जिनका जीवन ही साहित्य था

२१ जुलाई को नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखक अर्नेस्ट हेमिंग्वे का जन्मदिन था. उस अवसर पर हमने उनकी एक छोटी सी कहानी छापी थी. आज प्रस्तुत है यह लेख जो उनके जीवन और लेखन को लेकर है- प्रभात रंजन

नोबेल पुरस्कार प्राप्त अमेरिकी लेखक हेमिंग्वे की गिनती अंग्रेजी के महान लेखकों में की जाती है. हेमिंग्वे के जीवन के संदर्भ में जुलाई का विषेष महत्त्व है। 21 जुलाई को जन्मे इस लेखक ने इसी महीने की 2 तारीख को आत्महत्या कर ली थी। प्रसंगवश, काफ्का का जन्म 3 जुलाई को हुआ था। दोनों लेखकों में एक समानता और ढूंढी जा सकती है- दोनों ही लेखकों के बारे में यह माना जाता है कि का बीसवीं शताब्दी के साहित्य पर उनका युगांतकारी प्रभाव पड़ा।

हेमिंग्वे ने लिखा है कि जीवन के बारे में लिखने से पहले आपको उसे जीना अवश्य चाहिए। यही कारण है शायद कि हेमिंग्वे ने केवल विविधतापूर्ण लेखन ही नहीं किया उनका जीवन भी विविधताओं से भरपूर रहा। ग्रेजुएशन की पढाई पूरी करने के बाद आगे पढ़ाई में उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई। उनके डॉक्टर पिता चाहते थे कि हेमिंग्वे उच्च शिक्षा प्राप्त करें मगर हेमिंग्वे ने जीवन की पाठशाला को शिक्षा के लिए अधिक माकूल पाया। उन्होंने एक लोकप्रिय समाचारपत्र में संवाददाता के रूप में काम करना आरंभ किया।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान हेमिंग्वे ने बड़ी कोशिश की कि उनको सैनिक के रूप में युद्ध में शामिल होने का मौका मिल जाए। हेमिंग्वे की आंखें कमजोर थीं इसलिए सैनिक बनने की उनकी हसरत तो पूरी नहीं हो पाई मगर इस युद्ध को करीब से देख पाने की उनकी इच्छा जरूर पूरी हुई। रेडक्रास संस्था को इस युद्ध में एम्बुलेंस चलाने के लिए बड़े पैमाने पर ड्राइवरों की आवश्यकता पड़ी और ड्राइवर के रूप में युद्ध से जुड़ने का उनको मौका मिल गया। युद्ध के दौरान वे बुरी तरह घायल हुए, एक नर्स की सुश्रुषा से उनकी जान बची,उससे उनको प्यार भी हुआ। यह उनका पहला मगर असफल प्यार था।

हेमिंग्वे के अत्यंत प्रसिद्ध उपन्यास फेयरवेल टु आर्म्स को समझने के लिए उनके इस जीवन संदर्भ को समझना आवश्यक है। एक एम्बुलेंस चालक और नर्स की इस प्रेमकथा के विषय में कहा जाता है कि युद्ध और प्रेम को आधार बनाकर अमेरिका में जितने उपन्यास लिखे गए हैं इसका स्थान उनमें अन्यतम है। आज भी युद्ध को संदर्भ बनाकर लिखे गए उपन्यासों के प्रसंग में इस उपन्यास का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। फेयरवेल टु आर्म्स उपन्यास के प्रकाशन के समय हेमिंग्वे की उम्र महज २७ साल थी। वैसे इस उपन्यास के प्रकाशन के पूर्व द सन ऑल्सो राइजेज उपन्यास के प्रकाशन के साथ हेमिंग्वे अमेरिका में नई पीढ़ी के संभवनाशील उपन्यासकार के रूप में अपनी पहचान दर्ज करवा चुके थे। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जवान होने वाली पीढ़ी को ध्यान में रखकर लिखे गए इस उपन्यास के साथ साहित्य में लॉस्ट जेनरेशन का मुहावरा प्रचलित हुआ। लॉस्ट जेनरेशन यानी वह पीढ़ी जिसके सपने, जिसकी उम्मीदें युद्ध की भेंट चढ़ गए।

युद्ध हेमिंग्वे के लिए जीवन भर आकर्षण का कारण बना रहा। स्पेन का गृहयुद्ध पत्रकार के रूप में उन्होंने बहुत करीब से देखा, चीन पर जापान के अतिक्रमण की घटना के वे गवाह बने। प्रथम विश्वयुद में उन्होंने बतौर एम्बुलेंस ड्राइवर हिस्सा लिया था, द्वितीय विश्वयुद्ध की वीभिषिका को उन्होंने वार कॉरसपौंडेंट के रूप में कवर किया। स्पेन के गृहयुद्ध के दौरान हेमिंग्वे वहां चार बार गए। गृहयुद्ध के अनुभवों को आधार बनाकर उन्होंने फॉर हूम द बेल टॉल्स जैसा उपन्यास लिखा। कुछ आलोचक इसे उनका सर्वश्रेष्ठ उपन्यास मानते हैं। द ओल्ड मैन एंड सी के बाद हेमिंग्वे का यह सबसे अधिक बिकने वाला उपन्यास है। स्पेन की बुलफाइटिंग को केंद्र में रखकर उन्होंने डेथ इन द आफ्टरनून उपन्यास लिखा जिसके बारे में यह कहा जाता है कि बुलफाइटिंग पर अंग्रेजी भाषा में लिखी गई यह सर्वश्रेष्ठ कृति है।

हेमिंग्वे का ऑब्सेशन केवल युद्ध तक ही सीमित नहीं था। वे शिकार-यात्राओं के शौकीन थे। अफ्रीका के जंगलों में की गई शिकार-यात्राओं को आधार बनाकर जब उन्होंने ग्रीन हिल्स ऑफ अफ्रीका नामक उपन्यास लिखा तो उसकी भूमिका में उन्होंने लिखा कि इस उपन्यास की घटनाएं और इसके पात्र काल्पनिक नहीं हैं। उनकी कई कहानियों में जंगल के जीवन का चित्रण है। ताउम्र हेमिंग्वे एक ऐसे लेखक की मिसाल बने रहे सक्रियता जिनके जीवन का महत्वपूर्ण आयाम थी। उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं लिखा जिसका जीवन में उन्होंने अनुभव न किया हो।

मछली का शिकार हेमिंग्वे के जीवन का सबसे बड़ा खब्त था। कहते हैं कि क्यूबा में हवाना शहर के सीमांत पर एकांत में उन्होंने इसलिए घर बनवाया था ताकि मछली का शिकार करने में किसी तरह की बाधा न आए। प्रसंगवश, हेमिंग्वे का सबसे लोकप्रिय उपन्यास द ओल्ड मैन एंड द सी माना जाता है। इसी उपन्यास के प्रकाशन के बाद उनको साहित्य का नोबेल पुरस्कार(1954) मिला। उपन्यास में एक मछुआरे के अदम्य साहस और जिजीविषा की कहानी कही गई है।

हेमिंग्वे के उपन्यासों की छाया में अक्सर उनकी कहानियों की चर्चा कम होती है। लेकिन एक प्रसिद्ध अमेरिकी आलोचक का मानना है कि अगर हेमिंग्वे ने इतने जबर्दस्त उपन्यास न भी लिखे होते तो भी अपनी कहानियों की बदौलत साहित्य में उनको हमेशा याद किया जाता। वास्तव में हेमिंग्वे की कहानी कला ने दुनिया भर के लेखकों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया। द किलर्स, द शार्ट हैप्पी लाइफ ऑफ फ्रांसिस मैकंबर, ए क्लीन वेल लाइटेड प्लेस, हिल्स लाइक वाइट एलिफैंट, द स्नो ऑव किलिमंजारो जैसी उनकी प्रसिद्ध कहानियों की विशेष शैली को बाद में आलोचकों ने हिडेन फैक्ट की संज्ञा दी। इस शैली में कहानी में अक्सर उस बात की कोई चर्चा नहीं होती कहानी जिस घटना के बारे में होती है। कहा जाता है कि हेमिंग्वे की सर्वश्रेष्ठ कहानियां वे हैं जिनमें मानीखेज चुप्पियां हैं।

अपने जीते-जी हेमिंग्वे एक मिथकीय व्यक्तित्व बन चुके थे। मगर अपार लोकप्रियता और सफलता के बावजूद वे अवसाद और निराशा के मरीज बन गए। जीवन को लेकर उनक मानक बहुत उंचे थे। जीवन भर वे किसी और बेहतर जीवन की तलाश करते रहे। उनके एक जीवनीकार ने लिखा है कि वे एक साथ एक समय में सब कुछ पा लेना चाहते थे और उसी क्षण उनकी इच्छा कुछ भी न पाने की होती थी। उन्होंने चार विवाह किए, असंख्य प्रेम किए और मरने के बाद अपने गुप्त जीवन की अनेक किंवदंतियां छोड़ गए। उनके साहित्य की तरह ही उनके जीवन के प्रति भी पाठकों का आज तक आकर्षण बना हुआ है।

हेमिंग्वे के बारे में कहा जाता है कि वे अपने लेखन में आला दर्जे के परफेक्शनिस्ट थे, जीवन में भी इसी पूर्णता की तलाश उन्हें थी। शायद अपने मानको के आधार पर उस पूर्णता को न पा सकने के कारण ही उन्होंने आत्महत्या का मार्ग चुना। अपने जीवन, अपने साहित्य से पूर्णता की उम्मीद रखने वाला यह लेखक लगता है मृत्यु को भी पूर्णता में पाना चाहता था। कहते हैं कि २ जुलाई १९६१ को कनपटी में गोली मारकर आत्महत्या करने से पहले पहले करीब एक साल तक उन्होंने कनपटी में खाली पिस्तौल सटाकर गोली चलाने का अभ्यास किया था। कहा जाता है कि हेमिंग्वे का परिवार अभिशप्त था। हेमिंग्वे के डॉक्टर पिता ने भी आत्महत्या की थी, बाद में उनके भाई ने भी जीवन का अंत करने के लिए आत्महत्या का मार्ग चुना और काफी बाद में उनकी एक पोती ने भी आत्महत्या की।

मरने के करीब ५० सालों के बाद भी हेमिंग्वे के लेखन, उनके जीवन के प्रति लोगों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। इंटरनेट के दौर में हेमिंग्वे के चाहने वालों ने हेमिंग्वे डॉटकॉम बनाया। हर हफ्ते करीब १२ हजार लोग इस वेबसाइट पर हेमिंग्वे के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के उद्देश्य से आते हैं। यह हेमिंग्वे की लोकप्रियता का प्रमाण है और उस प्रभाव का भी जिसके कारण उनकी गणना बीसवीं शताब्दी के महानतम लेखक-व्यक्तित्वों में की जाती है। वे एक ऐसे लेखक थे जिनके लिए जीवन ही साहित्य था।

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