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  • शहादत के संग्रह ‘कर्फ़्यू की रात’ पर पवन करण

    आज पढ़िए युवा लेखक शहादत के कहानी संग्रह ‘कर्फ़्यू की रात’ पर यह टिप्पणी। लोकभारती से प्राकाशित इस संग्रह पर लिखा है जाने माने कवि पवन करण ने- मॉडरेटर

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    एक रात वाली रात नहीं कर्फ्यू की ये रात। ये रात, रात-दर-रात बढ़ती चली जा रही है।

    भारत में हिंदू और मुसलमानों की धार्मिक पहचान, प्रार्थना-पद्धतियों, मान्यताओं, रीति-रिवाज, खान-पान और पहनावे में भले ही कुछ कम-ज्यादा भेद हो। मगर युवा कथाकार शहादत के दूसरे कहानी संग्रह ‘कर्फ्यू की रात’ की कहानियों को पढ़कर ये बात साफ तरह से उभरकर  सामने आती है कि घर-परिवार, माता-पिता  भाई-बहनों, पत्नी-बच्चों के प्रति दोनों की संवेदना में कोई अंतर नहीं। उसका स्तर दोनों के बीच समान है। दोनों ही अपनी जिंदगियों में एक जैसी जद्दोजहद कर रहे हैं। और परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर एवं विकल्प हीन होने के बावजूद एक-दूसरे पर परंपरागत रूप से आक्षेपक और आक्रामक हैं। घर और अपने मन के बाहर भले ही वे अलग दिखते हों मगर अपने घर और मन के भीतर वे एक सरीखे हैं। यही वजह है कि संग्रह की कहानियां पढ़कर लगता ही नहीं कि हम भारतीय मुसलमानों की जिंदगियों और परिस्थितियों से जुड़ी कहानियां पढ़ रहे हैं। मगर इसके बावजूद इन कहानियों की ख़ासियत भारतीय मुस्लिम समाज, परिवार और मानस की कहानियां होने में हैं।

    कितने गडमड  हैं हम संग्रह की किसी भी कहानी को पढ़िये लगेगा कि जैसे मुस्लिम नहीं किसी हिंदू परिवार की बात की जा रही है। या ऐसे परिवार और उसके जीवन की बात की जा रही है जो हिंदू परिवार से अलग नहीं या हिंदुओं जैसा ही है या ऐसा परिवार जिसे हम जानते हैं। जिसे हमने जिया और देखा है। आपको लगने लगता है, अरे ये सब तो यहां भी है तो वहां भी है। ऐसी ही निर्धनता, दरिद्रता, अशिक्षा, बीमारियां और जरूरतें दोनों की हैं । वह इसलिए भी कि भारत में व्याप्त निर्धनता और अशिक्षा के स्तर पर भारतीय हिंदुओं और मुसलमानों में ज्यादा भेद नहीं। भले ही वर्तमान समय में बहुसंख्यकवादी कट्टर और सांप्रदायिक राजनैतिक आक्रामकता के चलते बहुसंख्यकों का एक बड़ा समृद्ध और ताकतवर हिस्सा एक देश के अपने ही जैसे मुसलमान-नागरिकों के विरुद्ध उन्मादी हो और अल्पसंख्यक भयभीत और संयमित हों, तब भी हर स्तर पर भी एक दूसरे के प्रति अकारण-गुस्से, धार्मिक-पहचान-आधारित नफरत, और जीवन-केंद्रित शिकायतों का भाव बराबर है। मगर जैसा कि मैने कहा- संतोषजनक, संवेदनात्मक-तथ्यात्मकता यह है कि ये कहानियां भारतीय मुसलमानों की कहानियां या भारतीय समाज की परस्पर पहचान दिखातीं, कहानियों की तरह पढ़ने में आती हैं।

    एक युवा कथाकार भारतीय मुस्लिम समाज को किस तरह देखता है। उसके मन को को किस तरह पढ़ता है।  ये इस संग्रह की उल्लेखनीयता है। भारत के भारतीय मुस्लिम समाज के मन और जीवन में क्या चल रहा है। इस संग्रह की कहानियों को पढ़कर जाना जा सकता है। उसके लिए जिम्मेदार परिस्थितियों और उससे उत्पन्न हृदय को विचलित कर देने वाली पीड़ा से परिचित हुआ जा सकता है। मगर लेखक का बूता यह है कि संग्रह की सभी कहानियों में वह मुसलमानों के मन में हिंदुओं के प्रति नफ़रत बढ़ाने और कोई नई घृणा उपजाने या उन्हें अपराधी बताने का प्रयास नहीं करता। वह इस परिस्थितिजन्यता से बखूबी परिचित है। जबकि वर्तमान में इसके लिए हिंदुस्तान के भीतर सांप्रदायिक राजनीति ने ऐसी जबरदस्त परिस्थितियां पैदा कर दी हैं। जिसका अनैतिक और हिंसक समर्थन करने के लिए उन्हें आसानी से कठघरे में खड़ा किया जा सकता है।

    वह सांप्रदायिक दंगों की बात करता है मगर भारतीय पुलिस की कार्रवाईयों में अल्पसंख्यकों के प्रति प्रश्नांकित प्रामाणिकताओं को रेखांकित नहीं करता। वह केवल वृहद-विविध भारतीय समाज के एक हिस्से के रूप जीवन जी रहे मुस्लिम जीवन की बात करता है। जिसके उदाहरण के रूप में कर्फ्यू की रात कहानी पढ़ने में आती है। जिसमें चंद अत्यंत निर्धन रोज-कमाने खाने वाले परिवार कर्फ्यू की वजह से अपने परिवारों पर संकट की तरह आ पड़ी फाकाकशी की बात करते हैं और कहानी के अंत में कितने साधारण और कमजोर साबित होते हैं। जबकि उन्हें जेहादियों से जोड़ने में तनिक भी संकोच नहीं किया जाता। प्रश्न यह भी पैदा होता है कि हम जिनसे लगातार नफ़रत किये जा रहे हैं वे अपने जिंदगी में पेट भरने के लिए कितनी जद्दोजहद कर रहे हैं। वस्त्र, दवाइयां, बच्चों की किताबें और बुजुर्गों की आंखों पर चढ़ने वाले चश्मे तो बाद में आते हैं। संग्रह की एक भी कहानी ऐसी नहीं जिसमें धार्मिक कट्टरता बढ़ती पनपती मिलती हो। बस पहचान है। जीवन-पद्धती है। फिर पहचान और पद्धति को किस आधार पर कट्टर माना और कहा जा सकता है। फिर वह किस धर्म में नहीं है।

    कौन सा धर्म अपनी मान्यताओं और सबके बीच  पहचानी जातीं जीवन प्रणालियों से अधूरा है?

    आप हिंदू-मुस्लिम कहकर अपनी बात कहने से लाख बचने की कोशिश करते हों मगर  ‘कर्फ्यू की रात’ को पढ़ते हुए इस पर पाठकीय प्रतिक्रिया देने के क्रम में आप -हिंदू-मुसलमान’ इस संबोधन का उल्लेख करने से खुद को नहीं बचा सकते। कारण इस संग्रह की अधिकतर कहानियां जिनमें एक कहानीकार के रूप से कहीं अधिक, एक चेतनासंपन्न और दृष्टिवान भारतीय युवा की तरह शहादत चलते-बढ़ते हैं, भारतीय मुस्लिम समाज के ऐसे परिवारों की कहानियां हैं जो हिन्दुस्तान में एकपक्षीय, अनुदारवादी और सामाजिक समरसता की संहारक, राजनीति और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित, दलितों के प्रति जैसी अमानवीयता, घृणा और हिंसा के मुख्यत: शिकार होते हैं। मुल्ला-मौलवियों-मरकजों के बीच फंसे अधिकतर निर्धन-अल्पशिक्षित, मजदूर-मिस्त्री, कारीगर-फेरीदार यानि रोज कमाने खाने वाले वे भारतीय मुसलमान जिनकी सामाजिक स्थिति दलितों से जुदा नहीं है।

    बंदिशें बाग़ी बनाती हैं। शहादत की कहानियों में स्त्री जीवन का वैविध्य विचारणीय है। उनकी कहानियों की स्त्रियों में खुद को लेकर छटपटाहट है। उनकी कहानियों की स्त्रियां किसी भी धर्म की स्त्रियों जैसी हैं। धर्म न तो उनका जीवन बदल पाता है। न हालात। वे दोनों तरफ एक सी हैं। मात्र थकतीं-हारतीं, घुटतीं-मिटतीं स्त्रियां। जिसका उदाहरण बनकर संग्रह की पहली कहानी ‘आज़ादी के लिए’ पढ़ने में आती है। मगर इसके बावजूद यहां उल्लेखनीय यह मिलता है कि अपनी कहानियों में शहादत स्त्रियों को मुक्ति दिलाते और उन्हें मुक्ति हासिल करने के लिए उन की खुद की कोशिशों से उकसाते चलते हैं। चाहे वह ‘आजादी के लिए’ कहानी की अम्मी की सहेली हो अथवा ‘बांझपन’ की शायरा या पत्नी को छोड़कर अपनी प्रेमिका के साथ भागने को तैयार प्रेमी से पहले ही अपने प्रेमी के साथ भाग चुकी ‘पत्नी और प्रेमिका’ कहानी की पत्नी या अपनी शादी के लिए कुछ-कुछ समझदार दिखते मौलवी के साथ पहली रात बिताने वाली औरत।

    अन्य धर्मों की तरह धार्मिक आधार पर पहले से ही कट्टर और एक-दूसरे के धर्म को लेकर फैलीं अफवाहों और दृढ़ताओं को लेकर और भी कट्टर होते जाते मुस्लिम समुदाय में पसरी-पलती जहालत को लेकर शहादत उन कथनों को सबके सामने रखने में कतई पीछे नहीं हटते जो उनकी ही पहचान में उनकी उपस्थिती को असहनीय बना सकता है। समाज की कई परतों, तहों, पहलूओं को टटोलती निरपेक्ष स्तर पर उनकी वैचारिक निडरता उन्हें स्पष्टता से अपनी बात कहने का इसलिए भी साहस प्रदान करती है क्योंकि कहने के स्तर पर वे अपनी कहानियों के पात्र बन जाते हैं। कहीं दृश्य और कहीं अदृश्य जिसके चलते उनकी कहानियों का मुख्य आधार हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता नहीं। हिंदू-मुस्लिम में बंटा भारतीय समुदाय है। समाज है। अपनी कहानियों में कहानी के किसी चरित्र में ढल जाते शहादत जैसे हिंदू-मुस्लिम युवाओं की समाज को लेकर समझदार दृष्टि पर विश्वास करके अपने विवेक पर भरोसा किया जा सकता है।

    विविध दृश्यों से भरी शहादत की कहानियों की भाषा रोजमर्रा की, सबके बीच बरती जाने वाली भाषा है। साहित्य की भद्रलोक-भाषा से फिलहाल उनका कोई जुड़ाव नहीं दिखता। उनका जुड़ाव समाज से है। जिनके बीच उनकी भाषा कथन में तब्दील होकर कहानी की शक्ल में हमारे सामने आती है। वे अपनी कहानियों को सजाते नहीं। न तो वे अपनी कहानी के द्वार पर स्वागत के लिए बंदनवार टांगते है न हीं उसके निकास पर कहानी पढ़कर निकलते पाठक को चौकते हुए देखना चाहते हुए हाथ मिलाकर प्रशंसा की गर्मी महसूसते हुए उससे विदा लेते हैं। अपनी बात कहते जाते किसी व्यक्ति की तरह वे भी अचानक उठकर चल देते हैं। इस अंदाज में जितना कह दिया, वही पूरा है। आगे आप सोचिए।  उसे बात का अंत मानिए अथवा बात का छूट जाना।

    अन्य की जगह अधिकतर स्वयं से बात करतीं संग्रह की कहानियों से कुछ पंक्तियां, पढ़ने के दौरान जिनसे आपकी भी मुलाकात होगी-

    ईश्वर के बाद धार्मिक लोग ही आम इन्सान को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। * क्या उसके दिल से ख़ौफ़-ए- ख़ुदा निकल गया था।

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    इस्लामिक समुदायों के आपसी झगड़ों और रिवाजों पर बात करना अंतहीन बहस को जन्म देना है। * जिन लोगों में सुनने का धैर्य होता है। वे दूसरों से कहीं आगे होते हैं।

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    आज हर घर में आपको एक शख्स हाफ़िज-ए-क़ुरान, मौलाना या आलिम जरूर मिल जायेगा।

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    ज़रूरत से ज्यादा देनदारी आपको पालतू कुत्ते में तब्दील कर देती है। जिनकी जंजीरें मौलानाओं के हाथों में होती हैं। वे जिस तरफ़, जिधर चाहें अपने फ़ायदे के लिए इन कुत्तों को दौड़ा देते हैं

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    तुम लोग सिर्फ़ हूरों और सोने-चांदी के महलों के लिए नमाज पढ़ते हो…अल्लाह के लिए नहीं। यानि तुम भी लालची हो … अय्याश। इन्सान को अच्छी जिंदगी, ख़ूबसूरत औरतों के लालच और जहन्नुम के अज़ाब का डर दिखाकर गुलाम बनाया जा सकता है

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    मुहब्बत में अपनी मुश्किलें आपको तकलीफ नहीं देतीं। पर जिन्हें आप प्यार करते हैं उनकी तकलीफें आपसे बर्दाश्त नहीं होतीं।

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    लड़कियां अपनीं फितरत में डाक्टर होती हैं। एक से मर्ज़ बिगड़ जाये तो दूसरी से आराम मिल जाता है

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    भारत में लोकतंत्र का उत्सव तो आया मगर वह मुसलमानों के लिए मौत का पैगाम लाया

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    हम खुलकर कभी नहीं कह सकते कि हम मुसलमान हैं

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    अब समुदाय में लोग डाॅक्टर, इंजीनियर, मेकेनिक, टीचर, लेखक या फिर पेंटर नहीं होते। अब केवल मुसलमान होते हैं

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    चुनाव हो रहे हैं तो दंगा भी होगा। ये चुनाव नहीं होने चाहिए। सब चुनावों का ही किया-धरा है। न ये होते न दंगे भड़कते और न हमारा ये हाल होता।

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    हमारा वोट नहीं चाहिए। मना कर दो। हम नहीं जायेंगे। इस तरह हमें बर्बाद और कत्ल करने की क्या जरूरत?

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    दंगा हुआ। वे पलक झपकते ही घरों से राहत शिविरों में जा पहुंचे

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    पवन करण

    कहानी संग्रह – कर्फ्यू की रात

    कहानीकार – शहादत

    प्रकाशक-लोकभारती प्रकाशन

    प्रकाशन वर्ष-2024

    संग्रह का मूल्य-250/- रूपये

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