ज़ेरी पिंटो के उपन्यास ‘माहिम में कत्ल’ का एक अंश

हाल में ही राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उपन्यास ‘माहिम में क़त्ल’ का मुंबई में लोकार्पण हुआ। यह उपन्यास अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध लेखक ज़ेरी पिंटो के अंग्रेज़ी उपन्यास ‘मर्डर इन माहिम’ का हिंदी अनुवाद है। यह उपन्यास मुंबई में समलैंगिकों की अंधेरी दुनिया को लेकर एक रोमांचक उपन्यास है। जिसका अनुवाद मैंने किया है। आप इसका एक रोचक अंश पढ़िए- प्रभात रंजन

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बम्बई में रात नहीं होती। सूरज समुद्र में डूब तो जाता है लेकिन अँधेरे को फैलने का मौक़ा बिलकुल नहीं मिल पाता। शहर को निगलने की इसकी हर कोशिश को लाखों नियॉन आँखें हरा देती हैं, जो शाम होते ही खुल जाती हैं और पलकें झपकाती रहती हैं; और पूर्वी बन्दरगाह के पार जलती हुई प्राकृतिक गैस की चमक, उस पहाड़ को रोशन बनाए रखती है जिसको बच्चे ‘राक्षस की क़ब्र’ कहते हैं। अँधेरा हर शाम पैर टिकाने और मुँह छिपाने को जगह ढूँढ़ने के लिए संघर्ष करता है।

इसका एक ठिकाना पश्चिमी रेलवे लाइन के माटुंगा रोड स्टेशन के पुल के नीचे का पेशाबघर है। सरकारी महकमे वालों ने इसको रोशन करने की बड़ी कोशिश की लेकिन बल्ब को बुझाने के लिए एक छोटा-सा पत्थर ही काफ़ी होता है। और जब तक इसके कारण के बारे में बताया जाता है, बल्ब ख़रीदने के लिए आदेश लिया जाता है और दुकान से नया बल्ब आता है तब तक यहाँ अँधेरा ही बना रहता है। और तब तक यह उन पुरुषों की शरणस्थली बना रहता है जो वहाँ आते हैं, अँधेरे में एक-दूसरे को इस उम्मीद में टटोलते-दबाते हैं, कि उनको कुछ राहत मिल सके, शायद प्यार या महज़ दूसरे जिस्म की गर्मी।

अँधेरा आज रात शिकारी को ठिकाना देने वाला था। हालाँकि प्लेटफ़ॉर्म पर भीड़ कम हो गई थी, फिर भी शिकार को पहचान पाना इतना आसान नहीं हो सकता था। यह एक संकेत है। अब उसको जल्दी से कुछ करना चाहिए।

हो सकता है उसका शिकार अभी तक नीचे पेशाबघर तक नहीं गया हो। हो सकता है कि वह ट्रेन पकड़ने के बहाने स्टेशन पर कुछ देर और इधर-उधर देखते हुए रुका रहे। हो सकता है कि वह दादर की ट्रेन भी पकड़ ले और बाद में वापस आ जाए। लेकिन अगर उसने अभी क़िस्मत आज़माने के बारे में नहीं सोचा तो बेहतर होगा कि वह इस बात को पक्का कर ले कि यह जगह साफ़ रहे। यहाँ तक कि इस समय भी अन्दर पुरुष होंगे। लेकिन शिकारी को पता है कि उनको बड़ी आसानी से डराया जा सकता है। उसको करना बस इतना है कि वह नीचे एक या दो पेशाबघरों के दरवाज़े पर जाए और जितनी ज़ोर से हो सके कहे, ‘ओए, क्या कर रहे हो?’ अँधेरे की उस ख़ामोशी में कोई भी यह नहीं चाहता कि उससे कोई यह पूछे कि वह क्या कर रहा है। पेशाबघर तत्काल ख़ाली हो जाता है।

शिकारी रेल की पटरी के पास से फिसलकर नीचे गया और ज़ोर से चिल्लाया। पेशाबघर ख़ाली हो गया। उसके बाद वह फिर से ऊपर गया और ऐसी जगह जाकर खड़ा हो गया जहाँ शिकार उसको देख ले। उनकी आँखें मिलीं और सामने वाले की आँखें चमक उठीं।

शिकारी ने नज़र घुमाकर आसपास देखा कि कहीं कोई उनको देख तो नहीं रहा। कुछ बूढ़े उनको भूखी निगाहों से देख रहे थे। उसने अपनी आँखों को फैलाते हुए भौंहें चढ़ाईं। वे तत्काल दूसरी तरफ़ देखने लगे।

उसने पीछे मुड़कर उस नौजवान को फिर देखा। उनकी आँखें इस बार जान-बूझकर ऐसे मिलीं जैसे सब कुछ साफ़ हो, स्पष्ट हो।

कुछ ही पल में वह आदमी ढलान की तरफ़ बढ़ने लगा। शिकारी उसके पीछे-पीछे चलने लगा, और अचानक, इससे पहले कि वह दुर्गन्ध-भरे अँधेरे पेशाबघर की खोह में घुसता, वह समझ गया कि वक़्त आ चुका है।

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