नाम साहिर था हकीकत में वो जादूगर था

साहिर लुधियानवी निस्संदेह हिंदी सिनेमा के सर्वकालिक महान गीतकार थे. उन्होंने फ़िल्मी गीतों को उर्दू शायरी का रंग दिया, उनको साहित्यिक ऊंचाई दी. उनकी गीत-यात्रा को याद कर रही हैं युवा कवयित्री-लेखिका विपिन चौधरी– जानकी पुल.


साहिर लुधियानवी के नाम को हिंदी सिनेमा और उर्दू अदब में न केवल एक गीतकार के रूप में  जाना जाता है बल्कि रोमानियत का सुरूर, जीने का अलमस्त तरीका और भी अनेकों अनेक रंगीन किस्से –कहानियां इस नाम से जाने अनजाने याद आने लगते है।
साहिर ने अपना पूरा जीवन पूरे मनोयोग से जीया, खूब जम के कमाया और जम के लिखा. १९२१ में अब्दुल अयासी के नाम से जन्मे साहिर का मासूम बचपन अपनी माता पिता के तनाव और उलझन भरे रिश्ते का सामना करते हुए गुजरा  यही कारण  था कि एक बेलौस  उदासी उन्हें विरासत मे मिली. अपने युवापन दिनों साहिर उन दिनों लाहौर मे एक संपादक के तौर पर काम करते रहे थे. तख्लियाँ नाम से एक कविताओ की किताब भी साहिर के नाम है.
साहिर चाहे लाहौर मे रहे या दिल्ली मे, उन्हें सुकून सिर्फ बंबई की सरजमीन पर ही मिला. जब कुछ रोज़ के लिये वे दिल्ली मे थे तब नोस्टैलजिक होते हुए साहिर ने अपने एक दोस्त को क्हा था, बंबई मुझे बुला रही है। बंबई सचमुच उन्हें बुला रही थी। इसी बंबई की नमकीन ज़मी मे उन्होने अपनी रचनात्मकता को धार देते हुए २०० के लगभग गीत, गज़ल और नज़म लिखे और आने वाले समय को अपनी रवानगी दे गये जो आज समय के साथ साथ मंद मंद बह रही है । इसी बंबई मे उन्होंने अपना शानदार बंगला बनाया जिसकी शान– ओ– शौकत  के बारे मे उस समय की  पत्र– पत्रिकाओ मे खूब छपा, अमृता प्रीतम और सुधा– मल्होत्रा से मोहबत और अपनी माँ से असीम लगाव की बातें  जो जगजाहिर है ही.  उस समय  बम्बई फिल्म सिनेमा मे शेलेन्द्र , शकील, आदि कई गीतकार अपने आप को सिद्ध करने मे लगे हुए  थे तब साहिर एक विद्रोही गीतकार के रूप मे उभरे. जीवन को अपने फक्कड़ अंदाज़ मे जीने का उनका जज्बा सबसे अलहदा था जिसकी परछाई उनके गीतों मे भी झलकती दिखाई दी.
१९४७ के बाद जब देश में कई तरह के राजनीतिक और सामाजिक उतार चढाव आ रहे थे और आम जनता के सपनों को अपनी ज़मीन नहीं मिल पा रही थी उनके सपने ने हकीकत का जामा अभी नहीं पहना नहीं था.
तब साहिर ने भी देश के जागरूक नागरिको की आवाज़ बन कर नई सुबह की उम्मीद मे पुकार लगाई।
‘वो सुबह कभी तो आयेगी
एक काले सदियों के सर से, जब रात का आँचल ढलकेगा
जब दुःख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा
जब अंबर झूम के नाचेगा, जब धरती नगमे गायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी‘
उन्होंने गीत जरूर फिल्म की कहानियों की डिमांड  पर लिखे पर यह उनकी निजी भीतरी आवाज़ थी जो भीतर के तहखाने मे बरसों  कुलबुलाती रहती थी और जो गाहे बगाहे कागज़ पर उतरती जाती थी.
धर्म और जात वयवस्था के खिलाफ और समाज मे व्याप्त  विसंगतियों पर प्रहार करते हुए

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