अधूरेपन की पूरी कहानी

इस साल के चर्चित उपन्यासों में एक उपन्यास भगवंत अनमोल का उपन्यास ‘जिंदगी 50-50’ भी रहा है। उसकी एक समीक्षा आज पीयूष द्विवेदी भारत के शब्दों में- मॉडरेटर

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भगवंत अनमोल के उपन्यास ‘ज़िन्दगी 50 50’ के विषय में प्रचलित यह है कि इसका कथानक किन्नर समाज की त्रासदियों पर आधारित है, लेकिन इस बात में पूरी सच्चाई नहीं है। ये ठीक है कि उपन्यास का केन्द्रीय कथानक किन्नर जीवन की जद्दोजहद के इर्द-गिर्द ही घूमता है, लेकिन समग्रतः यह उन सभी व्यक्तियों की व्यथा-कथा है, जो अलग-अलग प्रकार के कथित शारीरिक अधूरेपन के कारण सामाजिक तिरस्कार और उपेक्षा सहते हुए हीनताबोध से ग्रस्त जीवन जीने को मजबूर होते हैं।

यह तो नहीं कहेंगे कि इस उपन्यास का विषय हिंदी कथा-साहित्य के लिए एकदम ही नया और अनूठा है, लेकिन इतना जरूर है कि इसपर अभी बहुत ज्यादा लेखन नहीं हुआ है। किन्नर समाज की त्रासदी को केंद्र में रखकर लिखे गए कथा-साहित्य में किन्नर कथा, यमदीप, गुलाम मंडी आदि कुछ पुस्तकों की ही चर्चा सुनाई देती है। इनके अलावा भी कुछ पुस्तकें हो सकती हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत अधिक नहीं होगी। उल्लिखित सब पुस्तकें लगभग एक दशक के अंदर ही आई हैं। जाहिर है, इस विषय पर हिंदी में काफी कम लिखा गया है और  कम लिखे जाने के कारण ही अभी इस विषय का प्रभाव क्षीण नहीं हुआ है जिस कारण इसमें रचनात्मकता की भरपूर संभावना शेष है। इस तथ्य के आलोक में जब ‘ज़िन्दगी 50-50’ हमारे सामने आती है, तो स्वाभाविक रूप से मन में एक प्रभावी कथानक की उम्मीद जाग उठती है।

उपन्यास की कहानी शुरू से ही तीन धाराओं में चलती है। इनमें दो धाराएं मुख्य पात्र अनमोल के अतीत और एक धारा वर्तमान से सम्बद्ध है।  कहानी की शुरुआत अनमोल के वर्तमान से होती है, जब वो पिता बनता है और उसे पता चलता है कि उसका पुत्र किन्नर है। यहाँ से कहानी अतीत में जाती है, जहां अनमोल अपने किन्नर भाई हर्षा के प्रति सामाजिक-पारिवारिक उपेक्षा व अत्याचारों को याद करता है। यहीं वो तय करता है कि उसके पिता ने उसके भाई के प्रति जो अन्याय किया, वो वह अपने पुत्र के साथ नहीं करेगा, वरन समाज से लड़कर अपने पुत्र को एक सार्थक जीवन देगा।

हर्षा का चरित्र नीरजा माधव के ऊपर वर्णित उपन्यास ‘यमदीप’ की नायिका नाजबीबी से बहुत हद तक प्रभावित प्रतीत होता है। पैदा होते ही परिवार की आँख का काँटा बन जाना, सामाजिक तिरस्कार झेलना, कम उम्र में ही पढ़ाई छुड़वा दिया जाना, आखिर मुख्यधारा के समाज की उपेक्षाओं से तंग आकर किन्नरों के पास जाकर पूरी तरह से किन्नर बन जाना – ये सब बातें ‘ज़िन्दगी 50 50’ की हर्षा को यमदीप की नाजबीबी के निकट ले जाती हैं। भगवंत अनमोल ने यमदीप पढ़ी है या नहीं, ये तो नहीं कह सकते, लेकिन दोनों ही स्थितियों में यह तथ्य है कि उनके उपन्यास की किन्नर-कथा का केन्द्रीय चरित्र हर्षा, यमदीप की नाजबीबी के चरित्र से प्रारंभिक समानता तो रखता है, लेकिन उसके प्रकर्ष-बिंदु के आसपास भी नहीं पहुँच पाता। नाजबीबी का चरित्र किन्नरों की पीड़ा ही नहीं दिखाता, उनके लिए संघर्ष से सफलता की उम्मीद भी जगाता है तथा राजनीति के रूप में एक संभावनाशील विकल्प भी देता है, जबकि हर्षा के चरित्र की परिणिति किन्नरों के लिए करुणा का भाव रचने तक ही सीमित रह जाती है। हालांकि इस उपन्यास के मुख्य पात्र अनमोल द्वारा अपने किन्नर पुत्र को सामाजिक लांछनों की परवाह किए बगैर पालना किन्नरों के लिए एक धुंधली-सी उम्मीद जरूर देता है।

किन्नर कथा के समानांतर ही इस उपन्यास में अनमोल और अनाया की प्रेमकथा का अतीत भी चलता रहता है। अनाया, जिसके गाल पर एक धब्बा है, लोगों के उपहास और उपेक्षा के कारण आत्मविश्वास की कमी से जूझ रही है। परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि अनमोल उसे ख़ुशी देने का निश्चय करता है। दोनों में प्रेम हो जाता है। लेकिन आखिर अनमोल अपने निश्चय को पूरा कर पाने में सफल नहीं हो पाता। अनाया एक प्रतिनिधि चरित्र है, जो समाज के उन सभी लोगों की व्यथाओं को स्वर प्रदान करती है जो किसी न किसी प्रकार के शारीरिक अधूरेपन के कारण सामाजिक अपमान और उपेक्षा के शिकार होते रहते हैं। अनाया के चरित्र को यथार्थ के यथासंभव निकट रखने में लेखक सफल रहे हैं।

इस पुस्तक की अगर सबसे अधिक खलने वाली कोई चीज है, तो वो है इसका अंत। अनमोल के पुत्र का साक्षात्कार के लिए जाना, वहाँ उसकी प्रतिस्पर्धा में एक ही लड़के का रह जाना, परिस्थितिवास अनमोल का उस लड़के के घर जाना और वहाँ उसकी माँ के रूप में अनाया को देखना, फिर दोनों के बीच भावनात्माक प्रलाप होना आदि घटनाक्रम हमें बुरी तरह से चकित करता है। प्रारंभ से यथार्थवादी धारा में चली आ रही कहानी का ये अति-नाटकीय अंत कुछ-कुछ मनमोहन देसाई की फिल्मों की याद दिलाता है जिनमें शुरू में बिछड़े सब पात्र अंत में विचित्र ढंग से मिल जाते थे। प्रतीत होता है कि लेखक ने कहानी के अतीत और वर्तमान की धाराओं को अंत में एक साथ मिला देने की जिद और जल्दबादी का शिकार होकर ऐसा अंत रच दिया है। यह ठीक है कि कथाओं में ऐसे अति-नाटकीय अंत होते हैं, लेकिन एक यथार्थवादी विषय पर आधारित गंभीर उपन्यास के लिए ऐसा अंत प्रभावी नहीं कहा जा सकता। लेखक को यदि अंत में अतीत-वर्तमान का एकीकरण ही करना था, तो वो बिना नाटकीय हुए, यथार्थ का सूत्र पकड़े रहकर भी किया जा सकता था। इस संबंध में लेखक को और समय लेकर कोशिश करनी चाहिए थी।

अंत की इस बड़ी कमजोरी के बावजूद भगवंत अनमोल का यह उपन्यास संतोषजनक रूप से प्रभावी है। सबसे बड़ी चीज कि इसका चर्चित होना यह उम्मीद जगाता है कि हिंदी साहित्य के इस कमछुए विषय पर और भी लेखकों की कलम उठेगी तथा किन्नर विमर्श के क्षेत्र में कुछ नया जोड़ने वाली कोई और कृति हमारे सामने आएगी।

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