भारतीय अंग्रेज़ी के प्रमुख लेखकों में एक प्रमुख नाम अमिताभ कुमार का है। उनका पहला उपन्यास आया था ‘Home Product’, जिसका हिंदी अनुवाद हाल में राजकमल प्रकाशन से आया है- ‘घर बेगाना हुआ किया’। बिहार के राजनीतिक बदलावों, विस्थपान जैसे अनेक सूत्रों से जोड़कर इस उपन्यास की कथा बुनी गई है। उपन्यास का हिंदी अनुवाद मैंने किया है। इसका एक अंश पढ़िए- प्रभात रंजन
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बिनोद पत्रकार इसलिए बन गया क्योंकि स्कूल में उसने जॉर्ज ओर्वेल को पढ़ा था। ओर्वेल की तरफ़ उसका आकर्षण बर्मा में हाथी मारने को लेकर रोचक लेख या अंग्रेज़ी भाषा की स्पष्टता को लेकर उसके लेख से अधिक इस बात के कारण हुआ कि उसका जन्म मोतिहारी में हुआ था। ओर्वेल की माँ ने ओर्वेल को 1903 में उसी अस्पताल में जन्म दिया था जिसमें कई दशक के बाद बिनोद का जन्म हुआ। इस बात की जानकारी से बिनोद ओर्वेल के बारे में ऐसे सोचने लगा मानो वह उसका रिश्तेदार हो, मानो दोनों की एक ही जाति हो।
लेकिन जिस वजह से उसने संपादकीय लिखना शुरू कर दिया वह उसके पिता थे।
बाबा को बहुत सी बातों से ग़ुस्सा आता था। अंटार्टिका से आने वाली हवा के कारण आस्ट्रेलिया में बारिश नहीं हो रही। अमेरिका के कनेक्टिकट राज्य में आसमान से मेढक की बारिश हुई। चीन में एक आदमी को इसलिए गिरफ़्तार किया गया क्योंकि वह पीने के पानी के कुंड में ज़हर मिला रहा था ताकि उसके वाटर प्युरिफ़ायर की बिक्री बढ़ सके। आज़मगढ़ में एक आदमी को उसके चाचा ने मृत घोषित कर दिया क्योंकि वह उसकी संपत्ति चाहता था। लेकिन उस आदमी ने लड़ाई लड़ी। उसने मृतकों का एक संघ बनाया और अपनी हर याचिका में मृतक शब्द का उपयोग करता था। इस बात को अदालत में साबित करने में उसको अठारह साल लग गए कि वह वास्तव में ज़िंदा था। बाबा इन बातों के ऊपर ध्यान देते थे।
वह रेडियो सुनते थे और नज़र कमजोर होने के बावजूद वे पत्र पत्रिकाएँ पढ़ते थे, और इस बात को समझने की कोशिश करते थे कि दुनिया में क्या-क्या ग़लत हो रहा था। और फिर उनका अपना शरीर बीमार रहने लगा, उनको इस बात की समझ आई कि इस धरती को मौत ख़त्म कर रहा था, एक मारक कैंसर धरती को दुर्गंध के ढेर में बदल रहा था, इसकी नदियों और समुद्रों के जल के रंग को बदल रहा था, तब उन्होंने अपनी खोज को और स्पष्ट किया। अब वे मृत्यु के जनतंत्र के बारे में बात करते थे, और खुद को दिलासा देते थे कि किस तरह से इसने छोटे बड़े किसी को नहीं छोड़ा था।
एक साल पहले जब वे दिल्ली में एम्स में इलाज करवा कर ट्रेन से पटना लौट रहे थे तो उन्होंने बिनोद को महात्मा गांधी की मृत्यु से जुड़ी एक कहानी सुनाई। गांधी जी हर सुबह एक बकरी का दूध पीते थे। जिस दिन गांधी जी की हत्या हुई देश में किसी के घर चूल्हा नहीं जला। दिल्ली के बिडला हाउस में सर्वेंट क्वार्टर से वह बाग़ दिखाई देता था जहां नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी के सीने में तीन गोलियाँ दागी थीं। उससे पहले सुबह में रोटी पकाने के लिए आटा साना जा चुका था और बाद में उसको किसी ने छुआ भी नहीं। रात में गांधी की बकरी ने रसोई के दरवाज़े से अपना सिर अंदर घुसाया और साना हुआ आटा खा गई। सुबह बकरी पेट फूलने से मर गई। उसकी आँखें बाहर निकल आई थीं।
उस सफ़र में बाबा ने ट्रेन के एक खटारा डिब्बे में वह कहानी बिनोद को सुनाई, उनका बीमार शरीर ट्रेन में बर्थ पर पसरा हुआ था। ट्रेन के डिब्बे से अधिक शोर कहीं और नहीं होता है लेकिन उनके आसपास के मुसाफ़िर धीरे धीरे बात कर रहे थे और जब बाबा बोल रहे थे तो बहुत धीरे धीरे बात कर रहे थे। बिनोद लोगों की आँखों में जो देख रहा था उससे बहुत चिढ़ गया था और इस कारण वे लोग बाबा से अलग तरह का बर्ताव कर रहे थे। लेकिन बाबा यह बताकर ख़ुश थे, ऐसा लग रहा था मानो वे कहीं दूसरी तरफ़ से इस खबर को लेकर आए हों। बिनोद जब पटना लौट रहा था तो उसके दिल में छुपी हुई एक ख़्वाहिश थी। रात की ठंडी हवा और ट्रेन के हिचकोलों में उसको बर्थ पर नींद आ गई। ट्रेन अंधेरे में रुक गई थी लेकिन चूँकि कोई कुछ बेच नहीं रहा था, कोई भी रात के दो या तीन बजे ताज महल की छोटी सी मूर्ति ख़रीदने के लिए या बेस्वाद कुल्हड़ चाय बेचने के अपने मौलिक अधिकार का उपयोग नहीं कर रहा था, लेकिन एक अजीब से ख़याल के साथ उसकी नींद खुली कि उन लोगों को इस कारण पकड़ लिया गया था क्योंकि ट्रेन में किसी की मृत्यु हो गई थी।
करने के लिए कुछ नहीं था सिवाय इसके कि डिब्बे में काफ या खर्राटों की आवाज़ सुनते हुए लेटे रहा जाए। वह रात साँसों से भरी रात थी।
घर में बाबा पीठ के बल लेटे हुए थे, उस दिन के अख़बार का पन्ना उनके चेहरे के पास था। उन्होंने दाढ़ी नहीं बनाई थी और उनके चेहरे पर वैसी मुर्दनी पहले नहीं थी और उनका बायाँ हाथ फूल गया था क्योंकि किसी नए इंजेक्शन का ग़लत असर हो गया था। बिनोद दरवाज़े के अंदर खड़ा था, उसका सूटकेस पीछे रखा था। जब उसने अपने पिता के पास जाते हुए उनके पैर छुए तो बाबा ने तत्काल यह बताना शुरू कर दिया कि वे उन दिनों क्या पढ़ रहे थे। इराक़ में इतनी अधिक अनिश्चितता हो गई थी; युद्ध को लेकर भ्रम फैला हुआ था, हर तरफ़ अफ़वाहों का बाज़ार गर्म था। बिनोद के शरीर से ट्रेन की गंध आ रही थी, वह कुर्सी के ऊपर बैठकर सुनने लगा।
बाबा ने कहना शुरू किया, ‘जब हम लोग बच्चे थे तो अरेबियन नाइट्स से बग़दाद की कहानियाँ में बग़दाद के बारे में पढ़ते थे। राजा की क्रूरता के बारे में और वज़ीर की बेटी द्वारा सुनाई गई कहानी। आज इराक़ में क्या सही है क्या ग़लत कौन बता सकता था? लोगों का कहना था कि बग़दाद में अमेरिकी इराक़ी नोटों को जला रहे थे और देश में नगदी नहीं बचा था। न कोई धंधा बचेगा न काम। उदय हुसैन ने जिन शेरों को पालतू बनाकर रखा था वे सड़कों पर घूम रहे थे।‘
इस तरह की अफ़वाहें थीं कि इज़रायल के लोग इराक़ में ज़मीन जायदाद ख़रीद रहे थे जिस तरह से उन्होंने फ़िलिस्तीन में किया था। इस तरह की खबरें आई थीं जो निश्चित रूप से सच नहीं थी। बाबा ने बीबीसी पर सुना था कि इस तरह की खबरों के आने के बाद पाकिस्तान में दंगे भड़क गए कि अमेरिकी सिपाही इराक़ में स्कूल जाने वाली लड़कियों को पॉर्न बेच रहे थे।
बिनोद ने खखार कर अपना गला साफ़ किया। लेकिन बाबा ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उनका कहना था कि पत्रकारों को इस बारे में लिखना चाहिए कि लोगों को अफ़वाह फैलाने से बचना चाहिए। वह यह जानना चाहते थे अबू गरेब के अत्याचारों के बारे में बिनोद क्या सोचता था- और फिर जवाब सुनने के लिए उन्होंने इंतज़ार भी नहीं किया। शायद बिनोद की चुप्पी को उन लोगों ने असहमति समझ लिया और वे ज़ोर ज़ोर से बोलने लगे।
‘दुनिया को पता चलने के पहले ही सड़कों पर बात फैल चुकी होगी। लेकिन जो लोग अफ़वाहों में यक़ीन रखते हैं उन लोगों ने भी लिंडी इंग्लैंग के मुस्कुराते चेहरे के बारे में कल्पना नहीं की होगी। नंगे क़ैदियों के ऊपर फिरते हुए उसके हाथ, उसके अपने वक्षों के ऊपर उसके हाथ, दुभाषिया इराक़ियों से हस्टमैथुन के लिए कह रहा था।‘
बिनोद को ठीक से याद था कि उसके बाबा ने उसके सामने इस शब्द का प्रयोग पहले कभी नहीं किया था। वह यह सोचकर उदास हो गया कि इसी तरह की छोटी-छोटी बातों से किसी वयस्क आदमी को यह पता चलता है कि उसके पिता मर रहे हैं। वह अपने पिता से यह पूछना चाहता था कि उनकी छाती का दर्द बढ़ तो नहीं गया था या वे दवाएँ समय पर ले रहे थे या नहीं। लेकिन उसने नहीं पूछा क्योंकि इसका मतलब इस बात को मान लेना होता कि बाबा की देखभाल की ज़रूरत थी और वह वहाँ देखभाल करने के लिए नहीं था। वह अपने पिता को माला श्रीवास्तव के बारे में अपनी दिलचस्पी की बात बताना चाहता था, लेकिन उसने बताया नहीं। बाबा ने अपने जीवन काल में कुछ सरकारी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाई थीं; नाच-गाने वाली हिन्दी फ़िल्मों में उनकी दिलचस्पी नहीं के बराबर थी। बिनोद उनको विकास धर के बारे में कैसे बताता?
बाबा भी यही चाहते कि बिनोद लेखक बन जाए। उनके दिमाग़ में जो साँचे थे वे भी कपड़ों की तरह पुराने पड़ चुके थे। देश भर में अरुंधति रॉय जैसे युवा लेखकों की धूम मची हुई थी लेकिन बाबा अभी भी मुंशी प्रेमचन्द के प्रशंसक थे जिन्होंने हिन्दी लेखन में यथार्थवाद की शुरुआत की थी—लेकिन बम्बई में पटकथा लेखक के रूप में असफल रहे थे। प्रेमचन्द बाबा के जन्म के एक-दो साल के अन्दर गुज़र गए थे, लेकिन लगता है अपनी मृत्यु के बाद वे और अधिक प्रसिद्ध हो गए। बाबा का ऐसा मानना था कि अगर स्वीडिश एकेडेमी को हिन्दी भाषा के बारे में पता होता तो प्रेमचन्द को नोबेल पुरस्कार मिला होता। लेकिन यह महज़ भाषा की बात नहीं थी; दुनिया में अन्याय की जड़ें गहरी रही हैं। बाबा इस बात को समझ नहीं सकते थे कि साहित्य का नोबेल पुरस्कार विंसटन चर्चिल को क्यों मिला, जवाहरलाल नेहरू को क्यों नहीं। नेहरू की ऑटोबायोग्राफ़ी और डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया पटना वाले घर की किताबों में बिनोद ने बचपन से देखा था। किताबों की एक ही अलमारी थी और वह बैठकख़ाने में थी। कई बार कोई मेहमान पास जाकर किताबों को देखता था। बर्ट्रेंड रसेल, गांधी, नेहरू, मुल्कराज आनन्द, हजारीप्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, पर्ल एस बक, हेमिंग्वे। बाबा मेहमान की तरफ़ मुड़कर कहते थे कि नेहरू जैसी अंग्रेज़ी आज़ादी के पहले और बाद में किसी की नहीं हुई।
जब बिड़ला हाउस में गांधी का शरीर शोकाकुल लोगों से घिरा हुआ था तो नेहरू ने ऑल इंडिया रेडियो से देश के नाम सम्बोधन दिया था। उन्होंने बिना किसी नोट के अंग्रेज़ी में भाषण दिया था—
हमारी ज़िन्दगी की रौशनी चली गई और चारों तरफ़ अन्धकार छा गया है। हमारे प्यारे नेता, बापू, जिन्हें हमने राष्ट्रपिता कहा, नहीं रहे। मैंने कहा, रौशनी चली गई। लेकिन मैं ग़लत था, क्योंकि इस देश में जो रौशनी चमकी थी वह कोई आम रौशनी नहीं थी…वह रौशनी आज से बढ़कर आगे के लिए थी; वह ज़िन्दगी का प्रतीक थी, सनातन सत्य का, हमें उचित राह की याद दिलाने वाली, हमें ग़लतियों से बचाने वाली, इस प्राचीन देश को आज़ाद करवाने वाली।
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