संभवतः यह गाब्रियल गार्सिया मार्केस की हिन्दी में अनूदित पहली कहानी है। इसका अनुवाद तब हुआ था जब मार्केस को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला था। 1973 में इसका अनुवाद देवेंद्र मोहन ने किया था, और यह कहानी प्रकाशित हुई थी उस समय की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘सारिका’ में। आज आपके लिये- मॉडरेटर
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कोलंबिया
रेल कांपती हुई पथरीली सुरंग से बाहर निकल कर, अंतहीन-से लगने वाले केले के बगीचों के बीच से होती हुई चली जा रही थी। हवा में आर्द्रता थी और वे दोनों समुद्री हवाओं से बहुत दूर निकल आयी थीं। दमघोंटू धुंआ डब्बे के अंदर चला आया था। ग्यारह बज रहे थे लेकिन अभी गर्मी तेज नहीं थी।
—खिड़की बंद कर दो, औरत ने अपनी लड़की से कहा— तुम्हारे बालों में गर्द जम जायेगी।
लड़की खिड़की बंद करने की कोशिश करने लगी, लेकिन उसमें जंग लगा होने के कारण बंद न हो सकी।
तीसरी श्रेणी के इस डब्बे में सिर्फ वे दोनों थीं। लड़की धुएं से बचने के लिए खिड़की के पास से उठ गयी, उसने प्लास्टिक की थैली, जिसमें खाने की कुछ चीजें थीं और अख़बार में लिपटा हुआ एक फूलों का गुलदस्ता वहीं बेंच पर छोड़ दिया। वह खिड़की से हट कर अपनी मां की ओर मुड़ कर सामने वाली सीट पर बैठ गयी। दोनों ने सस्ते-से मातमी लिबास पहन रखे थे।
बारह बजते-बजते गर्मी तेज होने लगी। ट्रेन एक बीरान-से स्टेशन पर पानी लेने के लिए दस मिनट ठहरी।
गाड़ी चली तो धीमी रफ्तार से। बीच में दो छोटे कस्बों में रुकी। औरत सो रही थी। लड़की ने अपने जूते उतार दिये, गुलदस्ते पर पानी के छींटे मारने के लिए वह उसे उठा कर अंदर गुस्लखाने में ले गयी। वापस आयी तो मां ने प्लास्टिक की थैली से खाने की चीजें निकाल ली थीं।
औरत ने अपना खाना खत्म कर लड़की से कहा— जूते पहन लो। लड़की ने बाहर देखा, खाली मैदान नजर आ रहे थे और गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली थी। उसने केक के बचे हुए टुकड़े को प्लास्टिक की थैली में डाला और जूते पहनने लगी। औरत ने उसे कंघी दी— बाल संवारो।
गाड़ी सीटी बजाने लगी। औरत ने अपने गले से पसीना पोंछा और फिर हाथों से मुंह पोंछने लगी। लड़की ने बाल संवार लिये थे। गाड़ी अब एक शहर में से होकर गुजरने लगी थी।
—कुछ करना हो तो कर लो, औरत ने कहा, बाद में पानी-पानी पीना चाहो तो बिल्कुल न पीना, चाहे प्यास से जान निकल रही हो, और हां, रोना-धोना बिल्कुल नहीं।
लड़की ने अपना सिर हिलाया। इंजन की सीटी और पुराने डब्बों की खड़खड़ाहट के साथ एक गर्म हवा का झोंका खिड़की के अंदर आ गया। औरत ने प्लास्टिक का थैला मोड़ कर अपने हैंड बैग में डाल लिया। उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव थे। गाड़ी ने सीटी दी और धीमी हो गयी, कुछ देर बाद रुक गयी। दोनों गाड़ी से उतरीं और सड़क के पार छांव भरे फुटपाथ पर चलने लगीं।
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दोनों अब बादाम के पेड़ों की छांव तले चलते हुए शहर के अंदर आ गयी थीं। वे दोनों एक गिरजा-सी लगने वाली जगह के सामने वाले मकान में पहुंचीं, औरत ने एक दरवाजे पर हल्का-सा धक्का दिया। अंदर से एक बिजली के पंखे के चलने की आवाज आ रही थी। दरवाजे में धीमे-से चरमराहट हुई— कौन है?
—फादर से मिलना चाहती हूं।
—अभी सो रहे हैं।
—बहुत ही जरूरी काम है, औरत के स्वर में दृढ़ता थी। चुपके से दरवाजा थोड़ा-सा खुला, एक मोटी-सी बूढ़ी औरत का चेहरा नजर आया, उसकी चमड़ी का रंग पीला था और बालों का रंग लोहे की तरह। मोटे शीशों वाले चश्मे के पीछे उसकी आंखें बेहद छोटी लग रही थीं।
—अंदर आ जाओ, उसने कहा और दरवाजा खोल दिया।
वे अंदर कमरे में गयी जो बासी फलों की गंध से महक रहा था। उस मोटी औरत ने लकड़ी की एक बेंच दिखा कर उन्हें बैठने का इशारा किया। लड़की बैठ गयी, उसकी मां अपने हैंड बैग को मजबूती से पकड़े हुए, अनिश्चित-सी खड़ी रही। कमरे में पंखे की आवाज तैर रही थी।
मोटी औरत दूसरे कमरे से लौट कर एक दरवाजे पर खड़ी हो गयी।
—कह रहे हैं, तीन बजे के बाद आना। वह बहुत धीमी आवाज में कह रही थी — अभी पांच मिनट पहले लेटे हैं।
—साढ़े तीन बजे की गाड़ी पकड़नी है। औरत ने कहा।
वह थोड़ा ही बोली, लेकिन उसकी आवाज भली लग रही थी। मोटी औरत पहली बार मुस्कुरायी।
—ठीक है, उसने कहा।
वह दरवाजा फिर बंद हो गया, वह अपनी लड़की के साथ ही बैठ गयी। वह कमरा सादा-सा था, लेकिन साफ-सुथरा।
इस बार दरवाजा खुलने पर स्वयं फादर बाहर निकल आया, रूमाल से अपने चश्मे का कांच पोंछता हुआ। जैसे ही उसने चश्मा पहना, साफ हो गया कि वह उस औरत का भाई ही है।
—क्या मदद कर सकता हूं?
—कब्रिस्तान की चाबी चाहिए।
लड़की गुलदस्ता गोद में रखे, टांग-पर-टांग उठाये बैठी हुई थी, फादर ने पहले उसे देखा, फिर उसकी मां को, फिर वह खिड़की से बाहर मेघरहित आकाश की ओर देखने लगा।
—इतनी गर्मी में, उसने कहा— धूप नरम पड़ने तक इंतजार कर लो।
औरत ने खामोशी से अपना सिर हिला दिया। फादर ने एक अलमारी खोली, उसके अंदर से नोटबुक निकाली, एक कलम और दवात भी, और उन्हें मेज पर रख कर बैठ गया।
—किसकी कब्र पर जाना है? उसने पूछा।
—कार्लोस संतैनो की, औरत ने जवाब दिया।
—कौन?
—कार्लोस संतैनो। औरत ने दोहराया।
पादरी की समझ में अभी तक नहीं आया था।
—वही चोर, जो पिछले हफ्ते यहां मारा गया था, औरत ने उसी तरह कहा— मैं उसकी मां हूं।
फादर ने ध्यान से उसे देखा। वह भी उसे घूरने लगी, फादर ने अपनी आंखें मोड़ लीं। वह सिर झुका कर कुछ लिखने लगा। उसने लिखते-लिखते उससे उसका पता-ठिकाना पूछा। वह इस तरह बताने लगी जैसे वह कुछ पढ़ रही हो। फादर पसीना-पसीना हो रहा था। लड़की ने अपने दोनों जूते खोल कर पैर बेंच पर टिका दिये थे।
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पिछले सोमवार की घटना थी। यहां कुछ दूर एक मकान में रेबेका नाम की एक विधवा ने कुछ आवाज सुनी। बारिश हो रही थी, उसे लगा कि सामने वाले दरवाजे को कोई जबरदस्ती खोलना चाहता है। उसने सतर्कता के साथ अपनी अलमारी से एक पुराना रिवाल्वर निकाला और अंधेरे में ही बैठकर घर में चली आयी। पिछले अट्ठाइस वर्षों ने उसके भीतर एक अजीब-से भय की सृष्टि कर दी थी। वह इसी भय के प्रभाव में आंखें बंद किये हुए दरवाजे तक पहुंची। अंदाजे से उसने दरवाजे के छेद पर रिवाल्वर की नली रखी और उसी तरह आंखें बंद किये हुए थोड़ा दबा दिया। अपने जीवन में उसने पहली बार पिस्तौल चलायी थी। गोली छूटने के तुरंत बाद भी उसे टीन की चादर वाली छत पर बारिश की आवाज ही सुनायी पड़ी। फिर तभी उसने बरामदे में कुछ भारी-सी-चीज गिरने की आवाज सुनी, कोई कराह—आह, मां।
अगले दिन सुबह लोगों ने देखा, उस आदमी की नाक उड़ गयी थी। उसके शरीर पर एक धारियों वाली कमीज थी, उसने पैंट पर बेल्ट की बजाय रस्सी कसी हुई थी और वह नंगे पैर था, शहर में किसीने उसे नहीं पहचाना।
—तो उसका नाम था कार्लोस संतैनो। फादर बुदबुदाया। वह लिख चुका था।
—कार्लोस संतैनो अयाला, औरत बोली —मेरा इकलौता लड़का था वह।
फादर ने अलमारी के पास जा कर उसे खोला और उसके अंदर से दो जंग लगी चाबियां निकालीं, उसने चाबियां नोटबुक पर रखीं और उस जगह की ओर इशारा करके कुछ दिखाने लगा, जहां वह अभी लिखता रहा था— दस्तखत करो।
औरत ने हैंडबैग बगल के नीचे दबाया और नोटबुक पर अपना नाम लिख दिया। लड़की गुलदस्ता लिए खड़ी हो गयी और ध्यान से अपनी मां का चेहरा देखने लगी, फादर ने आह भरी।
—तुमने कभी उसे अच्छे रास्ते पर लाने की कोशिश नहीं की?
—वह बहुत अच्छा था।
फादर ने पहले औरत को देखा, फिर लड़की को, और यह उसे बेहद आश्चर्यजनक लगा कि वे दोनों बिल्कुल नहीं रोयीं।
औरत कह रही थी — मैं उससे कहती रहती थी कि वह कभी किसी के खाने की चीज न चुराये, और वह मेरी बात पर ध्यान देता था। उसे बॉक्सिंग का बेहद शौक था और वह अक्सर चोटें खा कर तीन-तीन दिन बिस्तर पर पड़ा रहता था।
—उसे अपने सारे दांत निकलवाने पड़े थे, लड़की ने बीच में ही दखल दिया।
—ठीक कह रही है, जब भी मैं खाने बैठती तो मुझे अपने बेटे पर पड़ी हुई मार की याद आ जाती, मुझे लगता, जैसे मेरे मुंह पर घूंसों की मार पड़ी हो और . . .
—परमात्मा की इच्छा कौन टाल सकता है, फादर ने कहा। उसका स्वर सपाट था, शायद एक तो अनुभव के कारण, वह कुछ शंकालु स्वभाव का हो गया था, दूसरे गर्मी के कारण भी। उसने उन्हें लू से बचने के लिए सिर ढंक लेने को कहा। उसने उबासी ली तो उनींदा-सा लग रहा था। उसने उन्हें कार्लोस संतैनो की कब्र तक पहुंचने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश बताये। उसने यह भी कहा कि वापसी में दरवाजा खटखटाने की जरूरत नहीं। चाबी दरवाजे के नीचे रख दी जाये, और वहीं हो सके तो गिरजा के लिए कुछ चढ़ावा भी।
फादर ने महसूस किया था कि बाहर से कोई अंदर देखने की कोशिश कर रहा था। दरअसल बाहर कुछ बच्चे इकट्ठा थे। जैसे ही दरवाजा खुला वे इधर-उधर बिखर गये, ऐसे समय पर अक्सर सड़क खाली रहती थी, लेकिन अब बच्चे ही नहीं थे, काफी बड़ी उम्र के लोग भी बादाम के पेड़ों के नीचे इकट्ठा होने लगे थे। फादर ने एक बार सड़क की चिलचिलाती धूप का मुआयना किया, बात उसकी समझ में आ गयी थी, उसने दरवाजा फिर से बंद कर लिया।
—जरा ठहरो, उसने औरत की ओर बिना देखे ही कहा।
उसकी बहन भी कमरे में आ गयी थी, उसने माई की ओर चुप-चाप देखा।
—क्या बात थी? उसने पूछा।
—लोगों को पता चल गया है, वह मद्धिम स्वर में बोलीं।
—पीछे के दरवाजे से निकल जाओ, अच्छा रहेगा।
—यही हालत है, वह बोली—लोग अपनी खिड़कियों पर जमा हो गये हैं।
यह सब औरत की समझ में नहीं आ रहा था, उसने खिड़की से बाहर कुछ देखने की कोशिश की, उसने लड़की के हाथ से गुलदस्ता ले लिया और दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी, लड़की उसके पीछे-पीछे हो ली।
—धूप कम होने तक इंतजार कर लो, फादर ने पीछे से कहा। hu
—धूप तेज है, पिघल जाओगी, उसकी बहन बोली—ठहरो, छतरी ले जाओ।
—धन्यवाद, औरत ने जवाब दिया— हम ऐसे ही ठीक हैं, उसने लड़की का हाथ पकड़ा और दोनों सड़क पर चलने लगीं।
(अनुवाद : देवेंद्र मोहन)
सारिका / जनवरी, १९७३

