अविनाश मिश्र की दस कविताएं

हिंदी कविता की हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि किसी कवि में नयापन दिखता ही नहीं है. कभी कभी जी करता है कि हिंदी कविता के साथ  काण्ड कर दूँ. लेकिन कुछ कवियों की कवितायेँ रोक लेती हैं. अविनाश मिश्र ऐसे ही एक कवि हैं. आज उनकी दस कविताएं- प्रभात रंजन 
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अगर कोई और समय होता
मैं चीख पड़ता भय से
अगर अकेला होता
भर जाता घृणा से
अगर नाउम्मीद होता
लिथड़ा रहता आत्मदया के पंक में
अगर मेरा कोई इतिहास न होता
बन जाता और दुःखी
चाहता और सहानुभूति
अगर सामने संसार न होता
***
और क्या कहेंगे
इतनी अच्छी थी उनकी तकदीर
कि गुलामियों की ओर ले जातीं रेलगाड़ियों में
मिल गई उन्हें गांड़ टिकाने की जगह
इतनी अच्छी थी उनकी तकदीर
कि किसी ने नहीं समझा उन्हें देशद्रोही या दहशतगर्द
इतनी अच्छी थी उनकी तकदीर
कि जेबकतरों ने उन्हें अछूत माना
और सलामत रहे उनके सस्ते मगर कैमरे वाले सेलफोन
उनके मैले कपड़ों में कहीं बजते हुए
इतनी अच्छी थी उनकी तकदीर
कि सकुशल वहां पहुंच जाने की खबर थी उनके पास
जहां बहुत धूल थी और बहुत भीड़
ये बहुत धूल और बहुत भीड़
रोज कुछ बीमार और कुछ जिंदा छोड़ देती थी
नारे लगाने के लिए     
इसे अच्छी तकदीर नहीं तो और क्या कहेंगे
कि सत्ताएं बदल जाती थीं
और लौटने के विकल्प खुले रहते थे
***
नदियां
मैं उन्हें बिलकुल भी नहीं जानता
लेकिन वे मुझे बार-बार मिलती हैं
इस सृष्टि की व्यस्त, अव्यस्त और अस्त-व्यस्त जगहों पर रोती हुईं
मैं उनके विलाप की वजह बिलकुल भी नहीं जानता
लेकिन यह जानता हूं कि
उत्पीड़ितों के प्रति भी करुणा से भरी हुईं
वे इस सृष्टि में सबसे सुंदर हैं
उनमें आंसू बचे हुए हैं
***  
कवि-कुकर्म
क्या दिया उस कवि ने
इस भद्दे समाज से पहले
अपनी उस पत्नी को
जो उसके युवा दिनों से
यहां तक रगड़ती चली आई
एक लाचार उम्र तक
वह अब भी अवकाशवंचित सुबहों में
पकड़ती है एक भीड़ भरी बस
अपने बेटे की उस बेटी के साथ 
जो अब समझदार हो चुकी है
***
प्रूफरीडर्स
वे ऐनक लगाकर सोते हैं
गलतियों के स्वप्नवाही, सर्वव्यापी और अमित विस्तार में…
वे साहित्यकारों की तरह लगते हैं
महाकाव्यों की गलतियां जांचते हुए
इस संसार की असमाप्त दैनिकता के असंख्य पाटों के बीच
वे सतत एक त्रासदी में हैं
वे सब पुस्तकें वे पढ़ चुके हैं जो मैं पढूंगा
वे सब जगहें वे सुधारकर रख देंगे एक दिन
जो मैंने बिगाड़कर रख दी हैं
वे एक साथ मेरे पूर्वज एक साथ मेरे वंशज हैं
***
यहां सुधार की जरूरत है
यह वह जगह है जहां वे ‘भूल-सुधार’ प्रकाशित करते हैं
कभी-कभार ‘भूल-सुधार’ में भी वे विराट गलतियां करते हैं
यह करना महज कोई भूल नहीं एक भाषा का विभ्राट है
जो मटमैले और लगभग अपठनीय पृष्ठों पर
बार-बार उजागर होता है
वर्तनी की असंख्य अशुद्धियों के साथ
यहां ‘भूल-सुधार’ नहीं आत्मस्वीकृतियां छापीं जानी चाहिए…
***
पार
वे कहीं-कहीं घृणित, अप्रिय और हास्यास्पद हैं
ये वस्तुत: सीमाएं हैं, दोष नहीं
मूल से अपरिचित रही आई पाठकीय विवशता के भाषिक संसार में
‘वह कृति क्यों नहीं बेहतर बन पड़ी एक भाषा में
वह जो एक भाषा का कालजयी वैभव थी?’
ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए वे बाध्य नहीं हैं
वे बस माध्यम हैं और इस रूप में ही सार्थक हैं
वे अपरिचय को नष्ट कर नए संदर्भ रचते हैं
और इस वजह वे प्रासंगिक हैं और रहेंगे
यह मैं अनुवादकों के विषय में कह रहा था
***
एक अन्य युग
आपत्तियां केवल निर्लज्जों के पास बची हैं
और प्रतिरोध केवल उपेक्षितों के पास
बहुत सारे विभाजन प्रतीक्षा में हैं
स्त्रियों को स्त्रियों में ही अलगाते हुए
बलात्कारों को बलात्कारों में ही अलगाते हुए
वंचितों को वंचितों में ही अलगाते हुए
आततायियों को आततायियों में ही अलगाते हुए
संकीर्णता इस कदर बढ़ी है कि संदेहास्पद हो गए हैं समूह
अब पीठ या कंधे पर कोई हाथ महसूस नहीं होता
आंखों के आगे केवल उंगलियां हैं उठी हुईं
***
यह मुझसे होगा
धोखा नहीं दूंगा 
कह दूंगा कि ये काम मुझसे होगा नहीं 
इंतजार नहीं करवाऊंगा 
समझा दूंगा कि वे शक्लें मुझे पसंद नहीं 
लिया है जो कुछ लौटाऊंगा 
नहीं रखे रहूंगा अपना समझकर
नींबू-मिर्च की तरह लटकता रहेगा
मेरे व्यवसाय पर मेरा विश्वास 
सारे संदेशों का जवाब दूंगा 
भले ही एक शब्द में 
***
फिर हमने यह देखा
रघुवीर सहाय के प्रति
चिंताएं कुछ अपनी कम नहीं हुईं
सब हैं अब तक वैसी की वैसी
हां कुछ बदलीं पर मरहम नहीं हुईं
वह कील अब भी रोज निकलती है
इस दुःख को अब भी रोज समझना पड़ता है
टीस भला ये क्यों नहीं पिघलती है 
पास का कागज कम पड़ता जाता है
‘अपमान, अकेलापन, फाका, बीमारी’
वक्त यही बस लिखना सिखलाता है?
हक के लिए हम अब तक लड़ते हैं
सारे महीने लगते हैं लंबे-लंबे
पैसे अब भी हमको कम पड़ते हैं
हम जब-जब कहते हैं अब अच्छा होगा
समय और कठिन होता जाता है
हमारा कहना आखिर कब सच्चा होगा?
***

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