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  • नोबेल विजेता लेखक लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई से शर्मिष्ठा मोहंती और कबीर मोहंती की एक लम्बी बातचीत

    आज हंगरी के लेखक लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है। उनके एक इंटरव्यू का अनुवाद प्रस्तुत है जिसे किया है युवा लेखक राकेश कुमार मिश्र ने- मॉडरेटर

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    भूमिकासाहित्य का नोबेल पुरस्कार 2025 हंगरी के लेखक लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई को मिला है। उन्हें आधुनिक उपन्यास के समकालीन उस्तादों में सबसे अग्रणी माना जाता है। 2015 में उन्हें मैन बुकर इंटरनेशनल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। साल 2012 में वे दिल्ली आए थे, ऑलमोस्ट आइलैंड डायलॉग्स में भाग लेने। इस आयोजन के दौरान, समकालीन अंग्रेज़ी लेखिका और कलाकार शर्मिष्ठा मोहंती और कबीर मोहंती ने क्रस्‍नाहोरकाई से उनके साहित्यिक सफर, उनके उपन्यासों की बनावट और हंगेरियन भाषा के बारे में एक लंबी बातचीत की थी। मेरा मानना है कि यह बातचीत उन सभी लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो उनके लेखकीय संसार को समझना चाहते हैं। मेरा सौभाग्य है कि मैंने इस बातचीत का हिंदी अनुवाद किया, जिसे प्रतिष्ठित हिंदी लेखक और संपादक मनोज पांडेय जी ने 2018 में हिंदी समय पर प्रकाशित किया था। यह अनुवाद मेरे जीवन के सबसे मुश्किल दिनों में संभव हुआ। मैं अपने परिवार और अब तक की यात्रा में मिले तमाम लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। उम्मीद है यह अनुवाद हिंदी के पाठकों को लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई के लेखन से जुडने में मदद करेगा।राकेश कुमार मिश्र

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    (हंगेरियन लेखक  लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई  से  शर्मिष्ठा और कबीर मोहंती की लम्बी बातचीत)

    2015 में द मैन बुकर इंटरनेशनल प्राइज़ से सम्मानित हंगेरियन लेखक लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई समकालीन उपन्यास की दुनिया में एक ज़रुरी नाम है। सतान्तागो (Satantango), द मलान्क्ली ऑफ़ रेजिस्टेंस (The Melancholy of Resistance), वॉर एंड वॉर (War and War) और एनिमल इन साइड (Animalinside) [जर्मन कलाकार मैक्स नेव्मान द्वारा चित्रित] आदि इनके चर्चित उपन्यास हैं। अंग्रेज़ी में हुए इनके अनुवाद एनिमल इन साइड (अनुवादकओत्तिलिए मुल्ज़ेत) को छोड़कर सारे अनुवाद ब्रिटिश कवि जॉर्ज सिर्तेज़ ने किये हैं। ये विस्तृत बातचीत जून, 2011 में दो दिनों तक बुडापेस्ट के एक होटल में हुई। लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई इस शहर से बस थोड़ी ही दूरी पर रहते हैं। वे बातचीत के पहले दिन अपनी अनुवादक पत्नी डोर्का के साथ आये। क्रस्‍नाहोरकाई की अंग्रेज़ी अच्छी है और लगभग उसी तरह से अपने आपको अभिव्यक्त करते हैं जिस तरह से हमारे दौर के कुछ बड़े विदेशी लेखक थोड़ा संकोच के साथ अपनी बात रखते हैं। हो सकता है कि क्रस्‍नाहोरकाई की अंग्रेज़ी व्याकरण के स्तर पर गलत हो या वाक्य विन्यास के हिसाब से आपको खटके लेकिन उन्होंने इस बातचीत में हमेशा अपने विचारों को पूरे नयेपन और गहराई के साथ अभिव्यक्त किया। इस बातचीत के दौरान उनकी पत्नी डोर्का ने कुछ विशेष शब्दों या अभिव्यक्तियों के चुनाव में उनकी मदद की। इस बातचीत के दौरान मैं अपने पति कबीर मोहंती के साथ थी, जो फिल्म निर्माता और विडियो आर्टिस्ट हैं। बातचीत के पहले दिन धूप तेज़ थी। क्रस्‍नाहोरकाई का चेहरा अन्दर की तरफ था जबकि मेरा चेहरा बाहर की तरफ। तो, उन्हें सुनते हुए मैं आसमान को भी देख रही थी और रौशनी धीरेधीरे फैल रही थी। ~ शर्मिष्ठा मोहंती)

    शर्मिष्ठा  मोहंती – क्या आप बुडापेस्ट से हैं ?

    लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई – नहीं। बिल्कुल नहीं। असल में मैं बर्लिन को थोड़ा बेहतर तरीके से जानता हूँ। उन दिनों मैं तीस साल का था जब मैंने पश्चिम की तरफ यात्रा की, यानी बर्लिन की तरफ। उन दिनों वह शहर ज़ख़्मी लोगों की राजधानी थी। उन दिनों जिम जर्मुस्च (अमेरिकन अभिनेता, निर्देशक और निर्माता) वहीं थे। इसके अलावा डेविड बोवी (ब्रिटिश गीतकार, गायक और अभिनेता), ऐलेन गिन्सबर्ग (प्रसिद्ध अमेरिकन लेखक और कवि), टॉम वेट्स (अमेरिकन संगीतकार और गायक) जैसे लेखक भी वहाँ मौजूद थे। मैंने वहाँ अच्छाखासा समय बिताया।

    मैं गियुला (Giyula) नाम के एक छोटे से शहर में बड़ा हुआ, जो हंगरी और रोमानिया की सीमा पर स्थित है। मेरी दो किताबें सतान्तागो और द मलान्क्ली ऑफ़ रेजिस्टेंस इसी शहर से प्रभावित है।

    श.म. – यहाँ की सड़कों पर हंगेरियन सुनना बहुत दिलचस्प है। किसी भी इंडोयूरोपियन भाषा से बहुत अलग

    ल.क. – पिछले 200 सालों में एक भाषा के तौर पर हंगेरियन भाषा का बहुत विकास हुआ है। बल्कि यूरोप की दूसरी भाषाओं की तुलना में यह सबसे उत्कृष्ट भाषा है। मैं अपने अनुवादकों के साथ बहुत जुड़कर काम करता हूँ। बेशक, जॉर्ज (George Szirtes) के साथ नहीं। बल्कि जॉर्ज तो कहता है, “मुझे कोई मदद नहीं चाहिए। मैं खुद ही सारी चीजों को संभाल लूँगा लेकिन मेरी मदद मत करो।” (हँसी) जब मैं अपने अनुवादकों के साथ काम करता हूँ तो देख पाता हूँ कि भाषा के तौर पर हंगेरियन भाषा में कितनी संभावनाएं मौजूद हैं। अगर फ्रेंच या स्पेनिश में ऐसी दो संभावनाएँ मौजूद हैं तो हंगेरियन में दस। हेक्सामीटर में लिखी पुरानी ग्रीक कविता को आसानी से हंगेरियन में रखा जा सकता है। यहाँ तक की पेंटामीटर को भी। लेकिन हंगेरियन अपने आप में अकेली भाषा है। इस भाषा में कई अनुवाद हुए हैं और उन अनुवादों ने इसे बहुत संपन्न बनाया है। साथ ही हमें इसकी ज़रूरत भी है। हंगरी में बीसवीं सदी तक लैटिन का इस्तेमाल होता था, फिर जर्मन का और अब अंग्रेज़ी का इस्तेमाल होता है। यहाँ बुडापेस्ट में कुछ बेहतरीन लेखक और कवि लगातार अनुवाद करते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर शेक्सपियर या कुछ दूसरी जटिल रचनाएँ हंगेरियन भाषा में बहुत आसानी से उतर पाती हैं। अभी हाल ही में हमने हेमलेट का मंचन बुडापेस्ट के जेल में किया। जेल के अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने अब तक के सबसे अच्छे क़ैदियों को इस मंचन के माध्यम से देखा है। लेकिन वे असल में कैदी नहीं थे। हो सकता है कि उनके जीवन में एक ऐसा शनिवार आया हो जिस दिन वे दुनिया के सबसे बुरे पति बन गये हों। उन्होंने प्रेम करने का अपराध किया था। तो, जेल में गिल्ट (ग्लानि) जैसे शब्द को लेकर लोगों की तरफ से बहुत सशक्त प्रतिक्रियाएँ आईं। उन्होंने दूसरे शब्दों को लेकर वैसी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मुझे लगता है कि शेक्सपियर सबके लिए था। सामंतों, वेश्याओं और समाज के सभी वर्ग के लोगों के लिएदस साल पहले एक अच्छे कवि ने हेमलेट का अनुवाद किया था।

    कबीर मोहंती – जॉर्ज द्वारा किये गए आपकी किताबों का अनुवाद देखकर लगता है कि वह ऊर्जा से लबालब है, उनमें तात्कालिकता है, हम वर्तमान में खो जाते हैं। कई बार लगता है कि ये हमारे हाथों से फिसल रहा है और फिर ये चला गया। साथ ही ऐसा भी महसूस होता है कि हम इसे अब वापस नहीं ला सकते।

    श.म.- इस साल दिल्ली में, ऑलमोस्ट आइलैंड कांफ्रेंस में खाने के समय वे आपके उपन्यासों के अनुवाद के बारे में बता रहे थे। उन्होंने कहा, “आप आख़िर तक पहुँच जाते हैं और खुश होते हैं। तभी अचानक से आपको एक नया वाक्य मिलता है जो बीस पन्नों तक चलता रहता है…”

    ल.क.- बिल्कुल। जॉर्ज ने बहुत तकलीफें सही हैं। उसने एक बार कहा भी, “लास्लो, मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूँ, लेकिन तुम्हारी किताब सतान्तागो को हाथ में पकड़ते हुए मैं कांप रहा था।लेकिन मैं क्या कर सकता हूँहालाँकि, उसका अंग्रेज़ी वाला क्रस्‍नाहोरकाई बहुत अच्छा है। कई बार इसे मैं भी नहीं समझ पाता और ऐसा होना बहुत अच्छा है। आपको पता होगा कि अंग्रेज़ी कवि रौबर्ट ब्राउनिंग ने एक बार कहा था, जवानी के दिनों में दो लोग मेरे काम को समझते थे, एक मैं और दूसरा ईश्वर। लेकिन अब मेरे काम को सिर्फ ईश्वर समझता है (हँसी)

    श.म.- एक गद्य लेखक के तौर पर जो चीज़ मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, वह अपने लेखन में लम्बे वाक्यों को आपके बरतने का तरीक़ा है, आप जिस तरह से उसका इस्तेमाल करते हैं। ये वाक्य हमारे समय के नहीं है और ना ही पुराने हैं। यह कुछ ऐसा है कि आप किस तरह से दुनिया को देखते हैं, जो एक दार्शनिक गतिविधि है, सिर्फ साहित्यिक नहीं।

    ल.क.- आपने  सबसे पहलेलम्बे वाक्यके बारे में कहा। मेरे लिए वे केवल लम्बे या छोटे वाक्य नहीं है। बल्कि बहुत छोटे या बहुत लम्बे वाक्य हैं। बीस साल की उम्र से ही मैं अपने दिमाग के भीतर ही काम करता हूँ। कोई ऐसा लेखक नहीं जो अपने राइटिंग डेस्क पर ही सोचता या लिखता है। ऐसा कभी नहीं होता। यह कुछ ऐसा है जैसे कोई मेरे भीतर लगातार बोलता रहता है, और दुर्भाग्य से यह कोई अलंकार या मेटाफर नहीं है। मैं अपने दिमाग में उस आवाज़ से जुड़ने की कोशिश करता हूँ। अगर मैं अपने भीतर उस आवाज़ या संगीत को समझ पाता हूँ और उसका पीछा करता हूँ तो लगातार पन्द्रह से बीस पन्ने तक लिखता ही रह जाता हूँ। मेरे वाक्यों के लम्बे होने का एक कारण यह भी हो सकता है कि मैं हमेशा उस आवाज़ के अधिक से अधिक करीब जाता हूँ। अगर आप मुझे कुछ अर्थपूर्ण बता रहे हैं तो इस तरह की स्थिति में आप पूर्ण विराम का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि आपको इसकी ज़रूरत भी नहीं पड़ती। पूर्ण विराम या अर्द्ध विराम सिर्फ औपचारिकताएँ भर हैं। लम्बे वाक्य या छोटे वाक्य सिर्फ नियम हैं। उदाहरण के तौर पर कुर्ताग (Kurtag) के संगीत के बारे में सोचिए। उस संगीत से जुड़े नोटेशन या बॉर्डर्स के बारे में सोचिए। मेलोडी कभी इन सीमाओं में बंध कर नहीं रही। पूर्ण विराम या डॉट कुछ ऐसी ही चीज है। डॉट या पूर्ण विराम मुझे ज़रूरी लगता है लेकिन मैं उस स्थिति या समय का इंतजार करता हूँ जब ये एकदम से ज़रूरी हो जाएँ। मेरे पात्र विराम चिन्हों का इस्तेमाल नहीं करते। गादीस और पिनचौन जैसे लेखक बीना विराम चिन्हों या पूर्ण विराम के ही काम करते थे। मैं यह नहीं कह रहा कि पारम्परिक वाक्य काम नहीं करते। लेकिन वे मेरे लिए काम नहीं करते। फ़ॉकनर मुझे कुछ हद तक रूढ़ीवादी लेखक लगते हैं। उन्होंने छोटे वाक्यों का इस्तेमाल किया। और उन्होंने उन वाक्यों का इस्तेमाल किया जो उन्हें ज़रूरी लगे। जबकि काफ़्का के यहाँ पर हर वाक्य एक रहस्य है, इसलिए भी उनके यहाँ वाक्य लम्बे हैं। तो, इस तरह के वाक्यों के लिए मैं रुकता हूँ और उन वाक्यों के बारे में लम्बे समय तक सोचता हूँ।

    मैं कल ही एक किताब पढ़ रहा था। किताब का नाम बाद में। उस किताब में एक वाक्य था-“What can be whole only within itself”? यह छोटा नहीं बल्कि लम्बा वाक्य है। (लास्लो ने यहाँ पर शर्मिष्ठा मोहंती के उपन्यास न्यू लाइफ (New Life) के भूमिका से इस वाक्य को लिया था )। यह शिल्प या संरचना से ज्यादा एक दार्शनिक सवाल है। आप तो लेखक हैं। आपको पता होगा कि भाषा सिर्फ भाषा नहीं है। भाषा अपने साथ सबकुछ समाहित करती है। दूसरे विश्व युद्ध से ही पश्चिम का साहित्य (अमेरिकन साहित्य को शामिल करते हुए) यथार्थ और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से प्रभावित था। लेकिन यह एक भ्रम है। त्रुटि है। वे लोग जो फ्रांस या जर्मनी में इसकी नकल कर रहे थे, वे बिना स्रोतों को जाने कर रहे थे। वे ख़ुद नहीं जानते थे कि वे किन चीजों की नकल कर रहे हैं। हंगेरियन साहित्य सिर्फ दो सौ साल पुराना है। 18वीं सदी में हंगरी में राजनीतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक स्तर पर बड़े आन्दोलन हुए। पूरे यूरोप में एक राष्ट्रीय विचारधारा का जन्म हुआ। हंगरी में एक नई और आधुनिक भाषा की ज़रूरत थी। जो ज्यादा भरोसेमंद हो। इससे पहले सामंतों का वर्ग एक विशेष तरह के लैटिन का उपयोग करता था। ठीक इसी समय उस पुरानी भाषा से एक नई भाषा बनाने के लिए कई लेखक और कवि साथ आए। यही वह नई भाषा है जिसका मैं इस्तमाल करता हूँ। यह भाषा एकदम जवान है, इसलिए मुझे इस भाषा को बदलने का भरपूर मौका मिलता है। पश्चिम यूरोप के पाठक कुछ ज्यादा ही रूढ़िवादी है, वे या तो पुरानी परम्पराओं से आते हैं या फिर उनसे जुड़ें हुए हैं। लेकिन हंगरी भाषा में ऐसी कोई बात नहीं है। इस भाषा के पाठक नए प्रयोगों के लिए तैयार रहते हैं, शब्दों के नए समूहों के लिए तैयार रहते हैं। यानी हंगरी के पाठक ज्यादा लचीले हैं।

    श.म.- आपके उपन्यासों से जुड़ी एक बहुत दिलचस्प बात है। वहाँ हमेशा एक आदमी होता है। जैसेसतान्तागो का डॉक्टर, द मलान्क्ली ऑफ़ रेजिस्टेंस का संगीत शिक्षक और वार एंड वार का अर्काविस्त, ये सारे पात्र शिक्षित और बौद्धिक भी हैं। जबकि दूसरे पात्र कहीं ना कहीं उपेक्षित हैं। और यह भी कि आपकी उपस्थिति दोनों तरह के पात्रों में समान रूप से देखने को मिलती है।

     ल.क. – अब मैं ये देख पाता हूँ कि उन पात्रों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। पर इन उपन्यासों के नायक ठीक मुझ जैसे नहीं है। इन सभी पात्रों में कहीं ना कहीं मेरे विचार हैं। इन सारे विचारकों या बौद्धिकों के सोचने का तरीका एक ही है। असल में ये लोग वे हैं जो पूरी पृथ्वी पर अकेले हैं। लेकिन इसके साथ ही, इनके पास अपनी स्थिति को अभिव्यक्त करने की इनकी क्षमता दूसरों से कहीं ज़्यादा है। और एक सवाल यह भी कि इन पात्रों का पूरी दुनिया से क्या सम्बन्ध है? आज मैं अपने उपन्यासों के पात्रों को ज्यादा बेहतर समझ के साथ देख पाता हूँ। बल्कि ज्यादा सहानुभूति के साथ उन पात्रों से जुड़ पाता हूँ। मुझे लगता है सतान्तागो का डॉक्टर, पूरे ब्रह्मांड में एक मात्र इंसान है जो इंसानों से जुड़ी समस्याओं को सबसे अच्छी तरह से अभिव्यक्त कर पाता है। द मलान्क्ली ऑफ़ रेजिस्टेंस का संगीत शिक्षक अपने आप में एक विरोधाभास है। उसकी असली कहानी यहनहीं है कि वह इस दुनिया के बारे में क्या फ़ैसला लेता है बल्कि उसकी समस्या यह है कि वह जवान वलुसका की सुन्दरता के पीछे पागल है। जबकि बहुत देर हो चुकी है। असल त्रासदी यह है। शायद यही समस्या है किसी भी बौद्धिक व्यक्ति या कलाकार के साथ। हमें लगता है कि हमें इस दुनिया को कुछ दिखाना चाहिए, लेकिन असल में हमारा काम कुछ और है। यह कुछ ऐसा है कि हम किसी नदी के किनारे चुपचाप बैठ जाएँ और उसकी आवाज़ सुने। नदी के सतह को देखें और यह भी देखें कि किस तरह से प्रकाश सतह पर फैलता है। किसी बड़े राजनीतिक फ़ैसला या इस दुनिया से जुड़े छोटे या बड़े निर्णय लेने से ज्यादा ज़रूरी है यह काम। खास तौर से, यह ज़रूरी है कि मैं अपनी पत्नी, अपने दोस्तों और अपने करीबी लोगों को समझने की कोशिश करूँ। उस स्थिति में रहूँ जहाँ मैं उन सभी को कुछ दे सकूँ। जो कि मेरी तरफ से हो। हम इस दुनिया के बारे में निर्णय तब लेते हैं जब हम जवान होते हैं लेकिन जिस उम्र में मैं हूँ उसमें एक ही काम हो सकता है, मैं इस दुनिया को पूरी सहानुभूती के साथ देखूँ। मेरी उम्र के हिसाब से सहानुभूति ही सबसे उचित प्रतिक्रिया हो सकती है। मनुष्यों को होने वाले अनुभव कभी नहीं बदलते। जवानी, बुढ़ापा और फिर एक दिन मृत्यु। यह सब कुछ सदियों के बाद भी नहीं बदला है। ये सारी चीजें ज्यों की त्यों हैं। इसके अलावा एक और बात। हमेशा जिज्ञासु बने रहें। मैं बहुत जिज्ञासु हूँ। ठीक इस समय मैं बहुत उत्साही हूँ क्योंकि कुछ सप्ताह पहले मैंने पानी की बूंद के बनवाट के बारे में पढ़ना और जानना शुरू किया है। पानी की बूंद की बनवाट को जानने के लिए फिजिक्स, मैथमेटिक्स, ज्योमेट्रीइन सभी को पढ़ना शुरू किया। अचानक से मैंने पाया कि पानी की यह बूंद आधुनिक भौतिकशास्त्र के सामने अब भी सबसे बड़ी समस्या है। मैंने एक बड़े वैज्ञानिक से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा, “लास्लो, ये हमारे लिए सबसे मुश्किल सवाल है।मैं अपने बनारस की यात्रा के बारे में लिखना चाहता था क्योंकि मैं वहाँ पहले कभी नहीं गया था। फिर मैंने कुछ लिखा। पर मेरे सोचने का मुख्य बिन्दु गंगा के पानी की एक बूंद ही थी। उसके बाद से मेरी दिलचस्पी इसमें बढ़ गई कि पानी की एक बूंद किस तरह से दिखती है। कई महीनों तक मैंने सिर्फ इसी सवाल के बारे में सोचा क्योंकि किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं था। ठीक एक सप्ताह पहले मैं अपने फिजिसिस्ट दोस्त से दोबारा मिला तो उन्होंने कहा, “मुझे बख़्श दो।उन्होंने मुझे बताया कि जैसा कि वैज्ञानिक समझ पा रहे हैं, पूरा ब्रह्माण्ड ही अब एंथ्रोपोमोर्फिक (किसी गैर-मानव प्राणी, वस्तु या अवधारणा को मानवीय रूप, गुण या व्यवहार देना) है। पिछले पांच सालों में यह स्पष्ट हुआ है कि प्रकृति के विभिन्न तत्वों के बीच में कई सम्बन्ध हैं। इन सबको पढ़ने और सुनने के बाद मैंने बुद्ध के बारे में सोचना शुरू किया। लगा कि मुझे यह भी जानने की कोशिश करनी होगी कि उन्होंने अपनी मगधी भाषा में क्या कहा है? मैं पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकता। पीड़ा मेरे लिए सबसे बड़ा और ज़रूरी शब्द है। आधुनिक भौतिकी शास्त्र और बुद्ध के विचारों में मैं कई तरह के जुड़ाव देखता हूँ। शायद बुद्ध ने पीड़ा को सामान्य लोगों की तरह ना देखा हो लेकिन शायद पीड़ा का उनके लिए कोई दूसरा अर्थ भी रहा हो। जैसे कि अगर मैं सामने रखे ग्लास को छूता हूँ तो मेरे इसे हिलाते ही इसे पीड़ा होती है, पानी के अणु एक नया समूह बनाते हैं। मैं इसका साधारणीकरण कर रहा हूँ क्योंकि मैं अंग्रेजी में बोल रहा हूँ

    श.म.- क्या आप कह रहे है कि बुद्ध चीजों के आपसी सम्बन्धों के बारे में बात कर रहे थे?

    ल.क.- हाँ। मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ इसे समझने की। आप ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते कि कोई विद्यार्थी ठीक वैसा ही बोले या समझे जो उसके शिक्षक ने कहा है। हमें लेखन की संस्कृति को बढ़ावा देना ही होगा। लेकिन उसमें भी गलत समझ की संभावना है। यह भी एक सच है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सच यथार्थ के पीछे छिपी कोई चीज नहीं है। जैसे कि बहते हुए पानी में एक खास तरह की रोचकता और सुन्दरता होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह प्रवाह ही सच्चाई है। हमारे यहाँ कई ऐसे दार्शनिक, लेखक और कवि हुए हैं जिनके विचार बहुत अलग रहे है लेकिन हमारी अब तक की संस्कृति का इतिहास, गलतफहमी का इतिहास है। इसके हज़ारों उदाहरण है। शायद यह पूरी दुनिया में लागू होता है। हम भ्रामक इतिहास के स्तर पर सम्पन्न हुए हैं। हेराक्लितस (Heraclitus) का यह कथन कि हम किसी नदी में दोबारा कदम नहीं रखते। लेकिन इसकी कितनी भ्रामक व्याख्याएँ हुई हैं। यह वाक्य एक बड़े समूह का हिस्सा है, जो एक जटिल संदर्भ से जुड़ा हुआ है। पूरा यूरोप इस तरह की जटिलता से भरा हुआ है। यूरोप किसी खतरनाक अँधेरे कमरे की तरह है। हमें हर हाल में आगे बढ़ना होता है भले ही कितनी भी खतरनाक बाधाएँ हों या भले ही दूरदूर तक रौशनी ना दिखे। बुद्ध ने कहा है कि हमारे समझने के लिए कुछ भी नहीं है। इस तरह से कुछ मूलभूत चीजें कभी नहीं बदलती। मैं यहाँ पर मृत्यु के बारे में बात नहीं कर रहा बल्कि मृत्यु के डर के बारे में बात कर रहा हूँ।

    श.म. – यही मानसिकता उच्च शिक्षित वर्ग की भी है। पश्चिम में ऐसे कई विद्वान हैं जो उपनिषद के दर्शन के बारे में बात करते हैं और मोक्ष के बारे में भी। इतना ही नहीं, एक विद्वान ने तो यहाँ तक कहा है कि भारतीयों में इस दुनिया और जन्ममृत्यु के चक्र से मुक्त होने की इच्छा इसलिए दिखती है क्योंकि वहाँ हमेशा से उष्ण वतावरण रहा है और शुरू से ही बिमारी, गर्मी और मृत्यु का बोलबाला रहा है।

    ल.क. – (हँसी) शायद आप नहीं जानती। मुझे लगता है कि जानने जैसा या समझने जैसा कुछ है ही नहीं। यह मेरा काम नहीं है। पूरा ब्रह्माण्ड एक रहस्य है। लावोत्से ने कहा है कि वह काम करो जो पत्थर, नदी या फूल करते हैं। हर बड़े चिंतक ने हमें यही समझाने की कोशिश की है कि कुछ भी अस्तित्व में नहीं और ना ही कोई अंतिम सत्य है। अगर आप किसी कार दुर्घटना के बारे में बात करें तो किसी को यह बताना मुश्किल होगा कि किस तरह से कई सारी घटनाएँ मिलकर उस घटना का कारण बनीं। अगर हम रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी एक घटना को ठीक से नहीं बता पाते तो हम पूरे ब्रह्माण्ड से जुड़े बड़ेबड़े  सवालों के बारे में इतनी आसानी से कैसे सोच सकते हैं ? अच्छा हो कि हम अपने दिनप्रतिदिन के जीवन से शुरू करें, जैसे कि डोर्का की आँखें, जो बहुत रहस्यमयी हैं। या आपकी आँखें। जेन मत के अनुसार हमें कुछ समझने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन सिर्फ यही काफी नहीं। ये थोड़ा सा सिनिकल है। बुद्ध ने जो कहा है वह ज्यादा मददगार है। जेन चिंतकों का यह कहना कि जब तुम अन्याय, गरीबी या मृत्यु के भय से पीड़ित हो तो शांत हो जाओ। सबकुछ भूल जाओ। इसका मतलब क्या है? हमारे लेखन में भी एक जिम्मेदारी होती है। हम एक पतली रेखा खींचते है। जीवन की कई सारी चींजों को लेकर हम लाचार होते हैं, चाहे वह कला, संस्कृति या विज्ञान से जुड़े हों। पिछले दस सालों में मैंने पूरी कोशिश की है कि मैं अच्छा लिखूँ। हर एक वाक्य को अच्छी तरह से लिखने की कोशिश की है। लेकिन सिर्फ यही काफी नहीं है। मैं अच्छी किताबें लिखता हूँ। आप भी अच्छी किताबें लिखती हैं, होमर ने भी लिखा, लेकिन सब कुछ जैसे का तैसा है। वहीं का वहीं। इसलिए मैं अपने आपको थोड़ा असहज, अशांत और बेचैन महसूस करता हूँ। खैर, हम लोगों ने काफी बातें कर ली

    श.म. –  बिल्कुल…

    ल.क. – क्या हमें खाने के लिए चलना चाहिए ?

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    (हमारी बातचीत का दूसरा दिन। हम सुबह मिले। इस बार हम होटल के कोर्टगार्ड कैफ़े में मिले और पेड़ों के नीचे बैठे। तेज धूप निकली थी लेकिन जल्द ही बारिश होने लगी। हम एक बड़े से छाते के नीचे बैठे और अपनी बातचीत को जारी रखा। उनकी पत्नी डोर्का व्यस्त थीं और बातचीत के दूसरे दिन नहीं आईं। दूसरे दिन लास्लो अपने साथ हंगेरियनअंग्रेज़ी शब्दकोश लेकर आए। ~ शर्मिष्ठा मोहंती)

    श.म. – आपने अपने उपन्यासों में एक खास भविष्य घोषणा (apocalyptic) की बात की है। लेकिन मुझे आपकी किताबों में एक खास तरह का विश्वास मिला है। सिर्फ धार्मिक विश्वास नहीं बल्कि हमेशा बने रहने वाला विश्वास।

    ल.क. – इस बारे में कुछ भी कहना आसान नहीं। आपको पता होगा कि थॉमस बर्न्हार्ड (प्रसिद्ध जर्मन कवि और लेखक) ने एक जगह कहा है , अगर कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त होता है तो हर मिनट हवाई जहाज पर अविश्वास करने वालों की संख्या बढ़ती है। मुझे लगता है कि ज़िंदगी का आख़िरी पड़ाव मृत्यु नहीं बल्कि मृत्यु का डर है। मैंने ढेर सारे दोस्तों, रिश्तेदारों और अपनी भाषा के वरिष्ठ लेखकों को खोया है। उनके पास ज़िंदगी के आख़िरी दौर में जीवन को लेकर नफरत या डर था। वे ज़िंदगी जीने में अपनी दिलचस्पी खो चुके थे। मैं इस बात को अच्छी तरह से समझ पाया हूँ कि किसी चीज़ में विश्वास करने का क्या मतलब होता है। चीन और जापान में मुझे सबसे पहले गूढ़ (transcendental) अनुभव हुए। लेकिन यह सवाल मेरे लिए बहुत ज़रूरी है। इन सभी अनुभवों के बाद मैं बहुत द्वन्द में था। तो, अब क्या होगा? लेकिन मुझे जवाब अब तक नहीं मिला। मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में अब भी कुछ पवित्र और पाक लोग हैं। इन लोगों में मेरा विश्वास भी है। लेकिन इन लोगों के विश्वास में मेरा विश्वास नहीं है। मैं सिर्फ लोगों में विश्वास कर सकता हूँ। यह मेरी स्थिति है। मेरा काम केवल उन लोगों को समझने की कोशिश करना भर है जो किसी चीज़ में विश्वास करते हैं। यह अपने आप में एक बड़ा काम है। उन लोगों को देखते हुए मैं यह गहराई तक महसूस करता हूँ कि मैं भी किसी चीज़ में विश्वास कर सकता हूँ बल्कि उन लोगों के साथ एक जुड़ाव महसूस करता हूँ।

    श.म. – मुझे बर्न्हार्ड के लेखन में बहुत अंधकार दिखता है।

    ल.क. – असल में बर्न्हार्ड ने इस दुनिया से बहुत नफरत किया, जो मैंने कभी नहीं किया। कभीकभी थोड़ा कर भी लेता हूँ। (हँसी) आज ही के दिन को देखिए। लगातार बारिश हो रही है। चारों तरफ हरियाली है। ढेर सारे प्यारे लोग हमारे आसपास हैं। असल में मैं बर्न्हार्ड को जानता था। उनके दादा एक पाक किस्म के आदमी थे। लेकिन बर्न्हार्ड का इस दुनिया से नफरत करना एक तरह से खुद को सुरक्षित रखने का तरीका था। वे भीतर से मजबूत नहीं थे। वे इस हद तक संवेदनशील थे कि उन्हें इस दुनिया के सीधे संपर्क में आने और रहने का खतरा लगा रहता था, जिसमें वे खुद को बचा नहीं पाते थे। इसलिए वे इस दुनिया से नफरत करते थे। जवानी के दिनों में वे बहुत बीमार रहे थे। उन्हें फेफड़े की बीमारी थी। लेकिन ऐसे ढेर सारे लोग होते हैं जिन्हें बीमारियाँ होती हैं। ये फेफड़े की बीमारी भी बहुत रोमांटिक बीमारी है। जर्मन साहित्य की दुनिया में इसे एक पवित्र बीमारी माना गया है। एक ऐसी बीमारी जो हमेशा महान या प्रतिभावान लोगों को हुई है। बर्न्हार्ड को मैं बहुत पसंद करता था। लेकिन मुझे हमेशा अपनी इस भावना को छुपाना पड़ा। अगर उन्हें पता चल जाता कि मैं उन्हें इस हद तक पसंद करता हूँ तो वे गुस्सा करते। इस तरह की भावना उनके लिए बहुत बेवक़ूफ़ाना होती। एक और बात, उनकी आत्मा में कभी विश्वास नहीं था। उन्होंने कभी लोगों पर विश्वास नहीं किया। उन्हें फेफड़े की नहीं बल्कि अविश्वास की बीमारी थी। आपने ठीक कहा कि मेरा अपना काम बहुत अलग है। बर्न्हार्ड मुख्यतः कवि थे लेखक नहीं। एक कवि हमेशा खुद के साथ काम करता है। मैं लेखक हूँ इसलिए पूरे ब्रह्माण्ड के साथ मेरा सम्बन्ध है।

    श.म. / क.म. – हम लोग कल शाम इसी संदर्भ में बात कर रहे थे, लगभग इन्हीं शब्दों में।

    ल.क. – दो महाद्वीप, यूरोप और भारत, किस हद तक एक दूसरे के करीब हैं यह सुनकर मुझे अच्छा लग रहा है। गद्य लेखन अपने आप में खुद से बाहर आने की एक संभावना है। (हँसी) इस दुनिया में मेरे अलावा ढेर सारे दिलचस्प लोग हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि मैं दिलचस्प नहीं हूँ पर दूसरे लोग मुझसे ज्यादा दिलचस्प हैं। मेरे पास ग़रीबी का एक लंबा अनुभव है। तीस साल का होने पर मैंने खुद को परिपक्व पाया। फिर एक दिन वह दिन भी आया जब खुद में मेरी दिलचस्पी कम होने लगी। उन्हीं दिनों अंकल जोसेफ में मेरी दिलचस्पी अचानक से बढ़ गई। और कुछ दूसरे मानवीय परिस्थितियों ने मुझे गहरे तक उदास किया। और फिर अचानक, मेरे दिमाग में स्पष्टता आई कि इन चीजों के बारे में लिखना है। इसमें समय लगा। धीरेधीरे मैंने अपने काम को समझा। मुझे वह उपन्यास पसंद नहीं जिसका लेखक के वजूद से सीधा सम्बन्ध नहीं होता। मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। लेकिन ये कवियों के साथ कुछ अलग होता है।

    एक कवि हमारे सामने खुली आत्मा की तरह होता है। अगर मुझे किसी चीज़ को गहराई तक महसूस करना है तो किसी कवि को पढ़ता हूँ। मैं गद्य और पद्य को बांटने वाली लकीर को अच्छी तरह से देख पाता हूँ।

    श.म.- मेरे हिसाब से आप हमारे समय के कुछ महत्वपूर्ण लेखकों में से एक हैं। मैंने महत्वपूर्ण शब्द का उपयोग बहुत सावधानी और सोचसमझ कर किया है। इतनी गहराई, कथन की क्षमता और भाषा की उत्कृष्टता जो कई बार कविता की तरह लगती है। साथ ही एक दार्शनिक गहराई भी। ये सारी विशेषताएँ किसी एक लेखक में मिलना बहुत मुश्किल है।

    ल.क. – लेकिन मुझे इससे दिक्कत होती है। इसके कारण मैं खुद को बहुत अकेला पाता हूँ।

    श.म. –  बेशक, मैं इसे समझ सकती हूँ।

    ल.क. – लेकिन मैं अकेला नहीं हूँ। अकेलापन मेरी समस्या नहीं है। हो सकता है कि सतान्तागो लिखने के दौरान खुद को रोमांटिक महसूस किया हो। लेकिन अब ऐसा नहीं है। यह गद्य लेखन का एक हिस्सा है। गद्य लेखक के तौर पर मेरी यह ज़िम्मेदारी है कि मैं इस दुनिया का एक सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत कर सकूँ। मुझे अपनी इच्छाओं के बारे में बात करते हुए डर नहीं लगता। यह मेरी इच्छा है कि मैं इस दुनिया का एक सम्पूर्ण चित्र खींच सकूँ। लेकिन इस सवाल का एक दूसरा हिस्सा भी है। मेरे लिए सबसे खतरनाक स्थिति वह है जब ये लगे कि मैंने कुछ समझ लिया है। कुछ पाने के लिए आपको किसी खजाने को खोजने की ज़रूरत नहीं है। बस आपको लगातार खोजना है। सोचना है। और यह कोई छोटा काम नहीं है। कई बड़े सवालों को लेकर मैं अब भी स्पष्ट नहीं हूँ। लेकिन यह काम मेरा नहीं है। मैं उपन्यासकार हूँ, दार्शनिक नहीं। पिछले कुछ सालों से मैं ने थोड़ा अलग तरीके से लिखना शुरू किया है। अपने शुरुआती उपन्यासों में, खास तौर से साल 2000 तक मैंने यह कोशिश की कि ज़िंदगी का कोई रूप दिखा पाऊं। उसके बाद मैंने यह महसूस किया और पता नहीं यह कहाँ तक ठीक है, लेकिन अब मैं चीजों को सम्पूर्णता में देख पाता हूँ। सवालों और जवाबों के बजाए मेरी दिलचस्पी इसमें ज्यादा है कि मैं संशय की स्थिति में बना रहूँ। पिछले पाँच सालों से मेरा मुख्य काम यही रहा है कि मैं खुद को संशय की स्थिति में रखूँ। किसी अंतिम निर्णय पर पहुँचने के बजाए अपने सवालों और जवाबों पर संशय करूं। मुझे यात्राएँ पसंद हैं। गलियों से गुज़रना पसंद है। और यह  सब कुछ करते हुए मेरे भीतर संशय ही रहता है। एक ऐसी क्षमता जिसमें मैं अपने दिमाग और ज़िंदगी को नियंत्रण में रखता हूँ। संशय की क्षमता अविश्वसनिय रूप से महत्वपूर्ण है। हम सभी बारिश को देखते हैं पर मेरी दिलचस्पी इसमें है कि बारिश असल में है क्या? या कोई बूंद किस तरह से दिखता है? क्या हमें कोई जवाब मिला? नहीं, हमें अब तक नहीं पता। अंतिम समाधान यही है कि उस संशय के द्वीप पर ही रहा जाए।

    मैं उस द्वीप पर बहुत आसानी से रह पाता हूँ। ऑलमोस्ट आइलैंड। (हँसी) लगभग एक द्वीप। एक ऐसा द्वीप जो किसी दूसरे द्वीप से बहुत कम जुड़ा हुआ है।

    श.म. – पूर्व के देशों में आपकी विशेष रुचि है। खास तौर से चीन और जपान में। पूर्व या पूर्व के देशों को आप खुद अपने लेखन में किस तरह से देखते हैं?

    ल.क.- मैं चीन गया क्योंकि मैं उन दिनों भारत नहीं जा सकता था। पुराने गणितज्ञों, दार्शनिकों ने मुझे हमेशा से भारत जाने के लिए प्रेरित किया। एक गैरमानव के चित्रण ने मुझे हमेशा भारत की तरफ आकर्षित किया। पर चीन ने उस तरह से आकर्षित नहीं किया। और जापान के बारे में यह कि जापान की संस्कृति बहुत दिलचस्प है। मैं हमेशा से उन जगहों पर जाना चाहता था जहाँ नागार्जुन जैसे दार्शनिक रहे हैं। जहाँ कई ज्योतिषाचार्य और कई धर्मों के प्रथम चिंतक रहे हैं। यह सब कुछ जानने के लिए कि मैं वहाँ हूँ जहाँ ये सारे लोग रह चुके हैं। सिर्फ यह जानने के लिए कि मैं वहाँ हूँ जहाँ बुद्ध रह चुके हैं। एक दुर्घटना के तहत 1990 में मैं मंगोलिया पहुँच गया। लेकिन वहाँ पहुँचने के बजाए मैं अमेरिका या पश्चिमी यूरोप जाना चाहता था। लेकिन मंगोलिया को देखना कुछ ऐसा रहा जिसकी पूरी पृथ्वी पर कल्पना करना मुश्किल है। वह बहुत अलग था। मंगोलिया पूर्वी यूरोप से कहीं ज्यादा कम्युनिस्ट शासन से प्रभावित रहा है। उन दिनों मंगोलिया में बहुत खराब समय चल रहा था। हर तरफ नाक फाड़ने वाली बदबू थी। हर चीज़ के भीतर एक गंध होती है, चाहे वह चाय हो या पानी। मैं उस समय का मानचित्र देख रहा था और तब मैंने फ़ैसला किया की मुझे चीन के पूर्वी हिस्से में जाना है। मैं और मेरे दोस्त ट्रेन से गोबी रेगिस्तान को पार करते हुए बीजिंग पहुँचे। बीजिंग में मैं गुयला के एक लड़के से मिला। मैं एक सम्राज्य का हिस्सा था लेकिन सब कुछ नहीं देख पा रहा था। मैं और मेरे दोस्त के लिए इतिहास का मतलब बहुत अलग था। एक ऐसा इतिहास जो किसी सीधी लकीर पर नहीं चलता। इस अनुभव ने मुझे मदहोश कर दिया। हम दोनों कान्टों और हांगकांग गए। उस दौरान मैंने चीन के बारे में अच्छाखासा पढ़ा। बूरी चीज़े भी। उन्हें भी जानना ज़रूरी था। उसके बाद फिर कई बार चीन गया। अभी कुछ साल पहले ही मैं जापान गया था। जापान में मेरे एक दोस्त हैं जिन्होंने एक फेलोशिप शुरू की थी। और वे लगातार इसके बारे में बात करते थे। वे फेलोशिप मेरे लिए किसी सपने जैसा था, कुछकुछ भ्रम की तरह। क्या यह वाकई सच है? मेरे दोस्त लगातार जापानी संस्कृति और राजनीति पर बात करते थे। मैं उनसे लगातार फोन पर पूछता थावहाँ के सड़कों पर आपको क्या दिखता है? वहाँ के लोग किस तरह से दिखते हैं? वहाँ पर आपको किस तरह के रंग दिखते हैं? मेरे दोस्त ने कहा कि मुझे इस फेलोशिप के लिए आवेदन करना चाहिए। मैंने फेलोशिप के लिए आवेदनपत्र भर दिया, यह कहते हुए कि मेरी विशेषज्ञता भविष्यरहस्य उद्घाटन अध्ययन (Apocalypse Studies) में है। और मुझे फेलोशिप मिल भी गई।

    जब मैं वहाँ गया तो उन्होंने मुझे बताया कि मेरी विशेषज्ञता ही मुझे फेलोशिप दिए जाने का सबसे बड़ा कारण है। मैं हँस नहीं सकता था क्योंकि जापान में आपको अपनी भावनावों को छिपाना पड़ता है। अपने पहले दौरे के दौरान क्योटो में मैंने नोहा परम्परा के एक गुरु के साथ लम्बा समय बिताया। वे एक निहायती पाक आदमी थे। उनका परिवार और कुछ दूसरे लोग उनके शिष्य थे। जापान ने मुझे बहुत प्रभावित किया। जापान में मैंने 200 से ज्यादा मंदिर देखे। हर मंदिर में सुंदर बगीचे और चित्र थे। सबसे बड़ी बात जापान का सम्पूर्णता का अपना सौन्द्रयशास्त्र है जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। अपूर्णता और सम्पूर्णता के बीच में एक खाली जगह है और वह जगह पागलपन की है। पागलपन की यह जगह बहुत दिलचस्प है। चीन की तरह जापान में रहते हुए भी मैंने जापान के बारे में बहुत कुछ पढ़ा। फिर मैं कई बार जापान गया।

    श.म.- आज के समय में आप उपन्यास विधा को किस तरह से देखते हैं ? क्या आपको लगता है कि यह अब एक थकी हुई विधा का रूप ले चुकी है?

    ल.क. – साहित्य की पुरानी विधाएँ संकट में नहीं है। दरअसल, संकट में हम हैं। साहित्य की सारी पुरानी विधाएँ अद्भुत हैं। प्राचीन ग्रीक के इतिहास और साहित्य को देखें तो वहाँ आपको कलाकार, कवि, नाटककार, दार्शनिक सब एक साथ मिलेंगे। उन्होंने कई अद्भुत विधाओं का इस्तेमाल किया। ये विधाएँ कभी संकट में नहीं रहीं। 5वीं सदी के बाद लोगों में एक गिरावट आने लगी। हेक्सामीटर अब भी दिलचस्प है। 5वीं सदी से 21वीं सदी तक। पर अब हम उतने दिलचस्प नहीं हैं। हमने नई विधाएँ इसलिए खोज निकालीं क्योंकि हम संकट में हैं। उपन्यास एक ज़रूरी विधा है बल्कि क्लासिक उपन्यास भी। लेकिन फ्लौबेर के समय से ही एक खास तरह का संकट देखने को मिलता है। 19वीं सदी के अंत में यह संकट और बढ़ गया। अब हम पुराने तरीके से लिखने की अपनी योग्यता को खो चुके हैं। अब हमें नयापन पसंद है। हम मानव जीवन को अभिव्यक्त करने के लिए नई विधाएँ और नई संभावनाओं को खोज रहे हैं।

    (क्रस्‍नाहोरकाई के फ्रेंच अनुवादक आ चुके थे। उन्हें लास्लो के किसी उपन्यास पर काम करने के लिए मिलना था। क्रस्‍नाहोरकाई ने अंतिम वाक्य के रूप में कहा, “तात्कालिक विदाई के बाद शायद फिर कभी मिलना हो।”)

    (साभार : almost island – monsoon 2012।  इस बातचीत को मूल अंग्रेज़ी में इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है:

     http://www.almostisland.com/monsoon_2012/pdf/an_island_of_doubt.pdf)

     

    ~: अनुवादक का  परिचय :~ 

    नाम- राकेश कुमार मिश्र

    जन्म तिथि : 22. 02.1990 

    जन्म-स्थल : छपरा (सारण), बिहार

     

    लम्बे समय से रंगमंच, साहित्य और अनुवाद की दुनिया में सक्रिय। ‘पक्षधर’, ‘परिकथा, शेष, ‘सवंदिया, ‘अकार, ‘आजकल, सदानीरा, ‘हिन्दवी’ और ‘इन्द्रधनुष में कविताएँ प्रकाशित। ‘पहल, ‘जानकी पुल, ‘हिंदी समय, ‘हिंदी टेक’ ‘मधुमतीऔर ‘दखल की दुनिया में अनुवाद प्रकाशित, हिन्दवी ब्लॉग, पहली बार ब्लॉग, ‘संवाद न्यूज़’ ‘ख़बरची, लोकमत समाचार, ‘डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट और RIC Journal में लेख, डायरी, नाटक और समीक्षा प्रकाशित। 2016 में नाटक उम्मीद का गीत का लेखन और निर्देशन।

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