फर्नलोज- मसूरी की स्मृति

नीता गुप्ता कम लिखती हैं लेकिन उनके यात्रा वृत्तांतों का अपना अलग ही अंदाज है, मसूरी के जुड़ी यादों का यह संस्मरण पढ़ कर लगा कि साझा किया जाए. मितकथन का सौन्दर्य उनके गद्य की विशेषता है. पढियेगा- मॉडरेटर 
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मसूरी को कई नामों से पुकारा जाता है–कोई इसे क्वीन ऑफ द हिल्सकहता है तो कोई किसी और नाम से पुकारता है लेकिन मेरी पहचान में, कम ही ऐसे लोग हैं जो इसे घर कहते हैं. मेरे पहाड़ी भाई बंधुओं को ही ले लीजिए, कोई खुद को अल्मोड़ा का बताता है, तो कोई नैनीताल का होने का दावा करता है. लेकिन मेरा अगर कोई घर है तो वो है मसूरी–जहाँ की मैं हूँ, जहाँ मेरे पिता का बचपन बीता और जहाँ मेरे दादा रहा करते थे.
फर्नलौज में. फर्नलौजउनके घर का नाम था, जो बार्लोगंज में था. बचपन में मुझे लगता था कि ये कोई पहाड़ी नाम होगा। लेकिन फिर समझ में आया कि फर्नएक सुंदर बारीक पत्तियों वाला पौधा होता है जो हमारे यहाँ इफरात में उपलब्ध था.
यहीं हमने अपनी गर्मियों की छुट्टियां बिताईं — लगभग दो महीने हर साल दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, बुआ-फूफा, भाई-बहनों के साथ. दादी के हाथ की बनी घी से चुपड़ी रोटियों का स्वाद आज भी याद आता है. वो तीन बजे का नाश्ता जब तरह तरह की मिठाइयां–बाल मिठाई, सिंगोरी, चॉकलेट, पेड़े–और दालमोंठ चाय के साथ परोसी जातीं। वो खा-पीकर बाबा के साथ सैर पर निकलना. कभी लाइब्रेरी की ओर, तो कभी पिक्चर पैलेस या लंढौर तक. माँ को पसंद थी वो पुरानी भुतहा ब्रुअरी को जाने वाली ठंडी सड़क. पास ही संत जॉर्जेस स्कूल था. तो कभी हम वहीँ तक चले जाते। मेरे चचेरे भाई स्कूल के स्विमिंग पूल में अक्सर तैर लेते. वहां हम लड़कियों का तैरना मना था।
कुछ नहीं तो मामचंद की दुकान में बैठ कर जलेबी ही खा लेते थे. जबकि दादा वहाँ बैठे लोगों से बतिया लेते.
मेरे दादा उन दिनों बार्लोगंज के संत जॉर्जेस स्कूल में बरसर हुआ करते थे. फिर उन्होंने कुछ दोस्तों की भागीदारी से अपना स्कूल खोला मसूरी शहर में. स्कूल चलाने के चक्कर में उन्हें फर्नलौज छोड़ कर मसूरी में घर लेना पड़ा, जो नए स्कूल के करीब था.
मैं वहां आखरी बार 1975 में गयी थी. उस वर्ष दिल के दौरे के कारण मेरे दादा की अकस्मात् मृत्यु हुई थी. दादी हमारे साथ जमशेदपुर लौट आईं और कई वर्षों तक मसूरी का घर बंद पड़ा रहा.
अस्सी के दशक में पिता भी गुज़र गए. मरने से कुछ ही वर्ष पहले उन्होंने फर्नलौजबेच दिया था. घर खँडहर हुआ जा रहा था, वहां जाने का किसी के पास टाइम ही नहीं था। मैं शायद उन दिनों कॉलेज में थी. अचानक मसूरी से सारे नाते टूट गये.
इधर मेरी शादी हो गयी और मेरे पति को पहाड़ों से सख्त नफरत थी तो एक तरह से केवल मसूरी ही नहीं, पहाड़ों से ही नाता छूट गया
खैर मैंने मसूरी की यादें किसी डिब्बे में बंद कर संजोये रखीं। आँखें बंद करते ही वो नीलम से पहाड़, वो बहते झरने, वो दादी की हाथ की बनी चिकनी-चुपड़ी रोटियां, सब याद आ जाता था मुझे।
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हाल ही में, भारतीय भाषाओँ के प्रकाशक होने के नाते मुझे मसूरी जाने का मौका मिला। लंढौर के एक स्कूल में आयोजित एक राइटर्स वर्कशॉप थी–जहाँ कई जाने माने कवि व लेखक भी बुलाये गए थे। एक ओर रस्किन बॉन्ड तो एक ओर उत्तराँचल के महान कवि नरेंद्र सिंह नेगी. साथ ही मेरे अपने कई युवा मित्र कवि जो बंबई-पूना से वहां इस दो दिवसीय समारोह में पधारे थे. वर्कशॉप में सुबह नौ बजे से शाम के छह बजे तक कई सत्र थे, जिनके बीच में चाय-नाश्ता और रात को कॉकटेल डिनर इत्यादि का भी आयोजन था. मैं बार बार ये सोचती कि कुछ समय चुराकर, बार्लोगंज का एक चक्कर लगा आती. लेकिन जब भी मैं कोशिश करती, तो कोई न कोई आ टकराता और मुझे अपने सत्र में खींच ले जाता. और फिर रस्किन बोंड भी कोई रोज आपको अपने घर कॉफी पीने नहीं बुलाते. और इत्मीनान से बैठकर लाईब्रेरी में एलेन सीली की कहानी सुनने का मौका भी इत्तेफाक से ही मिला था. फिर बचपन के मेरे पसंदीदा कवि जीव पटेल, जिनकी कविता ऑन किलिंग ए ट्रीमुझे जुबानी याद है, भी तो अपनी कविता पढ़ने वाले थे. मैं कैसे जाती यह सब छोड़कर.
फिर किसी ने मुझे ये भी हिदायत दी कि बार्लोगंज चलकर जाने में मेरे दो घंटे लग जायेंगे. बचपन में पता नहीं कैसे फुदक कर पहुँच जाते थे.
खैर अब जाने का समय आ गया था. दशहरे का दिन था और मैंने यह सोचा था कि तीन चार बजे वहाँ से निकलकर देहरादून समय से पहुँच जाउंगी, ताकि त्यौहार की शाम अपने चाचा-चाची के साथ बिता सकूँ. मेरी बुलाई टेक्सी ठीक साढ़े चार बजे पहुंची, मैंने अपना सामान रखा और कुछ तेज आवाज़ में ड्राईवर से देहरादून जाने को कहा. मैं थोड़ा चिढ़ी हुई थी, उसे तीन बजे आना था. हम अभी स्कूल का गेट पार कर ही रहे थे कि चौकीदार ने चेतावनी दी कि देहरादून जाने वाली मेन सड़क दशहरे की वजह से ब्लॉक है. रावण, कुंभकर्ण को जलाने का वक़्त जो सिर पर था. मैं थोड़ा और चिढ़ गई. चौकीदार ने पुरानी सड़क लेने की सलाह दी. मैं उसकी बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रही थी, मेरा सारा ध्यान तो बस इस बात पर अटका था कि किसी तरह आज रात देहरादून पहुँच जाऊ. होटल से भी चेकआउट कर चुकी थी और टूरिस्ट सीजन होने के कारण मेरे कमरे मे कोई और आ चुका था. मैंने ड्राईवर से रुखाई से कहा, “मैं नही जानती कि आप कैसे जायेंगे, या कहाँ से निकालेंगे, मुझे हर हालत मे आज रात देहरादून पहुंचना है.
हम धीरे-धीरे चढ़ाई उतरने लगे. चारों ओर देवदार के खूबसूरत जंगल थे, मेरा मूड थोड़ा संभला. खड़ी सड़क से उतरते हुए, न जाने क्यूँ मुझे ऐसा लगा कि मैं यहाँ पहले आ चुकी हूं. फूल भी पहचाने से लगने लगे, और जगह-जगह फर्न के गुच्छे मुझे देखकर मानो हाथ हिला रहे थे. रेडियो पर भी एक अच्छा गाना बजने लगा, एक बचकानी सी मुस्कराहट मेरे चेहरे पर खिल आई. मेरे आगे एक पुराने से मील के पत्थर पर बार्लोगंज दो किलोमीटर लिखा हुआ था. मैंने ड्राईवर से पूछा, “क्या यह रास्ता बार्लोगंज होते हुए जाता है?”
हाँ मैडम!और साथ ही सफाई देने लगा कि बार्लोगंज होते हुए जाने के बावजूद हम देहरादून टाइम से पहुँच जायेंगे.
नहीं, नहीं,” मैंने कहा. मुझे बार्लोगंज जाना है. मुझे बार्लोगंज के बस स्टैंड तक ले चलो.मैंने खुशी से चिल्लाते हुए कहा.

ठीक है मैडम. आप जैसा कहें.उसने जरूर मुझे पागल समझा होगा. मैंने रियर व्यू मिरर मे उसे मुहं बनाते देखा. लेकिन मुझे क्या परवाह थी. अब मैं अपने घर जा रही थी. एक के बाद एक पहचाने हुए मंजर नज़र आने लगे. ब्रुअरी… स्किनर्स लॉज… संत जोर्जस स्कूल… और फिर एक पहाड़ी मोड़ पार कर हम बार्लोगंज के बाजार में पहुंचे. मैंने झट से एक छोटा दीया ख़रीदा, और बाकी के ५०० मीटर की खड़ी चढ़ाई भागते हुए तय की. और मेरे कदम तभी थमे, जब मैं फर्नलोज पहुंची. गोधूलि का समय था… और घर वीरान. घर के बंद गेट से आती फूलों की भीनी महक ने मुझे अंदर झाँकने पर मजबूर किया. मैंने दीया जलाकर उसे लैटर बॉक्स के ठीक ऊपर वाले आले पर रखकर, नमन किया.

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