अनामिका की कविता ‘गणिका गली’

मुजफ्फरपुर के सांस्कृतिक विरासत स्थली चतुर्भुज स्थान पर मैंने किताब लिखी ‘कोठागोई’. वरिष्ठ कवयित्री अनामिका के नए कविता संग्रह ‘टोकरी में दिगंत: थेरी गाथा: 2014(राजकमल प्रकाशन) से गुजर रहा था तो उसमें एक कविता पर नजर पड़ी- गणिका गली. यह कविता चतुर्भुज स्थान को लेकर ही लिखी गई है. वैसे इस संग्रह में मुजफ्फरपुर के पहचानों, प्रतीकों को लेकर कई कविताएं हैं, जिनको फिर कभी साझा करूँगा. फिलहाल गणिका गली- प्रभात रंजन 
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गणिका गली
 
(एक वृद्धा सुमुखी के लिए जिनकी बेटी मेरे साथ पढ़ती थी)
 
सभ्यता से भी प्राचीन,
ये नदियों का तट थीं विस्तीर्ण-
चोर, नपुंसक, मूर्ख, संन्यासी, लम्पट, सामंत-
इनके तट पर आते डूबती नौकाओं पर
और वे उन्हेमं उबार लेतीं.
अब इनके प्रेमी अधेड़, विस्थापित मजूर,
“इनसे तो पैसे भी नहीं माँगते बनता, ऐ हुज़ूर!
पर हमारी बच्चियां पढ़ रही हैं
विस्तृत क्षितिज पर ककहरे- “
उन्होंने उमगकर कहा और खाँसने लगीं!
लेटी हुई छत निहारती
अपभ्रंश का विरह-गीत दीखती हैं ये गणिकाएँ
पुराने शहर के लालटेन बाजार में
लालटेन तो नहीं जलती पर
ये जलती हैं
लालटेन वाली
धुंधली टिमक से!
 
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युद्ध से घायल हो घर लौटे घोड़ों का
दुःख जानती हैं वे,
जानती हैं ये वे- लगता है कैसा
घुडसाल में उनको कहीं बांधकर
अनमने क़दमों से जब चल देता है कहीं घुड़सवार
और कभी वापस नहीं लौटता!
धीरे धीरे भूल जाता है
पोर-पोर उनका-
क्या होता है खरहरा,
और नाल झप से गले मिलती है कैसे-
कटे-फटे खुर भूल जाते हैं!
 
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कोई यहाँ अब नहीं आता!
सिर्फ एक वैद्यराज आते हैं
और भटकटैया में अश्वगंधा की
भावना मिलाकर
कुछ रसायन-सा पिलाते हैं!
गोरैया की नींद सोती हैं और
छपाक जाग जाती है
रात के तीसरे पहर,
बोलती हैं कुर्लियाँ जो
अकुलाकर!
छाती पर हाथ धरे सोचती हैं कुछ-कुछ,

 

छाती पर हाथ धरे क्या सोचती हैं वे? 
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