प्रज्ञा विश्नोई की कहानी ‘फ़िल्म थियेटर में एक शाम’

प्रज्ञा विश्नोई समकालीन लेखकों में सबसे अलग हैं। प्रचार-प्रसार से दूर चुपचाप लेखन कर रही हैं। बहुत अलग लिखती हैं, जैसे यह कहानी- मॉडरेटर 

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फ़िल्म शुरू हो चुकी थी पर मेरा ध्यान अभी भी अपने बगल वाली सीट पर बैठी हुई लड़की/स्त्री/लड़की के घुटने पर गिरे/टिके एक पॉपकॉर्न पर जमी हुई थी। लड़की का गहरा नीला पैंट उसके परिष्कृत रहन सहन को दर्शा रहा था। मेरा मन तो कर रहा था कम से कम उसका चेहरा तो देख ही लूँ। पर थिएटर में घुप अँधेरा होने के बावजूद भी नज़र घुमाकर उसके चेहरे को देखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। और जब तक घुटने पर उस पॉपकॉर्न का मैं कुछ कर नहीं देती, तब तक थिएटर के पर्दे पर नज़र उठाकर फ़िल्म देखना मेरे लिए असंभव था। उस पॉपकॉर्न के साथ मैं क्या करना चाहती थी? पता नहीं। शायद उसके घुटने से पॉपकॉर्न को झाड़ उसे दूर फ़ेंक देती या शायद नाक बहाते, माँ बाप से थप्पड़ खाते छोटे बच्चों की तरह वह घुटने पर से उठाया पॉपकॉर्न मैं अपने मुंह में ही डाल लेती। पर उस पॉपकॉर्न को लड़की के घुटने पर देखना मुझे उतना ही विचलित और उत्तेजित कर रहा था जैसे फ़िल्म टिकट के लिए लगी लम्बी लाइन में कभी अपने सामने खड़े व्यक्ति को ज़ोर से उसके लहूलुहान होने तक मारने या उसका चेहरा अपनी और घुमा उसे चूमने या काँच के उस पार ज़ेन भिक्षुक से बैठे टिकट देने वाले व्यक्ति को ज़ोर ज़ोर से झंझोड़ने का मन होता है। 

लड़की शायद फ़िल्म देखने अकेली आयी है। तभी उसकी आवाज़ अब तक एक बार भी नहीं सुनाई दी। यदि उसके साथ और लड़कियाँ आयी होतीं, तो अब तक उनके बनावटी ठहाके सुन सुनकर मेरे कान पक जाते और यदि उसके साथ लड़का आया होता, तो उन दोनों की शिष्टता का ढोंग करती हुई फुसफुसाहट सुनकर अपनी लार के साथ जाने कितनी गालियों को निगल जाना पड़ता। पर लड़की का कद अच्छा है। कम से कम उसकी लम्बी टांगों से यह तो साफ़ दिख ही रहा है। लड़की की सुंदरता का तो पता नहीं, पर लड़की आकर्षक अवश्य है ऐसा मेरा अनुमान है। कोई ऐसी जिसकी सोहबत में एक बार भी आना चाहे लड़का हो या लड़की, उनकी शान में थोड़ा तो इज़ाफ़ा कर ही देता है। इस लड़की के साथ अपने कमरे की ज़मीन पर रविवार की शाम को एक बाउल नूडल्स खाना कितना सुखद अनुभव होता होगा! नहीं? नूडल्स खाने वाले दिवास्वप्न को भेदती हुई एक बच्चे के रोने की आवाज़ मेरे कानों से टकराकर वापिस चली जाती है। मैंने कहीं पढ़ा था कि जब तक बच्चे बोलना शुरू नहीं करते, तब तक उनके पूर्वजन्म की स्मृतियाँ उनके चित्त में बिना बिगड़े हुए बनी रहती हैं। पर पता नहीं जब हम पशु पक्षी तो दूर, भाषा के पूर्व के मनुष्य को ही नहीं जान सके हैं, तो क्यों ही वैज्ञानिक निर्जीव मशीनों की भाषा खुद समझने और उन निर्जीव मशीनों को भाषेत्तर मनुष्य की भाषा समझाने के हरसंभव जतन करते रहते हैं। जो बुद्धिमत्ता पहले से ही बरगद के तने, सदियों द्वारा घिसे हुए पत्थर, कौवे की दृष्टि, गर्दभ की स्थिर स्वीकृति, शिशु के पनीले दृगों में होती है, कुछ समय ठहरकर उसी को समझने-गुनने का प्रयास क्यों नहीं करते?

मेरे बगल बैठी लड़की की गोद से कौवे की काँव काँव की आवाज़ आती है। मैं चौंककर उसके घुटने पर गिरे पॉपकॉर्न से थोड़ा ऊपर देखती हूँ तो पाती हूँ कि उसकी गोद में कौवा नहीं, उसके सेलफोन की रिंगटोन बोल रही थी। मेरे सीने के भीतर चल रहे इंजन की गति थोड़ी बढ़ जाती है। अब वो फ़ोन उठाएगी तो उसकी आखिरकार उसकी आवाज़ सुनने मिलेगी। साथ ही हो सकता है उसकी बातों से उसके बारे में कुछ जानने का भी मौका मिल ही जाए। 

फिर से कौवे की काँव काँव की आवाज़ आती है पर थिएटर के पर्दे के अंदर से। 

काँव-काँव-काँव, ये पहली बार नहीं था कि जब मुझे ऐसा लग रहा था कि मुझे कोई देख रहा है। कौवे का स्वर था, पर धुंध इतनी थी कि न ही उसकी छाया थी न ही रूप। यदि कौवे के पास उसका कर्कश स्वर भी न होता, तो कौवे के होने का मुझे कैसे पता चलता। और बिना रूप, बिना छाया, बिना स्वर के खुद काग को उसके अस्तित्व का भान कैसे होता होगा? शायद वैसे ही जैसे मुझे अपने ऊपर टिकी एक नज़र का भान अभी हो रहा है? मैं नहीं जानती कि वह कौन या क्या है जो मुझे देख रहा है पर इतना ज़रूर जानती हूँ कि नज़र रखने वाले का सबसे बड़ा खौफ खुद का देखा जाना होता है। सो मैं उस नज़र को पलट कर देखती हूँ। 

मेरे बगल की सीट पर बैठी स्त्री अब भी उसके घुटने पर गिरे पॉपकॉर्न की और मेरी नज़र से अनजान बैठी है। वहीं दूसरी ओर जैसे ही मैंने काँवकाँवकाँव की आवाज़ आने पर थिएटर के पर्दे के उस पार फ़िल्म की नायिका को देखा, फ़िल्म की नायिका ने पलट कर मुझे देखा। संवाद होने और न होने की शर्तें क्या होती हैं? क्या स्थानिक, कालिक, लैंगिक, नस्लीय, वैचारिक, प्रजाति की निकटता संवाद को सुनिश्चित करती है? यदि ऐसा होता तो फ़िल्म के अंदर नायिका से यात्रा के दौरान मिली रोमानी लड़की उससे झूठ क्यों कहती कि युद्ध में मारा गया नायिका का भाई अब भी जब तब लड़की से अपने परिवार का भविष्य देखने की विनती करता रहता है। यह दृश्य फ़िल्म का हिस्सा नहीं है, पर संवाद केवल मृत्यु की दहलीज़ के आर-पार ही नहीं, उन्नीसवीं शताब्दी के किसी ऊबे हुए रईस की कल्पना द्वारा रचे गए किरदार और उसकी कल्पना के ऊपर दो सदियों बाद किसी और की कल्पना का चश्मा चढ़ाकर देखने वाली दर्शक के बीच भी होता है।

अपने घुटने में मुझे कुछ फँसा, कुछ धँसा सा महसूस होता है। इधर उधर देखकर मैं अपनी स्कर्ट ज़रा सी उठाती हूँ। यूँ तो बग्घी कारपैथी पर्वतों और मुँह बाए सब कुछ निगलने को तैयार घाटी के बीच तंग गलियारे पर चल रही है, जहाँ सूर्यास्त के समय इंसान की लोथ के एक टुकड़े के लिए झपटते-भागते भेड़ियों का झुण्ड, कौवे का स्वर, मौत से दूर (या मौत की तरफ भागते?) घोड़े के बेचैन खुरों का शोर तो है, पर किसी मनुष्य की तांकाझांकी की संभावना लगभग शून्य है। गाड़ीवान जब घोड़े पर चाबुक बरसाता है, तो उसके इस कृत्य में पीछे बैठी स्त्री के प्रति उत्सुकता का लेशमात्र भी अस्तित्व नहीं होता, वरन एक ऐसे डर की बू आती है, जिसकी भयावहता को स्वयं में समेट सकने वाले नाम का ईजाद करने से अभी मानव जाति वर्षों दूर है। मेरे घुटने की त्वचा को फाड़ती हुई एक मकड़ी निकलती है। उसके साथ उस रोमानी लड़की का स्पर्श भी मुझे मुक्त कर देता है जिसकी तारनुमा अँगुलियों के पोरों में युद्ध में मर चुके उसके भाई के भूरे बालों की मुलामियत और बम के गोले से दहल चुके नायिका के सहोदर के अस्तित्व की चीखें दोनों सिमटी हुई थीं।

मेरे बगल बैठी हुई स्त्री अचानक से मेरा हाथ ऐसे जकड़ लेती है जैसे मेरी लोथ के एक भाग को किसी खूंखार पहाड़ी भेड़िये ने अपने दांतों के बीच जकड़ लिया हो। पीछे बैठे युगल अपने प्रेमालाप में इतना खो गए थे कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि कब उनकी खुली छूटी कोल्ड ड्रिंक की बोतल उन्हीं का धक्का लगने से उनके बगल बैठे दर्शक पर फ़ैल गयी है और युगल और दर्शक के बीच हर भाषा, बोली में गालियों का आदान प्रदान हो रहा है। अश्लील युवा, प्रेम से जलने वाले जलकुकड़े अंकल-आंटी जैसे लेबल मुफ़्त में बांटे जा रहे हैं। और जैसा हर बार होता है, भीड़ फ़िल्म देखना छोड़ दो भागों में बँटकर लड़ने के लिए अपने अपने साथी चुन रही है। प्रेम गलत है या अकेलापन? सब कुछ गलत है और गलत नहीं भी क्योंकि सब कुछ सच है और झूठ भी। बिलकुल इस फ़िल्म की तरह, बिल्कुल तुम्हारे, मेरे, हमारी तरह। मैंने अपने बगल बैठी स्त्री/लड़की/स्त्री को देखा। उसने फ़िल्म की नायिका का चेहरा पहन रखा था। या शायद जिस भेड़िये ने मेरा हाथ जकड़ रखा था, उसका चेहरा भी कुछ कुछ ऐसा ही तो था। या उस कौवे का जिसे न अभी तक मैं देख पायी थी, न ही फ़िल्म की नायिका, कहीं वो भी तो मेरे बगल बैठी स्त्री का ही तो चेहरा नहीं पहनता था? पर उस स्त्री/लड़की/स्त्री की आवाज़ बिल्कुल वैसी ही थी जैसे उस स्त्री/लड़की/स्त्री की आवाज़ होनी चाहिए थी। 

“तुम इसे देख रही थीं?” थिएटर के पर्दे के उस पार से नायिका कैमरे की ओर अपना घुटना दिखाते हुए पूछती है। मैं अपनी नज़र झुका लेती हूँ। स्त्री मेरा हाथ अपने घुटने की ओर ले जाती है और उसका हाथ (या मेरा हाथ?) उसके घुटने पर पड़े पॉपकॉर्न को उठाकर मेरे मुंह के भीतर डाल देता है। लवण, लार और हिचकी-गले-और मुख जैसे एक दूसरे से लिपटे, एक दूजे में घुले हुए भय-आवेग-मदभरी उत्कंठा मेरे मुँह के भीतर की रिक्तता को भर लेते हैं और मकड़ी के हज़ारों हाथ मेरे होठों, मेरे गले, मेरे फेफड़ों, मेरे उदर को भीतर से बाहर की ओर दबोच लेते हैं और मुझे दूर से आता हुआ स्त्री का (या नायिका या भेड़िया या कौवे का?) कहकहा सुनाई देता है, जैसे किसी दूसरे कमरे से बाहर रिसकर आता हुआ संगीत हो, “यदि रविवार को तुम घर पर हो, तो क्या मैं तुम्हारे साथ एक बाउल नूडल्स खा सकती हूँ?” अब मेरे हाँ या न की औपचारिकता की कोई आवश्यकता नहीं रह गयी थी, जैसे मृत्यु के सामने किसी शब्द के लिए स्थान और समय शेष नहीं रह जाता।

और इस तरह दो पर्दों के आर पार अनगिनत नज़रों से घिरी हुई मैं, सिनेमा के दो पर्दों के बीच खुद को निरी अकेली पाती हूँ। मेरे गले के भीतर कैद कौवे के पंखों की फड़फड़ाहट मुंह तक आते आते कसैले लार में बदल जाती है।

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