निवेदिता की कहानी ‘जड़ें बुलाती हैं!’

निवेदिता जी लेखिका, हैं कवयित्री हैं और समर्पित ऐक्टिविस्ट हैं। उनकी इस कहानी में समकालीन संदर्भों में विस्थापन के दर्द को समझिए। उन लोगों के दर्द को जिनका न परदेस बचा न देस- जानकी पुल।

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आसमान में बादल नहीं है। लू के नुकीले नाखूनों ने उसके पुरसुकुन चेहरे को नोच कर लहूलुहान कर दिया । उसने गहरी सांस लेकर पीठ पर पडे बोझ को एक तरफ खिसकाने की कोशिश  की। उसी लम्हा उसे महसूस हुआ कि उसके साथ चलने वाले लोग पीछे छूट गऐ हैं। उसने एंडियों के बल उचककर चारों तरफ नजर दौड़ाई   वे कहीं नजर नहीं आए। भूख से उसकी अंतड़ी पिघलने लगी थी। उसका बस चलता तो अपनी ही अंतड़ियों को भून कर खा लेता। हलक सूख रहा था। पानी के बोतल निकाल कर उसने अंतिम घूँट पीया।  अपने आस पास नजर दौड़ाई कहीं कोई नल नहीं था। उसे चक्कर आने लगा। पिछले सात दिनों से लगातार चल रहा था। चलते वक्त पडोस की कुलसुम ने उसे रोटी और सूखी आलू की सब्जी थमाई थी। उसे थमाते हुए कहा था भाईजान हालात ठीक हों जाए तो लौट आना। देर सबेर फैक्ट्री खुल जायेगी। उसनें भरी आंखों से कुलसुम को देखा। परदेस कहां रह गया था ये शहर। गुजरात उसकी रगों में दौडता था। पिछले 15 सालों से रह रहा था यहां। अपने गांव से ज्यादा वह इस शहर का हो गया था।

गुजरात से चलता हुआ नासिक पहुँचा था । नासिक और मुंबई के बीच की दूरी करीब 180 किलोमीटर है। इस बीच में दो घाट पड़ते हैं। नासिक से चलते हुए पहले वो कदवा नदी के पास रुका था। कदवा नदी के पास कुंभ सा नजारा था।  हजारों की संख्या में मजदूर वहां सुस्ता रहे थे। वह वहां से जल्दी निकल गया। जैसे उसे घर की मिट्टी बुला रही हो। हवा बहुत गर्म थी।  उसमें पेट्रोल और मिट्टी की महक घुली थी। उसे अपने गांव के मुहाने पर पेट्रोल पंप की याद आ गयी। पहली बार गांव में बाबू मदन सिंह का पेट्रोल पंप खुला था। जब से उसके गांव की सड़क एनएच से जुड़े गांव को शहरों की हवा लगने लगी थी। मदन बाबू का लड़का गुजरात में बिजनेस करता था। अपने साथ गांव के कई लोगों को काम के लिए ले गया था। एक दिन उसे भी लेता गया था।

उसकी आंखों के सामने गांव का पूरा मंजर घूम गया। वह अपने बचपन की तरफ लौटना चाहता था। उन परी कथा के अंदर जहां अक्सर कोई नेक दिल परी सारी मुसीबतें दूर कर देती थी। उसकी आंखें थकान के मारे बंद हो रही थी। भूख दम तोड़ रहा था। उसे लगा धरती से भी ज्यादे गर्म उसकी देह हो रही है। आंखें लाल हो गयी थी। अब एक कदम भी चलना मुमकिन नहीं था। उसने सायकिल खडा किया और एक पेड़ की ओट में लेट गया। उसकी आंखों में नींद और थकान उतर आयी। उसे अपना घर ,खलिहान, ओसारा, आम का बगीचा याद आया। भोर के तारे सुबह के आकाश में खो गए थे। सामने खेत की फसल लहलहा रही थी। सुबह की पारदर्शी नीरवता में हल्की आवाज सुनाई दे रही थी। वह खेत की मेड़ पर चल रहा था नंगे पांव। सुबह की ओस से भीगी फसलों पर बूंदे चमक रही थी। दलदली घासों और ठहरे पानी की परिचित गंध उसके भीतर उतर गयी। अचानक से दृश्य बदल गया।

उसने देखा अम्मा आंगन में बैठी है। बहन रसोई में है। चांद चमक रहा है और पाले के टुकड़े की भांति हल्की सी आभा दिख रही है। बाबू कहते थे कि पहले उसके गांव को हसनपुर बालू धीमा के नाम से जाना जाता था। अब रानीगंज के नाम से लोग जानते हैं।  289 एकड में फैला विशाल जंगल ही उस गांव की खास बात थी। उसे सर्दियों का मौसम बहुत पसंद था। अक्सर वह भागकर जंगलों की ओर जाता था। दूब पर तैरता कोहरा  दरख्तों पर गहरी धुंध, फूलों पर जमी बूँदें, पहाड़ी मैंनाएं , लाल चोच वाला गुल सेहरा,  नीले रंग के नूरपोश। बाबू कभी साथ होते तो प्यार से कहते, देखो नूरपोश! तुम्हें सलाम करने आए हैं। उसे अपने बाबू की जुबान पर हैरानी होती। बाबू बोलते तो शहद टपकता। कई बार उसके दोस्त उसे चिढ़ाते तुम्हारे बाबा मुसलमान हैं। वह बाबू से पुछता बाबू तुमको लोग मुसलमान क्यों कहते हैं। बाबू हंसते। उनकी आंखें पनीली हो जाती। जैसे कोई राज दफन हो आंखों में।

जब ठंडी हवा चलती जंगल में सियार बोलते। मैया बहुत डाँटती। किसी दिन तुमको सियार उठा लेगा। घर के काम में हाथ बटाओ ननकू। बाड़े में भैंसे डकार रही हैं, उसको साना पानी दो। मैया मुंह अंधेरे उठती थी। गांव में औरतें मर्द सभी सुबह ही उठ जाते हैं। मैया सूर्य नमस्कार के बाद पीपल के पेड के नीचे पूजा करती। एक दिन सुबह सुबह उसकी आंखें खुल गयी। किसी के रोने की आवाज आ रही थी। वह धीरे से आवाज कर पीछा करते हुए गया। बाबू गोहाल में रो रहे थे। मैया बाबू का  पीठ सहला रही थी। मत रोयें! हमें वहां जाना चाहिए। अम्मा की कब्र पर चादर डाल कर आते हैं। ननकू को बहुत हैरानी हुई। माई अम्मा किसे कह रही है? किसके कब्र की बात कर रही है? तो क्या बाबा मुसलमान हैं? और अम्मा ? उसका माथा भन्ना गया। उस अबूझ पहेली को वहीं छोड वह बाहर खेलने भाग गया  था। जमीन तवे की तरह धीप रहा था। वह नीम बेहोशी में था। उसने जोर देकर गुजरते लम्हों की डोर पकडनें की कोशिश की। उसे अपने गांव के कब्रिस्तान की याद आयी। बाबू उसे लेकर गए थे। कब्र पर सर झुकाएं देर तक रोते रहे थे। उसे हिम्मत नहीं हुई बाबू से कुछ पूछने की। बाबू ने ही धीरे से कहा तुम्हारी दादी यहां सो रही है। उन्हें सलाम करो। वो हैरान रह गया। दादी कहां थी अब तक? बाबू ने कभी तो नहीं बताया। तो क्या सच में बाबू मुसलमान हैं?

दलदली घासें, जो पहले ओस के कारण रुपहली लग रही थी, अब सुनहरी हो गयी थी। दलदली पक्षी झाड़ियों में फुदक रहे थे। उसे नींद में ही लगा कोई पुकार रहा है। उसने हिम्मत कर आंखें खोली। पूरा बदन टूट रहा था।  हे हो कतेय सुतबह। चलू नय।  उसने आंखें खोली। कई साथी उसे उठा रहे थे। उसने सायकिल उठाई और मजदूरों के झुण्ड के साथ चल पड़ा। अब चांद निकल आया था। तारीक घने दरख्तों में खडी बड़ी बडी इमारतें चमकने लगी।

जिस दिन वह गांव छोड रहा था बाबू ने कहा था अपनी जड़ों को मत छोडो। जड़ें चैन से नहीं रहने देती। वो हंसा था। बापू अब  इस गांव में बचा ही क्या है। जो जमीन थी वो भी मुनिया के ब्याह में बेचना पडा। एक धुर जमीन पर सारे दिन खटते हो फिर भी सबका पेट नहीं भर पाते। बाबू शहर जायेंगे तो दो पैसा कमाकर ही लायेंगे। शहर आकर हैरान रह गया था। यहां तो रात जागती है और दिन सोता नहीं है। मदन सिंह के बेटे ने एक कपडे के मिल में काम लगा दिया था। उसकी तरह कई मजदूर काम करते थे और कई पाली में। गाँव से निकले कितने दिन हो गये थे। हर साल सोचता था अबकी बार पैसा बचाकर गांव जायेंगे। कुछ जमीन खरीद लेंगे और वही खेती करेंगे। लौटेंगे नहीं। साल बीतता जा रहा था और पैसे बचते ही नहीं। किसी तरह अपना पेट पालते हुए बाबू को कुछ पैसा भेज देता था।  उसे याद है कैसे एक फैसले ने करोड़ों लोगों की जिन्दगी एक झटके में बदल दी। हजारों मजदूर रातोंरात सड़क पर आ गए। 24 मार्च का दिन उन सबों के लिए आफत लेकर आयेगा उसे कहां पता था।

 24 मार्च को फैक्ट्री बंद कर वह घर की तरफ जाने वाली अंतिम बस के इंतज़ार में खड़ा था। आम दिनों में इतनी रात को बडी दुकानें बंद हो जाती हैं पर दुकानों पर लाईन लगी हुई थी। लोग बदहवास लग रहे थे। परचून की दुकानें खुली थी और लंबी कतारें लगी थीं। अंदर जो हो रहा था उस तक उसकी जानकारी तेज धार दीवारों का भेदकर कुछ इस तरह पहुँची कि वो लड़खड़ा गया। क्या आज 12 बजे रात से  देश  में लॉक डाउन हो गया। उसने देखा डरी हुई जर्द चेहरे वाली एक औरत ने जल्दी से अनाज खरीदे और तेज कदमों से निकल गयी।

उसे पहली बार डर लगा। पहली बार लगा ये शहर अपना नहीं है। उसने अपनी जेब में हाथ डाला कुल जमा पूँजी 100 रुपए। महीना का अंतिम है। मिल भी बंद हो गया। अगले महीने की तनख्वाह भी नहीं मिलेगी लॉक डाउन के चलते।  उसने तेजी से सडक पार किया। सड़क के उस पार राशन की दुकान के पास खडा हो गया। एक लंबा लड़का दुकानदार से बहस कर रहा था। तुमने सामान की कीमत बढा दी है। उसने कुछ जरुरी सामान लिए और निकल पडा।  अब चारों ओर सन्नाटा था।  भौंकते हुए कुत्तों से आगे निकलता हुआ वह घर की तरफ मुड़ गया। घर क्या था एक खोली थी। शुरू होते ही खत्म हो जाती थी। सफेद आसमान और लैंप पोस्टों की ज़र्द सी रौशनी में सब कुछ नहाया हुआ लग रहा था। पुरानी खस्ताहाल इमारतें , जिसकी हर खिड़की से स्टोव की नलियां उगी हुई थीं। पांच सौ साल पुराने पत्थर के पुल और बेजान सी झुग्गियों से उठते हुए धुएँ की पतली लकीरें। इन खबरों ने उसे इतना उदास कर दिया कि वह रोने लगा। अपनी गरीबी और बेबसी पर गुस्सा आने लगा। उसके पास कोई रास्ता नहीं था सिवाय इसके की अपनी जड़ों के पास लौट जाय। पूरी रात उसे नींद नहीं आयी। किस तरह घर लौटेगा। उस दमधोंटू गर्मी में उसे बैचेनी होने लगी। उसके भीतर डर पसरने लगा। सुबह परेशान हाल मजदूरों का काफिला निकल पड़ा। उसने महसूस किया उसका गला सूख रहा है। पैर भारी हो गए हैं। अपने होठों की पपड़ियों सूखी जुबान फेरते हुए उसने सोचा आज सब कुछ हारकर वापस जा रहा है।

बाबा की बात याद आने लगी- जड़ें बुलाती हैं। उसकी चाल धीमी हो गयी थी। आहिस्ता आहिस्ता पैडल चलाता वो चला जा रहा था। उसे मालूम था बाबा उसका इंतजार कर रहे होंगे। उसकी देह थकान से टूटने लगी थी। उसने सायकिल किनारा किया। और पेड के किनारे बैठ गया। कई मजदूर सुस्ताने बैठ गए। रात काफी हो गयी थी। बाहर काफी अंधेरा था। बंजर वीरान जमीन जैसे मुलायम नर्म रेशम के धागे में तब्दील हो गई। जिन्दगी के फ़रिश्ते के होठों से हंसी की किरनें फूटी। मुहब्बत के चेहरे खुले और गायब हो गए। उसने देखा मां आंगन को गोबर और मिट्टी से लीप रही है। बाबू गाय को सानी दे रहे हैं। गाय रंभा रही है। उसने तेज आवाज में कहा, मैया हम आ रहे हैं। अचानक उसके हलक में तेज दर्द हुआ। जमीन कांपने लगी। जमीन का सीना खून में डूब गया। खून की धारें जमीन से फूट पड़ी। एक जोरदार आवाज। ट्रेन पटरियों पर शोर करता हुआ निकल गया।

लोगों ने देखा मजदूरों के खून से रेल की पटरियां नहा गयी है। पटरियों पर रोटियां बिखरी हुई है।

पिता ने अपने बेटे को जमीन पर लिटाया। उन्हें लगा बेटे की आंखें स्वप्न से भीगी हैं। उस रात चांद उतर आया था सिरहहाने। रेशम की चादर बन रेल की पटरियां रुई की फाहे की तरह लरज रही थी। पिता की आंखों में आज से 73 साल पहले का मंजर पसर आया। इसी तरह अमृतसर से ट्रेनो में लाशें भर भर कर आयी थी गांव।

जब उनकी आंखें खुली थी, कैम्प की ठंडी जमीन पर खून से लथपथ मां की लाश  पड़ी थी।  उसने अपने चारों तरह मर्दों , औरतों और बच्चों का उफनता हुआ समन्दर देखा था।  लोग पागलों की तरह अपनों  को तलाश  रहे थे इन्सानों के समन्दर में। नन्हें गोसाई अपनी मां के बदन से चिपट कर देर तक रोता रहा। मां उसे इसी नाम से बुलाती थी। उसे होश नहीं है कब लाशों के बीच  से दो कोमल हाथों ने उसे उठाया था। और अपने सीने से चिपटा लिया था। वही थी उसकी अम्मा नसीमा बेगम। उसके वजूद के रेशे रेशे में उतर गयी थी। उसी ने उसे पाल पोस कर बडा किया। आज फिर लाशें दरवाजे पर है। पर कोई हाथ नहीं जो उसके बेटे को लौटा दे। वे पागलों की तरह अपने बेटे की बदन से लिपट गए। नहीं! मैं इतिहास दुहराने नहीं दूँगा।

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लेखिका संपर्क-niveditashakeel@gmail.com

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