केदारनाथ सिंह की कविता ‘दुपहरिया’

आज सुबह चढ़ते चैत के महीने पर वरिष्ठ लेखक राकेश कुमार सिंह की पोस्ट लगाईं थी. लेकिन चैत के महीने में केदारनाथ सिंह के इस कविता के बिना कैसी बात बनेगी- मॉडरेटर

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झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,

उड़ने लगी बुझे खेतों से

झुर-झुर सरसों की रंगीनी,

धूसर धूप हुई मन पर ज्यों-

सुधियों की चादर अनबीनी,

दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की ।

साँस रोक कर खड़े हो गए

लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,

चिलबिल की नंगी बाँहों में

भरने लगा एक खोयापन,

बड़ी हो गई कटु कानों को ‘चुर-मुर’ ध्वनि बाँसों के वन की ।

थक कर ठहर गई दुपहरिया,

रुक कर सहम गई चौबाई,

आँखों के इस वीराने में-

और चमकने लगी रुखाई,

प्रान, आ गए दर्दीले दिन, बीत गईं रातें ठिठुरन की ।

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