नरेश कौशिक की कहानी  ‘मोलकी’

नरेश कौशिक पेशे से पत्रकार हैं, कहानियाँ भी लिखती हैं। हरियाणा की पृष्ठभूमि की यह कहानी वहाँ के समाज के एक कम जाने गए सत्य का उद्घाटन करने वाली है- मॉडरेटर

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        रामकुमार चौधरी के घर बहू आ गयी है। और ये बात पूरे गांव में आग की तरह फैल गयी थी। इसमें नई बात क्या थी? सभी बहू लेकर आते हैं। पर …इसमें नयी बात थी … तभी तो गांव भर में कानाफूसी शुरू हो गयी थी। जिस घर में सात जवान लड़के बिन ब्याहे बैठे हों वहां रातोंरात बिना लगन सगाई , बिना जीमा झूठी  , बिना ढोल नगाडे. के दुल्हन आ जाना नयी बात ही तो थी ।

      शाम ढलते न ढलते सबको खबर लग चुकी थी कि रामकुमार चौधरी ने अपने बडे. बेटे रामफूल के लिए बहू खरीदी है।  अब रीति रिवाज से ब्याह होता तो दहेज दिखाया जाता , गांव की औरतें गीत गाती बहू को मुंह दिखाई का शगुन देनी जाती , नयी बहू परिवार की औरतों के साथ कुल के देवी देवताओं की पूजा करने जाती,  मंदिर वाले नीम के पेड. के नीचे देवरों के साथ संटी खेलती।  लेकिन कैसा शगुन और कैसी मुंह दिखाई ?….कहां की पूजा और कैसी संटी . . ?  उल्टे गांव भर में सिर जुडने की बात हो गयी थी। स्कूल के पास बस अड’डे पर, चाय की दुकान पर, कुंए पर, खेत में सब जगह लोगों को ”हे मेरी मां ! हाय !  अच्छा ! अरे राम ! ” और भी ना जाने क्या क्या कहने का मौका मिल गया था।

        कुएं पर पानी भरने गयी औरतें तो और मजे लेकर लेकर बखान कर रही थीं। कौन है , कैसी है , कितनी उम्र की है , लंबी है या छोटी है , गोरी है या काली है ? किसी को कुछ नहीं पता था। दुख इसी बात का था। रामकुमार के पडोस में रहने वाली औरतों को भी भनक नहीं लगी थी। इसी खीझ में पानी की बाल्टी भरती एक औरत ने कह दिया , ” ऐ के बेरा कुंआरी भी सै के ना। के बेरा कित तै ठा लाए ? ”(पता नहीं, कुंवारी भी है या नहीं। क्या पता, कहां से उठाकर ले आए हैं?) इतने में एक और ने दबी जबान में कहा, ” कुंआरी ना भी हो तो के फर्क पडै. सै । हाडै भी कुण सा एकै का ए चूड़ा पहरैगी । घर में सात -सात कुंगर सै।” (कुंवारी नहीं भी हो तो क्या फर्क पड़ता है। यहां कौन सा एक की ब्याहता बनकर रहेगी । घर में सात सात जवान लड़के हैं।) लेकिन तुरंत ही उसे समझ आ गया कि बात कहीं दूर तक ना चली जाए । उसने बात संभालने की कोशिश करते हुए कहा, ” ऐ , बेरा ना बिचारी कुण कर्मा की मारी होगी ?” (अरे, पता नहीं बेचारी कौन करमजली होगी।)

     कुछ दिन और बीते तो यह भी निकल कर आया कि दिल्ली में किसी दलाल से कोई बंगालन लड.की खरीदी है । पता चला कि रामकुमार ने 15 हजार रूपये दिए हैं ।

        हां , सही बात थी । रूकमा कर्मो की ही मारी थी । सिलीगुड़ी के अपने छोटे से गांव में उसने कभी दिल्ली का नाम भी नहीं सुना था , हरियाणा तो दूर की बात । चाय बागान में हफ्ते भर खट खट कर वो , दस साल का छोटा भाई और उसकी विधवा मां 50 रूपये कमाते थे ।  उसी में खुश  थे .  वो तो मौसी ने सपने दिखा दिए । ”दिल्ली में आठ हजार रूपया पगार मिलती है हर महीने । रूकमा रानी बनकर रहेगी । इतनी कमाई में तो तीनों राज करेंगे ।”

     उन्हीं सपनों की डोर पकड़े पकड़े रूकमा ऐसे दलदल में जा फंसी जहां से इस जन्म में तो उसका निकलना मुश्किल था।  रूकमा को क्या पता था जिस सफर पर वो निकली है उसकी कोई मंजिल इस जनम में तो उसे मिलेगी नहीं । दिल्ली रेलवे स्टेशन से रात के अंधेरे में ट्रेन से उतरकर उसके पैर इस घर की दहलीज के भीतर आकर ही रूके ।सब कुछ इतना तेजी से हुआ कि रूकमा को महीनों लग गए हालात को समझने में ।

      घर में घुसते ही एक अधेड. उम्र की औरत ने उसके गले में पडे. दुप्पटे को आगे घूंघट की तरह खींच दिया ।

    अगले दिन उसे परिवार की कुछ और बुजुर्ग औरतों ने इशारों इशारों में बताया, ” घर के बड़े बेटे की ब्याहता है वो . . . पूरे 15 हजार दिए हैं उसके । इसके साथ ही उसे तमाम तरह की नसीहतें दी गयीं । घूंघट मत उतारना ….. नजरें नीची करके रखना …. घर से बाहर मत निकलना और भी ना जाने क्या क्या ।

      रूकमा जार जार रोती रही । बार बार अपनी बोली में कहती रही , ” आमी ऐखाने थाकबो ना । आमी माएर काछे जाबो ।”(मुझे यहां नहीं रहना। मुझे अपनी मां के पास जाना है)

          उसी रात 15 साल की रूकमा को एक कमरे में धकेल कर बाहर से दरवाजा बंद कर दिया गया। 32 साल का फूल सिंह और 15 साल की रूकमा । वो अकाल के मारे भूखे की तरह टूट पडा. ।

     दूर कहीं खेतों से हुर्र हुर्र की आवाज सुनकर रूकमा डर गयी। नीचे आंगन में सोई दादी सास बोली , ” फेर कोए सांड खेत में बडग्या दिक्ख सै । काच्ची फसल बर्बाद हो ज्यागी किसे बेचारे की।” (फिर कोई आवारा सांड खेत में घुस आया है। किसी बेचारे की कच्ची फसल बर्बाद हो जाएगी।)

   तूफान को तो आखिर शांत होना ही होता है । तूफान शांत हो गया और रात सुबह से ​मिलने के लिए आगे बढ़ती रही । मूंज  की चारपाई पर बिछी चादर को फूल सिंह ओढ. कर सो गया । चारपाई के सिरहाने बदरंग तकिया पड़ा था । रूकमा के सपनों की लाशें तकिये पर आंसू बन बन गिरती रही ।

    शादी के घर की बात ही अलग होती है । दीवारों पर रंगाई पुताई देखकर ही गांव के लोग पूछने लगते हैं , ” अरे भई , घर में शादी वादी है क्या? ”  दीवारों की रंगाई पुताई के बाद घर में दर्जी, नाई, कुम्हारी , धोबी , जमादारिन का सबसे पहले आना जाना शुरू होता है । दर्जी घर के बडे. बूढों , बच्चों, लड.कों और जनानियों के कपडे. सिलने के लिए महीने भर पहले ही से ही आंगन में अपनी मशीन जमा लेता है । दूल्हे के कपडे. तो शहर से सिलकर आएंगे ।

     घर पर तोरण बंध जाता है । पंडित जी दूल्हे का ब्याह लिखाने आते हैं । दूल्हे का जनेउ होता है ।

     उधर घर के आंगन से शाम होते न होते औरतों के बन्ने बन्नी के गीतों की शोखी सुनायी देनी शुरू हो जाती है । बन्ने की भाभी गाती है , ” बन्ना खेले गलियों में उड.ाए पतंग . .  ।”

       दूल्हे की दादी परांत भर भर कर बताशे और लड्डूू बांटती नहीं अघाती हैं । दूल्हे की मां भी दुल्हन के लिए बनवाए गहने, कपडे. लत्ते दिखाते दिखाते रात के दो बजा देती है । घर लोगों से भरा रहता है । कोई दूर के रिश्ते की बुआ है तो कोई मामी, कोई भाभी की बहन आयी है तो उससे अलग हंसी ठठा चल रहा है ।

      दूल्हे को सुहागनें उबटन लगा रही हैं तो किसी कोने से मेंहदी की महक उठ रही है । बुआ तेल चढ.ाते हुए मजाक करती है , ” तेरी बहू से बढि.या साड.ी लूंगी। ” इतने में दूल्हे की कोई मनचली भाभी उसे चिकोटी काटती है तो कोई काजल लगाते हुए काजल का टीका उसके गाल पर ही टिका देती है ।”   पास में ही छोटी लड.कियां हाथों पर उबटन मल रही हैं , कुछ मेहंदी लगा रही हैं । शादी केवल दूल्हे की है लेकिन कोई इस खास मौके पर पीछे नहीं छूटना चाहता ।

       आंगन के पिछले हिस्से में कढ.ाई चढ.ी है। हलवाई और उसके कारीगर एक से एक पकवान बनाने में लगे हैं । सीताफल की खट्टी मीठी मसालेदार सब्जी, आलू की रसेदार सब्जी, शुद्ध खोये की बरफी , गर्मागरम रसगुल्ले और मेहमानों के लिए भाजी की महक पूरे मौहल्ले में फैल रही है । जलेबी खासतौर पर बनवायी जाती है । कहते हैं ” सारी मिठाई एक तरफ, जलेबी की रंगत एक तरफ ।”

   घर की बड.ी बूढ.ी औरतें सुहाग का सामान तैयार करती हैं । कोई कलावे बांधती हैं तो कोई दुल्हन की गोद में रखने के लिए नारियल को लाल कपड.े से सिल रही हैं । तभी छोटी बुआ की आवाज सुनायी देती है , ” अम्मां , आज तो दूल्हा बान बैठेगा , आज तो बूरा चावल बनेेंगे ना। ”

      अम्मां हल्की नाराजगी में कहती हैं, ” बेबे , इब तम्म ब्याही थ्याही होगी हो । रीत रिवाज याद राखणे सीख लो । बुड्ढे हाड्ढा का के बेरा , कद बुलावा आजा।”( बहन, अब तुम शादीशुदा हो । रीति रवाज याद रखना सीखो । हमारी तो बूढ़ी हड्डियां हैं, पता नहीं कब ऊपर से बुलावा आ जाए।) बुआ हंसते हुए उनकी बात का जवाब देती हैं, ” तू भी के बात करै सै । इब तो पोता पोती खिलाए बिना कित्त ना जा तू । असली माल खा राख्या है थारी पीढ.ी नै तै ।”

   औरतों से घिरी अम्मां नारियल पर शगुन का लाल कपड.ा सुई धागे से सिलते सिलते गाने लगती है, ” बन्ने ओ तेरे महला मैं चौंसठ पैड़ी , बन्ने ओ मैं तो चढ.ती उतरती हारी ।”

    बगल में बैठी चाची उन्हें छेड.ते हुए गाती हैं, ” बन्ने ओ तेरी अम्मां लड.नी बताई , बन्ने ओ मैं तो उसतै भी चढ.ती आयी।” औरतें खिलखिला कर हंस पड.ती हैं ।

    कुल मिलाकर घर के रौशनदान , खिड.कियों , झरोखें , हर कहीं से शगुन की महक आ रही है ।

   पर चौधरी के घर में शादी का ये समा तो बंधा ही नहीं । ना दीवारों पर रंगाई पुताई , न तोरण, न शामियाना, न मिठाइयों की महक, न रिश्तेदारों से भरा घर … ना हंसी ठिठोली . . ना मेहंदी । सब कुछ खाली खाली सा था।

      ऐसा लगता है मानो कल ही बात हो । चौधरी की घरवाली 15 साल की उम्र में बहू बन कै इस घर में आयी थी। हर सवा साल पर घरवाली की गोद हरी होती गयी। जब तक चौधरी की घरवाली पति के नैन नक्श ठीक से पहचान पाती तब तक वह दस साल में ही चौधरी को सात लड.कों का बाप बना चुकी थी। हर साल चौधरी के आंगन में जच्चा के गीत गूंजते :

” जच्चा की चटोरी जीभ , जलेबी मांग सै,

इसके ससुरे नै गहण धर द्यो हे, सासू का ला दो ब्याज….’’

हर साल घर में गूंद के लड्डुओं की महक उठती . . … हर साल गीत गाए जाते और औरतों को मीठा बाजरा बांटा जाता . . ….हर साल कुआं पूजन होता । बेटों की गिनती के साथ ही चौधरी की मूंछें भी कुछ और उंची होती जाती ।

   चौधरी के घर का नाम ही सात बेटों का घर पड. गया था। बेटों का कद बढ. रहा था और चौधरी का रसूख । यार दोस्त ठिठौली करते , ” भाई , कौन सा मंत्र फूंक रखा है । छोरों की लाइन लगी

है । ”

      जिस घर में खुशियों के मुकाबले मंगल गीत कम पड. जाते थे उसी घर में अब सात जवान लड.के बिन ब्याहे और बिन रोजगार के दिनभर टांग से टांग भिड.ाते घूमते । बड.े बूढ.ों ने सही कहा था, जवान जहान लड.कों के शरीर का बल खेत खलिहान में नहीं निकलेगा तो घर बर्बाद हो जाएगा।

     घर की रूखी पपड़ीदार दीवारों पर अब बर्बादी अपनी परछाईं लंबी करती जा रही थी। बेटों का बाप होके भी चौधरी जान पहचान वालों से लड.कों के लिए कोई रिश्ता बताने को कहते । पर बिना रोजगार कोई अपनी लड.की देने को तैयार नहीं था।

       चौधरी शाम को खाना खाने बैठते तो चौधराइन का खटराग शुरू हो जाता, ” इतना बड.ा कुनबा है , नाते रिश्तेदार हैं । किसी से कहते क्यों नहीं हो । कोई लड.की बताए। ”

      दाई जब जनानखाने से बाहर निकल कर लड.का होने की खुशखबरी देती थी तो चौधरी  मंूछों पर बल देने लग जाते थे । लेकिन अब उन्हें घरवाली पर गुस्सा आने लगा था, ” तूने सात सात की लाइन लगा दी । अब कहां से लाउ इनकी सेज सजाने के लिए लड.कियां ।”

    लेकिन अखाडे. के पहलवान बीरे ने एक दिन चौधरी की समस्या हल कर दी। 30 35 हजार की बात थी लेकिन आखिर में सौदा 15 हजार में पट गया।

    पहले भी ऐसी कई बहुएं पड़ोस के गांवों में आ चुकी थी। कोई सुगना थी, कोई सियामी , कोई झुमकी लेकिन अब सब का एक ही नाम था ………” मोलकी” । रूकमा भी रूकमा नहीं रही थी ” मोलकी ” हो गयी थी।

    घर में चार कमरे पीछे की ओर थे । फिर उसके बाद बड.े बड.े खंभों वाला गलियारा ……. फिर बड.ा सा दालान जिसके बीचों बीच हैंडपंप था। ड्योड.ी के पास दो कमरे थे जो बैठक की तरह इस्तेमाल होते थे । एक ओर बड.ी सी रसोई ।   एक कमरा चौबारे में था।

       रूकमा रामफूल की बहू बन गयी थी। लेकिन वो ऐसी दुल्हन थी जिसे दुल्हन बनने का सपना देखने का मौका ही नहीं मिला । .. बिना मेहंदी वाले हाथों के वो सीधे पिया की सेज पर बैठा दी गयी थी। रूकमा दिनभर रोती रहती . . . भाषा बोली ही  समझने  वाला कोई न था तो उसके आंसू कौन समझता।

    रूकमा से ना किसी ने उसका नाम पूछा और न पता । वो घर के लोगों के लिए ”मोलकी ” थी . .. . . . खरीद कर लायी हुई ।

    बहू की जात कोई भी हो लेकिन सास की जात एक ही होती है । फूलसिंह की मां गिन्नी देवी ने पहले ही दिन फरमान सुना दिया, ” के बेरा कुण जात की है ? रसोई में हाथ नहीं लाण दूंगी मैं इसने । बुहारी झाड.ी का उपर का काम करे जागी । ”

  रूकमा अब चौधरी के घर की बहू थी जो सुबह चार बजे उठकर , लंबा सा घूंघट किए, रात के दस बजे तक घर के सारे ऐसे काम निपटाती जिनमें छुआछूत का कोई पचड.ा नहीं था।

   हर रोज की तरह उस रात भी काम निपटाकर रूकमा चौबारे में पहुंची । बिस्तर पर बैठी पति का इंतजार कर रही थी। उस पति का जिसकी  अभी तक उसने शक्ल भी ठीक से नहीं देखी थी।

     आज रात भी बिस्तर पर रूकमा चुपचाप लेटी थी लेकिन उसे अपने शरीर पर दौड.ते हाथों की तपिश कुछ अजनबी सी लगी। उसने अजनबी हाथों को झटकने की कोशिश की । एक हाथ हटाती तो दूसरा हाथ उसकी पीठ पर रेंगने लगता । कुछ ही देर बाद कई अजनबी हाथ उसके शरीर पर रेंग रहे थे । कई अजनबी हाथ .. …उसके शरीर पर कई परछाइयां तैर रही थीं … … .चारों ओर से गर्म सांसें किसी लू की तरह रूकमा को तपा रही थीं . .. . ..परछाइयां एक एक कर गायब हो गयीं ।

   अब हर रात रूकमा ऐसे ही परछाइयों से जूझती थी। रूकमा किस से कहती ? क्या कहती ? कौन उसकी सुनता ?

   ज्यादा समय नहीं लगा । नयी जबान के सिरे पकडने में रूकमा अपनी जबान भूलने लगी।

    उम्र तो थी ही कच्ची । इतनी परछाइयों में उर्वरा धरती पर ना जाने किसका बीज पड़ा लेकिन फसल जरूर लहलहाने लगी। चौधरी के घर में जच्चा के गीत गाए गए ।

           जच्चा तै म्हारी याणी , भोली जी ,

     जच्चा तै म्हारी कुछ ना जाण जी ’’——-/  गुड का मीठा बाजरा बांटा गया।

     घर में ना जाने कितनी चीजें खरीदी हुई होती हैं लेकिन जो चीज जितनी महंगी उसकी उतनी ही ज्यादा कद्र होती है । रामफूल के घर में केवल एक ”मोलकी ” ही ऐसी थी जिसका खरीदे जाने के बाद भी कोई मोल नहीं था। मोल था तो केवल उसकी कोख का । एक के बाद एक तीन लड.कों और एक लड.की के बाद जब चौथा लड.का हुआ तो तब जाकर कहीं सास ने कहा, ” तन्नै म्हारा कलेजा सीला कर दिया ।”

      सास अपनी ही रौ में कहे जा रही थी , ” एक छोरी तो चलो कोए बात ना । तीज त्यौहार मणावण खातर घर में एक छोरी तो होणिए चाहिए। चार भाइयां मै एक भाण सै तो चारूआं की लाडली भी रहेगी।”  चार भाइयों की लाडली बहन की बात सुनकर पता नहीं क्यों मोलकी की आंखों में आंसू लुढ.क आए। वो भी सात भाइयों की इकलौती बिन ब्याही घरवाली थी।

        श्राद्ध खत्म हो चुके थे और नवरात्र शुरू हो गए थे । आखिरी श्राद्ध वाले दिन   सांझी मैया बनायी गयी /  इस बार भी ‘मोलकी” बेटी के साथ गांव के जोहड. से काली चिकनी मिट्टी लेकर आयी थी। मिट्टी के सितारे बनाए । धूप में सुखाए ।  सितारे के बीच में गेरू से लाल टीका लगाया। फिर उसने पीली मिट्टी से  सांझी मैया का सुंदर सा चेहरा बनाया । हाथ पैर बनाए । उसके लिए गहने बनाए ।

      दीवार पर गाय का गोबर लेपती हुई मौलकी गा रही थी

, ” सांझी संझा हे , कनागत परली पार, देखण चालो हे संझा के लणिहार ।”

मोलकी को दुर्गा पूजा याद हो आयी। उसके गावं में कैसी रौनक होती थी। गोबर के उपर उसने सूखे सितारों से सांझी मैया का शरीर बनाया और फिर मुंह , हाथ पैर चिपकाए और लाल रंग के नए कपड़े से मैया का चेहरा ढंक दिया।

      सांझी मैया में मोलकी को दुर्गा मैया का चेहरा नजर आया। अब यही उसकी दुर्गा मैया थी।

       अब सुबह शाम खूब धूम रहेगी । दोनों बखत सांझी मैया को सबसे पहले भोग लगाया जाएगा। शाम को औरतें बैठकर सांझी मैया के गीत गा रही थी :

, ” म्हारी सांझी ए , के ओढैगी , के पहरेगी,

    मिसरू पहरूंगी स्यालु औढूंगी ,

     मोतियां की मांग भराउंगी । ”

      सांझी मैया मोतियों से अपनी मांग भरवाना चाहती है । लेकिन मोलकी सोच नहीं पायी मोतियों से मांग कैसे भरी जाती है । वो तो बिना हार सिंगार की दुल्हन बनकर इस घर में आयी थी।

      और फिर वो दिन भी आ पहुंचा जिस दिन मोलकी साल में सबसे ज्यादा उदास होती है ।

      नवमी का दिन था। आज सांझी मैया के भाई उसे लेने आएंगे । भोग में भी कुछ खास बनेगा , मेहमान जो आ रहे हैं । मोलकी ने छह छह सितारे लेकर सांझी मैया के बगल में उसके दोनों भाई बना दिए ।

       अगले दिन दशहरा था । सांझी मैया के शरीर पर लगे सितारों को तसले में भरकर बच्चे जोहड. में विसर्जित कर आए। अब सांझी मैया की विदायी की तैयारी हो रही है । कहते हैं दशहरे वाले दिन नवमी को सांझी मैया अपने मायके जाती है । भाई इसीलिए उसे लेने आए हैं ।

     शाम हो चुकी है । मोलकी ने सांझी मैया की कौडि.यों से बनी आंखों में काजल लगाया ।  एक बड़े से मिट्टी के मटके में छेद करके डोली बनायी गयी । सांझी मैया का मुंह और भाइयों को उसमें बैठाया गया।

     रात घिर आयी है । सांझी मैया और मेहमानों को भोग लगा दिया गया है । विदायी की घड़ी आ गयी है ।  बच्चे , औरतें मटके को सिर पर रखकर गीत गाती हुई तालाब की ओर जा रही हैं । पूरे गांव में चहल पहल है । हर गली से औरतों , बच्चों के झुंड अपनी अपनी सांझियों को सिर पर बैठाकर उन्हें विदा करने जा रहे हैं । सांझी मैया की डोली में घी का दीया जलाया गया है । मटके के छेदों से रौशनी निकल रही है और रास्ते पर रौशनी के छोटे छोटे द्वीप बन गए हैं ।

       मोलकी ने बेटी के सिर से सांझी मैया को उतारा और तालाब की लहरों में विसर्जित कर दिया .  ….तालाब में चारों ओर सांझी मैया की डोलियां तैर रही हैं । मैया अपने मायके जा रही है  . . ..।

      मोलकी किनारे पर खड़ी है .  . ..सूनी आंखों मे सवाल लिए . .. दूदूदूदूदूदूर तालाब के किनारे की ओर देखते हुए । सांझी मैया मायके जा रही है . . …  , मोलकी की नवमी कब आएगी ?. …. .उसका भाई कब आएगा   ….वो कब मायके जाएगी? ना जाने कितनी मोलकी ऐसे ही किनारे पर खड़ी थीं जहां से उन्हें अपना कोई छोर नजर नहीं आ रहा था।

लेखक परिचय :

नाम : सुश्री नरेश कौशिक

जन्मस्थान : गांव दतौड. , तहसील सांपला , जिला रोहतक , हरियाणा ।

संप्रति : पिछले 20 साल से अधिक समय से संवाद समिति प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया के हिंदी विभाग ” भाषा ” में बतौर समाचार संपादक कार्यरत ।

विशेष : प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘ हंस’  में ” गांठें ” शीर्षक से पहली कहानी प्रकाशित । ‘मोलकी’ कहानी पर ही दिल्ली अकादमी द्वारा नाटक का मंचन।

मौलिकता प्रमाणपत्र : संपादक जी यह मेरी पूर्णत: मौलिक रचना है । रचना जुलाई 2016 में दिल्ली अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘‘इंद्रप्रस्थ भारती’’ पत्रिका में प्रकाशित ।

 नरेश कौशिक

    ईमेल पता : nareshkaushik.pti@gmail.com

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