नर्मदा, नाव के पाल और चित्रकार

लगभग बीस वर्ष पहले इंदौर के निकट नर्मदा किनारे बसे ग्राम पथराड में एक कला शिविर हुआ था। यह इस मायने में नवाचार लिए था कि इसके सूत्रधार युवा शिल्पी-चित्रकार सीरज सक्सेना चाहते थे कि नर्मदा में चलने वाली नावों के पाल पर चित्र बनाए जाएं। वरिष्ठ चित्रकार अखिलेश ने इस शिविर की बागडोर सम्हाली। बहुत सारे चित्रकारों ने इसमें भागीदारी की थी। चित्रकार विवेक टेंबे ने उस शिविर की स्मृतियों पर डायरीनुमा एक रोचक लेख लिखा है। इस लेख के साथ के चित्र प्रतिभासंपन्न कला फोटोग्राफर तनवीर फारुखी ने लिए हैं। कुछ चित्र विवेक टेंबे के हैं। जन-जीवन और जनोपयोगी संसाधनों से चित्रकारों का यह जुड़ाव आप इसे पढ़ते हुए अनुभव कर सकते हैं- राकेश श्रीमाल
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 प्रत्येक वर्ष मार्च में मुझे घूमने निकलना और फोटोग्राफी करना ज्यादा सुहाता था। यह समय भी हमारे शासकीय प्रकाशनों के उपयोग के लायक फोटो मिलने का रहता है। मैं अपने कार्यालयीन टूर को तय ही कर रहा था, कि दिल्ली से मेरी चित्रकार मित्र निताशा जैनी का फोन आया कि उसे एक आर्ट वर्कशॉप में जाने के लिए भोपाल आना है। फिर वहाँ से पथराड नाम के गाँव पहुँचना है, वहीं कला कार्यशाला सम्पन्न होने वाली थी। वहां पहुँचने के लिए उसे मेरी मदद चाहिए थी। मैंने उसे बताया कि इसके लिए उसे भोपाल आने की जरूरत नहीं है, वो दिल्ली से सीधे इंदौर पहुंचे और वहीं से लोकल ट्रांसपोर्ट  लेकर नर्मदा किनारे पथराड गाँव पहुँचा जा सकता है।
उसे संतुष्ट कर मैंने फोन रख दिया। कुछ देर बाद जब हम लंच के लिए बैठे तो मैं इस वर्कशॉप के बारे में सोचने लगा। मुझे इस वर्कशॉप का विचार बड़ा नवोन्मेषी लगा। मैंने इस में हिस्सेदारी करने के लिए सारी जानकारी इकठ्ठा की, मुझे पता चला कि इंदौर आर्ट्स स्कूल के सीरज सक्सेना  और उसके सहयोगी इस आर्ट्स वर्कशॉप के संयोजक है और आमंत्रित चित्रकार अपनी कृतियों का चित्रण नर्मदा की धारा में चलने वाली नावों के बड़े पालों पर करेंगे, फिर इन नावों को नदी में ही चलित प्रदर्शनी के रूप में चलाएंगे। इस कल्पना ने ही मुझे रोमांचित कर दिया। और मैंने तुरंत सीरज से संम्पर्क साधा और उनसे अपने सहभागिता के बारे में बात की। सीरज ने तत्काल अपनी सहर्ष स्वीकृति जताते हुए मुझे औपचारिक निमंत्रण दे दिया।
   यह प्रयास नितांत वैयक्तिक प्रयासों और सीमित आर्थिक संसाधनों से संपन्न किया जाना था । सभी कलाकार अपने खर्च पर ही पथराड पहुँचने वाले थे और रंग सामग्री भी साथ लाने वाले थे।
       शाम को ही मैंने अपने ड्राइवर को ताकीद कर दी कि सुबह हम 6 बजे तक निकलेंगे। दूसरे दिन सुबह दस बजे तक हम इंदौर पहुंचे। वहाँ हमने थोड़ा नाश्ता किया और आराम से पथराड के लिए निकले, मार्च के बावजूद मौसम में गर्मी थी हम दोपहर में पथराड गांव पहुँचे। तनवीर फारूकी भी अपने कैमरे के साथ पहुँच गये थे।
         पहुँचते ही आए हुए कलाकारों से मेल मुलाकात का सिलसिला शुरू हुआ। मैंने निताशा और नरेन्द्र पाल सिंह को तलाश किया। जल्द ही मुझे वो दोनों मिल गये। बस फिर तो हम तीनों ने मिलकर पूरे गाँव का सर्वे कर डाला। साथ ही बाकी आये हुए कलाकारों से भी मिल लिए। लगभग 70-75 लोग इकट्ठा हो गये थे। फिर सब लोग अपने रंग रोगन के साथ दिए हुए नाव के पाल को पेंट करने में लग गये।
कुछ युवा विद्यार्थी, चित्रकारों की मदद भी कर रहे थे। रंगों की कई बाल्टीयां तैयार करना,उन्हें काम कर रहे चित्रकारों तक पहुँचाना आदि। इस कार्यक्रम के अलावा युवा ध्रुपद गायिका सुरेखा कामले का गायन और रायगढ़ घराने की सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सुश्री अल्पना शुक्ल वाजपेयी की नृत्य  प्रस्तुति भी कार्यक्रम के हिस्से थे।
        26 मार्च 1999 को शिविर का उद्घाटन सुश्री अल्पना शुक्ल वाजपेयी की नृत्य प्रस्तुति से हुआ था।
मैं 27 को दोपहर में पहुँचा था। सभी लोग काम करने में लगे हुए थे। मैंने भी काम शुरू कर दिया, नरेंद्र पाल सिंह ने तो अपना काम खत्म भी कर दिया था। रात हो गई थी, भूख भी लगने लगी थी, सो सीरज से पूछा, भाई खाने का क्या  प्रोग्राम है। उनके कार्यक्रम के अनुसार तो हर एक चित्रकार को किसी केवट के यहाँ ही खाना खाने जाना था। सीरज ने अपने  सहायक के साथ मुझे एक मांझी के घर भेज दिया।
            कुछ अजीब़ सा तो लग रहा था पर और कोई रास्ता नहीं था। मैं वहीं घर में जमीन पर बैठकर इन्तजार करने लगा, थोड़ी ही देर में एक चमचमाती कांसे की थाली में तीन रोटी और  एक प्याज मेरे सामने रख दिया गया, मुझे कुछ समझ नहीं पड रही थी कि एक बच्ची दाल लेकर आयी, मुझसे बोली भैय्या पैर लगाओ, दाल परोसूंगी। मैं उसकी तरफ देखने लगा, तो उसने मुझे समझाते हुए कहा थाली के नीचे पैर लगा कर उसे ऊँचा करुं ताकि दाल एक तरफ रहे, फैले नहीं।
         मैने खाना शुरू किया तो सोचा था कि पता नहीं मैं इसे खा पाऊंगा या नहीं, पर दाल पतली होने के बावजूद बड़ी स्वादिष्ट थी और उसके साथ प्याज ने तो समां बांध दिया था। वह स्वाद तो मैं आज तक नहीं भूला। खाने के बाद हमने नौका विहार का प्रोग्राम बनाया, मैं नरेंद्र, निताशा, सुरेखा,मोहन मालवीय और एक दो और लोग नाव में बैठ गये और हम चल पडे।चलते चलते अचानक नरेंद्रपाल सिंह नाव से नर्मदा के पानी में कूद गया। हम सभी घबरा गए। तभी पता चला कि वहाँ पानी काफी उथला था और नरेंद्र को इस बात का पहले से पता था। फिर कुछ और लोग भी पानी में उतर गये। थोड़ी मस्ती की और फिर वापस नाव पर आ गये, सभी बहुत थक गये थे। लौट कर जिसे जहाँ जगह मिल गयी वहीं बिना बिछावन के सो गए।
        दूसरे दिन सुबह उठकर चाय नाश्ते के बाद मैं अपनी पाल (कैनवास) पर काम करने लगा। आज कुछ लोग और आ गये थे। उनमें मुम्बई से चित्रकार सुधाकर, योगेश रावल, हैदराबाद से आतिया अमजद, इन्दौर से मनीष पुष्कले, अवधेश यादव और अखिलेश अपने बडे भाई देवेश वर्मा और बच्चों के साथ आये थे। दिल्ली से स्नेह गंगल भी आयी थी। जगदीश चंदर, कालीचरण गुप्ता आने वाले थे। और भी कुछ लोग थे जिनसे मेरा परिचय नही हुआ था। दोपहर के खाने के बाद लगभग सभी चित्रकारों के पाल पूरे हो चुके थे। गाँव के अति उत्साही लोगों ने तो कुछ चित्रित पाल नाव पर चढा भी दिये थे।
नरेंद्रपाल सिंह का पाल तो उल्टा चढ़ा दिया था। इस शिविर में पूरा गाँव सहयोग कर रहा था। गाँव की कुछ महिलाओं ने तो पाल भी चित्रित किये थे। रात में खाने के बाद गाँव के लोगों ने लोकसंगीत सुनाया। अंताक्षरी खेली गई, रात में सीरज ने बताया कि लगभग सभी के पाल बन गये हैं, तो क्यों न कल सुबह ही पाल बांधकर सभी नावों का नदी में प्रदर्शित किया जाएं। मैं और नरेंद्र बातें करते करते कब सो गए, पता भी नहीं चला।
     अगले दिन सुबह चित्रकार अपनी पालें नाव पर चढाने में व्यस्त हो गये थे। सारी नावें नदी की धारा के बीच में आने पर तो मज़ा ही आ गया था। विहंगम दृश्य था। शायद ही किसी संस्था ने इस प्रकार का आयोजन या प्रयोग पहले कभी किया हो। अपने संसाधनों की कमी के बावजूद, यह एक सफल आयोजन था और मुझे भविष्य में इसे बड़े पैमाने पर और सुन्दर तरीके से आयोजित करने की जरुरत महसूस होने लगी थी। कई लोग फोटो खींचने और खिंचवाने में लग गए थे। मैंने सीरज को इस सफल आयोजन के लिए बधाइयाँ दीं। शाम को मैंने सभी मित्रों से विदा ली, एक खूबसूरत आयोजन की खूबसूरत यादों के साथ।

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विवेक टेंबे का जन्म मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में 5 नवंबर1951 में हुआ था। उन्होंने ललित कला महाविद्यालय, ग्वालियर से 1973 में चित्रकला और 1977 मे मूर्तिकला में डिप्लोमा प्राप्त किया। इसके पश्चात भारत शासन की राष्ट्रीय छात्रवृत्ति के अन्तर्गत प्रसिद्ध चिंतक एवं चित्रकार जे.स्वामीनाथन के निर्देशन में तीन वर्षों तक (1976-78) कार्य किया। 1995 में वे राष्ट्रीय ललित कला अकादमी पुरस्कार के निर्णायक मंडल के सदस्य बने। 2001 मे मध्यप्रदेश शासन ने कला क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए उन्हें शिखर सम्मान से सम्मानित किया। कई एकल एवं समूह प्रदर्शनियों मे शिरकत की। शारजाह में मध्यप्रदेश की प्रदर्शनी का आकल्पन। लेखक-चिंतक उदयन वाजपेयी के साथ
आदिवासी चित्रकार जनगढ़सिंह श्याम पर एक पुस्तक ‘जनगढ़ कलम’ का प्रकाशन। भोपाल में रहते हैं।

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