• Blog
  • गीताश्री से उनके नए उपन्यास ‘अंबपाली’ पर बातचीत

     

    गीताश्री का नया उपन्यास आया है ‘अंबपाली’। वैशाली की इस ऐतिहासिक किरदार को लेकर बहुत लिखा गया है। लेकिन गीताश्री का लेखन-विश्लेषण बहुत अलग है। मुझे एक बात और समझ नहीं आ रही थी कि अंबपाली पर किसी स्त्री ने विस्तार से क्यों नहीं लिखा? इन्हीं सवालों के जवाब जानने का प्रयास मैंने किया है लेखिका गीताश्री से। आप भी पढ़िए- प्रभात रंजन

    =====================

    1 आम्रपाली के जीवन पर उपन्यास लिखने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

    गीताश्री- आम्रपाली की चर्चा की छाया में मेरा बचपन गुजरा है. हम एक लोकगीत सुनते थे –
    “हय धरती जे महावीर के, भेल जहां गनिका अंबपाली
    और जहां सबसे पहिले , गणतंत्र के फूटल सुंदर लाली ! “
    मेरी मातृभाषा बज्जिका है, यह उसी भाषा का लोकगीत है. गीत बड़ा है जिसमें आगे चल कर वैशाली पर गर्व करने की बात कही गई है. राम के भी यहाँ आने की चर्चा है. यह गनिका अंबपाली उत्सुकता और फैंट्सी जगाती थी.
    मेरे बचपन में मेरे बाबा कहते थे कि गर्व करो कि तुम वैशाली की पुत्री हो जिसने दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया. हम वृज्जि हैं, हमारा संघ था, उसमें आठ कुल थे. उसमें सब राजा होते थे. हम उसी कुल से हैं.
    लेकिन जब अंबपाली की चर्चा चलती तो वे चुप रह जाते थे. धीरे -धीरे मेरी समझ में आया कि वो एक अभिशप्त नाम है. एक ऐसी स्त्री जिसका न कोई लंबा चौड़ा इतिहास है न पराक्रम गाथा. हमारे ज़िले में अपनी बेटी का नाम आम्रपाली नहीं रखते थे उस वक्त. आज का मुझे पता नहीं. इस तरह बचपन से मेरे भीतर आम्रपाली बसने लगी थी. उसके बारे में जानने की उत्सुकता थी. लिखने के बारे में कभी सोचा नहीं. एक बार मैं घर गई तो वहाँ से वैशाली चली गई घूमने. बचपन में तो वहाँ रहती थी. तब कहाँ इतना महत्व पता था. तीन चार साल पहले जब वहाँ से लौट कर आई और मैं कुछ लिखना चाहती थी, यात्रा वृतांत जैसा. मैंने अपने बहुत करीबी लेखक मित्र-भाई से बात की. उनकी इच्छा थी कि मैं अंबपाली और वैशाली की कथाएँ लिखूँ. वहाँ से जो क़िस्से बटोरे, लोक में जो क़िस्से प्रचलित हैं, एक पूरी तवायफ परंपरा है जो अंबपाली काल से जुड़ती है.
    हमने काफ़ी विस्तार से इस पर बात की. उन्होंने ही
    मुझे प्रेरित किया कि मैं अंबपाली और वैशाली को केंद्र में रख कर लिखना शुरु करुं। मुझे ये बताने में तनिक हिचक नहीं कि उन्होंने  ही मुझे कुछ शोध सामग्री उपलब्ध कराई. कुछ मैंने जुटाई. लिखने से पहले फिर से मुझे वैशाली जाना पड़ा , गाँव दर गाँव भटकना पड़ा. वहाँ वैशाली के कई गाँवों में अंबपाली की निशानियाँ आज भी मौजूद हैं. कहाँ किस सरोवर में वो बाल धोती थी, किस वन में आखेट के लिए जाती थी ये सब.
    स्थानीय लोगों, विद्वानों से मिली. उस दौर का इतिहास पढ़ा. कुछ क़िस्से लिखें जो जानकीपुल पर धारावाहिक रुप में छपे. लोगों ने खूब पसंद किया. ख़ूब पढ़ा गया उसे. मुझे भी आनंद आने लगा. जैसे कोई आत्मा मेरी रुह से निकल कर मुझसे खुद को लिखवाने लगी. करीबी मित्र -भाई की प्रेरणा बनी रही. मैं लिखती रही. और एक दिन उपन्यास जितनी सामग्री हो गई मेरे पास. फिर यह विचार हुआ कि अब उपन्यास पर काम किया जाए. क्योंकि ये क़िस्से इतने ज़्यादा थे, अनसुने क़िस्से … जिन्हें उपन्यास में ही समेटा जा सकता था. इस तरह यह उपन्यास लिखा गया. अगर मेरे मित्र -भाई लेखक मुझे प्रेरित नहीं करते तो शायद अभी मैं अंबपाली नहीं लिखती. लिखने के अरमान रह जाते या जीवन की अंतिम बेला में लिखती. कुछ पता नहीं.
    यह प्रेरणा “एक्सोर्सिज्म” की तरह थी कि कोई आत्मा बाहर निकल आती है, अपना बयान देने. अपनी कहानी सुनाने.

    2 इसको लिखने में आपको कितना समय लगा और किस तरह से आपने इसको लेकर शोध किया?

     गीताश्री- अंबपाली उपन्यास लिखने में दो साल से ज़्यादा समय लगा. लेखन और शोध कार्य साथ -साथ चल रहा था. वैशाली की कई यात्राएँ हुईं. अंबपाली के गाँव भी गई. वहाँ ग्रामीणों से बातचीत की. इसलिए लेखन रुक रुक कर किए. मुझे कोई हड़बड़ी भी नहीं थी. मैं ठोस काम करना चाहती थी. मैं कम ज्ञात ऐतिहासिक पात्र पर काम कर रही थी, इसलिए उसकी कड़ियाँ तलाशने में बहुत मेहनत करनी पड़ी. उपन्यास पूरा करके मैंने वाणी प्रकाशन को अगस्त -2020 में ही दे दिया. जो अब छप कर आई है.
    शोध के लिए कई किताबें खंगाली जहां कहीं भी आम्रपाली की हल्की चर्चा मिल जाती, वहाँ से सूत्र उठा लेती. उस पर कथा बुनने लगती थी. मैं ज्यों का त्यों कथा या इतिहास नहीं लिखना चाहती थी. उस कथा में मुझे नया ट्रीटमेंट, अलग विजन डालना था. मेरा उद्देश्य अलग था . मैं आख़िर इस सदी में अंबपाली की कथा क्यों कह रही हूँ? क्या जरुरत है? इन सवालों से पहले मुझे टकराना था. मेरे भीतर जब सटीक जवाब आया तभी मैंने लिखना शुरु किया. अंबपाली के बहाने जो मैं कहना चाहती थी, वो कह पाई या नहीं… ये ध्यान रखना था. मैंने शोध में सिर्फ़ अंबपाली की खोई हुई कड़ियाँ तलाशी और कथा खुद बनी. उपन्यास में सिर्फ़ अंबपाली ही नहीं है. उसकी समकालीन अनेक स्त्रियाँ हैं जो उसके साथ थेरी बनीं. जिन्होंने कविताओं में अपने दुख दर्द कहे. मैं उस काल के समाज और परिवार को समझना चाहती थी. उसे आज से जोड़ कर देखना चाहती थी . क्या उस समय स्त्री मुक्ति का मार्ग भी किसी अन्य धर्म से होकर जाता था? क्या घरेलू हिंसा उस काल में इतनी चरम पर थी? शताब्दियाँ बीत गईं, स्त्री के दुख और दुख के कारण नहीं बदले.
    इन सब पर शोध करने के लिए सामंती समाज के बीच फिर से घुसना पड़ा.

    3 वैशाली में आम्रपाली को किस तरह याद किया जाता है? आपका संबंध वैशाली जनपद से है इसलिए आपसे यह सवाल पूछ रहा हूँ।

    गीताश्री- वैशाली ज़िले में दो तरह के लोग हैं. एक सामान्य ज़मींदार लोग जिनके लिए अंबपाली सिर्फ़ एक गणिका थी, नगरवधू थी. जिसका काम उस काल के सामंतों का मन बहलाना था. हाँ ये भी मानते हैं कि बहुत शक्तिशाली महिला थी. योद्धा थी और समूचे जनपद पर उसका असर था. इतनी अनुपम सुंदरी थी कि किसी का मन डोल जाए.

    दूसरे वैशाली में जो पढ़ी लिखी जमात है, वो अलग ढंग से अंबपाली के बारे में सोचती है. उनकी ये सोच इतिहास से नहीं बनी, रामवृक्ष बेनीपुरी जी के नाटक अंबपाली से बनी.

    वे बड़े गर्व से भर कर अंबपाली को महिमा मंडित करते हैं. मैं एक स्त्री हूँ और लेखक भी. मैं बेनीपुरी जी के प्रति शुक्रगुज़ार होते हुए अपनी अंबपाली को उनकी अंबपाली के समकक्ष खड़ा करके देखना चाहती थी. मेरी अंबपाली और किसी की अंबपाली से नहीं मिलती. मैंने थेरी अंबपाली का ज़िक्र किया है, वो इस रुप में कहीं नहीं मिली मुझे. बस थेरी गाथा में उसकी छोटी -सी किंतु बेहद मानीखेज कविता मिलती है मुझे और वही कविता मेरे लिए कथा सूत्र बन जाती है. उस कविता से अंबपाली के यौवन के दिनों को, उसके वैभव विलास को आप पहचान सकते हैं. मैंने कविता के माध्यम से उसके पिछले जीवन में प्रवेश किया और ढूँढ कर लाई एक नयी और अलग -सी स्त्री चेतना से संपन्न अंबा !

    मैं वैशाली की बेटी हूँ और मेरा उससे जुड़ाव स्वभाविक है. उसका सुख दुख मुझे छूता है. उसके साथ जो हुआ, अपने अभिशप्त सौंदर्य की वजह से उसने जो जीवन जिया, वो मुझे कोंचता रहा. उसके नाम पर मुँह बिचकाते सामंत देखे मैंने. सच कहूँ , मैं अगर वैशाली की नहीं होती तो अंबपाली पर नहीं लिखती. स्थानीयता बड़ी बात होती है. एक ही मिट्टी के रहे हम. जैसे सीता का दुख मुझे बहुत विचलित करता है वैसे ही वहाँ की स्त्रियों का दुख .

     यह उपन्यास लिख कर मैंने वैशाली के सामंतों को जवाब दिया है.

    वहाँ अंबपाली को एक ठसक वाली, बुद्धिमति , शक्तिशाली गणिका के रुप में याद करते हैं लोग जिसने बुद्ध के भोज भात के बदले समूची वैशाली का लालच ठुकरा दिया था. एक ऐसी महान स्त्री जिसे स्वंय महात्मा बुद्ध ने प्रवज्या दिलाई. सौभाग्य और अभिशाप उसके संग -संग चले.

    इतिहास ने उसे तवज्जो नहीं दी, साहित्य ने उसे प्रतिष्ठा दिला दी.

    4 हज़ारों साल पुरानी इस किरदार को आप समकालीन संदर्भों में किस तरह देखती हैं?

    गीताश्री- अंबपाली के प्रति इतिहास और साहित्य दोनों ने कतिपय कृपणता दिखलाई है और उसे सदासर्वदा से उस स्थान से वंचित रखा है जिसकी वह नगरवधू और जनपद कल्याणी दोनों ही रूपों में अधिकारिणी थी। वह न केवल सत्ता और ऐश्वर्य के शीर्ष पर रही, अपितु आवश्यकता पड़ने पर उसने वैशाली के गौरव की रक्षा के लिए अस्त्र भी उठाए। लेकिन इसके बाद भी वह सामाजिक पदसोपान में केवल इसलिए उपेक्षित रही क्योंकि वह एक स्त्री थी और दुर्भाग्य से अप्रतिम सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थी। प्रेम उसके लिए निषिद्ध माना गया और मातृत्व अवैध, जबकि इस दोनों के बिना किसी भी स्त्री का स्त्रीत्व अपूर्ण और संदिग्ध माना जाता है। इस उपन्यास में मैं उन्हीं आधारभूत प्रश्नों से उलझती-जूझती हूँ जिन्होंने स्त्री को आज भी वैश्विक स्तर पर एक दोयम नागरिक की पहचान से मुक्त नहीं होने दिया है।

    ‘हर बार जब कोई महिला अपने लिए खड़ी होती है, बिना दावा किए वह उसी वक़्त सबके लिए खड़ी हो जाती है’ — माया एंजेलो के इस कथन को आप सहस्राब्दियों पहले अंबपाली के विचार-पद्धति में देख सकते हैं।

    5 आम्रपाली की कौन सी बात आपको सबसे अधिक प्रभावित करती है?

    गीताश्री-अंबपाली भारत की ही नहीं अपितु संभवतः विश्व की पहली स्त्रीवादी नागरिक थी – ठीक वैसे ही जैसे कि उसकी मातृभूमि वैशाली दुनिया का प्राचीनतम गणतंत्र था। किन्तु यहाँ ग़ौरतलब यह है कि अंबपाली का नारीवाद अपनी प्रवृति और प्रकृति में अस्तित्ववादी न होकर वैराग्य और आत्ममुक्ति से निःसृत था। सिमोन द’वोउआ ने बीसवी सदी में जिस सामाजिक सिद्धांत का ईजाद किया था कि – ‘केवल पुरुषों के हाथ से सत्ता प्राप्त करना ही अभीष्ट नहीं होना चाहिए, आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता की व्यवहारिक परिभाषा में परिवर्तन लाया जाए’ – अंबपाली कोई ढाई हज़ार साल पहले इस निष्कर्ष को आत्मसात कर चुकी थी.

    6 आम्रपाली पर बहुत लोगों ने लिखा है लेकिन उनमें से कोई भी वैशाली का नहीं है? आप वैशाली की पहली लेखिका हैं जिन्होंने आम्रपाली पर लिखा है? इस बात पर आपका ध्यान गया था? – 

    गीताश्री- हाँ, मैंने हमेशा गौर किया, ख़ास कर शोध के दौरान. बेनीपुरी जी भी मुज़फ़्फ़रपुर ज़िला के रहने वाले थे. मैं वैशाली ज़िला की बेटी हूँ और मेरा किशोरावस्था  वैशाली गढ़ पर खेलते हुए बीता है. वैशाली गढ़ की एक एक ईंट पहचानती थी तब. मेरा पागलपन ये था कि गढ़ से प्राचीन ईंट के टुकड़े उठा कर लाती थी. अपनी किताबों के बीच में रखती थी. उसे छूते हुए मैं उस युग में पहुँच जाती थी. वहाँ की हवा में घुँघरुओं की खनक है, बुद्ध के प्रवचन हैं, भिक्षुणियो की सात्विक सांसे घुली हुई हैं.

    मुझमें यह गर्व भरा गया था कि वैशाली का एक गौरवशाली अतीत है और अपराजेय गण के सदस्य रहे हैं हमारे पूर्वज. वैशाली की धूल में बुद्ध समेत हमारे पुरखों की पदचिन्ह घुले मिले हुए हैं. इन सब अहसासों के बावजूद अंबपाली पर लिखने में देरी हुई . शायद उस प्रेरणा का अभाव था जो किसी से बड़ा काम करा ले जाती है. सच कहूँ तो अंबपाली पर लिखने का साहस जुटाना बड़ी बात थी. जिस पर बड़े बड़े लेखक लिख गए हो… चाहे वे किसी क्षेत्र से आते हो. मेरे भीतर अंबपाली हमेशा बसी रही. मेरी माटी पानी की अंबपाली ने मुझसे खुद को लिखवा कर मुझे माटी का क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा दिया.

    7 एक और दिलचस्प बात है कि आम्रपाली पर लेखिकाओं ने, लगभग नहीं लिखा। उनके ऊपर जितनी बड़ी किताबें हैं सब पुरुषों की लिखी हैं- वैशाली की नगरवधू, नाटक अंबपाली आदि आदि। इसका कारण आपको क्या लगता है?

    गीताश्री- सही सवाल है. स्त्रियों में वर्जित प्रदेश में प्रवेश करने का साहस जल्दी नहीं होता है. मुझमें भी यह साहस देर से आया. अगर मैं वैशाली में ही पड़ी रहती तो कहाँ से लिखती? बाहर निकल आई हूँ, अब मुझे चिंता नहीं होती कि लोग क्या कहेंगे? मैंने पत्रकारिता में भी वर्जित विषयों पर काम किया है. मेरे लिए फिर आसान हुआ कि मैं अंबपाली पर काम कर सकूँ. मैं जिस सामंती परिवेश से आती हूँ , वहाँ अंबपाली नाम रखने के बारे में सोचना भी गुनाह था. कुछ नाम अभिशप्त होते हैं. सदियाँ गुजर जाती हैं, अभिशाप मुक्त नहीं होते नाम. मैं मुजफ्फरपुर में रहते हुए कभी चतुर्भुज स्थान नहीं गई. उधर से गुजरते हुए मुँह छुपाना पड़ता था. जब मैं वहाँ से बाहर निकली, पत्रकारिता में आई तो मुझमें साहस आया, और तब मैंने वहाँ की तवायफो से बातचीत की. वहाँ की मशहूर तवायफ रानी बेगम से मेरी मित्रता हुई. वे शहर की मेयर बनी थीं. अपने परिवार में शादियों में उनका नाच छुप छुप कर देखती थी . वे मेरे उपन्यास में आती हैं एकाध जगहे. स्मृतियों में उनकी चमक हमेशा बनी रही. मैं उनसे मिलना चाहती थी लेकिन छोटे शहर में बदनामी तेज़ी से होती है और हज़ारों परिचित आँखें आप पर धंसी होती हैं. ख़ासकर जवान होती हुई लड़की पर. इन बंदिशों ने बहुत देर कर दी मुझे आंतरिक जकड़बंदी से मुक्त होने में. मेरे शहर में मुझसे पहले कई लेखिकाएँ रही होंगी, जाने क्यों उन्होंने नहीं लिखा. आज भी हैं. सबकी अपनी आकांक्षा , स्वप्न और दायरा होता है. हम अपनी प्राथमिकताएं चुनते हैं. अंबपाली नाटक में प्रभावित किया होगा, अंबपाली ने नहीं. मुझे तो पालि साहित्य में अंबपाली की ठसक का पता मिला था… पूरे जनपद को ललकारने वाली स्त्री का पता… मुझे ऐसी बेख़ौफ़ स्त्रियाँ बहुत पसंद आती हैं. मुझे इसी तरह की इतिहास में गुम स्त्रियों की तलाश है अपने इलाक़े में. ऐसा प्रतीत होता है किमुझे अंबपाली ने चुना है… मैंने उसे नहीं.

    =============================

    उपन्यास वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है। 

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins