तन्हाई का अंधा शिगाफ़ : भाग-4

आप पढ़ रहे हैं तन्हाई का अंधा शिगाफ़। मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात से जुड़ी बातें, जिसे लिख रही हैं विपिन चौधरी। आज पेश है चौथा भाग – त्रिपुरारि ========================================================

स्टारडम की राह यानी रेड कारपेट का खुलना

बैजू बावरा के हिट होते ही मीना कुमारी, रातों-रात स्टार बन गयी। इसके बाद तो लगातार हर साल ही उन्होंने हिट फ़िल्में दीं। लेकिन मीना कुमारी के जीवन में सब कुछ इतना आसान नहीं था जैसे-जैसे मीना कुमारी, प्रसिद्धी के शिखर पर चढ़ती गयी, वैसे-वैसे उनका जीवन कठिन होता गया. उनके पिता अली बक्श का शिकंजा उनपर कसता चला गया, उनके लिए नियम-कानून बनाये गए, समाज और घर-परिवार की दुहाई दी गयी. एक समय कम चर्चित फिल्मों में काम करने वाली मीना कुमारी का स्टार बनना कई चीज़ों को साथ लाया. फिल्मों में उनकी प्राइस-मनी भी बढ़ी और उन्होंने एक शानदार गाड़ी भी ले ली.

अगले ही साल मीना कुमारी ने फिल्म परिणीता ( 1953) में अभिनय किया. परिणीता, शरतचंद्र चटर्जी द्वारा लिखे गए उपन्यास पर आधारित फिल्म थी. फिल्म की प्रष्ठभूमि बंगाली थी, मीना एक बंगाली युवती के रूप में खूब जची. 50 के दशक में मीना कुमारी ने जिन फिल्मों में अभिनय किया उसमें, फुटपाथ 1954, शारदा 1957 और यहूदी 1958 थी. इन सभी फिल्मों को दर्शकों और फिल्म समीक्षकों ने खूब सराहा. फ़िल्में अब मीना के जीवन का अहम् हिस्सा हो चुकी थी.

इस समय तक मीना के चेहरे पर से हंसी गायब नहीं हुयी थी

मीना कुमारी के हिस्से कुछ ऐसी फ़िल्में भी आयी जिसका कथानक मनोरंजक होने के कारण हंसी-मजाक से परिपूर्ण होते थे. दिलीप कुमार, शिवाजी गणेशन, देव आनंद जैसे नायकों के साथ शरारत करती मीना कुमारी की ये फ़िल्में देखना बहुत सुहाता है. आँखों में चमक, खनकती हंसी वाली यह मीना कुमारी, बाद वाली मीना कुमारी से कितनी अलग दिखती है यह देखने वाली खुद महसूस कर सकते हैं.

हंसी-खुशी से लबरेज़ इन किरदारों में रंग भरती हुयी चुलबुली मीना कुमारी, धडाधड कई फ़िल्में साइन करती जा रही थी. हास्य-विनोद की ऐसी ही कुछ फिल्मों के नाम थे, शरारत, मेम साहब, मिस मैरी, आज़ाद और तमाशा. मीना कुमारी के जीवन के भी ये खुशनुमा साल थे. समय ठीक-ठाक चल रहा था, मीना कुमारी ही हंसी में दरारें पड़ने का समय अभी नहीं आया था. खुद मीना कुमारी को लगने लगा था कि अब जीवन इतना नहीं सतायेगा, जितना उसने बचपन में सताया था. गरीबी का हर वक़्त कन्धों पर चढ़े रहने वाला भार और माँ के जाने का दुःख भी अब कुछ हल्का पड़ गया था. हर वक़्त चाहने वालो की भीड़ उन्हें घेरे रहती, प्रशंसकों के पत्रों के बड़े-बड़े अंबार उन्हें एक नयी दुनिया में ले जाते थे. बहनों और रिश्तेदारों की चुहल अब आनंद देने लगी थी हालाँकि पिता अब भी पिता ही थे जो सख्ती को अपने साथ लेकर प्रकट होते पर इसमें कोई शक नहीं कि मीना कुमारी की प्रसिद्धी का आनंद वे भी खूब उठा रहे थे.

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