आज पढ़िए प्रज्ञा की कहानी। यह कहानी वनमाली कथा के मार्च अंक में आई थी। कहानी जैसे हमारी संवेदनाओं को झकझोर कर जगाने वाली लगी। इसलिए आप लोगों से साझा कर रहा- मॉडरेटर
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‘आशंका’ कुछ होने और न हो पाने के बीच की चिंतातुर मनःस्थिति का नाम है और मैं पिछले कुछ दिनों से इसी मनःस्थिति की शिकार हूं। दरअसल मेरे अखबार के संपादक ने मुझे एक मुश्किल में डाल दिया है। इस मुश्किल से भागना भी आसान नहीं है। ऊपर से संपादक इतने चतुर हैं कि अपने सुदीर्घ अनुभव से वे मेरे मना करने और कोई चोर रास्ता खोज निकालने का बंदोबस्त पहले ही करके तैयार थे-
‘‘मैं जानता हूं पूर्वा पूरी टीम में से एक तुम्हीं हो जिस पर भरोसा किया जा सकता है।’’
उनका यह ब्रह्म वाक्य एक स्थायी भाव की तरह बरसों-बरस से इस्तेमाल होता आया है बस बदलता है तो टीम का व्यक्ति यानी विषय। इस वाक्य में ‘तुम्हीं’ और ‘भरोसे’ पर विशिष्ट भाव का बलाघात रहता जिसे उनकी अपलक देखती आंखें बहानेबाजी के सारे रास्ते बंद कर देती हैं। क्या सीनियर, क्या जूनियर और क्या ट्रेनी-तीनों को ही उन्होंने इस भरोसे की लाठी से जब-तब पीटा है। ट्रेनी तो हां में हां मिलाकर कोई भी किला फतह करने को तत्पर रहता है पर हम जैसे जूनियर्स को भी कई बार ‘मन न भावै मूड मटकावै’ का भाव रखना ही पड़ता है। नौकरी अस्थाई भले हो पर उससे दुनिया में रंग तो बने रहते हैं। तो कुछ दिन पहले की बात है मुझे संपादक ने अपने केबिन में बुलाया और ब्रह्म वाक्य दोहरा दिया। मैं इधर-उधर न देख पांऊ इसलिए उन्होंने अपनी निगाहें मेरी निगाहों में पूरी उतार दीं। मैंने सिर हिलाया और बाहर आ गई। पता नहीं सही जवाब और सही नकार और सही तर्क ज्यादातर समय गुजर जाने के बाद ही क्यों सूझते हैं। मुझे भी अपने ऊपर बेहद गुस्सा आया कि समय रहते मना क्यों नहीं कर पाई। अब करो तैयारी। काम कैसा हो अंजाम उत्तम ही चाहिए रहता है संपादक को। मैं समझ गई संपादक को सम्मोहन विद्या का ज्ञान है। हमेशा ऊंची कुर्सियों पर बैठने वालों में जन्मजात प्रतिभा की तरह होता है -सम्मोहन।
कल जबसे मैंने संपादक के काम की दिशा में स्वयं की जांच-पड़ताल की तो खुद को कोरा पाया। बिल्कुल कोरा तो नहीं कह सकती पर लगभग कोरे वाली ही स्थिति थी। बार-बार संपादक के शब्द मेरे दिमाग में बिजली की तरह कौंध रहे थे और कौंध के बाद वाली गर्जना की कल्पना मेरी आशंका को और मजबूत कर रही थी।
‘‘देखो पूर्वा! ये मोबाइल नंबर है। इस नंबर से तुम्हें मशहूर कवि शंशाक निकेत जी की पत्नी कल्पना को खोजकर एक इंटरव्यू फिक्स करना है। शंशाक जी जीवित होते तो अगले माह बाद सौ बरस के होते। हम अगले माह इस इंटरव्यू को छापेंगे। देखो! इतना महत्वपूर्ण कवि जिसके बिना हिंदी भाषा बेजान और साहित्य अधूरा है उसके बारे में कुछ अच्छा पढ़कर जाना। ऐसे सवाल तैयार करना कि शशांक निकेत जी की समूची यात्रा बढ़िया ढंग से सामने आ जाए। उनको गुजरे जमाना हो गया पर आज भी ये कवि पाठकों की पहली पसंद हैं। नए पाठकों के लिए तुम्हारा काम बहुत मायने रखेगा…मैं जानता हूं पूरी टीम में से एक तुम्हीं हो जिस पर भरोसा किया जा सकता है।’’ एकसाथ इतने कामों और उत्तम परिणाम के दबाव के बोझ तले आकर मैंने बिना देर गंवाए संपादक द्वारा दी गई चिट पर लिखा नंबर मिलाया। काफी कोशिश करने के बाद अंततः नंबर तो मिला पर वह कल्पना निकेत जी का नंबर नहीं था। फोन पर मर्दाना आवाज थी-
‘‘ आपको ये नंबर कहां से मिला? और क्या बात करना चाहती हैं आप कल्पना जी से?’’
‘‘ जी दरअसल मैं कवि शशांक निकेत जी पर उनका एक इंटरव्यू करना चाहती हूं।’’ मैंने भी प्रश्न की तर्ज पर उत्तर संक्षिप्त रखा।
‘‘ किसने कहा है आपसे? कहां के लिए है ये?’’ अबकी बार फिर एकसाथ दो सवाल आए जिनका मैंने तसल्लीबख्श जवाब दिया। आवाज ने बिना परिचय दिए मुझसे संशयग्रस्त होकर और भी कई सवाल किए। मैं अपनी क्षमता मुताबिक जवाब देती रही फिर आवाज ने मुझे अगले दिन फोन करने के लिए कहा। मैं इंतज़ार के अतिरिक्त भला और क्या कर सकती थी। अगले दिन भी कई बार के बाद कोशिश कामयाब हुई तो एक नया नंबर मुझे मिला। मैंने नंबर मिलाया इस बार भी कोई स्त्री स्वर सुनाई नहीं दिया। फिर से मर्दाना स्वर। फिर से अनेक सवाल और फिर से एक और दिन का इंतजार। अखबार के ऑफिस में कोई न कोई काम हमेशा लगा रहता है। डेडलाइन की तलवार भी सिर पर झूलती ही रहती है। मुझे एक हफ्ते से चल रहे कालिदास नाट्य उत्सव में युवा निर्देशकों को कवर करती अपनी स्टोरी फाइल करनी थी। मैं उसमें लग गई। उत्सव के तमाम फोटोज़ के लिए मैंने पहले ही अपने साथी फोटो जर्नलिस्ट से कह दिया था। स्टोरी के साथ फोटो अरेंज करके पेज का ले आउट तैयार करना भी अभी बाकी था।
मेरी निराशा को धता बताता तीसरे दिन मोबाइल गूंजा तो कल्पना जी का बताया गया दूसरा नंबर जिसे मैंने कल्पना निकेत 2 के नाम से कांटैक्ट लिस्ट में सेव किया था स्क्रीन पर चमका। मैंने तुरंत फोन उठाया पर तीसरी बार भी बात कल्पना जी से नहीं हो पाई। कल वाले पुरूष स्वर ने ही परसों एक घंटे का समय मेरे लिए फिक्स कर दिया। उनका नाम विहान था। आज मैंने अपने टास्क की पहली पायदान पर कदम रख लिया था। अब मैंने प्रश्नों की फेहरिस्त की दिशा में काम किया। और जब शशांक निकेत जी के बारे में पढ़ना शुरू किया तो इतने कविता-संग्रह देखकर मैं चौंक गई। कुछ कविताएं तो मुझे भी याद थीं पर अफसोस हुआ कि मैंने उन्हें कितना कम पढ़ा है। जल्दी-जल्दी उन पर आधारित संस्मरण पढ़ डाले। कुछ सवाल वहीं से मिल गए। इसी उलट-पुलट के दौरान मुझे कल्पना निकेत जी का लिखा हुआ एक संस्मरण भी मिल गया। उनके कुछ कवितांश भी मिले तो लगा मेरी खोज पूरी हुई। इतने में तो मेरा काम चल जाना चाहिए। सब कुछ नोट करके पंद्रह-बीस सवाल तैयार किए और निश्चिंत हो गई। पता,लोकेशन सब मुझे विहान जी ने भेज ही दिए थे।
कल्पना निकेत जी का घर शहर के एक पॉश इलाके में था। पॉश इलाकों के घर यानी माहौल में घुली पुरानी पूंजी की नफासत और नज़ाकत। शब्द का संकोच और वैभव का विस्तार। मैं जानती थी वहां मकान खरीद पाना आम आदमी के लिए दिवास्वप्न था। एक तो पहली बार किसी से मिलने, काम की बात निकालकर लाने का दबाव मुझ पर था फिर पॉश इलाकों में जाने की मेरी पुरानी घबराहट दोनों ही मेरे साथ थीं। कैब ड्राइवर को मैंने लोकेशन पहले ही भेज दी थी। तकरीबन घंटा भर बाद गाड़ी ने पॉश इलाके में कदम रखा। भव्यता सब तरफ बिखरी थी पर मेरे लिए भव्यता का भय बड़ा था। आलीशान मकानों के सामने से गुजरने और कल्पना जी के वैभव की कल्पना ने मुझे और थर्रा दिया। मैं खुद को संयत करने की कोशिश में ही थी कि गाड़ी आलीशान मकानों की गलियों से गुजरकर एक संकरी-सी गली में घुस गई। हैरानी से मेरी आंखें चौड़ी हो गईं। सामने चालीस-पचास गज के तिमंजिला फ्लैट्स थे। पीली पुताई पर सीलन के धब्बों और अनेक मौसमों की काई झेलती दीवारें मेरे सामने थीं। ये फ्लैट्स काफी पुराने लग रहे थे। सड़कें भी जर्जर थीं। ड्राइवर ने एक जगह गाड़ी रोक दी। मैंने इधर-उधर नजरें घुमाईं तो सामने पार्क की दीवार पर लाल रंग से मकान नंबरों के साथ दिशासूचक चिह्न बना था। मैंने पता मिलाया तो नंबर उनमें शामिल था। ड्राइवर को किराया देकर मैं आगे बढ़ी तो पाया उस जगह के अनेक फ्लैट्स वीरान पड़े हैं। कुछ हिस्सों में नई पुताई की जगमग थी तो कुछ बिल्कुल पुरातन अवस्था को ढो रहे थे। आलीशान मोहल्लों के अपने अंधेरे भी होते हैं। बहरहाल पॉश एरिया की मेरी बेचैनी का तो अंत हुआ पर कल्पना जी मुझसे कितना खुल पाएंगी ये आशंका बरकरार थी।
कल्पना जी का घर तीसरी मंजिल पर था। मैं अपने प्रश्नों के विषय में सोचते हुए सीढ़ियां चढ़ रही थी। हर मंजिल पर तीन फ्लैट्स थे। जीने की तरफ बाईं ओर एक और दाहिनी तरफ दो। कुछ फ्लैट्स में साफ-सफाई के लिए कामवालियां जल्दी-जल्दी काम निबटा रही थीं। दूसरे जीने पर तीनों मकान वीरान से लगे। दाहिनी तरफ के मकानों के आगे पुराने कार्टन्स और कूड़ा-कर्कट बिखरा था। लंबे समय की उपेक्षा से दीवारों पर जगह-जगह जालों और धूल-धक्कड़ की यारी निभ रही थी। तीसरी मंजिल पर मेरे कदम बढ़े तो यांत्रिक ढंग से मेरे हाथों ने बालों में एक कंघा-सा मार दिया। मैंने बैग से पानी की बोतल निकालकर एक घूंट पानी पिया। तीसरी मंजिल पर जीने की ओर वाले फ्लैट पर पड़ा ताला वहां वर्षां की वीरानी को ढो रहा था। दाहिनी तरफ दोनों घरों में से पिछला फ्लैट कल्पना निकेत जी का था। नीचे के सभी फ्लैट में मेन डोर था पर यहां डोर से पहले गलियारे में लोहे का जंगला लगा था। अंदर झांकती दीवारों का रंगरोगन पुराना पड़ चुका था। मैंने जंगले से बाहर लगी डोरबेल बजाई। कुछ सेकेंड बीते पर कोई हलचल न हुई। मेरी आंखें उस छोटे-से गलियारे में लगे चित्रों को देखने लगीं। गलियारे की दीवारों पर कई चित्र फ्रेम में जड़े हुए लगे थे। गोंड और मंडला आर्ट के ये चित्र थे। एकदम नीचे जूतों के छोटे रैक के पास ही चिन्हारी कला के कुछ पीस भी दीवार पर लटके थे। मैंने कुछ पल के इंतजार में पूरी पड़ताल कर डाली। दूसरी बार फिर घंटी बजाई। इस बार दरवाजे तक आती पदचाप सुनाई दी और दरवाजा खुला। टी शर्ट-लोअर में चालीस के आसपास के एक आदमी ने जंगले के दरवाजे के पास आकर मेरे आने का सबब पूछा। मैंने नाम-काम बताया तो मालूम पड़ा कि यही विहान हैं जिन्होंने ये मुलाकात संभव करवाई। आश्वस्त होकर उन्होंने जंगले का दरवाजा खोला मैं उनके पीछे हो ली। मेरी निगाहें मछली की आंख के लक्ष्य सरीखी घर के भीतर प्रवेश के साथ ही कल्पना जी को ढूंढने लगीं। एक गलियारे से मैं गुजरी जिसके शुरू में ही एक कमरा था। जिसमें एक सोफे पर कुछ कुशन रखे थे। मैं रूकी पर वह व्यक्ति आगे बढ़ गया। गलियारे के अंत में ही दूसरा कमरा था। मुझे बाहर से उसमें पड़े बैड की झलक मिल गई। भीतर आई तो बैड पर एक कृशकाय आकृति को मैंने बैठा पाया।
‘‘यही कल्पना जी हैं।’’ विहान नाम के उस व्यक्ति ने जिस तरह धीमे स्वर की गंभीर मुद्रा में कहा मैं समझ गई इन्हें शब्दों की फिजूलखर्ची नापसंद है। मैंने हाथ जोड़कर कल्पना जी को नमस्कार किया जिसके एवज में कल्पना जी न हंसी और न ही मुस्कुराईं। वे बस मुझे गौर से देख रही थीं। विहान उनके बैड के कोने में बैठ गए। कल्पना जी पहले से ही बैठी थीं। मैं कहां बैठूं समझ नहीं पा रही थी। अभी तक किसी ने मुझे बैठने के लिए कहा भी नहीं था। कमरे के सन्नाटे को तोड़ते हुए मैंने ही बात शुरू की। अपने बारे में बताया। कल्पना जी की मुखमुद्रा अब भी बेहरकत-सी थी। मुझे अंदेशा हो गया कि इन्हें सहज कर पाना असंभव नहीं तो जटिल जरूर रहेगा। पूरा कमरा मेरे अजनबी होने का चरम संकेत कर रहा था।
‘‘ किसने भेजा है आपको?’’ कल्पना जी पहली बार बोलीं। देह जरूर दुबली थी पर आवाज कभी बहुत जानदार रही होगी ये आवाज की दृढ़ता ने मुझे बता दिया।
‘‘ जी मेरे अखबार के संपादक ने नंबर दिया था वो ….’’
‘‘ क्या वो मुझे जानते हैं?’’ मेरी बात को बीच से काटकर उन्होंने दूसरा सवाल खड़ा कर दिया।
‘‘ शशांक निकेत जी के बारे में आपसे बात करने के लिए आई हूं।’’ मैंने सहमा-सा जवाब दिया।
उन्होंने पहली बार मेरे चेहरे पर अपनी निगाहें गढ़ा दीं। दो क्षण के मौन के बाद उन्होंने पास रखे एक स्टूल की ओर इशारा करके बैठने के लिए कहा। जाहिर है पहले मुझे स्टूल पर रखे फोटोफ्रेम को कहीं और रखना था। उन्होंने इशारे से ही मुझे उसे टेबल पर रखने का संकेत दिया। मेरे हाथ में एक बहुत सुंदर स्त्री की तस्वीर थी। लंबे बाल और चौड़ा माथा। ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों में सुंदरता अधिक निखरकर आती है। टेबल पर कुछ और तस्वीरें भी थीं। एक अन्य स्त्री की तस्वीर थी और एक में शशांक निकेत जी किसी वृद्ध महिला के साथ थे। मैंने शुक्र मनाया चलो मुझे बैठने की जगह तो मिली पर सवालों को सिलसिला कब और कैसे शुरू होगा यह शंका बराबर बनी हुई थी। मैं स्टूल पर बैठ गई। मैंने उनकी ओर देखा। कमरे में तीन लोग थे पर सिर्फ पंखे की आवाज ही बनी हुई थी। कल्पना जी के सफेद बाल कंधों पर फैले थे। वे ढीले-ढाले सूट में बैठीं थीं। चेहरे का रंग उजला था पर झुर्रियां उनके लंबे अनुभव की तसदीक कर रही थीं। कुल मिलाकर बुढ़ापे में भी वे एक आकर्षक स्त्री थीं।
‘‘ कल्पना जी! मेरे कुछ सवाल हैं आपसे। यदि इजाजत हो तो बात शुरू करें।’’ मैंने समय गंवाना उचित नहीं समझा।
‘‘ आपने पढ़ा है शशांक निकेत जी को? क्या जानती हैं उनके बारे में।’’
मेरी विन्रमता के एवज में उनके दोनों सवालों में एक तुर्शी शामिल थी। मुझे उस वक्त ऐसा लगा जैसे मैं किसी मौखिक परीक्षा में बैठी थी। उनके सवालों का संतोषजनक जवाब देते हुए मुझे लगने लगा ये तो उल्टा ही हो गया। कल्पना जी ने मेरा इंटरव्यू करना शुरू कर दिया। जवाब देते हुए मुझे संपादक पर गुस्सा आने लगा कि कहां फंसा दिया उन्होंने। इतना तो मैं समझ गई थी कि कल्पना जी से जवाब निकलवा पाना टेढ़ी खीर है। भीतर के उबलते भावों को मैं अपने चेहरे की सहजता और धैर्य की रेखाओं से संतुलित करने की भरसक कोशिश कर रही थी।
‘‘ठीक है पूछिए…क्या जानना चाहती हैं।’’ कल्पना जी ने मेरे उत्तर सुनकर कुछ संतुष्ट-असंतुष्ट स्वर में कहा।
मैं चौंककर उन्हें देखती रह गई। मेरी निराशा के कुहासे को उनके शब्द छांटते-से लगे। मैंने आई-सी रिकॉर्डर और आईपैड निकाला। रिकॉर्डर को उनके नजदीक रखा और आईपैड में दर्ज सवाल खोल लिए। बीते पंद्रह मिनट में मुझे लग गया था कि मेरे सवालों को पर्याप्त समय नहीं मिलेगा इसलिए मैंने निजी जिंदगी के शुरूआती सवालों से हटकर सीधा शशांक निकेत जी की चर्चित कविताआें पर बातचीत शुरू कर दी। कल्पना जी की आंखों में पहली बार तरलता छांकी। मैं उत्साहित हुई लगा बातचीत सही ट्रैक पर आने का यह अच्छा संकेत है।
‘‘ निकेत बहुत अच्छे कवि थे। उन्हें सबका बहुत प्यार मिला। बड़ा नाम कमाया। उनकी कविताएं बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में छपती थीं।’’ जब तक वे बोलीं मैं बाहर से सिर हिला रही थी पर जब वे रूक गईं तो मेरे भीतर की बेचैनी ने सिर उठाया। मैं उनसे कुछ नया अनूठा जानना चाह रही थी पर जो संक्षिप्त से जवाब आए वो तो निकेत जी के बारे में कोई भी बता सकता था। दूसरी तरफ के मौन को तोड़ते हुए मैंने उन्हें निकेत जी की अच्छी लगने वाली कविताओं के बारे में पूछा। मौन बना ही रहा। बातचीत को चलते देख विहान कमरे से निकल गए। अब कमरे में हम दोनों ही थे। मैं कुछ देर इंतजार करती रही कि वे आगे कुछ और बोलेंगी पर वे खामोश बनी रहीं जैसे कुछ याद करने की कोशिश कर रही थीं। मैं जानती थी अर्सा हो गया निकेत जी को गुजरे और जिस तरह से कल्पना जी दिखाई दे रही हैं लग नहीं रहा था वे कहीं बाहर-आती जाती भी होंगी। अचानक मुझे चौंकाते हुए उन्होंने बोलना शुरू किया-
अचानक मुझे चौंकाते हुए उन्होंने बोलना शुरू किया जैसे कोई स्मृति कौंध गई हो –
‘‘ पूर्वा! आपने ‘दरख्तों से झांकती रौशनी’ कविता पढ़ी है?’’
‘‘ जी हां, इस शीर्षक से एक कविता तो मैंने इंस्टा पर पढ़ी थी और उसकी रील भी बड़ी वायरल हुई थी। ये तो हमारी जनरेशन में बड़ी चर्चित कविता है-
‘‘दरख्तों से झांकती रौशनी
चांद जैसे ख्वाब हैं’’
यही न? मैंने राहत की सांस ली कि मुझे ये दो पंक्तियां याद रहीं।
‘‘ जहां आपने ये पंक्तियां या कविता पढ़ी वहां ये नहीं बताया कि ये किसने लिखी थी?’’ कल्पना जी की आंखें एकदम गंभीर होकर मेरे चेहरे पर टिक गईं।
‘‘ नहीं उस रील में ये तो नहीं था… आप जानती हैं किसने लिखी है?’’ एक क्षण पहले के मेरे आत्मविश्वास की धज्जियां उड़ गईं। मैंने अपनी याददाश्त पर जोर मारा पर कुछ हासिल नहीं हुआ। पर मेरी बुद्धि ने निकेत जी की ओर इशारा किया-
‘‘ये तो निकेत जी की कविता है न?’’
‘‘नहीं,उनकी नहीं ये शायद मेरी पुरानी कविता है।’’ कल्पना जी ने मेरे हर प्रयास को न सिर्फ विफल किया बल्कि मुझे गहरे आश्चर्य में डाल दिया।
‘‘आपकी? पर सोशल मीडिया पर तो…ऐसा…कुछ….’’ कहते हुए मैं झेंप गई। इतनी चर्चित पंक्तियों को रचने वाली मेरे सामने बैठी हैं। जिसके बारे में मैं ही क्या अधिकांश लोग अनजान हैं। मुझे कल्पना जी कुछ सोचती हुई लगीं तो मैंने अपनी बातों से कुछ लीपापोती-सी की और फिर अपने टास्क को पूरा करने के लिए एकदम व्यावहारिक होकर अगला कदम उठाया।
‘‘ कल्पना जी! निकेत जी किस तरह के इंसान थे? परिवार को लेकर उनका क्या रूख था? अक्सर कहते हैं कि बड़े लेखक अपनी दुनिया में रमे रहते हैं कम बोलते हैं। क्या निकेत जी भी ऐसे ही थे?’’
‘‘ मैंने लिखा तो है संस्मरण में तुमने पढ़ा नहीं वो? उनके बारे में सब लिखा है।’’
‘‘पढ़ा तो था पर आप बताएंगी तो और अच्छा लगेगा।’’ मैंने उन्हें कुछ और खोलने की कोशिश की।
‘‘पूर्वा! सब तो लिख ही चुकी हूं। बहुत अच्छे इंसान थे निकेत जी। बड़े कवि थे। दुनिया में आज भी उनका नाम है और ये नाम हमेशा रहेगा।’’
मैं उनकी तरफ इंतज़ार से देखती रही कि आगे कुछ और कहेंगी पर वे पहले की तरह चुप हो गईं। मुझे अब झल्लाहट-सी होने लगी। ऐसे इंटरव्यू में मैं क्या नई बात निकाल पाऊंगी जहां एक भी बात कायदे की निकल ही नहीं पा रही थी। अपनी झल्लाहट को भरसक दबाते हुए मैंने उन्हें एक और मौका दिया-
‘‘कल्पना जी! जीवन के घटना प्रसंगां से आप बताना चाहें निकेत जी के बारे में।’’ मैंने चेहरे पर मुस्कान की परत बिछाते हुए कहा।
‘‘ दोनां बच्चियों को प्यार करते थे। उनकी शादी और खुदमुख्तारी नहीं देख पाए… हम दोनों में भी प्यार था…घटनाओं के बारे में तो मैंने लिखा भी है न…तुम पढ़ लो।’’
मैं विचित्र निगाह से उन्हें देखे जा रही थी। उनके लिखे संस्मरण में नाममात्र की घटनाओं का उल्लेख था। वे शायद भूल चुकी थीं। वे इतने टालू और चलताऊ अंदाज़ में मुझे जवाब दे रही थीं कि मुझे कोफ्त हो उठी। उनकी बातों में अनेक दोहराव हो रहे थे फिर भी मैं चुप नहीं रही।
‘‘ आपके घर में ही इतना बड़ा प्रेरणा स्रोत रहा तो आपने उनके सानिध्य में और क्या-क्या रचा? वे कैसे आपको प्रोत्साहित करते थे।’’
कल्पना जी मेरी ओर अपलक देखती रहीं फिर कुछ मुस्कुराती-सी बोलीं-
‘‘वे मुझे कवि मानते ही नहीं थे…और सच कहूं तो मैंने कुछ लिखा भी नहीं? मुझे तो ये भी याद नहीं ‘दरख्तों के पार रौशनी’ मैंने लिखी है। तुम्हारे इंटरव्यू में कुछ काम आ जाए इसलिए बता दिया। वैसे विहान और कुंजू ही मुझे बताते रहते हैं जब रेडियो पर ये पंक्तियां कभी सुनाई देती हैं। इंस्टा-विंस्टा से भी मेरा शाब्दिक परिचय भर है। विहान की मेहरबानी से।’’
पहली बार कल्पना जी का अंतस मुझसे संवाद-सा करता लगा। मुझे कुछ-कुछ अंदाजा हुआ कि मात्र एक संस्मरण और एकाध कविताएं नहीं और भी कुछ जरूर होगा उनका रचा हुआ। मैं लगभग उनके पीछे ही पड़ गई कि वे अपना लिखा हुआ कुछ सुनाएं। मुझे लग रहा था कि कुछ सूत्र मेरी मुट्ठी में आ गए हैं। मैं खुश भी थी पर अगले ही पल मुट्ठी खुल गई और सारे सूत्र बिखर गए। कल्पना जी ने मुस्कान समेटकर कहा-
‘‘ पूर्वा! इस घर में केवल निकेत जी की ही किताबें हैं। जब मैंने कुछ लिखा ही नहीं तो कहां से आएगा और भला मैं क्या सुनाऊंगी।’’
अब मैं कुछ हताश हुई। मेरे चेहरे ने उस हताशा का पता कल्पना जी को दे दिया या जाने क्या हुआ कि उन्होंने विहान को बुलाकर मुझे आगे वाले कमरे की ओर ले जाने के लिए कहा। मैं चलने लगी तो कल्पना जी ने मुझे अपना कैमरा ले जाने और निकेत जी के कमरे की फोटो उतारने के लिए भी कहा। मैं निराश कदमों से यंत्रचालित-सी विहान के पीछे हो ली। छोटे से एक कमरे में एक बड़ा-सा बुक रैक अधिकांश जगह घेरे था और उसके सामने एक सिंगल सीटर सोफा रखा था। विहान ने मुझे निकेत जी का डेस्क भी दिखाया। शेल्फ में कई कविता संग्रहों, किताबों के साथ निकेत जी की किताबें भरी थीं। मेरी हताशा अब कुछ छंटी और मैंने तस्वीरें लेनी शुरू कीं। पहले डेस्क की और फिर शेल्फ की।
‘‘ कुछ किताबें पीछे भी रखी हैं। आप उनकी तस्वीर भी लेना चाहेंगी।’’
विहान ने मुझसे पूछा तो मैंने हां में सिर हिलाया। विचार आया कि कुछ और नहीं बन सका तो एक फोटो फीचर ही तैयार कर लूंगी। मैं पीछे की किताबों को देख ही रही थी कि अचानक हरे जिल्द में मुझे एक किताब दिखाई दी। हरा जिल्द अलग से चमक रहा था। ये क्या जैसे ही ‘चांदनी में घुला राग’ शीर्षक से हरी जिल्द वाली किताब मैंने उठाई उसके नीचे सुनहरी अक्षरों से कल्पना निकेत का नाम पढ़कर मैं चौंक गई। अक्षरों की सुनहरी आभा कई जगह से चमक खो बैठी थी। मैंने किताब विहान को दिखाई तो उन्होंने भी हैरत से देखा। उन्हें नहीं पता था कल्पना जी की किताबें यहां हैं। अपनी जिज्ञासा के साथ मैं शैल्फ की पिछली रो टटोलने लगी। मुझे कल्पना जी के दो अन्य कविता-संग्रह ‘धुंधलके के पार’ और ‘जंगल की गूंज’ भी दिखाई दिए। मैं उन्हें पाकर रोमांचित हो उठी। मन ने यकीन से कहा इसकी जानकारी तो संपादक महोदय को भी नहीं होगी। मुझसे किताबें लेते हुए विहान उन्हें देखने लगे-
‘‘ बहुत धूल है इन पर। चाचीजी को धूल से दिक्कत होती है। उन्हें खांसी बनी रहती है इसलिए इस उम्र में उन्हें धूल आदि से दूर रखते हैं।’’
कहते हुए विहान ने अन्य किताबें शेल्फ में रखने के बाद कल्पना जी की किताबों पर बारी-बारी हाथ मारकर धूल छाड़ी और फिर एक कपड़े से उन्हें अच्छी तरह पोंछा। इस बार मैं आगे चली और मेरे पीछे विहान। मैंने पुलक के साथ तीनों संग्रह कल्पना जी के आगे रख दिए।
‘‘ इनके बारे में तो आपने बताया ही नहीं कल्पना जी। निकेत जी की किताबों को खोजते हुए ये हमें मिलीं।’’
मैं उत्साह में थी पर कल्पना जी अपनी ही किताबों को ऐसे देख रही थीं जैसे वे किसी और की हों। खुशी की एक भी रेखा उनके चेहरे पर नहीं उभरी। वे अपनी ही किताबों को आश्चर्य से उलट-पलट रही थीं। कभी अंदर के पेज पलटतीं तो कभी अचानक किताब बंद करके बाहर की जिल्द देखतीं।
‘‘विहान! टेबल से मेरा चश्मा तो उठाना।’’ कल्पना जी ने गंभीर स्वर में कहा। चश्मा मिलने पर वे गंभीरता से अपनी किताबों की पड़ताल में लग गईं। तीनों संग्रहों का जब एक भरपूर मुआयना उन्होंने कर लिया तब अपनी चुप्पी तोड़ी-
‘‘तो ये थी यहां? मैं तो इन्हें भूल ही चुकी थी। इन्हें क्या अपने आप को ही भूल चुकी थी। जिंदगी के इतने सबक शेष थे कि ये अध्याय कब छूटा-बिखरा और भूलकर भटक गया। जिंदगी तो एक ही होती है हमारी भूमिकाएं बदलती रहती हैं। रेल की पटरियों की तरह भूमिकाएं एक-दूसरे को काटती चली जाती हैं।’’
कल्पना जी जैसे स्मृतियों के दरीचे खोल रही थीं।
‘‘ तुमने पढ़ा है इन्हें?’’ अब कल्पना जी की जिज्ञासा चरम पर थी।
‘‘नहीं…माफ कीजिएगा हमारा काम कुछ अलग तरह का रहता है फिर मैं तो कायदे से साहित्य की विद्यार्थी नहीं रही हूं।’’
इस बार मेरा स्वर बहुत सपाट था। बार-बार अनेक सवाल करने के कारण अब मन में कल्पना जी के लिए एक दमित आक्रोश जगह बनाने लगा। मैं ऊब भी रही थी पर वो पहले से कुछ सचेत और ऊर्जावान लग रही थीं। कमरे में एक चुप्पी छा गई। इस बार पहल कल्पना जी ने की-
‘‘ ये सब किताबें कभी मैंने लिखी थीं और मुझे याद ही नहीं रहा।’’
एक क्षण के विराम के बाद अचानक वे पुलकित हो चलीं। ठहरे से पानी में जैसे अनेक आवर्त उभरने लगे। स्मृतियों की आवाजाही के अव्यवस्थित क्रम में वे मुझे जो, जितना और जैसा याद आ रहा था बताती रहीं। स्मृतियां कितनी स्वार्थी होती हैं जीवन में कहीं दर्ज न होने पर ऐसे विलग जाती हैं जैसे कभी थी ही नहीं थीं। मैं साफ देख पा रही थी कि कल्पना जी के लेखकीय व्यक्तित्व की स्मृतियों के साथ भी ऐसा ही विभ्रम घटित हुआ है। अनजाने ही एक अनूठा सच मेरे हाथ लगा था पर मुझे तो इस बातचीत को निकेत जी की ओर लाना था। इस बार मैंने अपने पूर्वनिर्धारित प्रश्नों को दिमाग से हटाया और नए सिरे से सोचा। मुझे उस समय यही सूझा कि मैं इनमें दिलचस्पी लूं तो शायद मुझे उस रास्ते निकेत जी की यात्रा के दर्शन हो जाएं। मेरा भीतर के कुशल खिलाड़ी ने अपना दांव चला।
‘‘ अच्छा कल्पना जी। एक घर में दो-दो कवि। इससे बड़ी बात क्या होगी भला? साहित्य समाज में डंका बजता होगा आपकी जोड़ी का। हालांकि आपके लेखन के बारे में लोग अधिक नहीं जानते। एक कवि के नाते आपको निकेत जी का लेखन किस दर्जे का लगता था।’’ आखिरकार मैंने बातचीत की नोंक पर निकेत जी से संबंधित सवाल रख ही दिया।
‘‘ अरे! मैं कहां निकेत जी जैसा लिख सकती थी वे बड़े कवि थे। उनके आगे मैं किसी को भला कैसे दिखाई देती? अब तो ऐसा लगता ही नहीं पूर्वा जैसे कि ये कभी मैंने ही लिखी थीं। ये किताबें…आज अपना ही लिखा बेगाना लग रहा है। बहुत कुछ तो भूल-भाल गई पर देखो हैरानी है कि कभी मैं इतना अच्छा लिख पाती थी।’’
मैंने देखा किताबें उनके हाथों में किसी खजाने सरीखी थीं। वे उन्हें उलट-पलट रही थीं। कुछ पढ़ रही थीं। कभी हंस रही थीं। वे शायद उन क्षणों में भूल गईं थीं कि उस कमरे में मैं और विहान भी हैं। मैं देख रही थी मेरे सामने नब्बे की उम्र को छूती एक स्त्री अपने लिखे शब्दों में उतर रही है जैसे अतीत की खोह में उतर रही हो। मैं सोच में पड़ गई कि इस स्त्री को घंटे भर पहले देखकर मैं सोच भी नहीं सकती थी कि ये मेरे आगे ऐसे हंसेगीं। वे अब भी बिस्तर पर उसी जगह बैठी थीं पर ऐसा लग रहा था जैसे अभी उठेंगी और घर से निकलकर बाहर की दुनिया से जुड़ जाएंगी। उनके चेहरे के उठते-गिरते भावों ने मुझे बता दिया कि वे दरअसल किताबों में खुद को खोज रही थीं। न जाने कबसे एक लेखक अपने ही घर में खुद को खो बैठा था। पूरी दुनिया में अकेला था। एक बड़े लेखक की छाया में जैसे न कभी पनप पाया, न कभी बढ़ पाया।
‘‘पूर्वा!हम कहीं घूमने गए थे कहां…हां याद आया… हम लोग मैक्लॉडगंज गए थे घूमने। वहां ही एक दिन एक लंबी कविता उतरी थी जेहन में जैसे काफी दिनों से बांधकर रखा एक झरना वेग से बह चला हो…उन्हें पारिवारिक यात्राएं बहुत पसंद नहीं थीं और मैं अव्वल दर्जे की घुमक्कड़। उन्हें पकड़कर ले ही जाती थी तो मना नहीं कर पाते थे। बहुत प्यार था न हमारे बीच…मैं प्यार से उन्हें शोना पुकारती थी। शंशाक निकेत…श और न…शोना।’’
कल्पना जी फिर चुप हो गईं पर मैंने शुक्र मनाया अपने संबंध के बारे में कुछ खुलकर बोलीं। अपने पास रखा हुआ एक तौलिया उन्होंने धीरे से उठाया और मुंह पोंछने के बहाने मुंह छिपा लिया। उनकी हर हरकत पर मेरी नजर थी। मैंने उनकी चोरी पकड़ ली। वे शरमा रही थीं। तौलिए की आड़ होने पर भी उनकी शर्मीली मुस्कान छिप न सकी। मुंह में आगे के दांत बाकी नहीं थे पर शर्मीली हंसी बहुत मोहक थी। बाजदफा अपूर्णताएं जीवन का वास्तविक सौंदर्य बन जाती हैं-मुझे उन्हें देखकर ऐसा ही लगा।
‘‘ कल्पना जी आपने इतना लिखा पर आपका नाम लोग नहीं जानते अलबत्ता आपकी कविताएं उन्हें जुबानी याद हैं।’’
मैं जानती थी कि हमारी बातचीत विषय से भटक चुकी है पर कल्पना जी कब और कहां से कोई गहरा संकेत दे दें मैं अब इसीलिए निराश नहीं थी। वे अपनी बातचीत में मुझसे खुल चली थीं यह भी मुझे हौसला दे रहा था।
‘‘ पूर्वा! नाम के लिए तो कभी लिखा ही नहीं। हां ये इच्छा तो रही ही होगी कि लोग पढ़ें, कुछ कहें। देखो लिखते तो हम दोनों ही थे। कॉलेज के जमाने से ही। संग पढ़े थे न। मैं ठहरी लद्दड़ और वो लिक्खाड़। गजब के धुनी। कई लोग अधिक लिखकर भी सार्थक ही रचते हैं उन्होंने अपने लेखन से इसे सिद्ध किया था ।’’ अब कल्पना जी की वाणी रफ्तार पकड़ रही थी।
‘‘घर में दो-दो कवि हों तो क्या आपस में ठनती नहीं थी? एक-दूसरे को अपनी कविताएं सुनाते भी रहते होंगे आप लोग? कोई किस्सा बताना चाहें आप।’’ मैं एक लंबा चक्कर काटकर फिर अपने टास्क के करीब पहुंचने की कोशिश करने लगी। समय बीत रहा था और मैं जान रही थी इस रिकॉर्डिंग का बहुत सारा हिस्सा अखबार के किसी काम का नहीं है।
‘‘ नहीं-नहीं ऐसा तो कुछ नहीं होता था। वो तो अपने एकांत में व्यस्त रहते थे। मैं सब कामों के बीच कभी-कभार ही एकांत निकाल पाती थी। बच्चे,नौकरी, जिंदगी के छोटे-बड़े मसलों में कभी ढंग से न तो एकांत मिला न लिख ही पाई। निकेत जी थे फुल टाइम साहित्यकार। घर,सभा-गोष्ठी, मैं कहां की साहित्यकार?’’ कहकर वो फिर से शर्माईं।
‘‘उस समय तो एक बड़ा कविता आंदोलन छिड़ा था। निकेत जी उसके सूत्रधार थे। आप तो उनकी सहयोगी रही होंगी?’’
‘‘ मेरा क्या सहयोग रहना था। उन दिनों हमारा घर बहस का अड्डा था। कितने लोग आते थे उस वक्त। वो और उनके दोस्त ही आंदोलन की मुख्य भूमिका में रहे। निकेत जी के दोस्तों के लिए चाय-नाश्ते की व्यवस्था मेरे जिम्मे। वैसे ही जैसे दुनिया के बड़े-बड़े साहित्यिक आंदोलनों में अधिकांश स्त्रियां आगे रहीं ही कब हैं। उन्हें भी मेरी ही तरह घर-संसार से फुर्सत मिलती होगी कुछ बड़ा करने की…ये मेरी ही कमी थी कि मैं ऐसा साहित्यिक माहौल पाकर भी मैं अधिक कुछ न कर सकी।’’
कहते हुए वे अपने से गहरे तौर पर खिन्न दिखने लगीं। इतने में दरवाजे पर बजी घंटी ने माहौल की गंभीरता को कुछ हद तक तोड़ दिया। मैंने सुना दरवाजे पर ही विहान ने किसी को चाय बनाने का आदेश दिया। कुछ समय बाद रसोई के सक्रिय हो उठने की सूचना मुझे बर्तनों की उठा-पटक और कुकर की सीटी ने दी। बीस मिनट के अंतराल पर कमरे में एक नौजवान मुस्कुराते हुए घुसा। उसके हाथ में चाय के दो प्याले और एक ग्लास पानी था।
‘‘ नमस्ते अम्मा जी। ठीक हो?’’
उसने कल्पना जी के दोनों हाथों में ग्लास थमाया। ये कुंजू था। उनके घर का सेवक। कल्पना जी ने बताया बाहरी दुनिया की सूचनाओं से यही उन्हें जोड़े रखता है। वे कुंजू को देखकर खुश हो गईं थीं।
‘‘तो क्या रहती है आपकी दिनचर्या?’’ मैंने उन्हें जानने की कोशिश की।
‘‘बस जैसा आप देख रही हैं।’’ इस बार कल्पना जी नहीं विहान बोले।
‘‘ इस उम्र में भला कहां आएगीं-जाएंगी?’’ विहान ने बात पूरी की।
‘‘ पुराने गीत सुनती हूं। अच्छे लगते हैं। फिल्में भी देखती हूं पर सब पुरानी। नई फिल्मों का धूम-धड़ाका मुझे समझ नहीं आता।’’ वे बता ही रही थीं कि विहान का फोन बजा और वे बाहर चले गए।
‘‘ कुंजू! दिखाता रहता है मुझे फिल्में। अक्सर दिन में यही रहता है मेरे पास। रात में भी जब कभी विहान नहीं आता। भतीजा है विहान मेरा। शादी नहीं की न इसने। कहता है इतनी कमियां हैं मुझमें तो किसी स्त्री का जीवन क्यों तबाह करूं। पूरा ध्यान रखता है मेरा।’’
बातचीत का सिरा अब कल्पना जी के निजी जीवन पर केंद्रित होने लगा और निकेत जी उस दायरे से छिटके चले जा रहे थे। मुझे हाल-फिलहाल में उन पर हुए एक आयोजन की खबर थी। मैंने बात को उस सिरे से जोड़ दिया-
‘‘ कल्पना जी! अभी निकेत जी की स्मृति में एक बड़ा भव्य आयोजन हुआ था। क्या आप जा पाईं थीं उसमें हिम्मत करके…’’
‘‘ मुझे तो कोई सूचना भी नहीं। किसी ने कुछ बताया ही नहीं। पहले एक प्रकाशक आ भी जाता था पर विहान से न जाने क्या झगड़ा हुआ कि अब वो भी नहीं आता। मैं तो दस-पंद्रह साल से घर ही में हूं। उम्र बढ़ रही है बाकी सब ठहरा हुआ है…देखो मैं पहले कैसी थी।’’
कल्पना जी ने उसी फोटो फ्रेम की ओर इशारा किया जिसे मैंने स्टूल से उठाकर मेज पर रखा था। एक सुंदर युवती की तस्वीर उसमें थी। कल्पना जी हताश-सी हुईं। एक क्षण के बाद फिर बोलीं-
‘‘ क्या अब भी अखबारों में साहित्य का पन्ना आता है?…’’
वे मुझसे लगातार ऐसे सवाल पूछ रही थीं। मैं हैरान थी कि लंबे अर्से से वे नहीं जानती कि साहित्य की दुनिया में क्या चल रहा है। कभी कोई अच्छी स्मृति अचानक कौंधती तो वे हंस देतीं वर्ना अपनी ही बातें कहतीं कहीं खो-सी रही थीं। मैं समझ पा रही थी कि ये स्मृति और विस्मृति के बीच के सघन पल हैं।
मैंने घड़ी की ओर देखा। समय काफी हो चला था। मैं जानती थी मुझे जो मिल गया है उससे अधिक निकेत जी के बारे में यहां कुछ नहीं मिलेगा। मुझे ही इस बातचीत के कई अंशों में पाठकों के लिए मशक्कत करनी पड़ेगी। कल्पना जी चुप थीं। अभी कुछ देर पहले की पुलक अब विलुप्त हो चली थी। मैंने इस बार सिर्फ उन्हें जानने की खातिर सवाल किया-
‘‘आप लिखती क्यों नहीं?’’
‘‘ अब तो लौ बुझने को है और भीतर की स्याही सूख गई है। कलम कहीं खो गई है। क्या लिखूंगी… देखो! शब्द भी इतने सयाने हो गए हैं कि सहजता से मेरी पकड़ में ही नहीं आते।’’
उनके चेहरे पर फिर से निराशा को चीरने वाली हंसी थी। हरे जिल्द वाली किताब उठाकर कुछ ढूंढने लगीं। एक पेज को निहारते हुए उत्साहित हुईं-
‘‘अंतस का अकेलापन
बाहर के शोर पर हावी है’’
पढ़ो तुम… पढ़ो इसे बोलकर पढ़ो। कितना गहरा लिख गई थी उस वक्त। अब तो सब भूल गई।’’
‘‘ आपने लिखना जारी क्यों नहीं रखा?’’
‘‘ निकेत जी के बाद जीवन की तपिश में सारे फूल सूखकर झर गए।’’
‘‘ और आपके पाठक? वो सब?’’ मैंने कुछ और कुरेदा।
‘‘ पाठक तो जिंदा लेखकों के ही होते हैं या फिर निकेत जी जैसे लेखकों के। मेरे पाठक अब कहां। तब तवज्जो मिली थी। प्रकाशक भी चले आए थे। अब उस दुनिया से इतनी दूर आ गई हूं कि वो दुनिया अनजानी लगती है फिर मेरी दुनिया के इतने लोग चले गए बस अब उनकी यादें ही हैं और वो भी तो मेरे ही साथ…’’ कहते हुए पहली बार कल्पना जी की आवाज लरज गई।
‘‘ उस समय के कुछ लोग तो अब भी होंगे ही। उनमें से कोई नहीं आता? आपके लिए न सही निकेत जी के लिए ही।’’
कल्पना जी ने मेरे सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। पहले मुझे देखा फिर सामने दीवार की ओर देखती रहीं। कमरे में फिर से केवल पंखा बोल रहा था। अचानक कल्पना जी रोने लगीं। मैं भौंचक रह गई। कुछ समझ नहीं पाई। एक अपराध बोध से भरकर स्टूल से उठकर उनके सामने खड़ी हो गई। खुद से खफा थी क्यों मैंने उनकी इतने वर्षां की चुप्पी को तोड़ना चाहा? क्यों अनाधिकार कोशिश की एक लेखक के एकांत में झांकने की? वे बेसाख्ता रोए जा रही थीं। विहान भी कमरे में आ गए। उन्हें चुप कराने लगे और मेरी विवशता जानकर आंखों से मुझे शांत रहने का संकेत किया। कुछ हिम्मत मिली तो मैं उनके पास आई। बेड पर बैठी और उनकी हथेली को अपनी हथेलियों के बीच कोमलता से रख लिया। असहायता में सिर्फ इतना ही कह पाई-‘‘मुझे माफ कर दीजिए कल्पना जी। आपको दुखी करने की मंशा कतई नहीं थी।’’
कमरे का माहौल बहुत भारी था। इतने में कुंजू खाने की थाली लेकर आया।
‘‘अरे ! अम्मा जी रोते नहीं हैं। खाना खाओ। आपकी पसंद का खाना है.. फिर देखो आज दीदी आईं हैं तो घर कितना अच्छा लग रहा है। है न? आप रोओगी तो ये नहीं आएंगी। आप चाहते हो ऐसा?…चलो खाना खाओ। जब तक मैं आपके लिए कोई अच्छी फिल्म लगाता हूं। चलो-चलो आंखें पोंछो।’’
कल्पना जी संयत हुईं। आंसू पोंछे। पानी पिया और थोड़ा सहज होने की कोशिश की।
‘‘ पूर्वा तुम जाने क्या समझोगी। वैसे मैं इतनी आसानी से रोती नहीं पर आज… जीवन है, हो जाता है कभी-कभी।’’
‘‘ बहुत स्ट्रांग हैं हमारी चाची।’’ विहान ने उनके कंधे थपथपाते हुए कहा।
इन शब्दों ने मुझे उबार लिया। आज के पूरे समय पर मुझे कुंजू का हस्तक्षेप इतना जरूरी लगा कि यदि कल्पना जी से उसका लगाव और भरोसे के शब्द न होते तो क्या होता। मैं समझ गई लेखन की दुनिया से एकदम दूर कुंजू उनके कितना करीब है। कल्पना जी के आगे भोजन की थाली परोसी जा चुकी थी। कुंजू टी.वी. ऑन करके पुरानी फिल्म की तलाश में था। मुझे अब चलना चाहिए था। मैंने कल्पना जी का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने इंटरव्यू छपने पर अखबार लाने का वायदा मुझसे लिया।
कल्पना जी के घर से निकलकर मैं चुप रही पर थोड़ी ही देर के बाद मन ने कहा-‘‘ निकेत जी पर तो कुछ खास बातचीत हुई ही नहीं। दिन निरर्थक रहा। जैसा चाहा था वैसा काम तो बना नहीं। संपादक भी अपने भरोसे को टूटते देख नाराज़ ही होंगे।’’ आशंकाओं में डूबी मैं चली जा रही थी। मैंने सोचा क्या वाकई सब कुछ निरर्थक था? दूर तक फैले सहरा में दबी रह गई एक ओस की बूंद का मिल जाना क्या कम है? आज जिस अनुभव को मैंने जिया-पाया, ये एहसास मेरे लिए कम नहीं था। मुझे घेर रही तमाम आशंकाओं को मैंने कंधे झकझोरकर हटाया और आगे बढ़ गई।

