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इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’ की कहानी ‘अधूरा उपन्यास’   

बहुत कम शायर होते हैं जो गद्य भी अच्छा लिखते हैं उन्हीं कुछ शायरों में इरशाद खान ‘सिकंदर’ हैं, उनकी यह कहानी ‘हंस’ में आई है. आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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रात के डेढ़ बजे ही मुशायरा ख़त्म हो चुका था और अहमद की परेशानी शुरू हो चुकी थी, उसके मन में आग बरस रही थी और बाहर पानी थमने का नाम नहीं ले रहा था, उसे बार-बार लालक़िला याद आ रहा था, लालक़िले में मुशायरा कभी भी ख़त्म हो उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था क्योंकि वहाँ से उसकी उम्मीदों के कई दरवाज़े खुलते थे। हर बार वो यही सोचकर मुशायरा सुनने आता था कि शायद अबकी बार मुशायरा रातभर चले लेकिन…।
ख़ैर… कोई बहुत अधिक परेशानी नहीं होती थी, समस्या बस इतनी सी थी कि जनवरी की कड़कड़ाती ठण्ड में रात के इस पहर वो घर कैसे जाये? बस सुबह छः बजे से पहले मिलती नहीं थी! और ऑटो से जाने के पैसे होते नहीं थे ! पर इस समस्या का हर बार वो नया नया हल ढूँढ लेता था।
पहली बार जब वो मुशायरा सुनने गया था, तो मुशायरा ख़त्म होने के बाद वो टेंट वालों के साथ ही सो गया था दूसरी बार जब ऐसा कोई रास्ता नहीं दिखा तो उसने लालक़िले के बाहर बस स्टैंड पर बैठकर रात काट ली थी, तीसरी बार वो चाँदनी चौक वाली राह पर यूँ ही टहलने के मक़सद से आगे बढ़ा ही था कि दाहिने हाथ पर लाजपत राय मार्किट के साथ ही एक चाय का ठीहा दिख गया, जहाँ उसके जैसे और भी लोग समय काटने के लिए चाय का सहारा ले रहे थे। चौथी बार ठण्ड की अधिकता ने उसे पैदल चलने पर मजबूर कर दिया जिसका दोहरा फ़ायदा हुआ, एक तो उसके बदन में गर्मी आ गयी दूसरा वो बिना पैसों के सवेरे तक अपने घर पहुँच गया था। लेकिन ये लाल क़िले की बात थी..।
‘‘ख़ुदा जहन्नुम में पहुँचाये उन हरामज़ादे दहशतगर्दों को ! न लालक़िले पर हमला हुआ होता न ये तारीख़ी मुशायरा वहाँ से शिफ्ट करके इस मनहूस तालकटोरा स्टेडियम में लाया जाता’’
अहमद लालक़िले को याद करते हुए तालकटोरा स्टेडियम को कोस रहा था, कोसे भी क्यों न? एक तो उसके रात गुज़ारने की सारी उम्मीदों पर पानी फिर चुका था और इधर पानी है कि बरसे ही जा रहा है, ऊपर से ये कमबख़्त सिक्योरिटी वाले ठहरने नहीं दे रहे

‘’चलो भाई …चलते रहो ..यहाँ मत खड़े होइए’’

‘’क्या हो गया भाई? क्या आफ़त आ गयी? थोड़ी देर खड़े ही तो हैं..पहले तुमने अन्दर से भगा दिया..फिर वहाँ थे तो वहाँ से भगा दिया अब इस छज्जे के नीचे भी?आख़िर बिगड़ क्या रहा है तुम्हारा’’? अहमद सिक्योरिटी गार्ड पर झल्ला उठा
‘’कुछ नहीं बिगड़ रहा बाबू जी हम लोग मजबूर हैं, ड्यूटी का सवाल है इहाँ किसी को रुकने का परमिसन नहीं है’’ सिक्योरिटी वाला बड़ी नर्मी से समझाते हुए बोला ।
अहमद को अपनी झुँझलाहट पर पछतावा हुआ, और उसने वहाँ से आगे बढ़कर एक घने दरख़्त की ओट ले ली, लेकिन दरख़्त बारिश से बचाव में उसकी कोई मदद न कर सका। अब भीगना ही उसने अपना मुक़द्दर समझ लिया। इस वक़्त उसे महसूस हुआ कि ठण्ड में ठिठुरने की जगह मिलना भी क़िस्मत की बात होती है। एक एक करके सारी गाड़ियाँ, मोटरसायकिल, ऑटो, बस उसके सामने से गुज़र गयीं, लेकिन उसके घर जाने की कोई सूरत नहीं बनी। तालकटोरा स्टेडियम अब सुनसान होने लगा था इक्का दुक्का लोग ही थे जो यहाँ वहाँ नज़र आ रहे थे शायद वो कर्मचारी होंगे ।
‘’आदाब अर्ज़ है” ।
अहमद ने इस मिमियाती आवाज़ पर पलटकर देखा, तो सामने एक दुबला-पतला, उमर शरीफ़ के लफ़्ज़ों में कहें तो कुछ कुछ ‘’झाड़ू से बिछड़े हुए तिनके’’ जैसा अधेड़ शख़्स नज़र आया। मटमैली सी शेरवानी, अलीगढ़ी पाजामा और सर पर गोल ऊँची टोपी, बाल कन्धों पर लटकते हुये, गोरा रंग क्लीन शेव, और चेहरे पर ऐसे भाव कि किसी उस्ताद का ‘’छिनाल औरत’’ वाला जुमला याद आ गया, जो उन्होंने एक शायर की तस्वीर देखकर कहा था।
‘’नाचीज़ को पत्थर इलाहाबादी कहते हैं, आपका इस्मे-गिरामी?
‘’आँय’’? अहमद ने हैरत से पूछा?
हमारा मतलब है कि हमारा नाम पत्थर इलाहाबादी है, आपका क्या नाम है मियाँ?
‘’अच्छा…अहमद अली’’! अहमद ने कन्धे उचकाकर कानों को ढकने की नाकाम कोशिश करते हुए लापरवाही से उत्तर दिया
‘’आप यहाँ क्यों खड़े हैं? घर क्यों नहीं गये? बस नहीं मिली? अच्छा मुशायरा सुनने आये होंगे? पत्थर इलाहाबादी ने धड़ाधड़ प्रश्नों की बौछार कर दी
अहमद ने बिना पत्थर को देखे एक छोटा सा उत्तर चिपकाया
‘’हाँ जी’’।
‘’तो आपको शायरी में दिलचस्पी है? वैसे ख़ाली सुनने का शौक़ ही है या कुछ कहते भी हैं? वैसे एक मश्वरा मानियेगा? यहाँ खड़े होने का कोई फ़ायदा नहीं, आइये आहिस्ता आहिस्ता आगे बढ़ते हैं, इसी बहाने कुछ वक़्त साथ काट लेंगे और एक-दूसरे को जान भी लेंगे’’! ये कहते हुए पत्थर ने अहमद के कन्धे पर हाथ रखकर चलने का दबाव बनाया और अहमद के पाँव कश्मकश में आगे बढ़ गये। अहमद मन ही मन सोच रहा था कि आख़िर है कौन ये नमूना? तब तक पत्थर फिर मिमियाया
‘’जनाब आपने कोई जवाब नहीं दिया?
‘’किस बात का’’? अहमद ने अपनी गीली जैकेट की पॉकेट में हाथ डालते हुए पूछा
‘’यही कि आप शायरी…
अहमद ने बात काटते हुए जवाब दिया
…मैं तो जी..सुनने का शौक़ीन हूँ और हर साल सुनने आता हूँ, और हाँ ..सिरफ़ सुनने का शौक़ है…शेर-वेर कहना अपने बस का नईं है..। अहमद के मुँह से भाप निकल रही थी वो जेब से अपने दोनों हाथ निकालकर हथेली आपस में रगड़ने लगा
‘’तो आपने हमें पहचाना नहीं”? पत्थर की इस बात पर अहमद मन ही मन बुदबुदाया
‘’ये कोई बड़ी तगड़ी फ़िल्म है यार…(फिर ज़ोर से)जी, नहीं पहचाना! क्योंकि आपसे कभी मैं मिला ही नहीं तो पहचानूँगा कैसे?’’
‘’मियाँ क्या बात कह दी आपने?हमें मुशायरों में देखा नहीं? आज के मुशायरे में भी तो स्टेज पर थे हम’’
‘’आज के मुशायरे में? कहाँ?’’ मैंने तो नहीं देखा!
‘’आप देर से आये होंगे शायद? हमने बिल्कुल शुरूअ में अपना कलाम पढ़ लिया था’’
‘’जी लेकिन मैं तो मुशायरा शुरू होने से पहले ही आ गया था’’
‘’आपने  ख़ातूने-मशरिक़, पाकीज़ा आँचल, ख़ूबसूरत अन्दाज़ इन रिसालों को पढ़ा है कभी’’
पुरानी बात को अधूरा छोड़कर ये नया सवाल दाग़ा था पत्थर ने, अहमद चिढ़ते हुए बोला
‘’जी कभी कभार पढ़ लेता हूँ’’
‘’तो आपने पढ़ा नहीं? सबमें मुसलसल नाचीज़ का कलाम छपता रहता है’’
‘’नाचीज़ कौन? अहमद ने हैरत से पूछा
‘’मियाँ आप भी निरे बौड़म हैं, शेरो-शायरी से रग़बत है और अदबी गुफ़्तगू से वाक़िफ़ ही नहीं हैं, अमा अदब में जब अपने लिए कोई बात कहना हो तो ख़ाकसार या नाचीज़ लफ़्ज़ का इस्तेमाल किया जाता है, यही अदब का तक़ाज़ा भी है और असातिज़ा की ज़बान भी यही है’’
अहमद अपनी अज्ञानता को जानता था इसलिए चुपचाप पत्थर की बातें सुनने और समझने की कोशिश करता रहा.. उसे न जाने क्यों पत्थर संदेहास्पद नज़र आने लगा, उसकी बातों के सारे सिरे कहीं के कहीं जुड़ जाते थे? वो शायर है और अगर आज वो मुशायरे में था तो मुझे क्यों नहीं दिखा? पत्थर अपनी बात जारी रखे हुए था
‘’मियाँ इस वक़्त के हिन्दुस्तान के अहम शायरों में ख़ाकसार का शुमार होता है, हिन्दुस्तान ही क्यों? बैरूनी मुल्क में भी बड़े एहतेराम के साथ सुना जाता है ख़ाकसार को… मुल्क का ऐसा कोई रिसाला नहीं जो नाचीज़ के कलाम के बग़ैर शाया हो जाये..’’
अहमद कम पढ़ा लिखा था लेकिन वो कुछ उर्दू पत्रिकाएं कभी कभी उर्दू सीखने की ग़रज़ से पढ़ लिया करता था और ग़ज़लों में तो उसकी ख़ास दिलचस्पी थी लेकिन फिर भी उसने कभी ‘पत्थर इलाहाबादी’ नाम न पढ़ा न सुना! पत्थर जारी था..
‘’मियाँ कहते हुये अच्छा नहीं लगता लेकिन ये सच्चाई है कि आप बड़े ख़ुशक़िस्मत इन्सान हैं जो इतने वक़्त से ..
अहमद को न जाने क्यों ‘सरफ़रोश’ फ़िल्म का नसीरुद्दीन शाह द्वारा निभाया ग़ज़ल गायक का किरदार याद आ गया, और पत्थर पर उसका सन्देह बढ़ने लगा..उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो चलते-चलते पत्थर के साथ कहाँ आ गया है,और आगे कहाँ और क्यों जा रहा है। बारिश तो लगभग बन्द हो चुकी थी और फ़िज़ा में कोहरा बढ़ रहा था. पत्थर बोला
‘’मियाँ ज़रा ठहरिये..सामने मेडिकल खुला है मैं ज़रा एक दवा लेकर अभी हाज़िर हुआ’’।
अहमद पत्थर के पीछे पीछे चलकर मेडिकल स्टोर से ज़रा पहले ठहर गया।
पत्थर– (मेडिकल वाले से) ‘’आदाब मियाँ, नाचीज़ को पत्थर इलाहाबादी कहते हैं…
मेडिकल वाला एक सफ़ेद लोई ओढ़े हुए बैठा था वो बिना किसी प्रतिक्रिया के पत्थर की बातें सुनता रहा।
…आपने सुना होगा कि आज तालकटोरा में एक मुशायरा था, तो हुआ कुछ यूँ कि ख़ाकसार को भी उसमें शिरकत का शरफ़ हासिल हुआ…ख़ैर मैं ये अर्ज़ कर रहा था कि आपके पास कफ़ सीरप हो तो इनायत कीजिये…
मेडिकल वाला– आपको क्या चाहिये चचा..
पत्थर– वही तो अर्ज़ किया अभी कि कफ़ सिरप!
मेडिकल वाला एक शीशी अलमारी से उठाकर काउन्टर पर रखते हुए
‘’20 रुपये’’।
पत्थर ने पैसे देकर शीशी जेब के हवाले की और अहमद की सिम्त बढ़ा। अहमद ने सोचा इस आदमी से पीछा छुड़ाकर यहीं मेडिकल स्टोर के पास ही रुक जाना अधिक सुरक्षित है पता नहीं ये कौन हो? क्या हो? ख़ुदा न ख़्वासता ‘सरफ़रोश’ वाले ग़ज़ल गायक की तरह आतंकवादी हुआ तो? और जैसे ही पत्थर क़रीब आया अहमद ने कहा
‘’चचा आप को जहाँ जाना हो जाइए मैं यहीं मेडिकल वाले के पास ही रुकूँगा, अभी थोड़ी देर में सुबह हो जायेगी फिर घर चला जाऊँगा’’
पत्थर ने फिर उसके कन्धे पर हाथ का दबाव बनाते हुए उसे आगे बढ़ाया
‘’यहाँ रुकने का कोई फ़ायदा नहीं है मियाँ..अभी सुबह होने में बहुत वक़्त है चलते रहिएगा तो जिस्म में गर्माहट रहेगी, कहीं बैठे तो अकड़ जाइएगा..वैसे आपका घर है कहाँ?
‘’मेरा अपना घर नहीं है, मैं त्रिलोक पूरी में किराये पर रहता हूँ’’ अहमद ने दो टूक जवाब दिया
पत्थर उछल पड़ा, और जेब से शीशी निकालकर सारा कफ़ सिरप एक बार ही में पी गया और फिर रोड के किनारे शीशी फेंकते हुए बोला..
‘’ये तो और भी अच्छी बात है मुझे नोएडा जाना है साथ ही चलेंगे दोनों,
पहले एक कप चाय आपके साथ आपके घर! उसके बाद होगा आगे का सफ़र!
इसी बहाने आपका घर भी देख लेंगे क्या ही उम्दा बात होगी….वाह’’
अहमद की जान सूख गयी कहाँ वो इस मुसीबत से जान छुडाना चाहता था कहाँ ये मुसीबत घर में दाख़िले का इरादा कर चुकी थी..’’उफ़ क्या करे? कैसे बचे अब? या तो ये कोई पागल है या फिर पक्का ‘’सरफ़रोश’’ वाला…’’
वो तमाम तरह की उधेड़बुन में था इतने में चलते-चलते गुरुद्वारा बंगलासाहिब दिख गया, अहमद को अब कुछ कुछ रास्ता समझ आने लगा था..पत्थर फिर उबला
‘’आइये मियाँ समझिये कि इन्तिज़ाम हो गया’’
‘’कैसा इन्तिज़ाम’’? अहमद ने पूछा
‘’मियाँ आइये तो सही’’ कहते हुए पत्थर अहमद का हाथ खींचता हुआ गुरुद्वारे के अन्दर दाख़िल हो गया, अन्दर जाकर पहली मंज़िल पे जाती हुई सीढ़ियाँ नज़र आयीं, पत्थर बन्दर की तरह उछल उछल कर सीढ़ियाँ चढ़ने लगा, और पलट-पलटकर अहमद को हाथों के इशारे से जल्द ऊपर आने को कहता हुआ ख़ुद ऊपर पहुँच गया इतने में अहमद भी आ गया..
वहाँ दीवार के कोने में टेबल कुर्सी डाले हुए एक सरदार जी गठरी बने बैठे थे नीचे फ़र्श पर मुसाफ़िरनुमा तमाम लोग कम्बल ओढ़े सो रहे थे, पत्थर ने इधर उधर एक नज़र दौड़ाई फिर सरदार जी की तरफ़ गर्मजोशी से बढ़ा
पत्थर– ‘आदाब अर्ज़ है सरदार साहब’
सरदार– सत श्री अकाल जी.. आदाब जी..
पत्थर– नाचीज़ को पत्थर इलाहाबादी कहते हैं आज तालकटोरा में एक मुशायरा था…सो ख़ाकसार को भी कलाम पढ़ने का शरफ़ हासिल हुआ..
सरदार– ‘अच्छा जी ‘’
पत्थर– मैं ये अर्ज़ कर रहा था कि (अहमद की तरफ़ इशारा करते हुए) हम दोनों…अगर आपकी इजाज़त हो तो कुछ वक़्त यहीं रुक जायें..?
सरदार– रुक जाओ जी..रुक जाओ
पत्थर– बहुत शुक्रिया हुज़ूर…एक छोटी सी गुज़ारिश थी
सरदार– दस्सो जी दस्सो..
पत्थर –अगर एक कम्बल मिल जाता तो हम दोनों …
सरदार– 100 रुपये जमा करा देओ जी.. कम्बल मिलजेगा जदों तुसीं कम्बल वापस करोंगे पैहे वापस मिल जाणगे।
पत्थर ने अहमद की तरफ़ देखा, अहमद रेलिंग से पीठ टिकाये फ़र्श पर बिछी दरी पर सिकुड़कर बैठ गया था..अहमद ने कहा ‘’मेरे पास नहीं हैं पैसे’’
पत्थर-(सरदार से) ख़ैर…सरदार साहब ज़रा देर की तो बात है, हम यूँ ही बैठकर वक़्त काट लेंगे।
सरदार– कोई गल्ल नईं जी…अराम नाळ बैठो तुसीं।
पत्थर-जी शुक्रिया ..।
पत्थर अहमद के पास वापस आकर बैठ गया और उसकी ज़ुबान फिर चल पड़ी
‘’सरदार लोग बहुत ही प्यारे होते हैं …कमाल के मुहब्बती और मेहमान-नवाज़..
हम तो अक्सर पंजाब जाते हैं मियाँ.. ख़ैर पंजाब जाने की भी क्या ज़रूरत है? अब तो हर शह्र में एक छोटा सा पंजाब मिल जायेगा..बल्कि कई शहरों में बड़ा बड़ा पंजाब मिल जाएगा …आँ$$$ह्ह्ह’’
पत्थर बोलते बोलते जम्हाई लेने लगा था उसकी जम्हाई पर बग़ल में सोये मुसाफ़िर ने कुनमुनाते हुए गर्दन कम्बल से बाहर निकाली
पत्थर– मुआफ़ कीजियेगा हुज़ूर..अगर हमारे सबब आपकी नींद में ख़लल पहुँचा हो तो ..
मुसाफ़िर को जैसे कुछ भी समझ  न आया हो, वो करवट बदलकर मुँह दूसरी तरफ़ करके सो गया। मुसाफ़िर के करवट लेने से उसके  कम्बल में थोड़ी सी जगह बन गयी पत्थर ने झटपट अपनी दोनों पतली पतली टाँगे फैलाकर कम्बल में घुसेड़ दीं और अहमद से कहा-
‘’आप भी आ जाइए मियाँ ज़रा .. आँ$$$ह्ह्ह’’ और ये कहते हुए उसे फिर जम्हाई आने लगी इसबार उसका मुँह ठीक सामने होने की वजह से पत्थर की  साँसें अहमद के नथुनों से टकराईं और शराब की सी गन्ध से उसका जी ख़राब हो गया उसने मुँह फेरते हुए कहा-
‘’नहीं मैं यहीं ठीक हूँ’’
पत्थर ने फ़ोर्स भी नहीं किया और आहिस्ता आहिस्ता फ़र्श पर पसर गया  अब उस पर नींद का जादू छाने लगा था ज़बान अब भी चल रही थी मगर लड़खड़ाते हुए…
‘’जानते हैं मियाँ सुबह जब मैं आपके घर चलूँगा… तब आपको अपनी ज़िन्दगी के…. पथरीले और सियाह रास्तों की सैर कराऊँगा..आपको सुनकर हैरानी होगी.. कि मैंने बहुत बड़ी बड़ी फ़िल्मों में.. बड़े बड़े फिल्मी सितारों के साथ छोटे छोटे काम किये हैं….पाँच हज़ार से ज़ियादा गाने लिखे, कितनी ही स्क्रिप्टें लिखी हैं.. बरसों से मुम्बई में हूँ …अब तक शादी नहीं की..अपना सरमाया अदब और सिनेमा में झोंक दिया.. पता है शादी क्यों नहीं की? मियाँ बस वो एक मौक़ा मिल जाए जिससे कि ज़िन्दगी में कुछ ठहराव पैदा हो ..कामयाबी! …कामयाबी ही वो मौक़ा अता करेगी! …मैं जिस दिन कामयाब हो गया शादी भी करूँगा और बच्चे भी….तुम आना ज़रुर मियाँ..मेरी शादी में ..’’

कुछ देर ख़ामोशी रही अहमद को लगा पत्थर सो गया लेकिन पत्थर की ज़ुबान फिर लड़खड़ाई
‘’जानते हैं मियाँ हज़ारों ग़ज़लें कहीं मैंने लेकिन आज तक मजमूआ शाया नहीं करवाया…करवाऊंगा…पहले स्टैबलिश हो जाऊं फिर ये काम भी करूँगा… पर हाँ, तुम्हें ज़रूर सुनाऊंगा ग़ज़लें…तुम सच्चे सामईन हो आजकल तुम जैसे….
पत्थर फिर ख़ामोश हो गया अहमद बुत बना कुछ देर यूँ ही बैठा रहा जब बड़ी देर तक पत्थर कुछ नहीं बोला तो उसे लगा कि इससे पीछा छुडाने का यही बेहतर मौक़ा है अहमद ने सरदार जी की तरफ़ एक नज़र देखा सरदार जी कुर्सी पर बैठे-बैठे जम्हाई ले रहे थे। अहमद धीर-धीरे ये सोचते हुए उठ खड़ा हुआ कि अगर पत्थर ने पूछा तो वो कह देगा कि सू सू करने जा रहा है. अहमद ने खड़े होकर एक भरपूर अँगड़ाई की आड़ में हालात का जायज़ा लिया।
कहीं कोई हलचल नहीं.. पत्थर ख़ामोश था.. उसने बिल्ली के पन्जों की तरह अपने क़दम आगे बढ़ाए और सीढ़ी पर पहुँचते ही बिजली की रफ़्तार से नीचे उतरा..नीचे उतरते ही सामने पेशाब घर की तरफ़ गया और फिर बाहर निकलकर ऊपर नज़र दौड़ाता हुआ गुरुद्वारे के उस तरफ़ बढ़ गया जहाँ ताज़ा गर्मागर्म हलवा बँट रहा था..अहमद हलवा लेकर बाहर निकला..उसने एक नज़र फिर ऊपर की तरफ़ देखा..पत्थर की कहीं कोई सुगबुगाहट न थी, वो जी ही जी में ख़ुशी से बुदबुदाया ‘’लगता है मुसीबत को नींद आ गयी’’ पल भर के लिए सर्दी का सारा एहसास फुर्र हो गया वो कुलाँचे मारता हुआ गुरुद्वारे से बाहर जाना चाहता था लेकिन इधर-उधर लोगों को देखकर वो ख़ामोशी से ‘’वाहे गुरु जी’’ को शुक्रिया कहता हुआ बाहर आ गया. गेट पर उसने एक व्यक्ति से बसस्टैंड का रस्ता पूछा, व्यक्ति ने हाथ के इशारे से रस्ता बताया ।
अगले ही पल अहमद बस स्टैंड के बोर्ड को दूर ही से पढ़ने की कोशिश करता हुआ बढ़ रहा था. उसने बोर्ड पर 378 नम्बर लिखा देखा तो कुछ राहत की साँस ली। वो बस स्टैंड के बिल्कुल क़रीब आ गया, उसे थोड़ी तसल्ली हुई कि पहले से चार लोग बस स्टैंड पर बैठे हुए थे।
अब भी अहमद को ये डर सता रहा था कि कहीं पत्थर उसे ढूँढता हुआ फिर न आ जाए, वो गुरुद्वारे की तरफ़ देखता हुआ बस स्टैंड में लगे लोहे की पाइप से अपनी पीठ टिकाकर खड़ा हो गया..
‘’अबे भों…के दाँत न चियारो…
अहमद ने पलटकर ग़ौर से देखा एक अधेड़ उम्र का मैला कुचैला सा व्यक्ति अपने साथ बैठे व्यक्ति पर ख़फ़ा था, साथ वाला व्यक्ति एक छोटा सा रेडियो कान पर सटाये, रेडियो का वॉल्यूम तेज़ करता हुआ इस अधेड़ की बात को मुस्कुराकर टाल रहा था, उसके बग़ल में बैठे 2 लड़के खी खी हँस रहे थे, अधेड़ ने गन्दा सा जैकेट पहना हुआ था, रेडियो वाला व्यक्ति कम्बल और कंटोप में अपने आपको क़ैद किये हुए था बाक़ी दोनों लड़के शायद स्वेटर जैसा कुछ पहने हुए थे, बस स्टैंड पर अँधेरा था इसलिए अहमद को उनका हुलिया साफ़ साफ़ नहीं दिखाई दे रहा था। वो बस रेडियो के स्वर में मिश्रित होती आवाज़ सुन पा रहा था। रेडियो की तेज़ आवाज़ और दोनों लड़कों की खी..खी.. पर अधेड़ और चिढ गया-
‘’ससुर के नात जब ठाँय से चूतर प गोली चली न! तब ई खी खी न चली हुआँ..समझ्यो? जान पियारी है त मान जाव .. अबहीं तू लोग दुनिया नाई देखे हव..एही से हमार कुल बात मजाक लागत होय..जहिया पाले परि जइबो वोह ससुरन के..ओह दिन अकिल काम न करी..’’
‘’ओय बकचोदी बन्द कर ले बुड्ढे कुछ ना होता..चुप चाप गाणा सुण…’’ रेडियो वाला व्यक्ति बोला। बगल वाले दोनों लड़के फिर खी खी कर कोरस में हँसने लगे। अहमद सुनकर अनुमान लगाने की कोशिश कर रहा था कि आख़िर माजरा क्या है? अधेड़ बिदकता हुआ अहमद की ओर मुख़ातिब हुआ
‘’अच्छा तुम्हई बताओ भईया..तुम पढ़े लिक्खे जान परत हव.. अबहीं 26 जनवरी के चलते मिलिटरी अ पुलिस दुनहुन क एह एरिया में केतना सखत पहरा है?आँय? है कि नाईं?
‘’हाँ पहरा तो है लेकिन बात क्या है….’’
रेडियो वाला रेडियो की आवाज़ कम करते हुए बोला ‘’अरे बात कुछ ना है भाई साब..आप अपणा काम करो बुड्ढा पागल हो गया है यू’’  और रेडियो की आवाज़ बढ़ा ली, बग़ल वाले फिर कोरस में हँसने लगे अधेड़ फिर भड़कते हुए अहमद की तरफ़ रुख करके
‘’ दे’ख्यो भईया? ई हैं आजकल के लवन्डी!
…मरै क एतना शउक है त मरौ भोंsss के.. हमार त जइसे तइसे पार होइ गई लेकिन तूँ लोग?तूँ लोग रामधे कुत्ता क मउवत मारा जाबो.. कउनो दिन आतंकवादी बतायके ठोंक दीहें त परा रह्यो मुँह बाय के …ओह दिन ई रेडियो कामे न आई’’
रेडियो बन्द करते हुए रेडियो वाला खीझकर बोला ‘’ओय चुप कर भेणके लौ…बुड्ढे..साणे तू अभी क्यों म्हारी लास ठाणा चा.. रा.. बोल तो दी तुझे इब णा जाउंगा… चाए सुसरी पैंट में कू टट्टी हो जा पर उधर ना जाउंगा.. इब के लिखके दूं तझे..?
‘’चाय ले लो रे……’’
बस स्टॉप के कुछ दूर दीवार से लगी झोपड़ीनुमा जगह से एक महिला की आवाज़ आई
‘’आज्जा चल चा पी ले ‘’ कहकर रेडियो वाला चल पड़ा दोनों कोरस वाले लड़के भी उसके साथ चल पड़े,अहमद ने फिर अधेड़ से पूछा ‘’हुआ क्या चाचा’’?
अधेड़ बड़ी नर्मी से समझाते हुए बोला ‘’देखौ बेटा बात ई है कि 26 जनवरी क समय नगिच्चे है अ ई बाउ साहब, हऊ उहाँ सामने देखत हौ.. ओह इलाका मा.. मैदान होय गै रहन..अब तुहीं बताओ पुलिसवाला आतंकवादी बतायके मार दें तौ? तनी भर में त खेला खतम होइ जाइ..गलत कहत होईं त बतावा?
भाषा पूरी तरह समझ में न आने के बावजूद अनुमान से अहमद को सारा माजरा समझ में आ रहा था अधेड़ की चिन्ता एक पिता की चिन्ता सी थी
‘’ह्म्म्म..बात तो सही है आपकी… वैसे…आप लोग क्या करते हैं’’? अहमद ने उत्सुकतावश पूछा
‘’जवन मिल जाय उहै कई लिहा जात है बाबू’’
‘’मतलब आप लोग मज़दूर हैं’’
‘’जब काम मिल जाय त मजूर, नाहीं त भिखारी’’
अहमद को कुछ समझ नहीं आया आज सबकुछ रहस्यमयी ही हो रहा था, उधर पत्थर इलाहाबादी और अब ये… ख़ैर बस न आने तक समय तो काटना था। अहमद ने बात आगे बढ़ाई-
‘’आप रहते कहाँ हैं’’?
‘’जहैं जगह मिल जाय! बस अड्डा..रेलवे स्टेशन..अ अगर पुलिसवालालोग मार के न भगावें त कवनो फुटपाथ’’
अहमद ने हैरत से पूछा ‘’मैं कुछ समझा नहीं चचा..मतलब मैं ये जानना चाहता हूँ कि आप लोग कौन हैं आपका घर कहाँ है?’’
‘’हम लोग कौन हैं? का करिहौ जानिके? ए बच्चा! हम लोग पूरा हिन्दुस्तान हैं..पूरा हिन्दुस्तान!..ऊ दे’ख्यो? रेडियो वाला लड़का? ऊ अपने घर क राजा रहन.. अपने खानदान क एकलौता वारिस.. बीए एम्मे पास… समय एक करवट बदलिस हमरे लोग के संघरी आज भिखारी बना बइठा हैं। आजो उनके पटिदार लोग क खबर मिल जाय… त एक मिनट मा गोली मरवाय दें.. सहारनपुर घर होय उनकर। अ हऊ लोग क दे’ख्यो र’ह्यो न? एक लड़का ओहमा गढ़वाल से है दुसरा नेपाल से। हम का देखौ! हम गोंडा से हन….अ उ अउरत जउन चाह खातिर बोलाइस है …ऊ यहीं पुरानिये दिल्ली क होय, एतनै नाईं बचवा अउर बहुत लोग होंय, कहाँ तक गिनाई? इनकर गिनती त जनगणना बिभागो क लगे न पइबो..कहा न तोंहसे पूरा हिंदुस्तान! सरकारी खाता से बाहर क हिन्दुस्तान..
‘’ओय बुड्ढे चाय ठण्डी हो री फेर गरम ना होगी..आज्जा’’ रेडियो वाले की आवाज़ आई
‘’चलो आओ ..चाह पी ल्यो’’ अधेड़ ने अहमद से कहा
‘’नहीं आप लोग पीजिये मेरी बस आने वाली है’’
‘’अरे पी ल्यो बस आई त चला जायो…आओ’’
अहमद न चाहते हुए भी अधेड़ के पीछे चल पड़ा
‘’ये औरत जब दिल्ली की ही है तो यहाँ क्यों रहती है अपने घर क्यों नहीं जाती’’? अहमद ने चलते चलते अधेड़ से पूछा
‘’जवाब बहुत कठिन है बेटा सवाल न पूछौ..एक एक आदमी क कहानी सुनै खातिर एक एक महिन्ना कम परि जाई… चलौ पटाई मारके चाह पियो अउर अपने घर जाव’’
अहमद चुप होकर चल पड़ा अधेड़ झोंपड़ीनुमा दड़बे में घुसकर दो गन्दे से कप में चाय ले आया,एक ख़ुद ली और एक अहमद की तरफ़ बढ़ाया-
‘’अन्दर आजा बैठकर पी ले आराम से’’ अन्दर से महिला की आवाज़ आई
इतने में 378 नम्बर बस आती दिखी..अहमद ने चाय तेज़ी से सुड़की और कप रखकर बस की तरफ़ लपका
‘’अच्छा चचा शुक्रिया…..बस आ गयी चलता हूँ’’
‘’सम्हार के जाओ हड़बड़ाओ मत ……धियान से …..हाँ …’’
अहमद लपककर बस में सवार हो गया, टिकट कटाकर वो सीट पर बैठा सोचने लगा कि ये रात थी या कोई अधूरा उपन्यास? उसे पीछे छूटे किरदार याद आ रहे थे..लेकिन सब के सब अधूरे, वो सोचता जा रहा था और अजीब से ख़ालीपन से भरता जा रहा था ।

अहमद को मुशायरे के अलावा मुशायरे की रिपोर्ट भी पढ़ने का शौक़ था।अगले दिन चाय की दूकान पर अहमद ने अख़बार के पन्ने खोले तो दिल्ली की ख़बरों वाले पृष्ठ पर एक छोटी सी ख़बर उसे पत्थर की चोट सी लगी।
‘’गुरुद्वारा बंगला साहिब परिसर में एक व्यक्ति मृत अवस्था में पाया गया प्राथमिक जाँच में उसकी मृत्यु का कारण हार्टअटैक बताया जा रहा है।प्राप्त सूत्रों से जानकारी मिली है कि उसका नाम कमलकिशोर था और वो पत्थर इलाहाबादी के नाम से लेखन कार्य करता था,उसने सिनेमा और साहित्य में बरसों संघर्ष किया लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। सम्भवतः इसी   कारण वो अपना मानसिक संतुलन खो बैठा था….’’
अहमद को जैसे लकवा मार गया हो, उसने ख़बर आगे नहीं पढ़ी, पत्थर का चेहरा उसकी आँखों के आगे नाचने लगा और वो पत्थर बना काफ़ी देर वहीँ बैठा रहा…

लालक़िले का तारीख़ी मुशायरा अगले साल से वापस लालक़िले में लौट आया लेकिन अहमद ने फिर कभी मुशायरा सुनने जाने की ज़हमत नहीं उठाई ।

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