सत्य और गल्प की गोधूलि का लेखक शरतचन्द्र

कई साल पहले प्रकाश के रे जी के कहने पर महान लेखक शरतचन्द्र पर यह लेख लिखा था।आज उनकी जयंती पर याद आ गया- प्रभात रंजन

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शरतचन्द्र जिस दौर में लिख रहे थे तब साहित्य, राजनीति हर तरफ सुधार, उद्धार, आदर्शों की चर्चा रहती थी. उसी युग में शरतचंद्र ने ‘गृहदाह’ जैसा उपन्यास लिखा जिसमें अचला यह निर्णय नहीं कर पाती कि वह महिम से प्यार करती है या सुरेश से? ‘चरित्रहीन’ उपन्यास की सावित्री और किरणमयी जीवन में सच्चे प्यार की चाह करती है. ‘श्रीकांत’ की राजलक्ष्मी तवायफ बनकर अपने जीवन में स्वतंत्रता पाती है. स्त्रियों के जीवन को, उनके मन को इतनी बारीकी से पकड़ने वाला लेखक उस दौर में दूसरा नहीं हुआ. शरतचंद्र के लेखन में स्त्रियों के लिए अथाह प्यार है. साधारण स्त्रियों के जीवन को उन्होंने अपने लेखन में असाधारण बना दिया.

15 सितम्बर 1876 को पैदा हुए शरतचंद्र के पिता मोतीलाल चटोपाध्याय भी लेखक थे, लेकिन वे अपनी कोई रचना पूरी नहीं कर पाए. शरत बाबू ने भी 18 साल की उम्र में अपना पहला उपन्यास लिख लिया लेकिन उसे प्रकाशित नहीं करवाया. उनका बचपन मुश्किलों में बीता और इसीलिए शायद उनको घर से अधिक बेघरी भाती थी. वे बार-बार घर से भाग जाते थे, न जाने कहाँ के लिए. जीवन की इन्हीं आरंभिक यात्राओं और उनके अनुभवों को लेकर उन्होंने ‘श्रीकांत’ उपन्यास लिखा जिसकी शुरुआत इन वाक्यों से होती है- ‘मेरी सारी जिन्दगी घूमने में ही बीती है। इस घुमक्कड़ जीवन के तीसरे पहर में खड़े होकर, उसके एक अध्यापक को सुनाते हुए, आज मुझे न जाने कितनी बातें याद आ रही हैं। यों घूमते-फिरते ही तो मैं बच्चे से बूढ़ा हुआ हूँ। अपने-पराए सभी के मुँह से अपने सम्बन्ध में केवल ‘छि:-छि:’ सुनते-सुनते मैं अपनी जिन्दगी को एक बड़ी भारी ‘छि:-छि:’ के सिवाय और कुछ भी नहीं समझ सका।‘

इन पंक्तियों में उनके जीवन, उनके लेखन का सार छिपा है. न प्रचलित मानकों के अनुसार उन्होंने जीवन जिया, न लेखन किया. वे घूमते रहे, तरह-तरह के किरदारों से मिलते रहे, उनसे स्नेह पाते रहे. वे पहले भारतीय लेखक थे जिनकी रचनाओं में विस्थापन का दर्द दिखाई देता है. बंगाल-बिहार में उनका बचपन बीता और बिहार-बंगाल के लोग आज भी सबसे अधिक विस्थापित जीवन जीते हैं. वे जहाँ के होते हैं वहां नहीं रह पाते हैं. खुद शरत बाबू भी नौकरी के सिलसिले में बर्मा गए थे. इसीलिए उनके साहित्य में मिलन नहीं बिछोह अधिक है, घर बसाकर सुख पाने की तमन्ना से अधिक सच्चे प्यार की ख्वाहिश है. अकारण नहीं है कि उनका नायक ‘देवदास’ प्यार में घर से दूर जान दे देता है.

लिखते तो कम उम्र से ही थे लेकिन छपवाने को लेकर उदासीन रहे. उन्होंने अपनी रचनाएं कोलकाता में अपने एक मित्र के पास छोड़ दी थीं, जिन्होंने 1907 में उनको बिना बताये उनकी एक कृति ‘बड़ी दीदी’ का धारावाहिक प्रकाशन एक पत्रिका में शुरू करवा दिया. उसके बाद उनकी कहानियों, उनके उपन्यासों की धूम मच गई. बांगला साहित्य में उनको रबीन्द्रनाथ टैगोर और बंकिम के बरक्स रखकर देखा जाने लगा. लेकिन उनके लेखन की सबसे बड़ी मौलिकता यही है कि उन्होंने समाज में उपेक्षित, परित्यक्त समझे जाने वाले पात्रों के लिए अपने साहित्य में करुणा जताई. उनके उपन्यासों में किरदार संभ्रांत समाज से नहीं आते बल्कि वे ग्रामीण-कस्बाई समाज से आते हैं. वे पहले लेखक थे जिन्होंने समाज को सतह से देखा. बिना किसी आवरण के देखा. साहित्य को एक से एक किरदार दिए. फ्रेंच लेखक बालजाक की जीवनी में स्टीफेन ज्विग ने लिखा है कि ईश्वर के बाद मनुष्यों के सबसे बड़े सृजनकर्ता बालजाक ही थे. यह बात शरत के बारे में भी कही जा सकती है.

वे सच्चे अर्थों में अखिल भारतीय लेखक थे. उनकी रचनाओं के अनुवाद लगभग सभी भारतीय भाषाओं में हुए. महात्मा गांधी के कहने पर उनके सचिव महादेव देसाई ने उनकी कुछ कृतियों का गुजराती में अनुवाद किया था. बांगला भाषा के इस लेखक की सबसे प्रामाणिक मानी जाने वाली जीवनी हिंदी में गांधीवादी लेखक विष्णु प्रभाकर ने लिखी- आवारा मसीहा. शरत बाबू अभाव के कारण ललित कला की पढ़ाई नहीं कर पाए थे लेकिन वे संभवतः अकेले ऐसे लेखक हैं जिनकी साहित्यिक कृतियों पर सबसे अधिक फ़िल्में बनी, टीवी धारावाहिक बने. ‘देवदास’ एक ऐसी कृति है जिसके ऊपर उत्तर-दक्षिण की अनेक भाषाओं में एक दर्जन से अधिक फिल्मों का निर्माण हुआ.

वे स्वयं में एक किरदार थे विरोधाभासों से भरे. बेहद लोकप्रियता के बावजूद भद्र लोक में उनको चरित्रहीन के रूप में देखा जाता रहा और चरित्रहीन समझे जाने वाले लोगों के बीच भद्र पुरुष. एक प्रसंग ‘आवारा मसीहा’ में आता है- “उनके मामा उपेन्द्रनाथ उन्हें खोजते-खोजते जब वेश्यालय गए और शरत् के बारे में पूछा तो उन्हें जो उत्तर मिला वह ऐसे था, ‘ओह, दादा ठाकुर के बारे में पूछते हैं। ऊपर चले जाओ। सामने ही पुस्तकों के बीच में जो मानुष बैठा है वही शरत् है।‘“

वे घंटों कहानियां सुनाते थे और यह पूछने पर कि क्या आपके जीवन में घटित हुआ कहते- ‘‘न-न, गल्प कहता हूँ, सब गल्प, मिथ्या, एकदम सत्य नहीं।’’

15 जनवरी 1938 को साहित्य की एक बड़ी विरासत छोड़कर बार बार घर छोड़कर जाने वाला यह लेखक दुनिया छोड़कर चला गया.

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