अंबर पाण्डेय की कुछ नई प्रयोग-कविताएं

इस समय हिन्दी में सबसे प्रयोगशील कवि अंबर पांडे हैं। जब उनकी कविताओं का मुहावरा समझ में आने लगता है कि वे उसको बदल देते हैं। भाषा-लहजा सब कुछ बदलने वाला यह कवि हर बार कुछ चमत्कार कर जाता है। नई कविताएं पढ़िये- मॉडरेटर

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तमाशा-ए-नसीब

तमामी तहमद हो कि झोंतरे की लँगोटी।
गाँठ में टैयाँ बंधी हो कि चवन्नी खोटी।
सूखे रोट का टुकड़ा कि टैनी की बोटी।
मुझ ठाले के ठाठ अनोखे बहती टोटी।।

अगले ज़माने हम भी हुक्मचंद होते थे।
रोज़ रात खीर में शीरमाल भिंजोते थे।
उसकी छातियों लग छपरखट पे सोते थे।
दूधों कुल्ला, दूध से हाथपाँव धोते थे।

तभू आया नसीब का ढलवाँ दौर लोगों।
पहले दिया, छीने क्या मुँह का कौर लोगों।
जो दौलत जाती हो, छोड़, न रोकना कभू।
ख़र्चा, दिया या ख़ुद गई और ठौर लोगों।

किस्मत ढट कभू ढींगर, लगे ढलाँव- खिचाँव।
भंडपीर की ढमढमी, सभू बज रही ठांव।।

*तमामी- एक प्रकार का रेशम।
*तहमद- लुंगी।
*झोंतरे- चिथड़े।
*टैयाँ- छोटी कौड़ी।
*टैनी- दोगला मुर्ग़ा या मुर्ग़ी।
*ठाले- ख़ाली बैठे रहनेवाला।
*हुक्मचंद- इंदौर के मशहूर सेठ, अपने ज़माने में दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति।
*ढलवाँ- ढलान वाला।
*तभू- तभी
*ढट- मजबूत, तगड़ी।
*ढींगर- कमज़ोर, बूढ़ी।
*ढमढमी- ढफली।
*सभू- सभी।

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हमारी औक़ात हमीं लगा दें
तो भलमन हूजे

टाट का घाघरा मूँज का इज़ारबंद था।
निहारी में नोन खाने का भी घमंड था।
क़ोतबाल, मुंसिफ़, जज की बीवियों से राग,
जिसपे फ़रेफ़्ता थे उसी से दंद फंद था।

गुलबांग मची थी निहारमुँह हम भी पहुँचे,
घूरे पे पड़ा किसू का दिल दर्दमंद था।
रोज़ का है मसला उसके कूचे चपक़लिश,
हज़ार कवियों में हाय य’ पीर भी भंड था।।

*घाघरा- फ़क़ीर भी अक्सर अपने जामे को घाघरा
पुकारते है।
*निहारी- नाश्ता
*नोन- नमक
*फ़रेफ़्ता- बहुधा आशिक़ होने पर प्रयुक्त।
*दंद फंद- लगाई झगड़ा। झोड़।
*गुलबांग- शोरगुल।
*चपक़लिश- जगह की तंगी और भीड़ की वजह से होनेवाले झगड़े।

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रानीपुरेवाली रसूलन को पीलिया होना

झलवाने जाती थी किसू पीर-भुचड़ी से।
पुचारा फेरता टका झटक बहन बड़ी से।
बावड़ी से घड़ा भरवाता उस पिदड़ी से।
पीलिया तो ना उतरा चढ़ा घड़ी घड़ी से।।

झमकड़ा झुँक गया जर्दगी थी झाड़बाकी।
चाँद में हँस ज्यूँ छाँह से पकड़ी जाए थी।
‘खिज़र के घाट किसू रात मिलो’ बोली काकी।
झाँवली से कहे थी, बाँह न भर पाए थी।।

रानीपुरे की रसूलन को, हाय, लाए झलंगा लाद।
‘झाँसे, झाँयझाँय सब होंगे, हम न होंगे, आप नाशाद।।’

*किसू- किसी।
*पीर-भुचड़ी- हिजड़ों के पीर, पीलिया, कालाझार वग़ैरह उतारते है।
*पुचारा फेरना- धोखा देना, बुरूश जैसा कुछ फेरना।
*पिदड़ी- बहुत दुबली और बहुत कमज़ोर।
*झमकड़ा- हुस्न।
*झुँक/झोंक- बर्बाद होना।
*जर्दगी- पीलापन।
*झाड़बाकी- बचा-कुचा, रहा-सहा।
*खिज़र के घाट- पानी के हज़रत खिज़र का घाट अर्थात किसी नदी या तालाब या बावड़ी का घाट।
*झाँवली- आँखों के इशारे, सैन।
*झलंगा- टूटी, ढीली खाट, बहुत बुड्डों या जो मरनेवाले हो उनके काम लाई जाती है।
*नाशाद- दुखी।

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त्योहारों के बाज़ार

कूज़पुश्त* दौड़ दौड़कर माँगते है भीख।
कूचों कूजागर* ज़ोर ज़ोर से रहे चीख़।
जुलाहिनें कूकती कोकला सी आती है।
पंडे माँगे नगद दे ‘माया तज’ की सीख।।

ग्वालिनों के खरगोशों सरीखी छातियाँ।
सिर चढ़े माखन के घड़े चश्म मदमातियाँ।
देखने को उनकी हथिनियों सी खमर* चाल,
डाकिये भूल बैठे टपाल* और पातियाँ।।

ख़र्च को चवन्नी मगर बुड्ढ़ें भी कम नहीं।
बीच रह ख़रख़शे* खड़े करने का दम नहीं।
डोकरियाँ बोहनी बिगाड़ने को आ गई,
बजाजों से कह रही पोलके चमचम नहीं।।

चपकलिश, चमींगोइयाँ, चरकटापन, दुलार,
बोहरी टोपियों से मारोठिया बाज़ार,
ठस है मोटीताज़ी जसोदाओं से गैल।
नैनचिलगोज़े* चखते है मर्द होशियार ।।

झेंप झोले में डाल टहलती है नार।
चिकनी पिंडलियाँ और मलमल की सलवार।
ऊँची एड़ी की चप्पलें बातें झोलदार।
टल्लेनवीस* भंडपीर को कौन करे यार।।

#भंडपीर_इंदोरी_३३

* कूज़पुश्त- कूबड़े।
* कूजागर-कुम्हार।
* खमर- शराब।
* टपाल- डाक।
* ख़रख़शे- झगड़े।
* चपकलिश- बहस।
* चमींगोइयाँ-कानाफूसी।
* नैनचिलगोज़े- eyecandy।
* टल्लेनवीस- बेरोज़गार।

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आमवाली की टेर

ले लो ले लो रसीला मेरा ये आम है
कहीं हरा कहीं पीला मेरा ये आम है
इस आम को खाकर बूढ़े जवान हो गए
बेचकर इसे मँगते भी धनवान हो गए

हाटों में जब ये रहे हाट सराफा लगे
फल के टोकरे पर सजा हरा साफ़ा लगे
रस चूता खाओ तो होंटों के कोरों से
इसके रसिक है राजा, सेठ तक चोरों से

इसमें दाँत धँसाओ सुखबदन याद आवें
सेज पर तश्तरी में सजाके आप खावें
खाते देख देवताओं का जी ललचावें
चुपके चूसो गरमी में जो मन घबरावें

देख आम की फाँक
उसके नयन सुध आए
दिल मेरा दो चाक
अबके चौंसा न आया

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कलालकूईंवाली के लिए

अक्सर दुचार हुआ उससे
कूचा-ए-कलालकूईं के सबसे तारीक और संकरे मोड़ पर
जो नब्ज़शाही की तरह फड़क
उठता उस वक़्त

उस नमकसार के खुले केस और
उनमें लगी हुई रंगीन
प्लास्टिक की क्लिपें ऐसी लगती
जैसे सायब ने नाज़ुकख़यालों को
किसी बहर में बाँध दिया है

फिर भी सुनने पर ख़याल
बहर से बाहर, इस कनपटी से
दूसरी तक ख़ून की तरह दौड़ पड़ते

बरसरे बाज़ार उसके लिए बदनाम होकर
मैं वली की तरह मशहूर हो गया
मैं शैतान की तरह मशहूर हो गया

अब शायरी करके क्या होगा
उसका पीछा करते जो मार पड़ी मुहल्लेवालों की
वो मुझे आख़िरी रोज़ तक कलालकूईं में
मशहूर रखने को काफ़ी है।

#भंडपीर_इंदोरी_ २

–भंडपीर इंदोरी की एक नज़्म

*कलालकूईं– इंदौर का एक मुहल्ला जो शराबियों के लिए मशहूर है।
*दुचार- आमना-सामना होना।
*तारीक- अँधेरा
*नब्ज़शाही- शरीर की प्रमुख नब्ज़।
*नमकसार- नमक की खान।
*सायब- फ़ारसी का शायर।
*बहर- छंद
*बरसरे बाज़ार- बीच बाज़ार।
*वली- दकन का मशहूर शायर।

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