आज पढ़िए अंग्रेज़ी के महान लेखकों में एक वी. एस. नायपॉल का लेख जैस्मिन हिन्दी अनुवाद में। यह बहुत महत्वपूर्ण लेख है जो अंग्रेज़ी भाषा पर औपनिवेशिक प्रभावों और उससे मुक्ति को लेकर है। इस लेख में लेखक बहुत स्पष्ट रूप से कहता है कि अंग्रेज़ी मेरी भाषा है लेकिन उसकी साहित्य परंपरा नहीं। यह उत्तर-औपनिवेशिक लेखकों का वह द्वंद्व है जो अंग्रेज़ी साहित्य में डैफ़ोडिल जैसे अनजाने फूल को पढ़ता रहता है लेकिन अपनी संस्कृति के फूल जैस्मिन यानी चमेली का नाम नहीं जानता। भाषाई और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े इस महत्वपूर्ण लेख का बेहतरीन अनुवाद किया है युवा लेखक आशुतोष कुमार ठाकुर ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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लगभग दस वर्ष पहले की बात है। उन दिनों मैं बीबीसी की कैरिबियन सेवा के लिए एक साप्ताहिक साहित्यिक कार्यक्रम का संपादन कर रहा था। एक दिन त्रिनिदाद से आया एक व्यक्ति पुराने लैंगम होटल के उन कमरों में मुझसे मिलने आया, जो स्वतंत्र लेखकों के लिए आरक्षित होते थे। वह मेज़ के किनारे बैठ गया, टाइप की हुई कुछ पांडुलिपियाँ मेज़ पर धप्प से रखीं और बोला, ‘मेरा नाम स्मिथ है। मैं सेक्स के बारे में लिखता हूँ। मैं एक राष्ट्रवादी भी हूँ।’
सेक्स का चित्रण फीका था, विलियम समरसेट मॉम के अंदाज़ में नारियल-पानी जैसा। राष्ट्रवाद उसके उलट बहुत आक्रामक था। उसकी कहानियों में स्त्रियाँ नारियल के पेड़ों की तरह लचकती थीं, उनकी त्वचा सपोटा यानी चीकू के रंग की थी। उनके मुँह के भीतर का रंग कटे हुए स्टार-एपल जैसा था और उनके दाँत नारियल की गिरी की तरह सफेद थे। और प्रेम करते समय वे तेज़ हवा में हिलते बाँसों की तरह कराहती थीं।
वह लेखक उस धारणा का विरोध कर रहा था जो अंग्रेज़ी भाषा ने हम पर थोपी थी। हम उसका इस्तेमाल जैसे चाहें, कर सकते थे। उसके साथ जो साहित्य आया था, उसका अपना एक विशिष्ट प्रभाव था। वह साहित्य हमारे लिए किसी बाहरी पौराणिक संसार जैसा था। जैसे, वर्ड्सवर्थ की वह मशहूर कविता जिसमें डैफ़ोडिल फूल का ज़िक्र है। फूल निश्चय ही सुंदर रहा होगा, पर हमने उसे कभी देखा नहीं था। तो फिर उस कविता का हमारे लिए क्या अर्थ था?
इस तर्क के पीछे एक वजह राजनीतिक भी थी। अगर इसे पूरा मान लिया जाए तो हर साहित्य को उसी देश तक सीमित करना पड़ेगा जहाँ से वह आया है। लेकिन इसके पीछे हमारे अपने समाज को लेकर भी एक बेचैनी थी। हमारा समाज अभी बन ही रहा था। हमारे पास अपनी कोई पौराणिक परंपरा नहीं थी। इसलिए हमारे लिए हर साहित्य बाहरी था।
त्रिनिदाद छोटा था, दूर था और दुनिया के लिए महत्वहीन भी था। हम जानते थे कि किताबों में हमें अपने आस-पास के जीवन का ज़िक्र मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। किताबें किसी दूर की दुनिया से आती थीं। वे हमारे लिए सिर्फ़ एक कल्पना, एक तिलिस्म ही बुन सकती थीं।
किताब खोलते ही मुझे खुद को बदलना पड़ता था। ठीक उस उत्तर-मध्यकाल के मूर्तिकार की तरह, जो पुराने धर्मग्रंथों की कहानियों को अपने गाँव के जीवन में ढाल लेता था। मुझे भी किताब की पूरी दुनिया को अपने साँचे में फिर से गढ़ना पड़ता था। मैं डिकेन्स के लंदन के सारे वर्णन मन से हटा देता था। मिस्टर माइकॉबर जैसे पात्रों के कपड़े तो चित्रकार वाले ही रहने देता था, पर उनके चेहरे और आवाज़ें मेरे जाने-पहचाने लोगों की होती थीं। मैं उन्हें उन्हीं इमारतों और गलियों में बसा देता था, जिन्हें मैं जानता था।
यह बदलाव अपने आप, लगातार होता रहता था। डिकेन्स की बूँदाबाँदी और महीन फुहार को मैं उष्णकटिबंध की मूसलाधार वर्षा में बदल देता था। बर्फ और कोहरे को मैं किताबों की एक परंपरागत बात मानकर स्वीकार कर लेता था। पर कोई चित्र या कोई ऐसी बात जो मुझे यह एहसास दिलाती कि मेरी यह आदत कितनी अजीब है, मुझे असहज कर देती, तो मैं उसे नज़रअंदाज़ कर देता था। हर उस चीज़ को भी मैं मन से निकाल देता था जो मेरे बनाए हुए उन पात्रों को मेरे ही कल्पना-लोक से बाहर खींचने की कोशिश करती थी।
मैं किताबों में कल्पना की तलाश में जाता था, पर मुझे उसमें यथार्थ भी चाहिए था। ‘द मिल ऑन द फ्लॉस’ के जिप्सी मुझे बनावटी लगे। वे निराशाजनक थे। उन्होंने किताब में मौजूद कई सच्ची बातों को भी अविश्वसनीय बना दिया था। मेरे लिए तो जिप्सी भी मिथकीय प्राणी ही थे। वे हान्स क्रिश्चियन एंडरसन और ‘द हीरोज’ की पूरी तरह काल्पनिक दुनिया के जीव थे।
और उस बूढ़े सिपाही की तलवार वाला किस्सा भी मुझे बहुत निराश करने वाला लगा। मैं समझता था कि तलवारें सिर्फ पुराने ज़माने में होती हैं। जबकि मेरे मन ने टॉम टुलिवर को मेरे ही मोहल्ले के लड़के के रूप में गढ़ा था। वह मेरी ही गलियों में घूमता था।
इसलिए मैंने कई किताबों को मन ही मन त्रिनिदाद में ला दिया था। ‘द मिल ऑन द फ्लॉस’ का शुरुआती हिस्सा, ‘ऑलिवर ट्विस्ट’, ‘निकोलस निकलबी’ और ‘डेविड कॉपरफील्ड’ के कुछ अध्याय एच. जी. वेल्स के कुछ उपन्यास और कॉनराड की कहानी ‘द लैगून’ भी। ये सब किताबें मैंने बचपन में पढ़ी या सुनकर जानी थीं।
मैंने उन्हें जस का तस स्वीकार नहीं किया। कुछ को मन से अपनाया, कुछ को छोड़ दिया। कुछ को अपनी रुचि से नया रूप दिया, और उनमें अपने ही लोगों की साँस भर दी।
मैंने कभी यह जानने के लिए किताबें नहीं पढ़ीं कि दूसरे देश कैसे होते हैं। किताबों में तो सब कुछ पराया था। हर चीज़ को मुझे अपने मन के अनुसार ढालना पड़ता था। किसी भी अंग्रेजी उपन्यास में जो बात मेरे काम की होती, जो मुझे अपनी सी लगती, वह उसी क्षण मेरे लिए पराई नहीं रह जाती थी। जैसे मिस्टर मर्डस्टोन मेरे काम का था, पर मिस्टर पिकविक और उनका क्लब नहीं था। जेन आयर और वुदरिंग हाइट्स मेरे भीतर ठहर गईं, पर प्राइड एंड प्रेजुडिस नहीं ठहरी। मोपासाँ ठहर गया, बाल्ज़ाक नहीं ठहरा।
मैं किताबों के पास एक तरह की साझेदारी के लिए जाता था। सामाजिक भेद के नाम पर मैं सिर्फ अमीर और गरीब का फ़र्क ही जानता था। इससे ज़्यादा जटिल समाज मुझे अवास्तविक लगता। साहित्य में ऐसा समाज सिर्फ अनजाना नहीं था, लगता था मैं उसका हिस्सा ही नहीं हूँ। वह मेरी कल्पना को ही व्यर्थ कर देता। जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ और लिखने का ख़्याल मन में पक्का हुआ, अपने समाज की गरीबी और असमानता और साफ़ दिखने लगे।
मैं डिकेंस को तो त्रिनिदाद में ढाल सकता था। पर त्रिनिदाद की अपनी जिंदगी को किताब में बदल पाऊँगा, यह असंभव लगता था। जैसे कोई कला तब तक कला नहीं बनती जब तक उसे चित्रकार की आँख न देखे, वैसे ही समाज भी तब तक सुघड़ नहीं बनता जब तक उसे शब्द न मिलें।
डिकेंस की किसी तस्वीर को देखकर अपने किए हुए सारे बदलावों के बचकानेपन पर मुझे शर्म आती थी। जो कुछ मैं देखता था, उसके बारे में लिखने की कोशिश करना भी उतना ही असहज था।
मैंने जो कुछ पढ़ा था, उसमें से बहुत कम मेरे काम का था।
किसी एक लेखक की संवेदना को ओढ़ लेना मुमकिन था। पर कोई भी लेखक, चाहे उसके विचार कितने ही अपने क्यों न लगें, अपने समाज से अलग नहीं हो सकता था। उसकी दृष्टि परायी थी। वह मेरे अपने अनुभव को छोटा कर देती थी। इतनी हिम्मत भी नहीं देती थी कि मैं अपनी कहानी में पोर्ट ऑफ़ स्पेन की किसी गली का नाम तक लिख दूँ।
कथा-साहित्य का कोई भी काम, चाहे उसकी गुणवत्ता कैसी भी हो, अपने विषय को एक खास गरिमा देता है। जिन चीज़ों को तुच्छ और हँसी-योग्य माना जाता था, उन्हें साहित्य में महत्व देना साहस का काम था। उन्हें मिथकीय अर्थ देना भी साहस था। इसके लिए पुरानी और मान्य मिथक-परम्पराओं को पीछे छोड़ना पड़ता था।
पोर्ट ऑफ स्पेन की फ्रेडरिक स्ट्रीट, मरीन स्क्वायर, लावेंटिल और बारातारिया जैसे इलाकों को साहित्य में जगह देना ऐसा ही साहस था।
यह एक तरह से उस परिचित, अर्थहीन शब्द को अस्वीकार करना था। यह अज्ञात डेफोडिल को हटाकर अपनी ही चीज़ को जगह देना था। सच कहें तो यह उतना ही सजग प्रयास था, जितना सपोटा जैसी साँवली त्वचा वाली स्त्रियों को तेज़ हवा में हिलते बाँसों की तरह कराहते हुए दिखाना।
अंग्रेज़ी साहित्य की पूरी दुनिया मेरे सामने खुली थी, फिर भी मेरी हालत ‘हिंदू हॉलिडे’ के उस महाराजा जैसी थी। जिसे एक ईसाई महिला ने समझाया कि ईश्वर यहाँ है, वहाँ है, हर जगह है। तो महाराजा ने पूछा – ‘इससे मुझे क्या मिलता है?’
मेरे साथ भी यही था। किताबों में सब कुछ था, पर उसमें मेरे लिए क्या था?
मुझे किसी ऐसी चीज़ की ज़रूरत थी जो मेरे लिए ज़्यादा प्रासंगिक हो। वह मुझे स्थानीय कहानियों से मिली। ये शायद कोई दर्जन भर कहानियाँ थीं। ये त्रिनिदाद के बाहर कभी प्रकाशित नहीं हुई थीं। उन्होंने मेरे आसपास की दुनिया को मेरे ‘लेखन’ में बदल दिया।
उन्हीं से मैंने पहली बार समझा कि लेखक की कला चीज़ों को कैसे बदलती है। वह उनमें से सार कैसे निकालती है। जहाँ मुझे सिर्फ एक उबाऊ और बिखरी हुई दुनिया दिखती थी, वहाँ उन्होंने एक क्रम खोज लिया था। जहाँ मैं अपनी दुनिया को सजा-संवार कर किताबों के बराबर खड़ा करना चाहता था, वहाँ उन्होंने उसे वैसा ही स्वीकार किया था, जैसी वह थी।
आखिरकार हर लेखक को अपना रास्ता अकेले ही तय करना पड़ता है। पर सच यह है कि अगर पीछे कोई परंपरा खड़ी हो, तो यह अकेलापन थोड़ा आसान हो जाता है। उससे बहुत व्यावहारिक मदद मिलती है।
अंग्रेज़ी भाषा मेरी अपनी थी, पर उसकी साहित्यिक परंपरा मेरी नहीं थी।
इसलिए मेरे लिए साहित्य लंबे समय तक सिर्फ कल्पना ही रहा। शायद इसी वजह से, मैंने बहुत छोटी उम्र में तय कर लिया था कि मुझे लेखक बनना है, और अठारह साल की उम्र में इसी ख्वाहिश के साथ त्रिनिदाद छोड़ दिया था, फिर भी गंभीरता से लिखना तेईस की उम्र में ही शुरू किया।
मेरे लेखन को किसी साहित्यिक परंपरा ने अभी पर्याप्त गरिमा नहीं दी थी। मुझे खुद भी उसके महत्व का वास्तविक ज्ञान नहीं था। मेरे मन में एक तरह की झिझक अभी भी बनी हुई थी।
साहित्य से मेरा लगाव अब बदल गया था। अब मुझे भाषा से प्रेम हो गया था।
स्कूल में मेरे विषय फ्रेंच और स्पेनिश थे। साहित्य पढ़ने में जितना आनंद आता था, उतना ही आनंद भाषा को जानने में भी आता था। मोपासाँ और मोलियर महान थे, इसमें संदेह नहीं। पर कॉर्नेली या रासीन को पढ़ने की बजाय मुझे बड़े हाराप फ्रेंच-अंग्रेजी शब्दकोश के साथ बैठना ज्यादा अच्छा लगता था। वहाँ एक-एक शब्द के साथ दिए गए उदाहरणों से मैं भाषा को और भीतर तक समझ पाता था।
मुझे लगा, मैं ये दोनों भाषाएँ सीख चुका हूँ। हालाँकि अब ये दोनों ही धुंधली पड़ गई हैं। इसलिए जब मैं विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए इंग्लैंड आया तो मैंने अंग्रेज़ी पढ़ने का निश्चय किया।
यह एक भूल थी।
अंग्रेज़ी का पाठ्यक्रम साहित्य से लगभग कटा हुआ था। वह महज़ एक ‘अनुशासन’ था, जिसका लक्ष्य कुछ ऐसा लगता था जैसे किशोर पुरातत्ववेत्ताओं की एक जमात तैयार करनी हो। उसने उपन्यास और गद्य के उन छोटे-छोटे अंशों को लगभग बाहर ही कर दिया था, जिनमें सच में साहित्य का सारा वैभव बसा था। एक अजीब और अनकही सहमति के तहत उसका सारा ध्यान कविता पर था। और चूँकि वह अठारहवीं सदी पर आकर रुक जाता था, इसलिए शेक्सपियर के गहन अध्ययन के बाद वह स्थानीय लेखकों के एक सर्वेक्षण भर में बदल जाता था।
मैंने लेखन के विशाल संसार में घूमने की कल्पना की थी। लेकिन मेरे सामने ‘पाठ’ रख दिए गए।
मेटाफ़िज़िकल कवि अध्ययन के लिए निश्चय ही आदर्श विषय थे, किसी अकादमिक अनुशासन के लिए उपयुक्त सामग्री। पर सच कहूँ तो मेरे लिए उनका कोई मूल्य नहीं था।
ड्राइडन, अपने गद्य की सहज मधुरता के बावजूद, मुझे उथला और अविश्वसनीय लगता था। क्या उसकी ‘आलोचना’ इतनी श्रद्धा के साथ पढ़े जाने योग्य थी? गुलिवर्स ट्रेवल्स उत्कृष्ट था। लेकिन द टेल ऑफ़ अ टब और द बैटल ऑफ़ द बुक्स को कैसे सहा जाए?
सच तो यह भी था कि मुझे विद्वत्ता में कोई रुचि नहीं थी। न ही मुझे साहित्यिक धाराओं और प्रवृत्तियों के विकास-क्रम को समझने का कोई मोह था। मैं तो साहित्य को जीवन से जोड़कर देखना चाहता था।
स्कूल में मिली शिक्षा ने इस दिशा में मेरी कोई विशेष सहायता नहीं की थी। हमारे पास पुस्तकालय बहुत कम थे, और साहित्य के इतिहास तक ले जाने वाली पुस्तकें तो और भी कम। जब हम ‘तार्तूफ़’ पर निबंध लिखते थे, तो नाटक के प्रति अपनी सीधी, सहज प्रतिक्रिया के आधार पर ही लिखते थे।
अब मुझे पता चला कि साहित्य के अध्ययन को वैज्ञानिक बना दिया गया है। हर लेखक तक पहुँचने से पहले विद्वत्ता के बुने हुए न जाने कितने जालों से होकर गुजरना पड़ता था।
Publications of the Modern Language Association of America के बँधे हुए कई खंड थे। छात्र उन्हें आत्मीयता से ‘PMLA’ कहते थे। उन पन्नों पर चॉसर के खगोल-विज्ञान या ज्योतिष-ज्ञान पर लेख होते थे। यह प्रश्न हर साल पूछा जाता था। वे पन्ने हाथों से बार-बार छुए जाने के कारण काले, मोटे और रोएँदार हो गए थे। यहाँ तक कि पेंसिल से लिखी गई टिप्पणियाँ, जैसे ‘No, Norah!’, भी अब धुंधलाने लगी थीं। इन बँधे हुए खंडों और उन पुस्तकालयों के प्रति मेरे भीतर एक अरुचि पैदा हो गई।
आनंद को न सिखाया जा सकता है, न मापा जा सकता है। विद्वत्ता को सिखाया भी जा सकता है और मापा भी। मेरी प्रतिक्रिया तर्कहीन थी, यह मैं जानता हूँ। फिर भी यह सारी विद्वत्ता मुझे किसी बने-बनाए साँचे में ढली हुई चीज़-सी लगती थी।
किसी साहित्य की खोज नहीं की जा रही थी। उसे पहले ही एक व्यवस्था में बाँट दिया गया था। कुछ पन्ने ‘पाठ’ के थे, कुछ ‘पृष्ठभूमि’ के और कुछ ‘आलोचना’ के। मानो साहित्य को इन खंडों में विभाजित करके ही समझा जा रहा हो। इस पर तो कोई गणितीय बुद्धि भी लागू की जा सकती थी।
बेशक, उसमें कुछ अच्छी चीजें भी थीं, जैसे शेक्सपियर, मार्लो और पुनर्स्थापना काल का रंगमंच। पर साहित्य के अध्ययन की इस पद्धति से उपजी मेरी वितृष्णा ने मुझे साहित्य से पहले से भी अधिक दूर कर दिया।
भाषा फिर भी मेरी बनी रही। इसलिए उसके विकास के अध्ययन की ओर लौटने में मुझे आनंद मिला। यहाँ मेरे भाषा-प्रेम के लिए भरपूर सामग्री थी। साथ ही, इसमें एक अप्रत्याशित रोमांच भी था।
चॉसर को एक महान कल्पनाशील लेखक के रूप में देखना आसान नहीं था। ‘द प्रोलॉग’ में भी दृष्टि सीमित ही थी, जिसे उसके बाद हजार बार पार किया जा चुका था। लेकिन एक नई और विकसित होती हुई भाषा के शिल्पी के रूप में चॉसर को देखना रोमांचक था।
पर शेक्सपियर के प्रति मेरा आनंद दोगुना हो गया।
त्रिनिदाद में अंग्रेजी लेखन मेरे लिए कल्पना का आरंभ था। अब इंग्लैंड में कुछ समय बिताने के बाद यह संभव हुआ कि मैं शब्द को देख सकूँ, भाषा को साहित्य से अलग करके देख सकूँ। भाषा कितनी भ्रामक हो सकती है।
अंग्रेजी बोलचाल की परंपराओं और तौर तरीकों को समझने में मैं कितना कमजोर हूँ, यह समझने में मुझे बहुत समय लगा है। इस बोलचाल की भाषा का इससे बेहतर विश्लेषण एंगस विल्सन की शुरुआती कहानियों में शायद ही कहीं मिलता हो।
अगर आज पीछे मुड़कर देखूँ तो कहूँगा कि इन कहानियों पर मेरी पहली प्रतिक्रिया उतनी ही भद्दी और अधूरी थी, जितनी एंग्लो सैक्सन एटिट्यूड्स में अपने अंग्रेज़ सहकर्मियों की रूखी शिष्टता पर प्रोफ़ेसर पफ़ॉरज़हाइम की थी।
लेकिन इंग्लैंड को जान लेने के बाद अंग्रेज़ी लेखन मेरे लिए भले ही अधिक सुगम हो गया, उसमें मेरी भागीदारी और कठिन होती गई। कल्पना का वह अभ्यास, पाठक की वह पूरक प्रतिक्रिया, अब मेरे लिए संभव नहीं रही। मैं अब एक ऐसे समाज को देख रहा हूँ जो अपरिचित होते हुए भी जाना पहचाना है, और उसमें मैं किसी विशेष सामाजिक आशय की खोज करने लगा हूँ।
त्रिनिदाद में जिन किताबों को कभी मैंने अपनी कल्पना में रचा बसाया था, उन्हें अब दोबारा पढ़ना बेचैन कर देता है। अब यह साफ दिखता है कि वे कितनी औपनिवेशिक हैं। डिकेंस के चित्रों को अब मैं नकार नहीं सकता। इसी ज्ञान के साथ वे किताबें मेरी नहीं रहीं।
सामाजिक टिप्पणी की खोज अंग्रेज़ी साहित्य की एक बुरी लत है, जिससे बचना कठिन है। उपन्यासकारों का यह आग्रह उस समाज को प्रत्यक्ष करता है जो पूरी तरह परंपराओं पर टिका है। यह आत्म सजग लोगों का बना बनाया समाज है, जो किताबें रोमांच के लिए नहीं, तुलना के लिए पढ़ते हैं। वे देखना चाहते हैं कि वे किन बातों को जानते हैं, या किन बातों को जानने का दावा करते हैं।
किसी लेखक को इस आधार पर परखा जाता है कि वह किस विषय पर लिखता है। मज़दूर-वर्ग का लेखक बस मज़दूर-वर्ग का लेखक है, उससे ज़्यादा कुछ नहीं। इस तरह लेखन एक खास समाज की अपनी निजी भाषा बन जाता है। हर नई खोज के साथ समाज की खुद के बारे में बनी छवि और पक्की होती जाती है। समाज अपने ही अंदर और ज़्यादा झाँकने लगता है। उसके पास संदर्भ के अनगिनत बिंदु हैं। उसके बारे में बहुत लिखा जा चुका है।
मिसाल के लिए, एंगस विल्सन के पात्र बहुत पढ़ने वाले लोग हैं। वे डिकेंस और जेन ऑस्टिन में डूबे हुए हैं। जल्दी ही ऐसे पात्र भी होंगे, जो एंगस विल्सन में डूबे होंगे। यह सिलसिला अंतहीन है।
एक संवेदनशीलता के ऊपर दूसरी संवेदनशीलता चढ़ती जाएगी। अनुभव की खुरदरी वास्तविकता आत्मचेतना द्वारा लगातार परिष्कृत होती जाएगी। लेखन आर्थर मिलर की समाचारपत्र की परिभाषा जैसा हो जाएगा, एक राष्ट्र अपने आप से बातें करता हुआ। जिनके पास इस भाषा को समझने की कुंजी भी होगी, वे भी सिर्फ़ उसके साक्षी बन सकेंगे, उसमें सहभागी नहीं।
हर साहित्य अपने भूगोल से बंधा होता है। शायद शेक्सपियर का देश काल से मुक्त होना, या डिकेंस में जीवन के यथार्थ का प्रत्यक्ष संप्रेषण ही है, जो उन्हें कम स्थानीय बनाता है। या शायद यह भ्रम केवल पाठक की अनभिज्ञता से उपजता है।
साहित्य में ‘अंतरराष्ट्रीयता’ के इस दौर में भी हमने उसे लगातार अपने भीतर ही सिमटते देखा है। वह ऐसी भाषाएँ गढ़ रहा है जो और भी अधिक निजी होती जा रही हैं। शायद अंत में साहित्य स्वयं को लिखते लिखते ही समाप्त कर देगा। तब उसका सारा आनंद शब्दों के आनंद तक सीमित रह जाएगा।
तीन साल से कुछ अधिक हुआ होगा। मैं तब ब्रिटिश गुयाना में था। एक ढलती दोपहर मुझे एक प्रतिष्ठित भारतीय मूल के ईसाई परिवार की एक बुज़ुर्ग महिला से मिलाने ले जाया गया। हमारे राजनीतिक विचार इतने भिन्न थे कि उस समय के संकट पर बात करना व्यर्थ था। हम बरामदे में रखी चीज़ों और पुराने दिनों की बातें करते रहे।
अचानक दिन का उजाला चला गया। त्रिनिदाद के उष्णकटिबंधीय प्रदेश होने के कारण ऐसा ही होता है। वहाँ शाम धीरे धीरे नहीं उतरती। दिन एकाएक समाप्त हो जाता है और रात घिर आती है।
ठीक उसी क्षण बगीचे से एक फूल की सुगंध आई। मैं उस सुवास को बचपन से जानता था, पर उस फूल का नाम कभी नहीं जान पाया था।
मैंने पूछा।
जवाब मिला, ‘हम इसे चमेली कहते हैं।’
‘चमेली! Jasmine!’
तो इतने सालों से मैं इसी को जानता था। मेरे लिए अब तक चमेली केवल किताबों का एक शब्द थी। एक ऐसा शब्द जिसके साथ खेला जा सकता था। वह उस नीरस वनस्पति से सर्वथा भिन्न थी जिसे मैं प्रतिदिन अपने आसपास देखता था।
बुज़ुर्ग महिला ने मेरे लिए उसकी एक टहनी काट दी। मैंने उसे अपनी खुली कमीज़ के ऊपरी बटन के पास टाँक लिया।
होटल की ओर लौटते हुए मैं उसकी गंध लेता रहा।
Jasmine। Jasmine।
पर मेरे मन में वह शब्द और वह फूल बहुत समय तक अलग अलग ही बने रहे। वे कभी एक हो ही नहीं पाए।
वी। एस। नायपॉल
1964



