सचिन कुंडलकर के उपन्यास ‘कोबॉल्ट ब्लू’ का एक अंश

मराठी लेखक सचिन कुंडलकर का उपन्यास आया है ‘कोबॉल्ट ब्लू’। इस उपन्यास का मराठी से हिंदी में अनुवाद किया है गीत चतुर्वेदी ने। पेंगुइन हिंद पॉकेट बुक्स से प्रकाशित इस उपन्यास का एक अंश पढ़िए-
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जब तुम इस कमरे में आए, तुमने कहा, ‘कितनी टेम्प्टिंग सुगंध है इस कमरे में!’
तब मुझे लगा, अगर यह लड़का इस कमरे में रहा, तो कुछ न कुछ इंटरेस्टिंग तो ज़रूर होगा। मैंने ज़ोर की साँस लेकर उस मीनार जैसे
कमरे की गंध को अपनी छाती में भर लिया। फिर तुमने कहा, ‘क्या तुम इस कमरे में चोरी-छिपे सिगरेट पीने आते हो?’ उस दिन मुझे अहसास हुआ कि सारी गंध दरअसल मन से होती है। असल कुछ नहीं होता।
आधी रात की ठंड में, गपशप करते हुए हम उस कमरे की खिड़की पर बैठे थे, तब मुझे लगा, मेरी ज़िन्दगी कितनी मामूली है, ज़रूरत से ज़्यादा सुरक्षित और आरामदेह।
जब तुम दसवीं में थे, तब तुमने अपने आई-बाबा को खो दिया था। रिश्तेदारों के यहाँ रहना टालकर तुमने हॉस्टल में रहना चुना। अपनी ज़िन्दगी के, अपनी परवरिश के सारे फ़ैसले तुमने ख़ुद लिए। तिस पर ज़िद यह कि चाहे कुछ भी हो जाए, किसी को अपनी आँख का एक आँसू तक नहीं दिखने दोगे।
दसवीं का तुम्हारा रिज़ल्ट शानदार था। स्कूल में दोस्तों और उनके प्रसन्न अभिभावकों की भीड़ ने तुम्हें असहज कर दिया था। इस कारण तुम वहाँ से ग़ायब हो गए थे। उस समय तुम अपनी एक मौसी के यहाँ रहते थे। जब तुम वहाँ पहुँचे, तो तुमने पाया कि वे लोग दरवाज़े पर ताला लगाकर कहीं गए हैं। हाथ में रिज़ल्ट थामे, कड़क धूप में बेपनाह तपती उन सीढ़ियों पर तुम उनके इंतज़ार में शाम तक बैठे रहे . . . जिस समय तुम यह बात मुझे बता रहे थे, क्या उस समय भी तुम्हारे पैरों तले वे तपती हुई सीढ़ियाँ थी?
आधी रात की ठंड में, उस कमरे की खिड़की पर, सिर्फ़ हम दोनों थे। उसके बावजूद तुम रोये नहीं। ऐसे मौक़ों पर मुझे लगता था कि मैं
तुम्हारी आई, तुम्हारा बाबा, तुम्हारा भाई, तुम्हारा दोस्त—सब कुछ बन जाऊँ, लेकिन उससे पहले ही तुम उस मुक़ाम तक पहुँच चुके थे,
जहाँ तुम यह तय कर चुके थे कि तुम कभी रोओगे नहीं।
साथ पढ़ने की गरज से जो गद्दा मैंने ऊपर के कमरे में बिछाया, तो फिर उसे कभी नीचे लेकर नहीं आया। इस तरह, धीरे-धीरे उस कमरे में सरकते हुए मैं तुम्हारे क़रीब आया, हर बार यह सोचते हुए कि इतने-भर से तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी।
एक रात सबके खाना खा लेने के बाद जब मैं ऊपर कमरे में आया, तो मैंने देखा, मेरा बेज़ रंग का कुरता पहन तुम मेरा स्केच बना रहे थे, तब मुझे यक़ीन हो गया कि मेरे इतने-भर क़रीब आने से तुम्हें सच में कोई परेशानी नहीं हुई। जब वह स्केच पूरा हो जाएगा, तब तुम उसे मेरे तकिए के नीचे रख दोगे, इस उम्मीद के साथ मैं उठकर दुबारा बाहर चला गया, धीरे-से दरवाज़ा बंद किया और सीढ़ियों पर बैठकर जतन से रातरानी की ख़ुशबू सूँघने लगा।
हवा एकदम-से थम गई थी। इस बीच रसोईघर की बत्ती जल उठी। बाबा के ज़ोर-से खाँसने की आवाज़ आई और बत्ती बंद हो गई। सामने लड़कियों के हॉस्टल में अभी भी चहल-पहल थी। चार-पाँच लड़कियाँ अपने बालों में तेल मलते हुए खिलखिलाकर हँस रही थीं। बाक़ी एक कमरे में अंताक्षरी खेल रही थीं। बेवजह ही मैं यह सोचने लगा था कि इन मूर्ख लड़कियों का आख़िर क्या होगा।
तभी ऊपर वाले कमरे की बत्तियाँ बंद हो गईं। मैं सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया, दरवाज़ा खोला और गद्दे पर लेट गया। गद्दे का आधा हिस्सा
मेरे लिए छोड़कर बाक़ी में तुम सोए हुए थे। तकिए के नीचे मेरा स्केच था। लेकिन यह वो स्केच नहीं था, जो मैंने देखा था। बल्कि इस काग़ज़ पर हमारा कमरा था, सीढ़ियाँ थी, मैं था और रातरानी का पेड़ था।
बहुत ग़ौर-से देखने पर मैंने पाया कि माथे पर बल डालकर, आँखों को जबरन मींचकर छोटे बच्चों की तरह तुम झूठ-मूठ में सोए हुए थे।

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