युवा शायर #1 सालिम सलीम की ग़ज़लें

जानकीपुल की नई पेशकश-युवा शायर। इस सीरीज के तहत उर्दू में लिखने वाले युवा शायर/शायरा की रचनाएँ प्रकाशित की जाएँगी। आप लुत्फ़ अंदोज़ हों। हौसला अफ़ज़ाई करें। आज पढ़ें पहला पोस्ट, सालिम सलीम की ग़ज़लें – त्रिपुरारि

1.

कनार-ए-आब तिरे पैरहन बदलने का
मिरी निगाह में मंज़र है शाम ढलने का

ये कैसी आग है मुझ में कि एक मुद्दत से
तमाशा देख रहा हूँ मैं अपने जलने का

सुना है घर पे मिरा मुंतज़िर नहीं कोई
सो अब के बार मैं हरगिज़ नहीं सँभलने का

ख़ुद अपनी ज़ात पे मरकूज़ हो गया हूँ मैं
कि हौसला ही नहीं तेरे साथ चलने का

अब आ गए हो तो फिर उम्र भर यहीं ठहरो
बदन से कोई भी रस्ता नहीं निकलने का

‘सलीम’ शम्-ए-वजूद आ गई है बुझने पर
बस इंतिज़ार करो मोम के पिघलने का

2.

ज़माँ मकाँ से भी कुछ मावरा बनाने में
मैं मुंहमिक हूँ बहुत ख़ुद को ला बनाने में

चराग़-ए-इश्क़ बदन से लगा था कुछ ऐसा
मैं बुझ के रह गया उस को हवा बनाने में

ये दिल कि सोहबत-ए-ख़ूबाँ में था ख़राब बहुत
सो उम्र लग गई इस को ज़रा बनाने में

घिरी है प्यास हमारी हुजूम-ए-आब में और
लगा है दश्त कोई रास्ता बनाने

महक उठी है मिरे चार-सू ज़मीन-ए-हुनर
मैं कितना ख़ुश हूँ तुझे जा-ब-जा बनाने में

3.

ज़ेहन की क़ैद से आज़ाद किया जाए उसे
जिस को पाना नहीं क्या याद किया जाए उसे

तंग है रूह की ख़ातिर जो ये वीराना-ए-जिस्म
तुम कहो तो अदम-आबाद किया जाए उसे

ज़िंदगी ने जो कहीं का नहीं रक्खा मुझ को
अब मुझे ज़िद है कि बर्बाद किया जाए उसे

ये मिरा सीना-ए-ख़ाली छलक उट्ठेगा अभी
मेरे अंदर अगर ईजाद किया जाए उसे

वो गली पूछती है दर-ब-दरी के अहवाल
हाँ तो फिर वाक़िफ़-ए-रूदाद किया जाए उसे

4.

कुछ भी नहीं है बाक़ी बाज़ार चल रहा है
ये कारोबार-ए-दुनिया बेकार चल रहा है

वो जो ज़मीं पे कब से इक पाँव पर खड़ा था
सुनते हैं आसमाँ के उस पार चल रहा है

कुछ मुज़्महिल सा मैं भी रहता हूँ अपने अंदर
वो भी बहुत दिनों से बीमार चल रहा है

शोरीदगी हमारी ऐसे तो कम न होगी
देखो वो हो के कितना तय्यार चल रहा है

तुम आओ तो कुछ उस की मिट्टी इधर उधर हो
अब तक तो दिल का रस्ता हमवार चल रहा है

5.

दालान में कभी कभी छत पर खड़ा हूँ मैं
सायों के इंतिज़ार में शब भर खड़ा हूँ मैं

क्या हो गया कि बैठ गई ख़ाक भी मिरी
क्या बात है कि अपने ही ऊपर खड़ा हूँ मैं

फैला हुआ है सामने सहरा-ए-बे-कनार
आँखों में अपनी ले के समुंदर खड़ा हूँ मैं

सन्नाटा मेरे चारों तरफ़ है बिछा हुआ
बस दिल की धड़कनों को पकड़ कर खड़ा हूँ मैं

सोया हुआ है मुझ में कोई शख़्स आज रात
लगता है अपने जिस्म से बाहर खड़ा हूँ मैं

इक हाथ में है आईना-ए-ज़ात-ओ-काएनात
इक हाथ में लिए हुए पत्थर खड़ा हूँ मैं

6.

न छीन ले कहीं तन्हाई डर सा रहता है
मिरे मकाँ में वो दीवार-ओ-दर सा रहता है

कभी कभी तो उभरती है चीख़ सी कोई
कहीं कहीं मिरे अंदर खंडर सा रहता है

वो आसमाँ हो कि परछाईं हो कि तेरा ख़याल
कोई तो है जो मिरा हम-सफ़र सा रहता है

मैं जोड़ जोड़ के जिस को ज़माना करता हूँ
वो मुझ में टूटा हुआ लम्हा भर सा रहता है

ज़रा सा निकले तो ये शहर उलट पलट जाए
वो अपने घर में बहुत बे-ज़रर सा रहता है

बुला रहा था वो दरिया के पार से इक दिन
जभी से पाँव में मेरे भँवर सा रहता है

न जाने कैसी गिरानी उठाए फिरता हूँ
न जाने क्या मिरे काँधे पे सर सा रहता है

चलो ‘सलीम’ ज़रा कुछ इलाज-ए-जाँ कर लें
यहीं कहीं पे कोई चारा-गर सा रहता है

7.

हर एक साँस के पीछे कोई बला ही न हो
मैं जी रहा हूँ तो जीना मिरी सज़ा ही न हो

जो इब्तिदा है किसी इंतिहा में ज़म तो नहीं
जो इंतिहा है कहीं वो भी इब्तिदा ही न हो

मिरी सदाएँ मुझी में पलट के आती हैं
वो मेरे गुम्बद-ए-बे-दर में गूँजता ही न हो

बुझा रखे हैं ये किस ने सभी चराग़-ए-हवस
ज़रा सा झाँक के देखें कहीं हवा ही न हो

अजब नहीं कि हो उस आस्ताँ पे जम्म-ए-ग़फ़ीर
और उस को मेरे सिवा कोई देखता ही न हो

वो ढूँड ढूँड के रो रो पड़े हमारे लिए
सो दूर दूर तक अपना अता-पता ही न हो

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