दुःख से ज्यादा खानाबदोश और कोई नहीं होता

पल्लवी त्रिवेदी की किताब ‘ज़िक्रे यार चले: लव नोट्स’ अपने आप में एक अलग विधा की किताब है। राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित इस किताब पर यह टिप्पणी लिखी है डेली कॉलेज इंदौर की अपूर्वा बैनर्जी ने।  आप भी पढ़ सकते हैं-
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इश्क़ इक ‘मीर’ भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है….
प्रेम तो वही का वही है, वैसे का वैसा है….. बस सूरत थोड़ी अलहदा हो गई है। दुनिया के एक शहर में कोई लड़का कविता लिखता है, तब बारिश होती है और दूसरे शहर में जब कोई लड़की कविता पढ़ती है, तब बारिश होती है।
पल्लवी त्रिवेदी
सच, जीवन के कितने ही रंग- रूप हों, गुण दोष हों, आकार प्रकार हो, जीवन की तलाश प्रेम से ही शुरू होती है और उसी पर खत्म। उसी प्रेम की ताउम्र सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है और उसी की कमी भी सबसे अधिक खलती है । यही एक भाव है जो भोगी को योगी  बना देता है और शैतान को इंसान। पर यह कभी अकेले नहीं आता, इसके साथ आती है उम्मीद, अपेक्षा, शिकायत, ग्लानि, शंका, उदासी, आस्था,  ईर्ष्या, बेचैनी और भी बहुत कुछ….. इसी प्रेम के विविध लम्हों और रंगो को, उसकी आहट और उसके खोने को, उसके आंसू और मुस्कानों को बड़ी शिद्दत से बयां किया है लेखिका पल्लवी त्रिवेदी ने अपनी पुस्तक ज़िक्रे यार चले लव नोट्स में।
जब इसे पढ़ना शुरू किया तो 48 सुंदर शायराना अंदाज़ में सजे शीर्षकों से तैयार ये लव नोट्स एक के बाद एक आसानी से पढ़ते चली गई। बात, जब बिना मशक्कत के आप तक पहुंच जाए तो लेखन की सहजता आपको तसल्ली तो देती है , चमत्कृत भी करती है। इस विषय पर लेखिका कहीं अपनी प्रतिभा और ज्ञान का ढिंढोरा पीटती नज़र नहीं आती पर भी छोटे छोटे किस्सों से प्रेम के, दोस्ती और रिश्तों के, एहसासों के ऐसे सुंदर ताने बाने बुनती हैं  कि आप हर दौर, हर अवस्था, के प्रेम को हर कोण से महसूस करते चलते हैं। लव नोट्स पढ़ते कहीं आप ख़ुद को खड़ा महसूस करते हैं, कहीं कभी यह भी लगता है कि हमने अपनी सोच, रीत और बंधी बंधाई परिपाटी में प्रेम को कितना सीमित कर दिया है, उसे घुटन और बंधनों से जकड़ दिया है जबकि ओशो ने तो कहा ही है कि प्रेम की असली सीमा पूरी स्वतंत्रता है और हम उसी के बिना ख़ुद को प्रेम में होने का भुलावा देते हुए जीते हैं।  कभी कोई किस्सा कहता है यदि प्रेम हमारे भीतर जीने की उम्मीद बढ़ा दे, तो जीवन कितना सहज और सुंदर हो सकता है और कभी यह भी कि हर रिश्ता,नाम और लेबल का मोहताज नहीं होता। यह सच भी कई किस्सों में बड़ी खूबी के साथ उपस्थित हुआ है कि कुछ एहसास, बस एहसास बनकर ही जीवन में महके तो वे  स्मृति और आत्मिक सौन्दर्य का हिस्सा बन जाते हैं। जहां  जेठ की दुपहरी में नीली साइकिल की प्यार भरी ट्रिन ट्रिन, तूफान और बरसात की प्रेम भरी रात और मैम जूलियट का प्यार आपको भावुक कर देता है, वहीं रोतलू टॉपर, लड्डू सर, दुष्ट प्रेम,   तस्वीर में कैद लम्हे, सिर्फ़ मेरे मंजूषा जैसे किस्से मन को गुदगुदाते है और मिठास से भरते हैं। कुछ और कहने से पहले
लव नोट्स के कुछ नोट्स बानगी के तौर पर
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दुःख से ज्यादा खानाबदोश और कोई नहीं होता। यह अपना आशियाना ख़ुद चुनता है और उस घर में रहने की मियाद भी।
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एक नदी जो धरती के ऊपर से सूख गई थी, इतना कि कोई सतह को देखकर अंदाज़ा नहीं लगा सकता था कि यहां कभी कोई नदी भी होगी, सतह के भीतर बहुत गहराई में इस कदर हरहरा के बह रही थी कि मानो कई जन्मों तक न सूखेगी।
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जो गलती करना आसान बना दे वही है सबसे प्यारा साथी।
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कैसा गहरा होता होगा वह अपराधबोध जिसे मुक्त हृदय से दी गई क्षमा भी कम नहीं कर पाती है।
 **ज़िंदगी के अलग अलग वक्तों में कोई एक कितना करीब होता है न*
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बहुत कम लोग आंसुओं की निजता को समझते हैं और तुम उन चंद लोगों में से हो जो मन के सबसे कच्चे कोने को सार्वजनिक होने की लज्जा से बचाना जानते हो।
*जो रोना आसान बना दे वो सबसे करीबी होता है।
लेकिन यह कहना भी निहायत ज़रूरी  लगता है कि इसमें प्रेम अंधे, बहरे रूप में व्यक्त नहीं हुआ है। कहीं चोट खाई बेवकूफ लड़की के किस्से भी हैं तो कहीं मासूम दीवाने के भी।
कहीं कहीं पढ़ते हुए लग सकता है कि सिर्फ़ किताबों और किस्सों में ऐसी चाहत, ऐसी उदारता संभव है पर फिर पल्लवी के कहे शब्द याद आते हैं, वे पुस्तक की भूमिका में लिखती हैं कि मेरा पूरा भरोसा है कि दुनिया की जितनी काल्पनिक कथाएं हैं वह इस पृथ्वी पर किसी एक का तो सच होंगी ही। जब वे इंसानी प्रेम के किस्सों से भरी दुनिया में दो सारसों की प्रेमकथा का ज़िक्र करती हैं तो मुझे भी महादेवी वर्मा के नीलकंठ और राधा याद आ जाते हैं।
ठहरे हुए पानी में कंकड़ फेंकने जैसी हलचल पैदा करती यह क़िताब प्रेम के उन तमाम पक्षों को दर्शाती है, जिन्हें हम अपने आसपास की दुनिया में देखते आए हैं, कभी किस्सों में, कभी अपनों में और कभी ख़ुद भी उसका हिस्सा बने हों तो अचरज की बात नहीं। लव नोट्स में प्रेम के कई रूप, कई आयाम मौजूद हैं जिन्हें बहुत सहज भाषा और किस्सागोई शैली में लिखा गया है। जितनी सरलता से एक कहानी, एक किस्से के माध्यम से  लेखिका प्रेम के लम्हों  और उसके अनूठे रंगों को हमारे सामने रखती हैं, वे पाठक पर उतना ही गहन असर छोड़ने में कामयाब रहते हैं। कहीं समर्पण, कहीं निष्ठा, कहीं मासूमियत, कहीं मिलन, कहीं विरह, कहीं कसक , कहीं  अभिव्यक्ति, कहीं बेचैनी कहीं सुकून…. हर अहसास का आस्वाद और स्पर्श  बहुत नर्म मुलायम अंदाज़ में यहां मौजूद है। यह पुस्तक इस बात की भी पुष्टि करती है कि बिना जटिल हुए भी बात संप्रेषणीय और प्रभावी हो सकती है, पांडित्य और ज्ञान से मुक्त  साहित्य भी जीवन की सीख दे सकता है, प्रेम तपिश का नाम है तो पानी के छीटें से उठती मिट्टी की सौंधी महक भी है। लेखिका ने अपनी सांगीतिक मेधा का कई जगह सुंदर प्रयोग किया है। यह पुस्तक दिमाग को ज्ञान की नहीं पर प्रेम की खुराक भरपूर देती है, गुदगदाती भी है, सोच में भी डालती है, आंखें नम करती है तो चेहरे पर मुस्कान भी लाती है।
दोस्ती, प्रेम, विवाह और रिश्तों पर चढ़ी संकीर्णता की धूल झाड़ती यह क़िताब उस साथी की तरह है, जिससे मिलने को बार बार मन करता हो और अगर लेखिका के शब्दों में कहूं तो बारिश के बाद की धूप की तरह…..यह पुस्तक निश्चित  ही आपको जीवन के कई खूबसूरत पहलूओं से रूबरू करवाएगी।
अपूर्वा बैनर्जी

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