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गीताश्री की कहानी ‘लकीरें’

गीताश्री वय से वरिष्ठ हैं लेकिन उन्होंने कहानियां लिखना बहुत देर से शुरू किया. शुरू में ही कुछ ऐसी कहानियां लिख दीं कि ‘बोल्डनेस’ का विशेषण चिपक गया उनकी कहानियों के साथ. जबकि उनकी ज्यादातर कहानियां स्त्रियों के सशक्तिकरण की हैं, ग्रामीण, कस्बाई स्त्रियों के धाकड़ व्यक्तित्व की हैं, उनकी भाषा में लोक की शक्ति है और परिवेश की जीवन्तता. उनकी यह कहानी ‘लकीरें’ बड़ी मार्मिक है. शायद इतनी करुणा किसी लेखिका में किसी पुरुष के प्रति न हो. वह भी चोर के प्रति. एक बार पढने पर न भूलने वाली कहानी है- मॉडरेटर 
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तगड़ी कोठी लग रही है, मालदार आसामी होगा. उसने कोठी की दीवारें अंधेरे में टटोली..तर्जनी ऊंगली से ठकठक किया। ओह…ये खोखली है। उसका काम आसान हो गया। दीवारे जहां खोखली हों तो सेंध लगाना कितना आसान हो जाता है, ये कोई ऱघु से पूछे। उस दीवार के उसने प्यार से सहलाया, उसे अपनी आत्मीयता दी और झोले से जली लकड़ी का नुकीला कोयला निकाला और उस जगह पर गोल घेरा बना दिया। अब ये जगह उसकी हो गई थी, जहां वह अपनी राह बनाने वाला था, जो उसे उसकी मंजिल तक ले जाएगी। कम मेहनत में भुरभुरी दीवारें झरने लगीं। उसने बिल्डर को धन्यवाद दिया मन ही मन जिसने घटिया मेटेरिय़ल लगा कर कोठी मालिक को अच्छी चपत लगाई होगी। कई दिन से रघु इस कोठी के चक्कर लगा रहा था। आगे पीछे चारो तरफ घूम घूम कर देखा भाला। कूड़ा बीनने के बहाने दीवारों को ठकठका कर देखा भी। कहीं कहीं खोखली लगीं थी। वह दीवारों के खोखलेपन से ज्यादा धूर्त बिल्डर की बेइमानी पर मुस्कुराया था। किसी के सगे नहीं होती ये बिल्डर की जात। अपना घर भी बनाएंगे तो रेत ज्यादा मिलाएंगे। इससे अच्छे हम चोर भले जो अपने घर में तो चोरी चोरी या ताला तोड़ कर नहीं घुसते। कोठी के दोनों तरफ जमीने खाली पड़ी थी। पीछे के हिस्से में छोटा सा पार्क था जहां मुहल्ले के बच्चे खेला करते हैं। रात होते कोठी के चारों तरफ सन्नाटा हो जाता है। अंदर से एक हल्की लाइट जलती रहती है। रात को भी उसने कई चक्कर लगाए। दिन में कुछ लोग आते जाते दिखते थे। और कोठियो की तरह इस कोठी में रौनकें नहीं दिखतीं थी। उसने कई बार महसूस किया कि कोठी की दीवारों पर बोगनबेलियां नहीं, उदासी की लताएं चढी हुई हैं। कभी कभी गाने की धीमी आवाज आती। जैसे कोई विलाप सुर में कर रहा हो जैसे। पिछले कुछ दिनों से वह इस कोठी को ठीक से परख रहा था। आखिर मोटा माल हाथ लगने की उम्मीद जो थी। वह फेल नहीं होना चाहता था। एक बार हाथ साफ करके कुछ दिन मस्ती में बिताना चाहता था। उसे इस रोमांच को जिए लगभग एक साल हो गया था। गांव, कस्बों में अब भी बदस्तूर उसका धंधा ठीक ठाक चल रहा था। लेकिन महानगर से सटे उपनगर में जब से वह मजदूरी के लिए आया है, असली काम ही भूल गया है। उसे लगने लगा था कि धीरे धीरे वह बदल रहा है और अपना असली कर्म, पुश्तैनी कर्म भूल रहा है। उसके पुरखे उसे कभी माफ नहीं करेंगे। इतनी मेहनत से बाप ने सीखाया। बाबू हमेशा साथ में रखते थे ताकि सावधानी, सुरक्षा और सेंध लगाना सीख जाए। पिता की कुशलता उसे विरासत में मिली थी। वह ताला तोड़ना भी सीख गया था और खोलना भी। उसे अपनी कला पर नाज था। जरा-सी मेहनत, सारा माल अपना। सांप की तरह रेंग कर अंदर जाओ और जो हाथ लगे, समेट लो।
दीवार मे छोटा सुराख करते ही रेत भरभरा कर गिरने लगी। ईंट के टुकड़े भी साथ साथ टूटे। एक घंटे की अथक परिश्रम और चौर्यकला से उसने इतनी सुराख बना ली कि रेंग कर अंदर जा सके। अपने दुबले होने का यही फायदा तो था। सूराख से पहले हाथ अंदर डाला..चारो तरफ खंगाला। हाथ किसी ठोस चीज से टकराई। झट से हाथ खींचा। पता नहीं क्या हो। उसने पोटली से चुंबक लगी छड़ी निकाली। उसको सूराख के अंदर फिराया। बाहर खींचा तो कुछ भी नहीं।
इसका मतलब कोई चाकू छूरी नहीं है…वह बुदबुदाया। उसने राहत की सांस ली।
उसने पहली छोटी चाइनीज टार्च निकाली। सूराख के अंदर माथा घुसेड़ते हुए टार्च जलाया। सामने कोई खुली जगह थी। वहां छोटी छोटी चीनी मिट्टी की मूर्तियां रखीं थीं। वहीं टकराई थी हाथों से। वह सूराख से पूरा अंदर घुस चुका था, अपनी पोटली समेत। अपनी देह से सबसे पहले धूल मिट्टी झाड़ा। एक कोना तलाशा जहां छिपा जा सके। वह एक बड़ी सी उजड़ी सी गोदरेज की अलमारी के पीछे दुबक गया। जीरो वाट के बल्ब वहां जल रहे थे। बाहर से कोठी जितनी अंधेरी दिखती है, अंदर इतना अंधेरा नहीं था। रोशनियां थीं, मरियल और उतरे चेहरे जैसी। अब तक उसने कस्बो में इतनी चोरियां की, बहुत रोमांच झेला। लुकाछिप का खेल खेला। मस्ती की, किसी को दवाई सुंघाई तो किसी का मुंह बंद किया। किसी के हाथ पांव बांध दिए। किसी को खबर न हुई और आराम से माल समेट कर चंपत हो गया। किसी महानगर की यह पहली सेंध थी। इसलिए उसको ज्यादा कुछ समझ में नहीं आ रहा था। छोटा चोर अचानक बड़ी बड़ी चीजों के बीच में खुद को पाकर थोड़ा अचकचाया हुआ था। यहां तो नजारा ही भव्य था. भले रौनक गायब थी। कस्बो में चीजें इतनी पास पास होती हैं कि कई बार अंधेरे मे वह लड़खड़ा जाता था। एक बार तो वह एक बूढे के ऊपर गिरा और बुढ्डा भूत भूत कह कर ऐसा भागा कि चोर हड़बड़ा कर खुद ही भूत भूत कर बाहर भाग निकला। उस दिन घर पर जम कर ठुकाई हुई। कमबख्त..संभल कर पैर नहीं रख सकता। कभी अनाज की टोकरी में पैर रखा तो कभी सिर पर आटे का कनस्तर गिरा। क्या क्या न सहे हमने जुलुम…। सोचते सोचते मुस्कुराने लगा। आज देखते हैं, यहां क्या होता है।
उसे याद आया, सुबह ही उसके साथी रमेश ने कहा था कि दीवार में सेंध वेंध का चक्कर छोड़, ताला तोड़ और सीधा घुस जा..। साथ में तमंचा लेकर चलेंगे। किसी ने ज्यादा ऐश तैश दिखाया तो गला रेत देंगे साले का…। बापू ने कहा था, बालकनी देखना, कई बार लोग बंद करना भूल जाते हैं। उसे आसानी से खोल लेगा। उधर से भी घर में प्रवेश कर सकता है। या चाहे तो छत से चला जा।
सेंध पुराने जमाने की बात हो गई है। कब तक हम चोर ऐसे मुंह छिपा कर अपना काम करते रहेंगे। हमारा जासूसी तंतर ठीक होना चाहिए। दिन दहाड़े जाओ और माल उड़ा दो
रमेश अपने पेशे को लेकर ज्यादा स्वाभिमानी हो उठा था।
उसी ने रघु को बताया कि उसके एक दोस्त ने अपार्टमेंट में रहने वाले एक मकान मालिक से कमीशन वाली दोस्ती गांठ रखी है। अंदर के घरो में ही दिन दहाड़े ताला तोड़ कर गहने, पैसे, लैपटाप उड़ा लाता है। गेट से बाहर जाने का कोई चक्कर नहीं, अंदर का माल अंदर…।
सुन कर रघु हैरान रह गया था। ये तो चोरी ना हुई, मेहनत की कमाई न हुई रमेश…ये तो लूटपाट है..फिर क्या फर्क है हममें और राहजनी करने वालो में…
चुप्प कर..बहुत सवाल उठाने लगा है तू…जा अभी जा..काम पर जा रहा है..पर बता देता हूं, शहर में ताला तोड़ कर घुसना ठीक होवे हैं…घर खाली मिलता है।
घर खाली मिला तो क्या बाबू…कलाकारी तो तब है ना जब सब सोते रहे और हम उनकी आंख से काजल चुरा लाएं। क्यों रमेश…?”
सोचते सोचते अचानक उसकी नजर सामने कमरे की अधखुले दरवाजे पर पड़ी। हल्का अंधेरा और हल्की रौशनी एक साथ छन छन कर बाहर आ रही थी। दबे पांव घिसटता हुआ वह दरवाजे तक पहुंचा। दरवाजे से झांका। दरवाजा खुला देख कर वह खुश हो गया। सारा माल इसी कमरे में होना चाहिए। कमरों में गहने और पैसे रखने की बस दो तीन ठिकाने ही होते हैं। एक बार कमरे में पहुंच गए तो माल उड़ाना मुश्किल नहीं। वह शुभ घड़ी पास आ गई थी। वह खुश था कि कल रमेश और बापू के सामने अपनी उपलब्धियों के बारे में कैसे बखान करेगा। महानगर की पहली चोरी कितनी सफल रही।
धड़कते दिल से अपना सिर थोड़ा अंदर करके देखना चाहा…
अंदर एक अकेली स्त्री सोई हुई है…सिरहाने लैंप रखा है..जल रहा है…वह सोई हुई है..या आंखें बंद…नहीं मालूम। ठीक से उसे निहारता है…उम्र का अंदाजा नहीं होता उसे.अधेड़, दुबली पतली औरत, चुस्त नाइटी में। मन हुआ, खाली कोठी है, उसे दबोच ले..मुंह दबा देगा..टेप चिपका देगा…पूरा घर खाली..ऐसे भी किसी को पता भी नहीं चलेगा…वह मनमानी करके निकल लेगा..। उम्र ज्यादा हुई तो क्या हुआ। कौन सा उसे घर बसाना है। नहीं नहीं..ये ठीक नहीं है…एक सचेत मन ने उसे दुत्कारा। तेरे खानदान में सारे नीच कर्म हुए हैं, जबरदस्ती वाला काम नहीं हुआ रे रघुआ…
क्यों…माई नहीं चीखती थी क्या, आधी रात को…
माई तो बाबू की पत्नी थी न रे..बाबू का हक जो बनता था..
चाहे माई का मन हो न हो..ये कौन सा हक है जी..
नहीं रे..तू ऐसा नहीं कर सकता…तू तो अपने खानदान में सबसे समझदार माना जाता है रे..नाक मत कटा रे..अपना काम कर और निकल यहां से…
नहीं..मुझे मत रोको..बस एक बार…कौन देख रहा है..चिल्लाएगी तो मुंह पर टेप…
सोचते ही शरीर में कुछ हरकत हुई..नसें तड़कने लगीं..आंखों में बनैले हिंस्त्र पशु जैसी चमक उतर आई।
धीमे धीमे बेड तक पहुंचा। माल-वाल तो बाद में लूटी जाएगी। पहले जोर आजमाइश हो जाए।
लैंप की रोशनी में  उसने देखा…स्त्री के दोनों आंखों के नीचे से पानी की एक लकीर नीचे तक गई है…सूखी हुई…हाथ छाती पर क्रास करके धरे हुए। सीधा मुंह…और मुंह देख कर वह कांप उठा।  
उसे गांव की चौरस नहीं की याद आई..दो दिशाओं में बंट कर जब सूखती थी तो ऐसी ही दिखती थी।
लकीर सी..मटमैली..चौरस नदी। वह तब नदी के पास जाने से बचता था। अनजाना सा भय होता और वह भाग खड़ा होता।

मां कहती थी…औरत और नदी…दोनों दुख विपत्ति पड़ने पर सूख जाते। दोनों का पानी सूख जाता है और बस लकीर बच जाती है।  उसे याद आया…माई के चेहरे पर झुर्रियों के बीच एक स्थायी लकीर बनी हुई थी। रघु वहां से लड़खड़ाते कदमों से उठा, अपनी पोटली पीछे टांगी। उसी छेद से रेंगता हुआ बाहर निकला, नीम अंधेरे में वह और औजारो से भरी हुई उसकी पोटली दोनों खो गए।  

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