को शशिभूषण द्विवेदी उनके बहुत करीब था, कहने को मैं उनका करीब था. लेकिन हमने कभी यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि 2011 में लकवाग्रस्त होने के बाद अगर वे जीवित हैं तो किस हालत में हैं. मेरे कॉलेज के सीनियर नरेशा शर्मा का कहना था कि वह दो बार उनकी नोयडा वाली कोठी में गया था उनके बारे में पता करने. वहां उनके जो रिश्तेदार रह रहे थे उनको भी उनके बारे में कुछ पता नहीं. जिनको विरसे में उनका घर मिला था उनको भी उनके बारे में कुछ पता नहीं था. हम सोशल मीडिया के दौर में उनको किम्वदंती बनाकर अपनी अपनी संवेदना का झूठा खेल खेल रहे थे.

खेलते रहते अगर एक दिन मेरे ब्लॉग जानकी पुल पर आकर उनके भाई के पोते आदित्य मदान ने उनके ऊपर प्रकाशित एक किम्वदंतीनुमा लेख में यह नहीं लिख दिया होता- ही इज नो मोर! वह लेख शशिभूषण द्विवेदी का ही लिखा था. बहरहाल, इस कमेन्ट का सिरा थाम कर जब मैं उनके भाई के परिवार के सदस्यों के पास पहुंचा तब पता चला कि उनका देहांत 16 अक्टूबर 2016 को ही हो चुका था. हम पांच साल उनके होने न होने का खेल खेलते रहे. लेकिन जब सच में यह पता चला कि वे नहीं रहे तो लगा कि अब ख़त्म हो गया.

एक साथ जो टुकड़ों टुकड़ों में ही सही लेकिन बहुत लम्बा था.

1989 में मैं जब दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज में पढता था, हॉस्टल में रहता था. उन दिनों मेरे सीनियर नरेश शर्मा थे. वे मैथेमैटिक्स पढ़ते थे, बहुत अच्छे छायाकार थे. बाद में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट से उन्होंने सिनेमाटोग्राफी की पढ़ाई भी की. नरेश शर्मा उन दिनों कॉलेज में फोटोग्राफी क्लब चलाते थे और हम लोगों को तस्वीरें खींचना सिखाते थे. वह ज़माना और था. आज की तरह सब कुछ डिजिटल नहीं हुआ था.

बातचीत में नरेश हमें बताते कि उनकी कहानियां ‘सिनेमा ऑपरेटर’ को लेकर वह शोर्ट फिल्म बनाना चाहता था. वह अकसर बताता कि दरियागंज में ब्रजेश्वर मदान का दफ्तर था. जहाँ वे ‘फ़िल्मी कलियाँ’ नमक पत्रिका का संपादन करते थे. वह अक्सर वादा करता कि मुझे एक दिन मदान साहब से मिलवायेगा. उन दिनों मैं लिखकर कमाने के इंतजाम में लगा रह था. तब पत्र-पत्रिकाओं में छपने के लिए संपादकों से मिलना जुलना शुरू कर दिया था. जब नरेश ने कई बार वादा करके उनसे नहीं मिलवाया तो उसके बताये क्लू के सहारे दरियागंज की 21 नंबर गली पहुँच गया. मेरे मन में सिनेमा, फिल्म पत्रकारिता को लेकर बड़ा ग्लैमर का भाव था. बड़े बड़े फ़िल्मी सितारों की धज्जियाँ उड़ाने वाली पत्रिका का दफ्तर भी उसी तरह का होता होगा. एकदम वैसे जैसे फिल्मों में देखते थे.

बड़ी निराशा हुई. जब पहली बार उनसे मिला तो उनका एक छोटा सा दड़बानुमा दफ्तर था जिसमें एक साधारण सा मझोले कद का आदमी सादे पन्ने पर कुछ लिख रहा था. कमरे में और भी लोग बैठे. मैंने सोचा था कि संपादक का बड़ा सा चैंबर होगा, जिसमें मुझे चिट भेजनी होगी. फिर मुझे अन्दर बुलाया जायेगा. लेकिन पूछने पर पता चला कि वह लिखने वाला आदमी ही ब्रजेश्वर मदान था. ‘फ़िल्मी कलियाँ’ का संपादक. उस पत्रिका का जिसके पन्नों पर सीतामढ़ी में रहते हुए ही मैं हर महीने सिनेमा के बारे में पढ़ा करता था. मैं उसी पत्रिका के संपादक से सामने था और उसके लिए लेखक बनना चाहता था. सिनेमा पर लिखने का सपना अधूरा रह गया क्योंकि पता चला कि पूरी पत्रिका मदान साहब ही लिखते थे. संपादक के रूप में उनका यही काम था.

लेकिन उस पहली मुलाक़ात में ही वे इतने सहज लगे कि फिर कभी उनसे समय लेकर मिलने जाना ही नहीं हुआ. उन दिनों यूरोपीय सिनेमा देखना, उनके बारे में जानना बौद्धिक होने की एक बड़ी निशानी मानी जाती थी. बुनुएल, फेलिनी, इंगमार बर्गमैन, कुरोसावा इनके बारे में जानने के लिए इनकी फिल्मों को देखने के मौके तलाश करता रहता था. आज की तरह न गूगल था, न इंटरनेट से फ़िल्में डाउनलोड करने की सुविधा. इसलिए ज्ञान सीखने के लिए गुरुओं की संगत करनी होती थी. मदन साहब ने फिल्म के लिए लिखने का मौका कभी नहीं दिया लेकिन फ़िल्म की इस रहस्यमयी दुनिया में घुसने का रास्ता उन्होंने जरूर दिखाया.

तब यूरोपीय दूतावासों में या सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में फिल्म फेस्टिवल होते थे जिनमें बिना पास के जाना असंभव होता था. कम से कम दो फेस्टिवल में उन्होंने मेरे लिए पास बनवाया. एक तो फेलिनी की फिल्मों के रेट्रोस्पेक्टिव और दूसरे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का. 90 के दशक के आरंभिक वर्षों में फिल्म फेस्टिवल देखने का जो जादू था वह आज नहीं है. उनके साथ साथ न जाने कितने फिल्मकारों से मिला. सब उनका सम्मान करते थे. खासकर कुमार शाहनी. ऋत्विक घटक के शिष्य और कला फिल्मों के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक कुमार शाहनी की फिल्मों को उस तरह से कोई नहीं समझा सकता था. आज देखता हूँ कि इंटरनेट के इस दौर में कुमार साहब की फिल्मों को लोग भूल गए हैं, लेकिन उनकी फिल्मों तरंग, कस्बा, खयालगाथा के ऊपर उस दौर में उतना अच्छा किसी ने नहीं लिखा था. किस तरह से उनकी फिल्मों में एकरेखीय कथात्मकता नहीं होती थी बल्कि दृश्यों के माध्यम से परदे पर कविता रचती फ़िल्में वे बनाते थे. किस तरह से उनकी फ़िल्में ऋत्विक घटक की फिल्मों के सबसे करीब थी. उनके लिखे लेखों को पढ़कर मैंने कुमार शाहनी की फिल्म ‘कस्बा’ देखी थी जो मेरे नजरिये से शत्रुघ्न सिन्हा के जीवन की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है.

बात उनके होने न होने से शुरू हुई थी अब कुछ बात उनकी फिल्म पत्रकारिता, फिल्मवालों से उनके रिश्ते और आज की फिल्म पत्रकारिता से उस दौर की फिल्म पत्रकारिता के अंतर को समझना भी जरूरी है. आज फिल्म पत्रकार फिल्म प्रोमोशन में खुलेआम भाग लेते हैं. फ़िल्मी कलाकारों के साथ फोटो खिंचवाते हैं और उसको साझा भी करते हैं. और इसमें किसी को कोई परेशानी भी नहीं दिखती.

एक दिन मदान साहब ने शाम को मुझे बताया कि तू जानता नहीं है कि अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘जंजीर’ की पब्लिसिटी मैंने की थी. मैं चौंक गया. बोला, इतनी बड़ी बात आप छुपा कर क्यों रखते हैं? इस बात को कोई जानता क्यों नहीं है? उन्होंने कहा, देखो बेटा, मैं पत्रकार था. पत्रकार का काम फिल्म की आलोचना करना होता है उसका प्रचार करना नहीं. इसलिए इस बात को मैंने सिर्फ इसलिए किया था क्योंकि मुझे बच्चन जी ने खुद बुलाकर कहा था कि अमित की फिल्म की पब्लिसिटी तुम संभाल लो. उसकी फ़िल्में ठीक से चल नहीं रही हैं. यह उसकी अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म है. यह नहीं चली तो उसका कैरियर डांवाडोल हो जायेगा. तब फिल्म पत्रकारों की साख होती थी. अपना रुतबा होता था. लेकिन 90 के दशक में वह धीरे धीरे ख़त्म होने लगा.

मुझे याद आता है. शायद 1992 का साल था. शत्रुघ्न सिन्हा नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से राजेश खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले थे. उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस होलीडे इन होटल में रखी थी. आज जिस होटल का नाम ललित है उसका नाम तब होलीडे इन था. ललित सूरी का वह होटल उन दिनों शत्रुघ्न सिन्हा का पसंदीदा होटल था. मैं उस दिन अचानक मदान साहब से मिलने पहुँच गया. वे अपना बैग संभाले तैयार हो रहे थे. बोले, आओ तुमको बिहारी बाबू से मिलवाने ले चलता हूँ. वे जानते थे कि मैं शत्रुघ्न सिन्हा का दीवाना था. शत्रुघ्न सिन्हा ने देखते ही मदान साहब का स्वागत किया. लेकिन सवाल पूछते हुए उन्होंने कोई मुरौवत नहीं बरती और शॉटगन से पूछ दिया- तो अब अब बिहारी बाबू सुपर स्टार को हराकर सुपर स्टार बनना चाहते हैं?

यह बहुत चुभता हुआ सवाल था. शत्रुघ्न सिन्हा के दिल की यह सबसे बड़ी फांस थी उन दिनों कि अमिताभ बच्चन सुपर स्टार बन गए. वे इतने अच्छे एक्टर होकर भी नहीं बन पाए. मुझे याद है अपने अन्दाज में शत्रुघ्न सिन्हा ने जवाब दिया था- ‘इस दीपक में तेल नहीं है!’

वे असली कलमबाज़ थे. जो भी कमाया लिखकर कमाया. लेकिन बाद के दिनों में सब कुछ बदलता जा रहा था और वे उसके साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे. अचानक से पत्र-पत्रिकाएं बंद होती जा रही थीं. लिखने के स्पेस कम होते जा रहे थे. जिस फिल्म पत्रकारिता ने उनको नाम दिया, ईनाम दिया, पैसा दिया उससे जैसे उनको विरक्ति सी हो रही थी. वे जिस यूरोपीय सिनेमा के विशेषज्ञ थे गूगल देखकर कोई भी उसका विशेषज्ञ बन जा रहा था. जिस कला सिनेमा, जिस कुमार शाहनी की फिल्मों के वे विशेषज्ञ थे उसके बारे में जाने की किसी में दिलचस्पी नहीं रह गई थी.

जो कुछ भी ठोस था सब पिघल रहा था!

आखिरी बरसों में वे सहारा समूह में रहे. उनके साथ लम्बे साहचर्य के दौरान उनके साथ सबसे अधिक समय गुजारने का मौका तभी मिला. एक कारण यह था कि मैं तब आसपास ही रहता था. दोपहर के वक्त अकसर आ जाता था. शाम के समय भी आता था. लिखने या पढने में उनकी कोई ख़ास आस्था नहीं बच गई थी. हालाँकि वे बहुत लिखते थे. लेकिन मैंने पाया कि वे अकसर अभ्यास से ही लिख  देते थे. एक प्रसंग याद आता है उदयन वाजपेयी का कहानी संग्रह आया था ‘दूर देश की गंध’. एक दिन जब मैं उनसे मिलने गया तो मेरे हाथ में वही किताब थी. उसे लेकर कुछ देर देखते रहे. उनकी एक कहानी ‘सुदेशना’ के बारे में बताते रहे. फिर मैं वह किताब उनकी ही सीट पर रखकर सहारा के दफ्तर में अन्य लोगों से मिलने चला गया. तब मंगलेश जी भी वहीं थे. मेरा दोस्त शशिकांत और शशिभूषण द्विवेदी, विमल झा बहुत सारे लोग थे. शशिकांत के साथ नीचे रेस्तरां में खाने चला गया. घंटे डेढ़ घंटे के बाद जब लौटा तो देखा कुछ लिख रहे थे. मैं बैठ गया. थोड़ी देर बैठने के बाद मेरी तरफ मुड़े और बोले कि जरा किताब की डिटेल लिखवा देना, मतलब प्रकाशक, मूल्य, प्रकाशन वर्ष आदि… मैं समझ नहीं पाया. उसके बाद उन्होंने फुलस्केप में लिखे ढाई पन्ने मेरी तरफ बढ़ा दिए. उदयन वाजपेयी के कहानी संग्रह की समीक्षा थी. मैंने पूछा, आपने बिना पढ़े ही लिख दिया? जवाब में वे बोले, समीक्षा पढ़कर थोड़े हही लिखी जाती है, लेखक के पर्सपेक्टिव को समझते हुए उसके ऊपर लिखना चाहिए. तुम लोग क्लास रूम शैली में फंसे रह जाते हो. स्कूल के जमाने से ही व्याख्या पढने रहते हो पढ़ाते रहते हो. सच में उदयन वाजपेयी की कहानियों पर उतनी मैच्योर टिप्पणी कम ही लोगों ने लिखी है. आज भी मैं इस राय पर कायम हूँ.

उन दिनों मैंने देखा था कि कभी कभी आपदधर्म निभाने के लिए उनको अगर फिल्म पर भी लिखना होता था तो वे हॉल में जाते थे लेकिन फिल्म पूरी देखे बिना ही लौट आते थे और उसके ऊपर बहुत लिख देते थे किसी साधे हुए माहिर समीक्षक की तरह.

उनका मन उस सबसे उखड़ता जा रहा था जिसमें जमता आया था. वे उन उखड़े हुए दिनों में कविताएँ लिखने लगे थे. किसी सधे हुए कवि की तरह. उनका एक कविता संग्रह प्रकाशित हुआ- आलमारी में रख दिया है घर. उन दिनों जीवन में बिलकुल अकेले हो गए थे. उन्हीं दिनों एक बार उन्होंने मुझे अपने यहाँ खाने पर बुलाया. बोले कि आज मैं अपने हाथ से तुम्हारे लिए पकाऊंगा. यह बहुत हैरानी की बात थी मेरे लिए. वे दिन रात दोनों वक्त ढाबे से खाते थे.

मैं लंच पर गया. उन्होंने मटन पकाया था मेरे लिए. कुकर में मीट को पानी के साथ डालकर खूब सारी सीटी लगाकर पकाया था. हमने उसके ऊपर नमक और काली मिर्च डाली और खूब मन से खाई. उनके लेखन की तरह उसका स्वाद भी बहुत अलग था.

कई किताबें लिख रहे थे, कहानियां, संस्मरण, फ़िल्मी जीवन के किस्से… कुछ भी पूरा नहीं हुआ. वे शायद कुछ पूरा करना चाहते ही नहीं थे. मुझे याद है उनके कहानी संग्रह ‘बावजूद’ की भूमिका में उदय प्रकाश ने उनकी कहानियों पर निर्मल वर्मा के हवाले से लिखा था, “यह एक भटकती हुई आत्मा की डायरी है. डायरी का हर सत्य अगले पन्ने के सत्य की प्रतीक्षा में अधूरा पड़ा रहता है, अधूरा और प्रतीक्षारत…”

सच बताऊँ तो उनकी मृत्यु के पांच साल बाद ही सही जब मुझे उनकी मृत्यु का पक्का समाचार मिला तो मैंने राहत की सांस ली- मृत्यु ने उनके जीवन-लेखन की अपूर्णता से उनको मुक्ति दिला दी थी.

वे अपूर्णता के सबसे पूर्ण लेखक थे!

 

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