जानकी पुल आज से अपने नए रूप में औपचारिक रूप से काम करने लगा है. पिछले कई महीने से मेरे युवा साथी निशांत सिंह इसे नया रूप देने के काम में लगे थे. बहुत मेहनत का काम इसलिए था क्योंकि ब्लॉगस्पॉट से इस नए मंच पर पिछली सारी सामग्री डालने का काम करना था. निशांत जी ने बड़े धैर्य के साथ यह काम किया. हम उनके आभारी हैं. हम इसके नए रूप की शुरुआत बाबुषा की कविताओं से कर रहे हैं. वसंत को युवाओं का महीना कहा जाता है और हाल के वर्षों में जिन युवाओं ने अपनी रचनाओं से विशेष पहचान बनाई है बाबुषा उनमें से एक हैं. बाबुषा के बारे में ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ अखबार ने लिखा था कि पिछले साल इन्टरनेट पर इनकी कविताएँ सबसे अधिक पढ़ी गई. निस्संदेह उनकी पहचान अपने लेखन, अपनी कविताओं से बनी है. आज उनकी कुछ नई कविताएँ- मॉडरेटर
1.
इस सभ्यता में पथराना
दुनिया भर के बाग़ियों पर जितने पत्थर मारे गए
संभव है कि सब मेरे ही दिल में आ जमा हुए हों
वैसे दिल का पथरा जाना कोई अच्छी बात तो नहीं
पर जीवन को इस तरह से भी समझा जाए
कि दिल मोम होना ज़रूर बुरी बात है
विदा के क्षण आत्मा के शव पर मोमबत्ती भी नहीं जलाता कोई
चुल्लू भर रौशनी में डूब मरने को एक मोम दिल ही बहुत काफ़ी है
देह के जर्जर खंडहर में आ बैठते निठल्ले चील-कौव्वे
स्मृतियों की काँव-काँव गूँजती है
फिर किसी और शव की गंध पाते
किसी और ठिकाने उड़ जाते हैं परिन्दे
सारी भाषाएँ चुक जाती हैं कठोर चुप्पियों के द्वार पर
चुप्पी ही खटखटाती है चुप्पी ही खोलती साँकल
चुप की अँधेरी कोठरी में चुप्पियाँ रह जाती हैं
प्रेम का भव्य स्मारक है ताजमहल
कैसा पथरीला वैभव
जिसके भीतर चुप सोता प्रेम
करुणा की कोमल मूरत हैं बुद्ध
ये और बात है कि मूरत भी तो पत्थर की ठहरी
भव्यता प्रेम का आविष्कार है
पथराया हुआ उदास ईश्वर प्रेम की खोज
तन का ऐश्वर्यपूर्ण नाच है श्वास
पर मेरी छाती में धड़कनें ऐसे बच-बच के चलती हैं
मानो उनकी राह में बड़ा-सा पत्थर पड़ा हो
2.
हम चिड़ियों की चहक में बचे रहेंगे
चिड़िया को बहेलिये से बचाने के लिए
लड़ पड़ते हम बार- बार
चीखते-चिल्लाते
बिलख पड़ते स्याही की आवाज़ में
अंतरिक्ष ही है सकल संसार
जहाँ पहुँचती है चमक आवाज़ से भी पहले
कोई बात नहीं !
कि हम देर से पहुँचेंगे
पर जब भी पहुँचेंगे, हम बड़े ज़ोर से पहुँचेंगे
इस मूक- बधिर समय की
संकेत भाषा है कविता
टूट जाएँ टाँगें सत्य की
हम कलम को बैसाखी बना लेंगे
फूट जाएँ आँखें क़ानून की
तब भी हम ब्रेल में लिखेंगे
चूने लगें हमारे घरों की छतें
चटक जाएँ दीवारें
हम अपने पुरखों की कविता में
पनाह ले लेंगे
लिखेंगे अंतिम साँस तक
हम चिड़ियों की चहक में बचे रहेंगे
3.
बेदाग़
उन लोगों के पास जितनी कमीज़ें थीं
जितने रूमाल थे
उतने चेहरे
वो हर कमीज़ के साथ नया चेहरा पहनते थे
हर रूमाल से पिछला चेहरा पोछते
वो लोग अपनी परछाईं के आगे नहीं देख सकते थे
अपनी आवाज़ के सिवाय कोई आवाज़ नहीं सुन सकते थे
वो लोग
एक हाथ से गुलाब देते दूजे से चाक़ू भोंक देते थे
रूमालों का अच्छा इस्तेमाल करते थे
उनके सारे चेहरे बेदाग़ रहते थे
4.
आभास
[ कवि का एकांतवास ]
कविता कुतरती है मेरे रेशमी एकांत को
किसी चंचल चूहे की तरह
मैंने कपड़े को पानी में बदलने का हुनर सीखा
तो चूहों ने झटपट मछली का रूप धर लिया
मैंने पानी को आकाश बनाने की विधि खोजी
तो मछलियों ने पंछियों में बदल जाने का जादू दिखाया
कविता
दरअसल मेरे एकांत पर सेंध लगाती है एक शातिर शिकारी की तरह
और मैं अपने मौन की रक्षा के लिए
कपड़ा पानी आकाश चन्द्रमा प्रपात या पेड़ में बदल जाती हूँ
अपने ही नाम की धमक से थर्राने वालों पर प्रकट नहीं होता सूर्य का रहस्य
टूटे सितारों की धूल बहुरूपियों पर झरती है
कभी-कभी कविता
मेरा आँगन बुहारने में असमर्थ अधटूटी झाड़ू हो जाती है
मुझे आभास है
एक दिन इस झाड़ू की सारी सींकें टूट कर धूल में मिल जाएँगी
एक दिन धूप धान धुन लकड़ी लोहा लोग सब गड्डमड्ड हो जाएँगे
एक दिन सारा ज़माना अपना ठिकाना हो जाएगा
एक दिन अपना नाम अपने से अजनबी हो जाएगा
एक दिन अपना पता दयार-ए-नबी हो जाएगा
प्रिय !
क्या तुम्हें झाड़ू के एक सींक से आकाश भेद देने की कला आती है ?
मुझे आभास है
एक दिन मैं पैदा होऊँगी धूल के एक कण से
आकाश चटक-चटक हर ओर झरेगा
एक दिन अपनी माँग में धूप भरूँगी
धूप,
जो किसी साधक सितारे की धूल है
एक दिन अपनी पाजेब में धूप जडूंगी
धूप,
जो किसी मायावी नर्तक का घुँघरू है
एक दिन धरती पर धूल का अंधड़ उड़ेगा
एक दिन दिशाएँ अचरज की छनछन से गूँज उठेंगी
एक आदिम नाच होगा
साँय साँय साँय की थाप पर
नमी दानम कि आख़िर चूँ दम-ए-दीदार मी रक्सम
बसद सामान-ए-रुसवाई सर-ए-बाज़ार मी रक्सम*
लचीले आकाश के कुछ नियम शाश्वत हैं
लय में उगने वाली सुबह को काटनी होती है प्रलय की रात
बहुरूपिया है धूल
बहुरूपिया चाँद
बहुरूपिया है कविता
बहुरूपिया कवि
बहुरूपिया सितारों की बारात
कविता
जीवन की कड़ी धूप पर बनती परछाई है
एक खुली छत है एकांत
झुलसी परछाइयों पर खुलता है सूर्य का रहस्य
बस ! इतनी सी है बात
[ * I do not know why at last to have a longing look, I dance. You strike the musical instrument and see everytime I dance, In whatever way you cause me to dance. O beloved ! I dance. – Bulleshaah ]
5.
दिसम्बर
[ अंत का पेड़ और सांता क्लॉज़ का बस्ता ]
सच से कहीं ज़ियादह तेज़ उड़ता है सच्ची कहानियों का पंछी
इस पेड़ में चहचहातीं असंख्य आज़ाद चिड़ियाँ
जिनके गीतों का आखेट करता है बुरी नज़रों का विषबुझा तीर
उमग कर सिर उठाए कितनी हरियल शाखें
अंजाने न्यौता दे बैठती हैं कुल्हाड़ी की भूखी धार को
सेब का नहीं अमरुद का भी नहीं
यह अंत का पेड़ है
जिसके फल दैत्याकार हैं
जिसकी जड़ें धरती की नमी पीते हुए बड़ी दूर तक फैली चली जाती हैं
अपनी खिड़कियों के पल्ले खोलो तो ज़रा
और देखो कि बर्फ़ पर उगा
यह अंत का पेड़ है
इसकी कोटर में छुपी है मिथाइल आइसोसाइनेट की ज़हरीली रात
जिसकी सुबह कहीं ढूँढे नहीं मिलती
इसकी फुनगियों पर एक मस्जिद की ईंटों के टुकड़े खिले हैं
इसके चौड़े तने के पीछे गुम गयी थीं किसी निर्भया की चीखें
रात ढलते ही उल्टे लटक जाता है इसकी किसी नरम डाल पर कंधार का प्रेत
अश्वत्थामा के घाव सा हरा है यह पेड़
इसकी हरियाली को दक्खनी सुनामी ने सींचा है
और सिकन्दर !
यह वही पेड़ तो है जिसकी छाँव में हम बैठा करते थे उँगलियों में उँगलियाँ फँसाए
मौसम बदलने के ठीक पहले तुमने कुछ क़समें उठाई थीं
जानते हो, इकतीस तारीख़ की उस रात मैं दुनिया की सबसे सुन्दर लड़की थी
मुझे लगा था..
मुझे लगा था तुम जान चुके हो कि मुझे बच्चों के संग स्टापू खेलना अच्छा लगता है
और पालक की भाजी मेरे दाँतों में ठीक वैसी ही उलझन पैदा करती है जैसे ब्रह्मकुमारियों को रंगीन वस्त्र
मुझे लगा था तुम जान चुके हो कि मैं बाँधती हूँ अपने केश में दोरंगे रिबन
और एक यॉर्कर बॉल बरसों से मेरे स्वप्न की गिल्लियाँ उड़ाया करती है
मुझे लगा था तुम जान चुके हो कि सड़क ख़ाली भी हो तो उसे पार करने में मुझे डर लगता है
और यह भी कि मेरी सबसे कोमल कामना और सबसे कठोर संकल्प नर्मदा के गहरे कानों में दर्ज हैं
आज इस पेड़ के तले अकेले बैठी मैं यह जान गयी हूँ कि तुमने मुझे जितना जाना वह भी बहुत है
कम-अज़-कम तुम इतना तो जानते हो कि
मेरा नाम बाबुषा है
मैं थोड़ा-बहुत कविता लिख लेती हूँ
और मेरी नाक पर एक तिल है
मगर तुम नहीं जानते कि कब समय इस पेड़ के तने जितना कठोर हो चला
मैं आज भी चुनती हूँ इस पेड़ के गंधहीन फूल
बरस भर टोकरी में भरती हूँ
इन दिनों
मैं आकाश को पहनाने के लिए एक माला पिरो रही हूँ
हक़ीक़त तो यह है कि हक़ीक़त से कहीं ज़ियादह कल्पना में किया है मैंने प्रेम
इस लिहाज़ से काल्पनिक ही है मेरी बेहोशी
और इस नियम से कल्पना के ही पर्वत में होगी कहीं संजीवनी बूटी
जबकि इस कल्पना के बाहर लहलहाता
मेरे वजूद का नन्हा पौधा
सांता क्लॉज़ के बस्ते में जगह पाना चाहता है
6.
सत्यान्वेषी
एक दिन हम सब 12×18 इंच के एक फ़ोटो फ़्रेम के भीतर सिकुड़ कर रह जाएँगे और हमारी मुस्कुराती शक़्लें अगरबत्ती के धुएँ के पीछे छुप जाएँगी. वो लोग जो जीवन भर हमारी फक्कड़ हँसी से ख़ौफ़ खाते रहे या हमारे मुक्त केश बाँधने के लिए चौड़े फीते बनाते रहे, हमारी अच्छाइयाँ गिनते नहीं थकेंगे. हमारी ज़िन्दगी की बड़ी से बड़ी ग़लती पर लाड़ के रेशमी पर्दे पड़े होंगे और हमारी छोटी-छोटी जीतों का आकार अचानक ज्यूपिटराना हो रहेगा. हम सब आगे या पीछे लगभग एक ही तरह की प्रतिक्रियात्मक स्मृति में टाँक दिए जाएँगे जहाँ कुछ घन्टों की सनसनी को दुःख कहते हैं.
जा रे ज़माना !
इतना भी क्या उथला जाना
गूगल के सहारे किसी को ढूँढा जा सकता
तो यक़ीनन सबसे पहले मैं खुद को ढूँढ़ निकालती
कोई पढ़ने या न पढ़ने वाला भी अगर मुझे जानना चाहे तो कृपया गूगल का भरोसा न करे
न ही उन्हें सुने जो मेरे जाने के बाद मेरी शान में कुछ कह रहे हैं
सुनना तो बस ! उन्हें,
जो कुछ नहीं कह पा रहे.
मेरा क़िस्सा ख़त्म होने पर कुछ ( एकदम कु छ ) लोग ज़रूर ऐसे बच रहेंगे जो जानते थे कि
मुझे सही होने की उतनी चाह नहीं है
जितनी कि सत्य होने की
दरअसल मेरे दोस्त !
ज़िन्दगी अपने आप में एक आतंकवादी हमला है
जिससे किसी तरह बच निकली कविता अपने क्षत-विक्षत टुकड़ों में भटकती
दुःस्वप्न बन अपने कवि की नींद चुनती है
हमारे दुःस्वप्न कितनी ही कविताओं का शमशान घाट हैं
हमारी कविताएँ आँखों देखी मौत का ऐतिहासिक दस्तावेज़
~ बाबुषा

