राजीव कुमार की कहानी ‘कहानी उलझी हुई’

राजीव कुमार साहित्यानुरागी हैं, कवि हैं, लेखक हैं। आज उनकी एक नई कहानी पढ़िए। एक दिलचस्प कहानी-

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फेसबुक पर उसकी इस नई कहानी का जिक्र था। एक बार फोन भी किया था उन्होंने। उसने यह आग्रह भी किया था कि उनकी यह कहानी मेरे द्वारा जरूर पढ़ी जाय, और त्वरित टिप्पणी भी हो। उसने मुझे अपनी इस बात से थपकी भी दी कि आपका कुछ कहना मायने रखता है। उस दिन क्लब में अचानक ही मिली। थोड़ी सी इधर उधर की बातें हुईं और कहानी पर कुछ कहने का आग्रह फिर से एक बार । मैंने करीब-करीब पूछ ही लिया कहानी कहाँ पढ़ी जा सकती है। बाद में देर रात मेसेज चेक किया तो देखा मेरे मेसेन्जर पर उनकी इस कहानी का पूरा लिन्क। कहानी जिस वेब साइट पर होस्ट की गई थी, उसका एडमिनिस्ट्रेटर उसका तथाकथित मित्र था। उस मित्र ने अपने संपादकीय कथन में बेहद संक्षिप्त टिप्पणी देते हुए कहानी के बारे में कहा था शिल्प और कथ्य में बिल्कुल एक खास ताजगी का अहसास देती कहानी। उसने अल सुबह ऐन वक्त पर फोन किया कहानी मिल गई होगी, तुम चेक कर लो। मैं तब तक कहानी के मध्य में था।

कहानी की नायिका पेशे से पत्रकार है। पति किसी एक्सपोर्ट कम्पनी में काम कर रहा होता है। ये एक बेहद अलहदा पेशा अख्तियार किए हुए जोड़ी थी। पति पत्नी के अपनाए गए धंधे में दूसरा अजनबी था।  एक्सपोर्ट कम्पनी में उच्चासीन व्यक्ति का भाषाई शब्द-कोष अलग होता है।  वह देश की अर्थ व्यवस्था को ठीक से समझ लेने का दावा करता है । वह विदेश बार-बार जाने के प्रकरणों को चाव से सुनाता तो है, साथ ही सहज भी दिखना चाहता है। अपनी लंबी जेट यात्राओं का उबाऊपन  और यह सुस्त वक्त उसने कैसे हर बार  काटा है का जिक्र किस्सागो की तरह करता है। अपने दोस्तों के बीच सरल ढ़ंग से इसका वर्णन करता है ताकि एक बौद्धिक उच्चता वाले व्यक्ति का इमेज बने।

इस सब के उलट इस कहानी की नायिका का पति अल्पेश जिस भाषा का इस्तेमाल करता है वह कहानी के उसके किरदार से मेल नहीं खाता। वह उन पात्रों से आक्रांत है जो उसकी पत्नी को राजनीतिक असहज सा दिखनेवाले साक्षात्कार देते हुए बिल्कुल सहज रहते हैं। वह पत्नी की बहुत ही जरूरी बाइट कितनी भी आप धापी में जान लगाकर ले लेने और फीड तुरंत भेज देने के रण – कौशल से आक्रांत है। फीड भेजकर वह ऑफिस में हर किसी को फोन कर देती है ताकि उसकी स्टोरी को प्राथमिकता मिल जाय। पति नायिका के इस तरह काम करने की कला से आक्रांत है। बेवजह ज्यादा  जगह घेरती है कहानी की जमीन एक कमज़ोर सहनायक की हैसियत। उसकी आदतों का वर्णन छूट गया शिरा सा अनाथ रह जाता है। वह जुमलों में ही रह जाता है। एक बड़ा किरदार जिसके बूते और जिसके धन के बल पर नायिका सारा तामझाम रचती है, कहानीकार की संवेदना का हिस्सेदार नहीं रह पाता। एक फूहड़ सा सामाजिक व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है सहनायक।

नायिका लुटयन्स दिल्ली में असरदार भूमिका में दिखाई पड़ना चाहती है। पत्रकारिता को टूल बनाकर वह सियासत के खेल की धुरी बनती दिखती है।  जहां संभव हो अपने प्रतिद्वंदी पुरुषों को धूल चटा देती है , थोड़ा डरती है स्त्री किरदारों से जिसके पास भी इसके जैसे ही हथियार हैं। वह आधुनिक स्त्री के लिये रचे गये नैतिक सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाना चाहती है। बिन्दी, सिन्दूर, पेन्ढ़न को पहले ही उसने स्त्री विरोधी हथियार कह दिये थे। आपकी भाषा शालीन नहीं कहकर अक्सर लज्जित करती है नेताओं को। जो उसके काम के हैं उसे आज इस मुद्दे पर क्या स्टोरी चलेगी के राज भी बताती है।  क्या नहीं कमिट कर देती है नेताओं और अफसरों को, कि यह स्टोरी तो आने वाले समय में आग लगा देगी। बार-बार कहती है मैं इस स्टोरी को बहुत ऊपर ले जाना चाहती हूँ। कहानी पढ़ते हुए मुझे लगता है कि इस कहानी में कोई स्टोरी ऊपर ले जाने का न तो घटना क्रम है ना ही उसकी ईमानदार कोशिश। नायिका पति के वैभव के बारे में एक जाल बुनती है, पर पति का ऐश्वर्य किसी किरदार को अपने गिरफ्त में नहीं लेता। हर किरदार छिटक कर कोई अपना वाकया सुना देता है। न ही कहानी को वो गति देता है न ही कोई परिप्रेक्ष्य।  एक वाकये में छोटा सा काम एक नेता का आता है, जिसमें उसके पति की मदद की ज़रूरत पड़ती है तो नायिका बगलें झाँकती है। नायिका अपने किरदार की इस कमजोरी से फ्रस्ट्रेटेड नहीं है न ही लेखिका इन बारिकियों को शब्द का जामा पहना रही। नायिका की रेशनलिटी का बयान नहीं है कथाकार की  कहानी कहने की कला में।भाषा के स्तर पर भी यथेष्ट ध्यान नहीं।

फिर एक दिन आर्मी क्लब में वो मिली। चाय आते-आते उसने अपनी कहानी पर फीडबैक लेना चाहा। अब तक हम बहुत अच्छे दोस्त हो चुके थे। इस दोस्ती में मुझे एक ईमानदारी बरतनी चाहिये। मैं वह सब बोलने लगा जो मुझे कहानी पढ़ते हुए महसूस हुआ। मैं कहता रहा बाजार अच्छे प्रोडक्ट की ही कीमत देता है। छप जाने भर से बनी पहचान स्थाई नहीं होती। कथा कहने का इन्स्टिन्क्ट है तुममें। तुम थोड़ी और मिहनत करो। नायिका क्या क्रिएटेड है, तो क्राफ्ट उसके अनुसार चुनने होंगे। शिल्प और भाषा अलग करती है कहानी को आम बन जाने से। जो पात्र आते हैं उनका प्रयोजन तय होता है।  कोई भी बहुत कुछ नया नहीं कहता।

वह अपने प्रकाशक मित्र का जिक्र करने लगी। कहती रहीं “वो इस तरह की कई और कहानियों की डिमांड कर रहा है। अगली बार जब मैं तुमसे मिलूंगी तो तुमसे ज्यादा बातें हो पाएंगी। मुझे जयपुर जाना है वहां से बीकानेर। आगरा का पिछला ट्रिप अच्छा नहीं रहा, मैं खो गई थी कहीं।  मैं भी नौकरी बदलना चाहती हूं। तुम अपने स्वास्थ्य पर ध्यान रखो, थोड़ा जिम जाया करो।” एक बात दूसरी किसी भी बात को ध्यान में नहीं रख रही थी, बातों में तालमेल नहीं था। बेहद बिखर चुकी है वो, इसका अहसास मुझे तकलीफ दे रहा था।

कश्मीर में पोस्टेड उनके पति जिक्र से इस बार भी बाहर रहे। आर्मी की नौकरी में परिवार से अलगाव बहुत परेशान कर सकता है, अगर दंपत्ति सचेत न हों। पति से इस कदर मानसिक दूरी की कभी विश्वसनीय दलील नहीं दे सकी थी वो। पहले भी बात बदलने की कोशिश होती थी उसकी।  दिल्ली प्रवास उसके पति का विषाद भरे क्षणों में होता है , चर्चा ही नहीं हुई इस बात की। उसने संकेत भर दिए ताकि मैं ज्यादा पूछूं कि सब कुछ ठीक क्यों नहीं चल रहा है और हर बात पर वो कहे छोड़ो न अभी, बाद में फिर कभी। अपने टूटते जाने की प्रक्रिया पर इस बार भी नजरें चुरा गई। इस बार भी उसने नहीं बताया कि उन दोनों के दरम्यां इतना कुछ बिगड़ा कैसे। मुझसे मिल कर सिर्फ बताना है, सांकेतिक ही रहना है या कुछ संवारने की भी कोशिश करनी है।

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