• कथा-कहानी
  • प्रमोद द्विवेदी की कहानी ‘बारह घंटे’

     प्रमोद द्विवेदी की कहानियाँ अपनी जीवंत भाषा और ज़बरदस्त नाटकीयता के कारण याद रह जाती है। अब यह कहानी ही पढ़िए- मॉडरेटर

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    घर छोड़कर निकले सिंघल साहब ने ऐसी उम्मीद तो की ही नहीं थी। घर से इतनी दूर, चाय की टपरी पर राष्ट्रीय हिंदी अखबार के लापता कॉलम में अपनी तस्वीर देखकर घबरा गए।  

    साथ में सूचना थी- ‘सर्व साधारण को इत्तिला किया जाता है,   मेरे पिताजी घनश्याम दास सिंघल, उम्र 68 साल, रंग सांवला, कद पांच फीट आठ इंच, माथे पर कट का निशान, दिनांक 08-04-24 से लापता हैं। इधर कुछ अरसा से उनकी मानसिक दशा ठीक नहीं है। वे बिना बताए घर से गए हैं। उनके बारे में सूचना देने वाले या घर पहुंचाने वाले को पांच हजार रुपए का इनाम और राह खर्च दिया जाएगा…।’

                                       -राकेश सिंघल पुत्र, 

                                      मीना सिंघल पुत्रवधू

                            व अन्य व्यथित परिजन……..

    सूचना के अंत में घर का पता, राकेश सिंघल का मोबाइल नंबर और मयूर विहार थाने के प्रभारी जीएल अस्थाना का नाम और नंबर भी दिया गया था।

     सूचना पढ़कर सिंघल साहब घबरा गए। चाय की दुकान पर दो लोग और थे। पर उनकी दीन दशा देखकर लगता था कि जीवन में शायद कभी अखबार नहीं पढ़ा होगा। चाय वाले ने जरूर उनकी बेचैनी को गौर से देखा, पर वह अपने काम में मगन था। उन्हें लगा, जल्दी यहां से निकल लेना चाहिए। हालांकि उनकी तस्वीर किसी अपराधी के तौर पर नहीं थी। पर चाहते थे कि कोई उन्हें पहचान ना पाए।

     घर से निकलने के बाद मोबाइल अभी तक बंद कर रखा था। यह सूचना देखते ही उन्होंने मोबाइल खोला तो सोसाइटी के वाट्स ग्रुप हैप्पी फैमिली में भी उनकी चर्चा चल पड़ी थी…। भांति-भांति की टिप्पणियां हो रही थीं…। कुछ अति उत्साही बिना समझे ‘वैरी सैड’ और ‘नमन’ जैसे उद्गार लिख रहे थे। उनका फोटो बहुत ही शानदार लगा था। एकदम सूट-बूट में। उनके मित्र राजेंद्र किशन पोरवाल ने तो यहां तक लिख दिया था, ‘सिंघल साहब स्पीचुअल इंसान हैं…वे जल्द लौटकर आएंगे…।’ लेकिन उन्हें यह पढ़कर बड़ा गुस्सा आ रहा था कि बेटे ने ग्रुप में  भी लिख दिया था कि ‘पापा की मानसिक दशा ठीक नहीं है।’ उनके लिए यह सरासर अपमान था। मानसिक दशा खराब होती तो क्या वे सुबह नौ बजे सिस्टम के सामने आसन जमाकर शेयर बाजार खंगालते…दिल्ली छह वाले बनिया पड़ोसी उनकी सलाह पर ही दांव लगाते थे…। और यह बांगड़ू कह रहा है कि मानसिक दशा ठीक नहीं है। उनका बेटे को गाली देने का मन किया, पर क्रोध गुटक गए। अपनी फुकरही हरकत के कारण खुद उनका मनोबल गिरा हुआ था।     

     बहरहाल, स्मृति परीक्षण के लिए तुरंत उन्होंने देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सूबे के मुख्यमंत्री से लेकर अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ और ‘रेशमा और शेरा’ तक को याद किया। फिल्म ‘सावन भादों’ वाली सलोनी रेखा को भी याद किया। सोचने लगे कि सब तो याद है…घर में भी कभी ऊटपंटाग हरकत नहीं की, फिर बेटे ने ऐसा क्यों लिखा। उनकी पैदाइशी वणिक चेतना जाग उठी- अरे पक्का यह खौखटिया बहू का दिमाग होगा। उसकी निगाह काफी दिनों से मेरे बैंक अकाउंट से लेकर फरीदाबाद वाले फ्लैट पर है…। दो साल से पीछे पड़ी है कि फ्लैट की गिफ्ट डीड कर दीजिए…। जब देखो कह देती है, ‘पापा जी आप बीपी, शुगर के मरीज हो…लॉकर में रखे गोल्ड वगैरह का नॉमिनी बना दीजिए किसी को…बाद में बड़ी दिक्कतें आती हैं…।’

     सिंघल साहब ने यह भी सोचा कि हो सकता है कि किसी वकील की सलाह पर ये सब मुझे मानसिक रोगी दिखाकर कुछ खेल करना चाहते हैं…। हाल में उन्होंने ऐसी खबरें पढ़ी भी थीं कि कैसे औलादों ने अपने बूढ़े बाप की संपत्ति हड़प कर बेदर कर दिया या वृद्धाश्रम भेज दिया। डर के मारे उन्हें आगरा के पागलखाने की याद आ गई, जहां उनकी एक पुष्पा मौसी काफी दिन रहीं। यह तो बाद में पता लगा कि पति की मौत के बाद उनके देवरों ने ही उन्हें पागल करार दिया और डाक्टर से फर्जी सर्टिफिकेट लगवा कर उन्हें पागलखाने भेजवा दिया। सारी संपत्ति देवर जीम गए। बाद में मौसी सर मुंडाकर स्वामी अखंडानंद के आश्रम चली गईं। परिवार वाले उन्हें भक्तिन अम्मा के रूप में याद करते रहे…। कमाल की बात यह है कि एक देवर नरेश रस्तोगी ने भक्तिन अम्मा की याद में एक बार बाला जी का भंडारा भी किया था। उसने भक्तिन अम्मा की याद में एक आश्रम में पोलर के पंखे भी लगवाए थे।

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     यह सब सोचकर ही सिंघल साहब पसीने से भीग गए। पानी निकाल कर पिया। घर से सिर्फ स्टील वाली पानी की बोतल और दो जोड़ी कपड़े, डेबिट कार्ड और कुछ नगदी लेकर निकले थे। पहली रात सोनीपत में संघ के दफ्तर में काटी जहां के संजीव बंसल भाई उनके परम मित्र रहे थे। दूसरे दिन बस पकड़कर कुरुक्षेत्र होते हुए पिहोवा निकल गए। सुन रखा था, पिहोवा जाकर बड़ी शांति मिलती है। पौराणिक जगह है। असल में वहां उनके एक अन्य कवि दोस्त शिव सैनी राही का घर था। वह अक्सर बुलाता भी रहता था। अचानक सिंघल साहब को देखकर वह चौंका, लेकिन मिला बड़ा गदगद होकर। सिंघल साहब ने साफ-साफ बता दिया कि दो दिन रहना है बस…। थोड़ा मंदिरों के दर्शन करेंगे। लेकिन यह नहीं बताया कि वे किस कारण घर से भाग आए हैं।

                     

     तो आज सिंघल साहब पिहोवा में थे। चाय की टपरी पर, एक कोने में जाकर अखबार की सूचना का फोटो खींचकर रख लिया। बेटे को वाट्सऐप करके इतना ही लिखा- ‘यह क्या हरकत है…मेरी मानसिक दशा कब खराब हो गई…। कौन सा बदला निकाल रहा है…।’

      सारे मैसेज पढ़कर मोबाइल बंद कर दिया। हालांकि वे समझ गए थे कि सर्विलांस के जरिए उनके मोबाइल से उन्हें ट्रेस कर लिया जाएगा। मोबाइल में बेटे, बेटी, दोस्तों की मिस काल थीं। एकबारगी मन किया कि गुड़गांव में जा बसी बेटी शोभा गुप्ता से बात करें। बेचारी बड़ी परेशान होगी। पत्नी रमा जिंदा होती तो यह नौबत ही नहीं आती। वे एक दिन भी उससे अलग नहीं होते थे। भले लड़ाका और जिद्दी थी, पर जीवनसंगिनी तो थी ही। ताश खेलते हुए, लड़ते हुए भी पूछ लेती थी- ‘शुगर वाली गोली ले ली…भुलक्कड़ राम।’ सोचते हुए उनकी आंखें तर हो गईं…। मन किया कि बेटी को फोन मिलाकर बता दें कि मथुरा, वृंदावन घूमते हुए आ जाएंगे…पर जी कर्रा किया। पता नहीं क्यों अपने आप से शर्म आ रही थी। शर्म आने की वजह भी थी।  

    पता नहीं क्यों उन्हें लग रहा था कि वे बेटे-बहू, बेटी-दामाद को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। पत्नी तो उनकी हरकतें जानती थीं। समझाती भी थीं कि ‘कंपूटर में यह सब गंदा देखने के बजाय अच्छी बातों पर सुरत लगाओ महाराज…।’ बस एक बार बीच रात झिड़कियां खाने के बाद कान पकड़कर बोले थे, ‘रमा देवी, कसम से आगे से कोई शिकायत नहीं मिलेगी। कहो तो वृंदावन चलकर श्री महाराज से माफी मांग लेंगे। अब तो बड़े-बड़े स्टार उनके पास जाकर आशीष लेते हैं।’

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    उनकी गुमशुदगी को लेकर तरह-तरह की अफवाहें उड़ चुकी थीं। एक अफवाह यह भी कि उन पर कर्ज काफी था। साथ ही गाजियाबाद में पोस्टिंग के दौरान हुए एक घपले की फाइल खुलने से उनका नाम भी आया था।

     लेकिन हकीकत तो कुछ और ही थी। सिंघल साहब समझ भी रहे थे कि बात का बतंगड़ बन रहा है। पर असलियत बताएं किसे। अखबार में छपी फोटो देखकर उन्होंने अनुमान लगा लिया था कि पूरे मोहल्ले में उनकी मशहूरी हो गई होगी। पहली बार ऐसा हुआ था कि दो दिन से उन्होंने हजामत नहीं बनाई। तनाव का असर चेहरे पर भी छाप छोड़ रहा था। ‘चिंता चिता के समान होती है ’ वाली कहावत आज पहली बार उन्हें समझ आई।

     आखिर हुआ क्या कि सिंघल साहब को अपने घर से मुंह छिपाकर भागना पड़ा। लोगों के कयासों से अलग मामला यह था कि उस दिन सिंघल साहब दो पैग लगाकर अपने कंप्यूटर पर बड़ा मूड बनाकर किसान आंदोलन के दौरान मशहूर हुई अपनी प्रिय पोर्न नायिका और उसके हब्शी गुइयां के दर्शन कर रहे थे कि अचानक स्क्रीन पर डरावना संदेश आ गया। साइबर क्राइम सेल का विशाल संदेश था: आप नियमित रूप से प्रतिबंधित साइट को देख रहे है, इसलिए आपके कंप्यूटर को ब्लाक कर दिया गया है। किसी भी समय आपके घर आकर नजदीकी पुलिस आपको गिरफ्तार कर सकती है। अभी स्क्रीन को अनलॉक करने के लिए आप आपने कार्ड से चालीस हजार का भुगतान करें। बारह घंटे तक आपका इंतजार करेंगे। इसके बाद आपकी रपट सीधे गृह मंत्रालय को कर दी जाएगी। इस बीच आपने स्क्रीन को अनलॉक करने का प्रयास किया तो नई आपराधिक धारा जुड़ जाएगी…।

    सिंघल साहब के समझो प्राण ही निकल गए। बल्कि नशा हिरन हो गया। भले ही वे रिटायर्ड इनकम टैक्स कमिश्नर रहे। पर आज कानून से पाला पड़ते ही वे हल्की सर्दी में भी गलथरी तक भीग गए। दस मिनट में तीन बार-बार पेशाब कर आए। तीन सिगरेट फूंक डालीं। एक पैग और लगाया। पूरे घर में चहलकदमी करते रहे। बड़ा विचार कर अपना कार्ड लेकर बैठे। साइबर क्राइम सेल की सूचना को फिर गौर से पढ़ा। जैसा निर्देश था, उसे मानते हुए कार्ड लेकर बैठ गए…। सोच लिया था कि इतना बड़ा नुकसान उठाकर जिंदगी से एक सबक ले लेंगे और फिर कभी कंप्यूटर में पोर्न नहीं देखेंगे। दरअसल उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि पोर्न फिल्मों को लेकर कोई नया अदालती आदेश भी आया है कि पुलिस की उन लोगों के सर्वर पर निगाह रहती है जो नियमित रूप से पोर्न देखते हैं।

     अचानक उनके पड़ोस से, यानी सामने की सड़क से 112 नंबर की गाड़ी अपना सायरन बजाते निकली। उन्हें लगा पुलिस उनके घर के करीब ही आ रही है और अभी सीधे उनके ट़ॉवर के पास आ जाएगी। घबराकर उन्होंने सारी लाइटें बंद कर दीं। पुलिस की गाड़ी आगे निकल गई तो उन्हें चैन आ गया। पता नहीं क्यों उन्हें लग रहा था कि आज पुलिस की गाड़ी की आवाज ज्यादा सुनाई पड़ रही है। इतने राउंड तो कभी लगे नहीं।

    कंप्यूटर की स्क्रीन अब भी लॉक थी। सिंघल साहब को सबसे बड़ा डर था कि मनाली घूमने गए बेटे-बहू ने आकर चेक किया तो वे क्या जवाब देंगे। बहू तो छूटते ही कहेगी- ‘हमारे तो भाग्य फूट गए ऐसे कुसंस्कारी परिवार में आकर…। छि… राम राम जपने की उम्र में बुढ़ऊ गंदी फिल्मों का व्यसन पाल लिए।’ सिंघल साहब वैसे भी बहू से ज्यादा ही डरते थे। एक बार उनके कंप्यूटर में हिस्ट्री चेक करने के बाद उसने ससुर को इतना ज़लील किया कि दो दिन उनसे खाया-पिया नहीं गया। यहां तक कह दिया कि ‘पापा जी सॉरी… डिंपी के साथ आप नहीं खेलोगे…डर लगने लगा है।’ बेटे ने तो यहां तक कह दिया कि ‘बेचारी मां कैसे रही होंगी आपके पास…। इस बुढ़ापे में पोर्न कौन देखता है यार…। कुछ हार्मोनल प्रॉब्लम तो है… टीका तो इतना लंबा लगाते हो…करम ऐसे कि थूकने का मन करता है…।’

     जीवन में पहली बार उन्होंने बेटे से माफी मांगी और लगभग रोते हुए कहा- ‘किसी और को मत बताना। मैं जल्द ही किसी मनोवैज्ञानिक से मिलकर पूछूंगा कि इतनी कामेच्छा क्यों है…? ’ बेटे ने कहा, ‘मैडिटेशन क्यों नहीं करते। गांधी तो आप पढ़ोगे नहीं, रामकृष्ण परमहंस की कुछ किताबें हैं, वही पढ़िए। पढ़ने की आदत कई फालतू चीजों से दूर रखती है…।’ बहू  की नजरें बता रही थीं कि वह नफरत से भर चुकी है। अब सिंघल साहब के लिए इतनी सजा काफी थी कि बहू ने अपनी बेटी डिंपी को उनके पास जाने से रोक दिया और एक दिन बाकायदा बैड टच की जानकारी दी। यह भी बता दिया कि ‘दादू के पास अकेले में नहीं जाना…कभी किसी अंकल की गोद में नहीं बैठना…। किसी को गाल पर, चेस्ट पर हाथ मत लगाने देना…।’ डिंपी को नौ साल की उम्र में ही मरदाने मनसूबों से अवगत करा दिया गया। पर उसके लिए एक अचरज भरा सवाल तो था ही कि मम्मी ने दादू के पास जाने से भी रोक दिया।

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     पर आज रात तो बस सिंघल साहब को मौत ही नहीं आ रही थी, सारे करम हो गए। जैसे नरक के खौलते तेल वाले कड़ाहे में उन्हें डाल दिया गया था। तनाव में वे पंखे की ओर देखने लगे कि किस कंपनी का है। अगर लटक जाएं तो टूट तो नहीं जाएगा। उन्हें लगा जैसे आत्महत्या से वे सारे संकट से मुक्त हो जाएंगे…। बाथरूम में जाकर तेजाब की बोतल भी देख आए। चूहे मारने की दवा कहां रखी है, यह भी याद करने लगे। कलाई की उभरी नस देखने लगे। सुन रखा था कि कलाई की नस काट दो तो मौत आराम से हो जाती है। फिल्मों में ऐसे सीन देख रखे थे। पर कलाई पर चाकू चलाने का जिगरा उनके पास नहीं था।

     खैर, जान देने का विचार उन्होंने रिजर्व में रखा। डिब्बी में अभी दो सिगरेट बाकी थीं। रात के तीन बज चुके थे। बार बार स्क्रीन की ओर देखते जो लॉक थी। जिसमें लिखा था-कार्ड से भुगतान होते ही स्क्रीन अनलॉक हो जाएगी।

    कमाल की बात यह कि कभी इतने बड़े अधिकारी रहने के बावजूद उन्हें यह ख्याल नहीं आ पा रहा था कि किसी तकनीकी इंसान से मदद ली जाए। पर समस्या यह थी कि जिससे भी बताएंगे, वह पहले इनकी खिल्ली उड़ाएगा। अपने मित्र रिटायर्ड आईपीएस पीएन राय का ख्याल भी आया कि सुबह होते ही उनसे मदद मागेंगे। अचानक उन्हें ध्यान आया कि उनकी पुरानी दफ्तरी सखी पारुल चंदोला मदद कर सकती है। उससे डर भी नहीं था, क्योंकि वह दो आदमी छोड़ अकेले रहती थी। हर तरह की रसीली, टपोरी बात कर लेती थी। साठ की उम्र में भी हसरतें जवान थीं, यह सब फेसबुक से पता चलता रहता था। सिंघल साहब ने डरते-डरते फोन किया..। नहीं उठा। फिर किया, नहीं उठा। दस मिनट बाद उधर से ही फोन आ गया…जुकाम भरी नकही आवाज निकली, ‘अरे सर इतनी रात में क्या हो गया…। डोलो खाकर सोई पड़ी थी।’

    सिंघल साहब ने ‘सॉरी-सॉरी’ कहा, लगभग कंपायमान होकर बोले,  ‘पारुल जी…बड़ा सोच कर फोन किया….मैं बड़ी मुसीबत में फंस गया हूं…मैं एकचुली कुछ देख रहा था…अचानक स्क्रीन लॉक हो गई। पुलिस पकड़ सकती है…।’ सब एक सांस में बोल गए।

     पारुल ने मरा हुआ-सा जवाब दिया, ‘सर मैं कोई आईटी इंजीनियर नहीं हूं…आप क्या पोर्न देख रहे थे…। पर यह तो नॉर्मल बात है…।’

    सिंघल साहब ने कमजोर-सा बहाना किया, ‘नहीं नहीं बस गूगल में कुछ हीरोइनों की तस्वीर सर्च कर रहा था…इत्ते में ही…।’

    पारुल ने असहाय बनकर कहा, ‘मैं एकदम नींद में हूं…आप भी सो जाओ, सुबै देखेंगे…। वैसे एक बार चेक कर लीजिए, आजकल फ्राड भी चल रहे हैं…मैंने तो नहीं सुना कि पुलिस कंप्यूटर लॉक कर देती है…।’ कहकर उसने फोन रख दिया।  

     अब तो जैसे कोई उम्मीद ही नहीं थी।

    स्क्रीन देखते ही उनका जियरा धक से रह जाता। डरावनी कल्पना कर रहे थे- कल सुबह होते ही पुलिस वाली गाड़ी उनके घर के नीचे आकर खड़ी हो गई है। गार्ड बताने आया है कि सिंघल साहब इस वाले फ्लैट में रहते हैं…। पुलिस उनके घर में आ गई है…। वे दरोगा से कह रहे हैं, मैं क्लास वन अफसर रहा हूं…। साथ चल रहा हूं…। प्लीज देखे रहिए ज्यादा तमाशा ना बन पाए…। मोहल्ले वाले पुलिस की गाड़ी के पास आकर खड़े हो गए हैं…। गाड़ी साफ करने वाले मुस्करा रहे हैं। सामने वाला खन्ना मजा ले रहा है, पूछते हुए- इंस्पेक्टर साहब यहीं निपटा लीजिए। खामखां नककटी होगी। इसका लड़का तो सीए है, बड़ा जेंटल आदमी है… सिंघल साहब घुड़क रहे हैं, प्लीज पर्सनल मामलों में मत आइए…। खन्ना कह रहा है, सर मैं आरडब्लूए का सेकेट्री हूं…सब जानने का अधिकार है। पुलिस आने से सोसाइटी की बदनामी नहीं होती क्या…।

    सब चुप। दरोगा धीरे से जाकर अश्लील अंगुलि-संकेत से बताता है, अंकल कंप्यूटर में धौंकाई वाली फिल्में देख रहे थे। हैबीचुउल लगते हैं। साइबर क्राइम सेल ने केस दर्ज किया है। सुबह ही होम मिनिस्ट्री से आदेश मिला…। सारे परसंतापी इस सूचना पर खुश लगे। किसी ने कहा भी, शक्ल से ही रंगीला दिखता है। बाल देखो कैसे रंडीबाजों की तरह काले किए रहता है। वे सिर झुकाए गाड़ी पर बैठ गए हैं…। दरोगा समझाने में लगा है कि बेल थाने से हो जाएगी…केस बाहर ही बाहर निपटाना हो तो टॉप लेवल पर सेटिंग जरूरी है। आप सीनियर सिटिजन हो, कुछ राहत मिल जाएगी….।

     डरावने सोच को झटकने के लिए उन्होंने गर्दन झटकी और ओह कहकर सांसें भरीं। करार आया…बाप रे, कहां तक सोच लिया था। असल में जीवन में पहली बार इस तरह के संकट में वे फंसे। वीसीआर के जमाने से वे ऐसी नंगी-पुंगी फिल्में देखते आए थे, पर फंसे आज…। मन ही मन कहा, साइबर दुनिया बड़ी जालिम है…। हमारे जैसे बूढ़े, हड़बड़िया, तकनीकी दुर्बलता वालों के लिए कुछ ज्यादा ही।

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    बची हुई सिगरेटें भी खत्म हो गईं, पर उन्हें नींद कहां आने वाली थी। भय और अंदेशे का बोझ हल्का करने के लिए वे घर से नीचे उतर गए। गेट पर गार्ड से बात करते-करते उससे तंबाखू ली। उसने पूछा भी कि अंकल आज इत्ते सुबह…। उन्होंने बहाना किया, हां आज शाम को भयंकर सो लिए…। बेटे-बहू हैं नहीं, अकेले बोरियत होती है…। फिर सामान्य दिखने का नाटक करते हुए पूछने लगे, ‘क्यों राणा आज पुलिस कुछ ज्यादा सरगर्म नहीं दिख रही…।’

    गार्ड ने हां कहा और बताया कि कल शाम को पार्क में दो लड़कियां नैकेड हालत में पकड़ी गई थीं। सोसाइटी के लोगों ने कंप्लेन की है, इसलिए पुलिस ने आज से चक्कर बढ़ाए हैं। आज से पार्क को शाम आठ बजे बंद करने के आर्डर दिए हैं। दो सीसीटीवी लगाए जा रहे हैं। पार्षद नमन गुप्ता जी भी आए थे, कह रहे थे ‘एक बड़ी लाइट लगवा देंगे ताकि अंधियारे का कोई फायदा ना उठाए।’

    यह सुनकर सिंघल साहब को चैन आया। वे इस भय से निजात पा गए कि पुलिस तक उनकी खबर पहुंच गई है।

    पांच बज चुका था। उन्होंने तय कर लिया कि सुबह की
    धूप निकलते ही वे कोई फैसला कर लेंगे। कोई आसान मौत का फार्मूला मिला तो वह भी ऑप्शन रखा जाएगा।

     इस आपदा की घड़ी में उन्हें फिर पत्नी की याद आई। वे उसे साफ-साफ बता सकते थे कि कंप्यूटर में क्या देख रहे थे। अचानक यह मुसीबत गले लग गई। इस वक्त वे संसार के सबसे दुखी, असहाय इंसान थे। वे अंदर ही अंदर रो पड़े।

    सारे रास्ते बंद होने के बाद अब एक ही इलाज था कि घर छोड़कर भाग लिया जाए। बेटे-बहू जब लौटकर आएंगे तो उन्हें चैन से जीने भी नहीं देंगे। सबसे ज्यादा डर इस संदेश से था कि बारह घंटे बाद पुलिस उनके पास पहुंच जाएगी।

    आखिकार उन्होंने फैसला कर ही लिया। कंप्यूटर को शट डाउन करने के बजाय सीधे बंद कर दिया। सादा कागज निकालकर एक पत्र लिखा- ‘प्रिय राकेश, तुम्हारी मां के जाने के बाद से ही यह संसार मुझे असार लगने लगा है। जीवन में एकदम शांति नहीं है। मैं घर छोड़कर जा रहा हूं। मुझे ढूंढ़ने का प्रयास मत करना। मन किया तो लौटकर आ जाऊंगा। घर की एक चाभी तुम्हारे पास है ही। अपनी वाली चाभी मैंने शू रैक के सबसे नीचे वाले खाने में तुम्हारे स्पोर्टंस शू के अंदर रख दी है…।’

                                  – तुम्हारा दुखी पापाजी…।

    घर के दरवाजे से निकल कर बाहर लगी साईं बाबा की तस्वीर देखकर सिर झुकाया, मानो अंदर ही अंदर माफी मांग रहे हों।

    अंधरे में जब सड़क पर आए तो सुबह की सैर पर निकलने वाले कुछ लोग उन्हें पहचाने से लगे। पर वे किसी की ओर  देखना नहीं चाहते थे। अपराधी की तरह निकल रहे थे।

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    जीवन में पहली बार वे घर छोड़कर निकल रहे थे। अचानक मन में क्या आया कि वे लौटकर गार्ड राणा के पास आ गए और बोले, राणा भाई अपना मोबाइल नंबर देना, कुछ जरूरत होगी तो आपसे पूछना है…। राणा ने रहस्य भरी नजरों से देखते हुए कहा, कल तक ही नाइट है, परसों से डे ड्यूटी…।

    कोई बात नहीं, कल ही बात करेंगे। उन्हें तो बारह घंटे की मियाद ही खाए जा रही थी। बेटा-बहू कल आने की बोल चुके थे।

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     आईएसबीटी पहुंचकर वे सोचने लगे कि किस शहर की ओर निकलना चाहिए। यह भी अहसास था कि वे ज्यादा दिन बाहर नहीं रह पाएंगे। सामने चंडीगढ़ जाने वाली बस खड़ी थी, गुरुमुखी लिखी देखकर पता चल रहा था कि यह पंजाब रोडवेज की है। ज्यादा सोचे बिना वह बस के अंदर चले गए। जब तक सवारी भरती उन्होंने सोच लिया कि वे सोनीपत में उतर जाएंगे। बाद में सोचेंगे कहां जाना है, या घर लौटना है। फिलहाल बारह घंटे की चेतावनी उन्हें खाए जा रही थी। आधुनिक तकनीक के जबड़े में वे पहली बार फंसे थे। अखबार में डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन वसूली की खबरें रोज पढ़ते आए थे। पर आज जैसे खुद ही फंस गए।
      फिलहाल सोनीपत के जिस संघ कार्यालय में वे रुके, वहा वैसे तो आराम था, पर सिगरेट-बीड़ी पीने की सख्त मनाही थी। दारू पीना तो आफत मोल लेना था। इसलिए सुबह उठते ही वे नहा-धोकर निकल लिए। प्रभारी बंसल जी से बहाना कर दिया कि अंबाला में किसी रिश्तेदार के पास जाना है। लेकिन अंबाला के बजाय वे कुरुक्षेत्र गए और वहीं से पिहोवा। सैनी के घर में कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि उसने बाकायदा हुक्के से लेकर चिलम तक की व्यवस्था कर रखी थी। शाम को दारूपान एक नियम के तौर पर स्वीकृत था।

    सैनी ने लाख कुरेदा, ‘भाई कैसे रुख किया इधर…पहले तो कभी ना आया तू …कुछ तो बात है…?’

    पर सिंघल साहब मौनी बाबा बने रहे। बस इतना ही कहा, ‘बस थोड़ा मन और हवा बदलने का जी किया…पिहोवा की बड़ी महिमा सुन रखी थी। भार लगे तो बतइयो…बिदाउट हेजीटेशन।’

    सैनी भावुक हो गया, ‘क्या बात कर दी यारा…तेरा ही घर है। जब तक मन करे…मुकेश का गाना याद है- मेहमां जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता है…।’

    सिंघल साहब संतुष्ट हो गए। मोबाइल अभी भी बंद था। अचानक याद आया कि बारह घंटे वाले मियाद तो कभी की निकल ली…। घबराकर उन्होंने मोबाइल खोला। गार्ड राणा का नंबर मिलाया। उसने बताया था कि उसकी दिन में ड्यूटी रहेगी पंद्रह दिन। राणा के फोन उठाते ही सिंघल साहब हकलाते, भड़भड़ाते बोले, ‘राणा मैं 411 वाला सिंघल अंकल बोल रहा हूं…पहचान लिए….?’

    उधर से आवाज आई, ‘अरे सर हंगामा हो गया। आपके बेटे हम पर खौड़म हो रहे थे कि तुरंत क्यों नहीं बताया…अब हमें क्या पता, आप डिस्ट्रब होकर निकल गए हो….।’

    सिंघल साहब ने उसे रोकते हुए कहा, ‘चलो, कोई नहीं…अरे यार बताओ परसो दोपहर, शाम तक कोई पुलिस आई थी…?’

    राणा ने कहा, ‘यहां कोई नहीं आया…। एक अखबार के रिपोर्टर आए थे, आपके घर गए थे…। सोसाइटी के कुछ लोग भी आपके बेटे से मिलने आए थे।’

    सिंघल साहब ने चैन की सांस ली। सोचने लगे, साला यह बारह घंटे सिर्फ भभकी थी क्या…। अब उन्हें अहसास हुआ कि वे किसी बड़े फ्राड के चक्कर में आ गए थे। बाप रे, फ्राडियल ऐसे जाल बिछाते हैं…। हल्का सुकून आते ही उन्होंने एक  सिगरेट सुलगाई। मन किया बेटे को फोन लगाकर बता दें कि ‘भाई, अब कोई इश्तहार मत देना, मैं एक दो दिन में आ जाऊंगा।’ पर अभी उतनी हिम्मत आई नहीं थी। बस तसल्ली यही थी कि पुलिस घर तक नहीं आई थी और उनके पलायन को आकस्मिक घटना मान लिया गया था। 

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      इत्मीनान जगने के साथ ही उन्हें दाढ़ी में खुजलाहट होने लगी। रोज हजामत की आदत तीस सालों से थी। अफसर होने के कारण इसे आवश्यकता मान लिया गया। बस पतली मूंछ रखते थे। मूंछ भी इसलिए कि रमा देवी यह कहावत कहकर ताना मारती थीं- ‘जिनके मुच्छ नहीं उनके कुच्छ नहीं…।’ पत्नी एक बार जरा इशारा भर कर देतीं तो वे भारत भूषण की तरह चिकनिया नायक बनकर दिखाते।

    खैर, वे खाली पड़ी नाई की दुकान में घुस गए और जवानों जैसे आत्मविश्वास से कहा, ‘भाई ओनली शेव, हां मूंछ ना छेड़ियो, बस हल्की कैंची लगानी है…और ये नाक के बाल भी देख लेना…।’ हज्जाम ने पेशेवर तन्मयता से उनकी हजामत बनाई, नाक से झांकते बाल साफ किए और ऑफर दे दिया, ‘सर बाल कलर करवा लीजिए…रौनक आ जाएगी।’ वे समझ गए, जवान हज्जाम को लिफ्ट मिल गई है। सिंघल साहब ने मुस्कराकर कहा, ‘फिर कभी…। भाई रौनक तो दिल में आती है, बाल में नहीं…।’ शेव बनाने वाला बांकपन से मुस्किया दिया। 

     साफ चेहरे ने जैसे उनकी जिजीविषा बढ़ा दी। पैरों में भी ताकत लौट आई। उस रात कहां आत्महत्या तक के बारे में सोच बैठे थे, आज लगने लगा- जिंदगी दुष्टताओं से घिरे होने के बावजूद बड़ी कीमती चीज है। अपने आप इस जहां से कूच कर देना निरी बेवकूफी है।  

     राणा से बात करके उन्हें यह भरोसा तो हो गया कि अब पुलिस गिरफ्तार करने नहीं आ रही। अखबारों की खबरें याद करते हुए वे समझने लगे थे कि हैकर्स उनके जैसे असहाय, तकनीक भीरु लोगों पर घात लगाए रहते हैं। हाईकोर्ट के एक पूर्व जज से पचास लाख वसूलने की खबर भी तो कल ही आई थी। कल ही साइबर अपराध पर हरियाणा के पुलिस मुखिया आरडी सांगवान एक प्रेस कांफ्रेंस करके बता रहे थे कि साइबर अपराधी सिर्फ आपके लोभ, लापरवाही और अज्ञानता का फायदा उठाते हैं। फंसने वाले भी ज्यादातर अधवयसे, बूढ़े और रिटायर्ड लोग होते हैं। पुलिस, सीबीआई, ईडी के नाम पर डिजिटल अरेस्ट होने वाले एक बार भी दिमाग नहीं लगाते कि कानून में सिर्फ फिजिकल अरेस्ट जैसी बात है।

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    ओफ!…एक बुखार था जो उतर गया। वे सोचने लगे जब उनके जैसा क्लास वन अफसर रहा व्यक्ति हैकर्स और साइबर अपराध के जाल में फंस सकता है तो बाकी की क्या बिसात…।

    घर लौटने का फैसला कर लिया। पर कोई फोन नहीं, अब वे सरप्राइज जैसा माहौल बनाकर घर लौटना चाहते थे। सैनी साहब से विदा लेकर वे निकल लिए, बस इतना बोले, ‘यार बड़े संकट से निजात मिल गई है। फिर मिलेंगे तो बताएंगे।’ सैनी साहब मुस्करा दिए, ‘ऐसे संकट आते रहें, इसी बहाने तू आता रहे…जहे-नसीब…।’ सिंघल साहब लाजवाब हुए। भावुक भी हो गए।

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     और यह संयोग ही था कि जिस वेला में वे घर से निकले थे, उसी वक्त वे लौटकर आए। सब सो रहे थे। मन किया कि ना जगाएं, पर अंदर की अधीरता कहां मानने वाली थी। कॉलबेल दबा ही दी। दो बार के बाद अंदर से कोई आवाज आई, ‘आए…आए भई…सुबह सुबह कौन आ गया…?’

     दरवाजा खुला, सामने अधनिंदासा बेटा था। चौंककर बोला, ‘क्या करते हैं आप पापा…तीन दिन से हम सब अधमुए से बैठे हैं…। खाना भी नहीं बना…बच्चों जैसी हरकत क्यों करते हो…।’

    लाजवाब सिंघल साहब के नैन सजल हो गए, ‘सॉरी सबसे…मैं सबका गुनहगार ठहरा…पर बेटा मेरा मानसिक संतुलन ठीक है…।’ कहकर वे शर्माकर मुस्कराए…।

    हमेशा भुनभुनाया रहने वाले बेटे का प्यार उमड़ ही आया, ‘आप ऐसी हरकतें करेंगे तो यही माना जाएगा ना…। जाइए अपने कमरे में, कपड़े बदलिए…चाय बनाता हूं।’

    बारह घंटे के खौफ से मुक्ति पाकर सिंघल साहब का एक भय तो अभी बाकी ही था। इसके निस्तारण के बिना पूर्ण भयमुक्त कैसे हो सकते थे। अपने कमरे में जाकर, कंप्यूटर ऑन किया। धीरे-धीरे रोशनी झलकी, फिर स्क्रीन के आइकन प्रगटे…वह डरावना संदेश शिकार किए बिना ही काफूर हो चुका था।

     सिंघल साहब स्क्रीन देखकर अब मुस्कुराए थे।

    दुनिया के लिए यह राज़ राज़ ही रह गया कि वे घर छोड़कर क्यों भाग गए थे। बेटे का भी दिल बहलाने के लिए उन्होंने झूठ ही सही, मान लिया था कि ‘हां, हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ गया था…पर यह भी कोई पब्लिक प्लेटफार्म पर लिखने की बात है…।’

    सोसाइटी के वाट्स ग्रुप में आज बेटे का नया मैसेज अवतरित हो गया था- ‘ 411, टॉवर फाइव निवासी घनश्याम दास सिंघल सकुशल घर लौट आए हैं। शुभेच्छाओं के लिए आप सभी का धन्यवाद!’

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