युवा लेखकों में प्रज्ञा विश्नोई की कहानियाँ मुझे प्रभावित करती हैं। वह कथ्य-शिल्प दोनों ही स्तरों पर हर कहानी में कुछ नया करने की कोशिश करती हैं, जैसे इस प्रेम कहानी में- मॉडरेटर
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भाग एक: हल्दी के दाग
तेज़ फ्लोरेसेंट नीली सफ़ेद रोशनी।
डिसिन्फेक्टैंट और पेशाब की मिलीजुली तेज़ गंध।
टंकार सी विदेशी भाषा के स्वर, और
नीचे जाता हुआ एस्केलेटर।
मानसी जब भी एस्केलेटर देखती थी, उसे हम आपके हैं कौन में रेणुका शहाणे का सीढ़ियों से नीचे गिरने वाला दृश्य याद आ जाता था। वैसे भी इस समय उसका सिर घूम रहा था। जेट लैग था शायद।
पीछे से आ रही अधीर आवाज़ों ने मानसी को हल्का सा धक्का दिया और वह लड़खड़ाती हुई एस्केलेटर की दूसरी सीढ़ी पर उतर आई थी। मानसी ने कस कर एस्केलेटर के हैंडल को पकड़ लिया। पता नहीं आजकल बात बात पर उसे रोना सा क्यों आ जाता था। मानसी नाक सुड़कते हुए अपने आँसू गाल पर ढुलकने से रोकने की कोशिश कर ही रही थी जब उसने ऊपर की ओर जाने वाले एस्केलेटर के हैंडल पर एक साँवला हाथ देखा। पारदर्शी नेलपॉलिश, न कोई अंगूठी,न ही कोई कंगन। बस एक सादी सी घड़ी। लंबी, पतली उंगलियाँ, बिल्कुल माँ जैसी। शायद इस अंजान शहर में साँवले हाथ झलक, या हल्दी के दाग लगी, घर भर के कपड़े रोज़ धोने के कारण रूखी हो चुकी माँ की कटी फटी लंबी पतली उंगलियों की याद के कारण मानसी के आँसू उसके चश्मे के काँच को गंदा करने से पहले ही रुक गए थे और अब मानसी ने घूमकर अच्छे से उस स्त्री को देखा।
“माँ?” स्त्री अब मानसी से ऊपर थी पर कैरामेल हाईलाइट्स वाले चॉकलेट रंग के कॉलर बोन तक करीने से कटे बालों, चेहरे पर हल्का सुरुचि पूर्ण मेकअप, रेशम की ऑफ वाइट शर्ट और कैमल रंग के ट्राउसर और ब्लेज़र पहने होने के बावजूद स्त्री का चेहरा मानसी की माँ का था।”मम्मी?” इस बार मानसी के स्वर में पहली सी कंपकम्पाहट नहीं थी। मानसी एस्केलेटर से नीचे उतरते ही मेट्रो के जिस प्लेटफॉर्म से व आई थी, वापस उसी की ओर ऊपर ले जाने वाले एस्केलेटर पर सवार होते ही ऊपर की ओर सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। पर माँ उसे फ़िर दिखाई नहीं दीं। मानसी फ़िर भी आगे बढ़ती रही। थोड़ी दूर एक सुनहरे बालों वाला महँगा दिखने वाला कोट पहने आदमी माँ के सामने किसी सेल्समैन की तरह अपने लैपटॉप पर उन्हें कुछ दिखाने में लगा हुआ था, पर माँ बिना उस पर ध्यान दिये अपने फ़ोन पर कुछ टाइप कर रही थीं। भीड़ के कारण न मानसी आगे बढ़कर माँ की तरफ़ जा पा रही थी, न ही उसे कुछ सुनाई दे रहा था। तब तक माँ ने उस सुनहरे बाल वाले आदमी से लैपटॉप ले लिया था। माँ के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। “नो।” माँ की आवाज़ में यह शब्द सुनकर मानसी के गले में कुछ अटक गया था। आदमी फ़िर माँ को कुछ समझाने की कोशिश करने लगा, और इस बार उसके भवें कुछ तन सी गयी थीं। माँ ने फ़ोन पर्स में रखा और पहली बार उसकी ओर सीधे देखा। आदमी के कंधे नीचे गिर गए थे। “डू इट अगेन एंड दिस टाइम प्रोपर्ली।” माँ ने फ़िर कहा । आदमी कुछ और बहस करने की कोशिश करने लगा। “यू हर्ड मी,” माँ की आवाज़ में ये शब्द सुनकर और आदमी की नाक की बढ़ती ललाई और ऊपर उठते नीचे गिरते नथुने देखकर मानसी ठिठक गयी थी। तभी माँ की नज़र मानसी पर पड़ी।
मानसी को अचानक अपनी जैकेट याद आई। माँ ने चलते समय उसे बैग में ठूँस दी थी।
“रख ले, वहाँ ठंड होगी,” माँ ने कहा था।
मानसी ने उसे निकालकर वापस रख दिया था।
अब वह उसे पहन लेना चाहती थी। पर इससे पहले मानसी उस स्त्री को माँ समझने की भूल दोहराती, मानसी वापस पलट गयी थी।
दुपट्टा
होटल रूम पहुँचते ही मानसी ने अपना फ़ोन ऑन कर माँ का नंबर डायल किया।
“खाना खा लिया, मानसी बेटा?” माँ ने पूछा पर आगे के शब्द पीछे से आ रही कुकर की सीटी लील गयी।
“माँ अभी तो होटल पहुँची हूँ। खाना कहाँ से खाने लगूँगी?”
“तब तक जो नमकीन के पैकेट तुम्हारे बैग में रखे थे, उन्हीं में से कोई खा लो।”
“ठीक है,” मानसी के उत्तर में ऊब थी और तसल्ली भी। माँ को कुकर की सीटी, नमकीन के पैकेट और उसकी भूख की चिंता में उलझा हुआ सुनकर मानसी कुछ देर के लिए निश्चिंत हो गई।
पता नहीं उस स्त्री का नाम क्या होगा? माँ का नाम क्या था?
द से कुछ?
दुर्गा? नहीं। माँ का नाम दुर्गा से लंबा था।
कोई देवी का नाम था—इतना उसे याद था।
पापा का नाम पारितोष उसे साफ़-साफ़ याद था क्योंकि हर ज़रूरी फॉर्म में भरना पड़ता था।
माँ का नाम?
माँ उसे मेरा बाबू, राजा बेटा, न जाने क्या-क्या बुलाती थीं। फिर भी मानसी को अपना नाम कभी नहीं भूलता था।
तो माँ का नाम क्यों नहीं याद आ रहा था?
पर लाख याद करने की कोशिश करने के बावजूद भी मानसी को अपनी माँ का नाम या नहीं आया।
किसी दिन वो यहाँ पराये देश में खुद का नाम भूल गयी तो?
नहीं, नहीं, वो खुद का नाम भूल भी गयी तो माँ सबकी नाक में दम करके उसको ढूंढ़ निकालेंगी।
खुद को तसल्ली देते हुए मानसी ने दवा निकाली।
गोली हथेली पर रखी और कुछ देर उसे देखती रही।
उसे याद नहीं था कि पानी की बोतल कहाँ रखी थी।
फिर याद आया—बैग की सामने वाली जेब में।
पिछले कुछ वर्षों में उसकी स्मृति के साथ ऐसा होने लगा था। मनु के अलावा उस और कुछ याद नहीं रहता था। मनु भी इसी शहर में था। इसी वजह से उसने इस प्रशिक्षण के लिए हाँ कहा था।
मानसी ने ऑनलाइन फ़ोरम चेक किया। फ्लाइट के कारण आज सवेरे से वह फ़ोरम चेक नहीं कर पाई थी। हाँ, मनु की पोस्ट थी। किसी फ़ोरम में किसी अंडरग्रेजुएट सदस्य को हीसेन्बर्ग का सिद्धांत समझा रहा था। इतना सामान्य कैसे रह सकता था मनु? मानसी को ब्लॉक करने के बाद। वैसे जब उसने मानसी का प्रेम प्रस्ताव बेहद तहज़ीब से ठुकराया था, तब भी वो सामान्य ही था। मानसी ने बार बार वेबपेज रिफ्रेश किया। वही पुरानी पोस्ट। मानसी ने अपनी दोस्त का इंस्टाग्राम चेक किया। “फिफ्थ हनीमून विथ माय लव” कैप्शन के साथ अपनी और अपने पति की फ़ोटो डाली थीं उसकी दोस्त ने। दोनों इटली में अपने प्रेम विवाह की पाँचवीं सालगिरह मना रहे थे। एक मानसी थी जिसने आज तक मनु को देखना तो दूर उसका असली नाम तक पता नहीं किया। मानसी ने आदमकद शीशे में खुद को देखा। छोटा कद। चेहरा जो कभी गेहुँआ नज़र आता था, तो कभी गोरा। जिसका तेज उसके मन की उथल पुथल पर अधिक निर्भर था। देह जो किसी स्त्री की कम, किसी ग्यारह साल के बच्चे सी ज़्यादा लगती थी। मानसी अपनी उम्र से दस साल छोटी दिखती है। शायद इसलिए उसके साथ वाले हमेशा उससे बच्चियों वाला ही व्यवहार करते रहे, स्त्रियों जैसा नहीं। बचपन मे मानसी की माँ को आँटियाँ हमेशा सरदार जी की मम्मी समझ लेती थीं। कितना तो कोशिश करती थी मानसी स्कूल के नाटक में उसे लड़की बनने मिले, नोंहर बार नटखट लड़के का किरदार नहीं। अब उससे छोटे कद की लड़कियाँ स्त्री न दिखती हों, ऐसा भी नहीं था। मानसी का कद शायद इतना भी कम नहीं थी, ऐसा मानसी ने खुद को समझाया। पर स्त्री का सुंदर होना अलग बात है, आकर्षक होना अलग। जैसे माँ सुंदर थीं, और माँ सी दिखने वाली स्त्री आकर्षक। आकर्षक तो मानसी भी नहीं थी, तभी तो मनु से उसे ठुकरा दिया था। यदि मानसी की माँ, माँ न होकर, माँ जैसी दिखने वाली स्त्री होती तो? तब क्या मनु? नहीं, जिसे देखा तक नहीं, उस लड़के कर लिए वो अपनी माँ की जगह? पर ये पहली बार तो नहीं, जब मनु के लिए उसने माँ को धोख़ा देने का सोचा था। जब उसे पता चला था मनु भारत छोड़कर यहाँ आने वाला था, तो एक झटके में मानसी उसके लिए अपनी स्थायी, सम्मानित नौकरी छोड़ने को तैयार हो गयी थी, यदि मनु उसे अपनाने का एक इशारा बस देता तो। जबकि माँ ने सब कुछ मानसी की पढ़ाई, और उसे आत्मनिर्भर बनाने के लिए ही तो झेला था। पर मानसी का सपना तो बिल्कुल मामूली था, आज की शिक्षित जागरूक स्त्री के लिए एकदम बेढंगा। उसने थोड़ी न बोला था कि उसकी माँ उसके लिए कोई भी त्याग करे, कोई भी अपमान सहे। मानसी अपनी माँ की बेटी है, पर वह अपने भीतर की लड़की को खुद से अलग कैसे करे?
यदि मनु भी दूसरी करियर में सफ़ल स्त्रियों की तारीफ़ उसके सामने करता तो? नहीं मनु उससे कभी ऐसे बात नहीं कर ही नहीं सकता था। मनु ऐसा था ही नहीं। पर मनु था कैसा? मनु था कौन? वह स्त्री कौन थी?
मानसी को अचानक अपना दम सा घुटता महसूस हुआ। अभी तो यहाँ इतनी ठंड थी, अब इतनी गर्मी। जैसे वो रसोई में अकेले अपने पति और ससुराल वालों के लिए खाना बना रही हो, और बाहर से पापा, चाचा, बुआ और चाची की तेज़ तेज़ हँसने की आवाज़ें आ रही हों। जैसे ही चाची के बेटे बेटी को वो रोटियाँ परोसने जाती है, वो लोग चुप हो जाते हैं, और पापा उसकी ओर आँखों से इशारा कर अपनी हँसी रोकने की कोशिश कर रहे होते हैं। पर ये लोग उसके अपने ससुराल में भी उसका पीछा क्यों नहीं छोड़ते? उसकी नज़रें मनु को खोजती हैं, पर उसकी माँ उसके हाथ से रोटियाँ लेकर सबको परोसने लगती हैं। “अंदर जो, मानसी,” ये माँ बोल रही हैं या माँ जैसी दिखने वाली स्त्री? कपड़े तो सलवार कुर्ता और दुपट्टा ही पहन रखे हैं। पर माँ का लहज़ा उसी स्त्री जैसा क्यों है? माँ मानसी के ससुराल में खाना क्यों परोस रही हैं? मनु कहाँ था? पर मानसी के हाथों में मेंहदी तो दिख ही नहीं रही थी। और चूड़ियाँ? फ़िर उसकी कलाईयाँ सूनी क्यों थीं? और सिंदूर? वो तो माँ की माँग पर है जहाँ पसीना बह रहा है। उसकी तो शादी हुई ही नहीं थी। और मनु को तो उसने दे… मनु कहाँ था? माँ कहाँ थीं?
नेलपॉलिश
ट्रेनिंग सेंटर जिस बिल्डिंग में था, वह मूलतः एक बहुराष्ट्रीय तकनीकी कंपनी का मुख्यालय था। मनु भी तो किसी बहुराष्ट्रीय तकनीकी कंपनी में ही बहुत बड़े पद पर था। इस शहर की सुबह फीकी चाय सी हल्के रंग वाली थी और यहाँ सब कुछ ठंडा था। कहीं ट्रेनिंग वाली बिल्डिंग में ही मनु उससे टकरा गया तो? फ़िल्मों में ऐसा ही तो दिखाते हैं। बहुत दिनों बाद उम्मीद की तितली मानसी के मन में फड़फड़ाई थी। मानसी समय से पहले ही बिल्डिंग पर पहुँच गयी थी। पर उसकी ट्रेनिंग किस तल पर होने थी? बिल्डिंग तो ७८ तल ऊँची थी। जाने उसने जहाँ अपने ट्रेनिंग रूम का पता लिखा था, वो पन्ना उससे कहाँ गुम गया था। और यहाँ उसके मोबाइल फ़ोन का इंटरनेट भी नहीं चल रहा था जो ऑनलाइन अपने ईमेल इनबॉक्स से पता ढूंढ़ लेती। बिल्डिंग के सबसे नीचे तल की लॉबी में मानसी भटकने लगी। रिसेप्शनिस्ट देखने में सख्त सी लग रही थी, तो मानसी की उससे पूछने की हिम्मत नहीं हुई। तभी एक बुज़ुर्ग से क्लीनर वहाँ सफ़ाई करते दिखाई दिए। मानसी ने उनकी उम्र देखकर अपने आप नमस्ते में सर झुकाया था, पर जब मानसी को अपनी गलती का एहसास हुआ, तब तक उन बुज़ुर्ग ने भी मानसी को देखकर मुस्कुराते हुए सर झुकाया। “यू इंडियन?” उन्होंने मानसी से कोमल स्वर में पूछा। “यस, यस,” मानसी ने जवाब दिया। वी हैव एन इंडियन एक्सेकुटिव, सीईओ वर्किंग. यू मस्ट हैव कम टू मीट। उनकी अंग्रेज़ी टूटी फूटी थी, पर ये बिल्डिंग जिस कंपनी की है, उसका सीईओ कोई भारतीय है, मानसी समझ गयी। कहीं इसलिए ही तो मनु उससे अपनी पहचान नहीं छिपाता था? बिल्कुल किसी परिकथा के जैसे।
“व्हेर द सीईओ सिट्स?” मानसी ने पूछा था।
“ऑन द सेवेन्टी सेवेंथ फ्लोर, मिस। यू विल नीड एन अपॉइंटमेंट तो मीट, बट द सेक्रेटरी इस अ स्वीट गर्ल।”
“थैंक यू सो मच सर।” मानसी ने बुज़ुर्ग क्लीनर से नमस्ते करते हुए कहा था।
मानसी को सीईओ का इंतज़ार करते हुए पूरा दिन बीत गया था, पर मनु उससे मिलने नहीं आया। आखिरकार जब दरवाज़ा खुला, तो दरवाज़े से वही माँ का चेहरा चुराने वाली स्त्री एक आईपैड के साथ बाहर निकली। इस बार उसने एक इंडिगो शर्ट, सेज ग्रीन ब्लेज़र और ट्राउसर पहन रखे थे और पैरों में ऊँची एड़ी वाली महँगी सैंडल्स। मानसी को अपने कद को लेकर बुरा न महसूस हो इसलिए माँ तो कभी भी ऊँची एड़ी की सैंडल्स नहीं पहनती थीं। हालांकि तब भी मानसी का कद उनसे बहुत छोटा ही लगता था। रिसेप्शनिस्ट स्त्री के पास जाकर बोली, “कात्या, शी इज़ मानसी फ़्रॉम इंडिया।”
स्त्री, मतलब कात्या ने अपनी एक भौंह ऊपर चढ़ाकर मानसी को सरसरी तौर पर देखा और अपनी सेक्रेटरी से पूछा, “सो?”
“शी वांटेड टू मीट यू.”
इससे पहले स्त्री कुछ बोल पाती, मानसी सेक्रेटरी की तरफ़ मुखातिब होकर बोली, “आई वांटेड टू मीट द सीईओ ऑफ पिकोसिस टेक्नोलॉजी नॉट हर।”
“बट शी इज़ द सीईओ अबाउट हूम यू आस्क्ड फॉर।” तभी मानसी की नज़र कात्या जिस केबिन से बाहर आयी थी, उस पर लगी नेमप्लेट पर गयी जिस पर लिखा था कात्यायनी रे, चीफ़ एक्सेकुटिव ऑफिसर।
“आई आस्क्ड फॉर मनु।” मानसी को फ़िर साँस लेने में दिक़्क़त होने लगी थी।
“लेट मी डील विथ हर,” कात्यायनी ने कहा।
कात्यायनी ने मानसी से पूछा, “यू आर मिस्टकेन, मिस?”
“माई नेम इज़ अ…”
कौन थी वो? क्या नाम था उसका? उसकी माँ का नाम क से ही तो शुरु होता था। पर उसका अपना नाम का था?
“सो मानसी, यहाँ कोई मनु नहीं है। तुम खुद ही उससे क्यों नहीं पूछ लेतीं कि वो कहाँ है?”
“मुझे उसका फ़ोन नंबर नहीं पता। मुझे तो ये भी नहीं पता कि वो दिखता कैसा है.”
पर तब तक कात्यायनी उसकी बात पूरी सुने बिना ही आगे बढ़ चुकी थी।
“म…मेरा मतलब कात्या!” मानसी ने आवाज़ दी।
कात्यायनी बेतकल्लुफ़ी से पीछे मुड़ी।
“तुम्हारा चेहरा…”
“तुम्हारी माँ से मिलता है,” मानसी ने कात्यायनी को पहली बार मुस्कुराते देखा। वैसे ही जैसे मानसी का की झूठ पकड़ने पर माँ के चेहरे पर मुस्कान खेल जाती थी।
“तुम्हें कैसे पता?” मानसी चकित थी।
“क्योंकि तुम्हारा चेहरा मुझसे मिलता है।” कहते हुए कात्यायनी एलीवेटर के भीतर दाखिल हो गयी और मानसी काँच के बंद दरवाज़े पर अपनी परछाईं को निहारती रह गयी।
बिल्डिंग से बाहर निकलते ही मानसी को हसास हुआ कि ट्रेनिंग के पहले सेशन की जगह मनु को खोजने का विचार इतना भी व्यवहारिक नहीं था। इस बात की शिकायत उसके कार्यालय और बॉस के पास जायेगी और फ़िर इस अनुशासनहीनता का कारण उन्हें समझाना मुश्किल होगा। और यदि माँ तक ये बात पहुँच गयी तो, उसने घर पर किसी को मनु के बारे में नहीं बताया है। यही सोचते सोचते मानसी न जाने किस अंधेरी गली आ गयी। जब मानसी के सस्ते सेलफ़ोन पर माँ का फ़ोन का कॉल आया, तब तक एक मैले कपड़े पहना आदमी मानसी के सामने अपने हाथ फैला चुका था। मानसी उसे कुछ देने के लिए अपना पर्स खोल चुकी थी। दूसरे आदमी ने मानसी की बाँह पकड़ उसमें अपने नाखून गड़ा दिया थे और दूसरे हाथ से उसकी दाहिनी आस्तीन खींच ली थी। और तीसरा उसका पर्स छीन भाग चुका था। और बीस मिनट बाद एक काली कार मानसी के पास आकर रुकी।
गाड़ी मानसी के पास रुकी और खिड़की खुलते ही गाड़ी के अंदर कात्या का चेहरा दिखा।
“डिड समथिंग हैप्पन हेयर?” मानसी की फुल शर्ट की फ़टी आस्तीन देख कात्या ने उससे पूछा।
“वो मेरा पर्स छीनकर भाग गए।” मानसी ने जवाब दिया।
“गेट इन,” कात्या ने कार का दरवाज़ा खोल दिया।
मानसी अंदर बैठ गयी, और फ़ोन उठाकर अपनी घबराई हुई माँ को अपने साथ हुआ वाकया सुनाने लगी।
“मम्मी अब आप रो मत,” मानसी अपनी बाँह पर आयी खरोंच को दूसरे हाथ की उँगली से धीरे धीरे मल रही थी और कात्या कान में ईयरप्लग लगाए लैपटॉप पर काम करती जा रही थी। बात करते करते मानसी बीच बीच में कात्या को भी देखती जा रही थी इस आस में कि वह उससे पूछे कहाँ चोट आई, परेशान होकर चोट पर दवाई लगाए। पर कात्या अपने काम में मगन थी।
जब मानसी ने अपनी माँ से यह कहकर फ़ोन काटा कि व उनसे होटल पहुँचकर बात करेगी, तब भी कात्या ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया।
जब पुराने बाज़ार के बीच कार पहुँची, तब जाकर एक कान से कात्या ने ईयर प्लग हटाकर मानसी से पूछा, “डू यू नीड अ ड्रिंक?”
मानसी ने न में सर हिलाया और कात्या से पूछा,”क्या आप ड्रिंक करती हो?”
“नहीं, मेरे पास करने को बहुत का होता है। और दिन भर में कई मीटिंग्स भी अटेंड करनी होती हैं। एंड आई डोंट लाइक टू टेक माय हेल्थ फॉर ग्रांटेड।” कात्या ने जवाब दिया।
“मान लीजिये आप वैकेशन पर हैं, और शराब से सेहत पर कोई नुकसान नहीं होता तब आप शराब पीती?”
“वेल, देन इट वुड डिपेंड ऑन माई मूड।”
मानसी को पता नहीं कि उसके चेहरे पर यह सुनकर क्या भाव आये थे कि कात्या ने उससे सवाल किया, “क्या तुम्हारी माँ को पता है कि तुम यहाँ उस लड़के से…क्या नाम है उसका?”
“मनु।”
“राइट, कि तुम यहाँ उस मनु से मिलने आई हो?” कात्या ने मानसी का हाथ अपने हाथों में लेकर उसकी तीसरी उँगली के निचले हिस्से पर अपने पैने नाखून को फ़िराते ही पूछा।
मानसी ने स्त्री को देखा। उसे क्यों नहीं समझ आ रहा कि जहाँ उस आदमी ने मानसी को पकड़ा था, उसका नाखून उसकी त्वचा में कितने गहरे धँस गया था? और अभी भी मानसी को वह बाँह का नीलापन जल रहा था।
“नहीं, घर पर किसी को नहीं पता,” मानसी के ये बोलते ही कात्या ने मुस्कुराते हुए मानसी का हाथ छोड़ दिया।
“मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ मानसी,” कात्या मानसी के चेहरे पर अपनी नज़रें गड़ाते हुए बोली।
तभी गाड़ी रुकी।
“मेट्रो स्टेशन आ गया। यदि मैं तुम्हारी जगह होती, तो परछाईं के पीछे अँधेरी गलियों में भागने से ज़्यादा अपनी सेफ़्टी और करिअर पर फोकस करती। बट युर लाइफ, युर चॉइस।” मानसी के हाथों में अपने पर्स से निकाला हुआ एंटी इंफेक्शन ट्यूब पकड़ाते हुए कात्या बोली।
मानसी कार से उतर गयी।
“थैंक यू,” चाहते हुए भी मानसी कात्या को उसके नाम से नहीं बुला पाई।
“जिसने ये किया है,” मानसी की बाँह की ओर इशारा करें हुए कात्या बोली, “मैंने उसकी तस्वीर कॉप्स को भेज दी है। ही विल बी टेकन केयर ऑफ। यू वोंट नीड टू बोदर।”
और काली गाड़ी कात्या को पीछे छोड़ आगे बढ़ गयी।
हल्दी और नेलपॉलिश
दो महीने बाद
मानसी से बिना पूछे माँ ने उसकी और अपनी टिकट मंडी हाउस में एक नाटक देखने के लिए करा ली थी। माँ ने सरसों रंग की नई कुर्ती और बर्गण्डी रंग के ट्राउसर पहन रखे थे और पहली बार अपने घने घुंघराले बाल खुले छोड़े थे।
नाटक देखते हुए मानसी ने माँ से पूछा, “मम्मी यदि पापा आ गए और हैं लोग यहॉं बैठे रहे तो?”
“तो?” माँ ने पूछा नहीं, कहा।
“नहीं, मतलब,” मानसी झेंप गयी, “माँ देखो। वो जिस लड़की को मौत का राजा उठाकर पाताल ले गया है, उसको पाताल की अग्नि में गिरने से जिस जादूगरनी ने बचाया, उसकी शक्ल लड़की की माँ से नहीं मिल रही जो अपनी बेटी के अपहरण के दुःख में पूरी धरती पर अकाल ले आये है।”
माँ ने मंच पर ध्यान से देखा, “कौन वो काले कपड़े वाली जादूगरनी? नहीं तो। मुझे तो लड़की और लड़की की माँ की शक्लें एक सी लग रही हैं।”
इस बार मानसी ने देर तक मंच की तरफ़ ध्यान से देखा, “हाँ। शायद माँ, बेटी, जादूगरनी तीनों की भूमिका एक ही स्त्री निभा रही है।”
“हाँ, शायद,” माँ के सेलफोन पर पापा की कॉल आ रही थी। माँ ने फ़ोन साईलेंट कर दिया और मानसी का हाथ अपने हाथ में पकड़कर अपनी गोद में रख लिया। मैनीक्योर और नाखूनों पर पारदर्शी नेलपॉलिश लगाने के बाद माँ की पतली उंगलियाँ और सुंदर लग रही थीं।

