स्मिता सिन्हा की आठ नई कविताएँ

स्मिता सिन्हा की कविताएँ प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में छपती रहती हैं, सराही जाती हैं. उनका एक अपना समकालीन तेवर है, संवेदना और भाषा है. प्रस्तुत है कुछ नई कविताएँ- मॉडरेटर
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(1)
मैंने देखे हैं
उदासी से होने वाले
बड़े बड़े खतरे
इसीलिए डरती हूँ
उदास होने से
डरती हूँ जब गाती है
वो नीली आँखों वाली चिड़िया
सन्नाटे का गीत
सारी सारी रात
उस सूखे दरख्त पर बैठे हुए
ताकते हुए आकाश
उदास तो वो
आले पर रखा हुआ दिया भी है
जिसमें रोज़ जलती है
उम्मीद की लौ
उदास तो वो चूल्हा भी है
जिसके पास बच जाती है
बस थोड़ी सी ठंडी राख
वो हरी कोमल दूब भी उदास होती है न
जब लाख कोशिशों के बावजूद
सम्भाल नहीं पाती
ओस की एक अकेली बूंद
वो नदी भी
जिसमें होती है
सागर जितनी प्यास
मैंने देखा एक मन को उदास होते हुए
देखी शिद्दत से सहेजी
उसकी सारी नमी को बह बह जाते हुए
होठों ने भी चखी उदासी
और कहा
नमक सी तासीर है इसकी
बस उसी दिन से डरती हूँ मैं
छिपा देती हूँ
अपनी पीठ के पीछे
नमक के बड़े बड़े पहाड़
हाँ डरती हूँ
क्योंकि मैंने भी सुन रखा है
नमक की क्रांति के बारे…………..
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© स्मिता सिन्हा
(2)
विस्थापन
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( क )
हम विस्थापित होते हैं हर रोज़
हम छोड़ देते हैं अपनी मिट्टी को
और भागते है ज़िंदगी के पीछे बेतहाशा
पर हमारी जड़ें दबी रह जाती हैं
वहीं कहीं उसी मिट्टी के नीचे……
(ख )
हम विस्थापित होते हैं हर रोज़
अपने सपनों में ,अपनी स्मृतियों में ,
अपनी सांसों और सिलवटों में ,
भाषा ,शब्दों और विचारों में ,
हम विस्थापित होते हैं
हर नये रिश्ते में ,
अपनी रुह तक में भी……….
( ग )
हम खुद में ही खुद को छोड़कर
बढ़ते जाते हैं आगे
और पीछे छूटती जाती हैं
जाने कितनी विस्थापित परछाइयां
विस्थापन लगातार बेदखल करता जाता है
हमारी तमाम पुरानी चाहनाओं को
उस एक अप्राप्य की चाह में……….
(घ)
विस्थापन किस्तों में ख़त्म करता है हमें
और हमारे मिटते ही
अवतरित होता है एक नया कालखंड
अपने होने वाले विस्थापन के
कई नई वजहों के साथ
विस्थापन ही रचता है
चीखती ,चिल्लाती , झकझोरती सी
उन आवाजों को
जो सच सच कह जाती हैं
कि हर विस्थापन का अंत
वापसी तो बिल्कुल नहीं होता……..
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© स्मिता सिन्हा
(3)
जूतों की चरमराहट
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वह ऊँची आवाज़ में
क्रांति की बात करता है
संघर्ष की बात करता है
और फ़िर निश्चेष्ट होकर बैठ जाता है
वह देखता है
हर रोज़ होती आत्महत्याओं को
रचे जा रहे प्रपंचों को
वह हर रोज़ गुजरता है
अपनी उफ़नती सोच की पीड़ा से
किंतु प्रमाणित नहीं कर पाता
अपने शब्दों को
वह हर रोज़ बढ़ाता है एक क़दम
उस अमानुषी पत्थर की ओर
फ़िर एक क़दम पीछे हो लेता है
वह अपने और ईश्वर के बीच
नफ़रत को बखूबी पहचानता है
और पहचानता है हवाओं में
देह व आत्माओं की मिली जुली गंध
वह देखता है
सभ्यता के चेहरे पर पड़े खरोंचों को
वह देखता है
सदी के नायकों को टूट कर
बिखरते बदलते भग्नावशेषों में
वह अकेला है , विखंडित
इतनी व्यापकता में भी
अभी जबकि
जल रहे हैं जंगल , गेहूँ की बालियां
टूट रहे हैं सारसों के पंख
कैनवास में अभी भी
सो रहा है एक अजन्मा बच्चा
और उसकी माँ की चीखें
कुंद होकर लौट रही हैं
बार बार उसी कैनवास में
अभी जबकि हो रहे हैं
हवा पानी भाषा के बंटवारे
और समुन्दर के फेन से
सुषुप्त हैं हमारे सपने
उसे थामना है इस थर्राई धरती को
और चस्पा करने हैं मुस्कान के वो टुकड़े
जिसमें बाकी हो कुछ चमकीला जीवन
अभी जबकि बाकी है उसके जूतों में चरमराहट
उसे लगातार दौड़नी है अपने हिस्से की दौड़……..
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©स्मिता सिन्हा
(4)
अट्टहास
———–
वह एक अट्टहास है
उस भीड़ का
जहाँ उसके लिये
सिर्फ़ वितृष्णा होनी चाहिये
वह गिद्धों की गरदन
मरोड़कर बैठा है
बेखौफ
जबकि छिपकलियां
छटपटा रही हैं
उसकी मुट्ठीयों में
उसने नोंचने शुरु कर दिये हैं
सारसों के पर
हाँ उनकी खरोंचें
अभी तुमपर बाकी हैं
तुम बस यूँ ही
खींसे निपोरकर
बैठे रहना  चुपचाप
मुझे बड़ा ताज्जुब होता है तुमपर
तुम्हारी नज़रों के सामने
वह लगातार बोता जा रहा है
झूठ पर झूठ
और तुम बड़ी ही
तल्लीनता से चढ़ाये जा रहे हो
उसके  झूठों पर
सच की कलई
अभी जबकि
तुम्हारा संघर्ष
सिर्फ़ तुम्हारे हिस्से की
अंधेरे के खिलाफ होना था
तुम व्यस्त हो
उसके दिये हुए
तमाम अंधेरों को समेटने में
मैं क्या जिरह करूँ तुमसे
कि सबकुछ
जानते समझते हुए भी
तुम रोज़ गढ़ रहे हो
उसके पक्ष में
नये नये धारदार तर्कों को
जबकि वो खुद ही
अपने विरुद्ध
एक सशक्त बयान है………..
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© स्मिता सिन्हा
(5)
नीरजा
_______
मैं अब भी चिहुंक उठती हूँ
बारिश की बूंदों की मद्धम आवाज़ पर
छिटकना चाहती हूँ यादों की परछाईं
तुम फ़िर भी शेष रह जाते हो मुझमें कहीं
उस दिन भींगते आकाश से
जो एक अकेली बूंद गिरी थी
मेरी पलकों पर
मैंने उसे तुम्हारा प्रेम समझा
गाढ़े चुम्बन में लिपटा
तुम्हारा बहुप्रतीक्षित प्रेम………….
पर ऐसा हो नहीं सकता
कि तुम्हारे आस पास
हर वक़्त नमी रहे
बरसती रहें बूंदे
और अंतस तक फूटती रहें नदियाँ
मैंने देखा
चटख अंगारों पर टपकती बूंदों को
और धुआँते आसमान को भी
मैंने देखा
उन सभी स्पंदित भावनाओं को
कांपते ,थरथराते ,बहते
निर्वाध वेग से
उन बारिश की बूंदों के साथ…………
देखो बहने और बहाने के बीच
एक युग सा फासला होता है
पर डूबना एक सा ही है
हाँ प्रेम फ़िर भी अविचल रहता है
सभी अमानुषी पहाड़ों के विरुद्ध
अब फ़िर जिस दिन
बूंदे बरसेंगी बेतहाशा
तुम नज़र रखना उस क्षितिज पर
देखना दूर कहीं
किसी अंजुरी की कोर से
छूटती बूंदों में
धीरे धीरे छूटती जाऊँगी मैं भी
और अंततः तुम मुक्त होते जाओगे
अपने प्रारब्ध से………
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© स्मिता सिन्हा
(6)
आदत
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आकाश के आमंत्रण पर
अब भी घिर आते हैं
काले काले बादल
और बरसती हैं बुंदे
उन नन्ही बूंदों को
अपनी पलकों पर सहेजे
मैं अक्सर आ बैठता हूँ
उसी सुनी मुंडेर पर
जहां जाने कितने आकाश
उतर आते थे उन दिनों
हमारी आँखों में
तुम्हें याद है
उस दिन
एक उड़ते कबूतर के
पंख टूटने पर
कितनी आहत हुई थी तुम
रोती रही बेहिसाब
और मैं सोखता रहा
तुम्हारे उन आँसूओं को
अपनी हथेलियों में
ये हथेलियां अब भी नम हैं
सोंधी सी महक है इसमें तुम्हारी
मैं अब अक्सर अपने चेहरे को
इन हथेलियों में छुपा लेता हूँ
इन हथेलियों को आदत थी
तुम्हारी उँगलियों की
कितने सलीके से उलझती थीं
ये तुम्हारी उँगलियों से
कभी नहीं छूटने के लिये
ये आदतें भी कमाल होती हैं न
हमें थी एक दूसरे की आदत
एक दूसरे के साथ हँसने की आदत
हँसते हँसते रो देने की आदत
हम कभी नहीं पूछते थे
एक दूसरे से यूँ रोने की वज़ह
शायद हमें शुरु से ही अंत का पता था
पता था कहाँ और किस मोड़ पर
रुकना है हमें
होना है अलग
फ़िर कभी नहीं मिलने के लिये
उन रास्तों पर अब कोई नहीं जाता
पर मैं अब भी निकल आता हूँ अक्सर
वहीं उन्हीं रास्तों पर
उसी मोड़ तक
अब अक्सर ही लिखता हूँ मैं
प्रेम कवितायें
लिखता हूँ एक अनजान शहर
कुछ अनजाने रास्ते
और बेतकल्लुफी में गुज़रते
दो अजनबी
कुछ अनजानी तारीखें
और इन तारीखों में सिमटी
तमाम जानी पहचानी यादें
मैं कभी नहीं लिखता
उदास वक़्त के उदास शब्द
उदास सा मुंडेर
उदास सी हंसी
उदास आँखें
मैं चाहता हूँ
कि मुझे आदत हो
खुश रहने की
मुझे आदत हो
खुद जीने की
मैं अब मुक्त होना चाहता हूँ
इस प्रारब्ध से
जहां सब कुछ होते हुए भी
अक्सर प्रेम ही चूक जाता है
मेरे जीवन में………..
(7)
‘ विदा ‘
———-
सिगरेट के लम्बे गहरे कश के साथ
मैं हर रोज़ उतरता हूँ
अँधेरे की गंध में डूबे उस तहखाने में
जिसके प्रस्तरों पर
अब भी बिखरे से पड़े हैं
जाने कितने मखमली ख्वाब
जो कभी साझे थे हमारे
बंद आँखों को मैं
और कसकर बंद करता हूँ
ताकि बचा सकूं कुछ स्मृतियों को
बिखरने से पहले
सहेज सकूं उनके कुछ अवशेष !
वह झरोखा तो अब भी वहीं है
तो शायद अब भी होगा
वह एक टूकड़ा चाँद वहीं कहीं
उसी दरख्त के पीछे
पर नहीं
कुछ झरोखे गर्द सीलन से भरी हवा लाते हैं
जो घोंटतीं हैं सांसे
मैं चुपचाप चलता जाता हूँ
सन्नाटे में डूबे गलियारों में
तुम्हारे निशानियों को टटोलते हुए
कि दे सकूं तुम्हें
तुम्हारे पसंद के गुलमोहर के कुछ फूल
कि सुन्दर मौसम तो बस यादों में ही रह जाते हैं !
सिगरेट की हर कश के साथ
मैं भटकता हूँ
खूब भटकता हूँ
खुद को खो देने की हद तक
और फ़िर सोचता हूँ
क्या ये मुनासिब नहीं होता कि
एक झूठी सी गफलत ही सही
बाकी रहती हम में कहीं
कि ये जो कुछ कच्चा पक्का सा है
हमारे रिश्ते में
अब भी कायम है और यूँ ही रहेगी सदा
तुम्हें पता है
सिगरेट के हर कश के साथ
मैं उलझता हूँ
अटकता हूँ हर बार
वहीं उसी लम्हे में
कि आखिर क्यों कहा तुमने मुझसे
हमारे बीच का वो आखिरी शब्द ‘विदा ‘॥
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© स्मिता सिन्हा
(8)
कहानी
———–
इस कहानी में अक्सर
मैं होती हूँ
तुम होते हो
और होते हैं
उलझते ख़त्म होते से संवाद !
इस कहानी में
अक्सर ही रह जाते हैं
असंख्य असहज से शब्द
कुलबुलाते बुदबुदाते
तिलिस्म के अंधेरे में
शब्दों से टकराते शब्द
और पीछे छूटता
एक अनकहा सा सन्नाटा
उस अनकहे में भी
जाने कितना कुछ
कह जाते हैं हम
एक दूसरे से
पर कभी समझना नहीं चाहते
उस कहे को !
इस कहानी में
अक्सर ही मैं सजाती हूँ
वह एक खुद का कोना
और रख आती हूं वहां
अपना मन बड़े सलीके से
कि कभी तुम आओ तो
साझा करूं उस मन को
तुम्हारे साथ !
यूँ देखा जाये तो
और क्या चाहिये हमें
इस एक कहानी में
बस यही न कि
हो एक टूकड़ा आसमां
और छोटी
बेहद छोटी सी उड़ान
ताकि लौट सकें वापस
एक दूसरे के पास
वक़्त के रहते
चुटकी भर पीली चटकीली धूप
और ओस की बूँदों में नहाई
हरी कोमल पत्तियाँ
हमारे नाजुक सपनों की तरह
मुठ्ठी भर छलकती हंसी
और ढेर सारी तसल्ली व दिलासा
कि होगी बेहतर
और बेहतर ज़िंदगी !
वैसे इस कहानी में
अगर कभी पुछ पाऊँ
तो इतना ज़रूर पूछना चाहूंगी तुमसे
कि कहीं ज़िंदगी जीने की कोशिश में
हम हर दिन ,हर एक दिन
खुद को ,एक दूसरे को
खोते तो नहीं जा रहे हैं…….
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