लेह, ले मेरा दिल

रचना भोला यामिनी जानी मानी अनुवादिक हैं और ‘मन के मंजीरे’ जैसी किताब की लेखिका हैं जो अपनी तरह की अकेली किताब है हिंदी में जिसमें जीवन, दर्शन सब जैसे शब्दों की लड़ियों में पिरो दिए गए हों। यह उनका यात्रा संस्मरण है जो लेह पर है- मॉडरेटर

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यात्रा अचंभित कर देने वाले क्षणों से भर देती है आत्मा की झोली …जाओ…कहीं दूर घूम आओ, मिल आओ, खु़द से घड़ी भर के लिए.. जी लो कुछ साँसें… कि ज़िन्दगी है छोटी और दुनिया का छोर नहीं!

दिन-रात काम की गहरी व्यस्तताओं के बीच, अपने कमरे बैठे-बैठे खु़द को लगातार प्रेरित करने और यात्रा की योजना तैयार करके निकलने में अंतर है। केवल सोचने की फैंटेसी और वास्तविकता में कहीं पहुँचने और घूमने के बीच की गहरी खाई सुविधाओं-असुविधाओं के पत्थरों से पाटनी पड़ती है। इस खाई को भरने के लिए मुद्रा रूपी चट्टानें गिराई जाती हैं, जिन्हें आप समझने के लिहाज़ से करेंसी भी कह सकते हैं। ऐसा लगता है कि ये चट्टानें जितनी ज़्यादा होंगी, खाई पार करना उतना सरल होता जाएगा परंतु यह सच नहीं है।

 विमान यात्रा ने कुछ ही घंटों में लेह पहुँचा दिया और आकाश से, श्रीनगर से लेह के दौरान दिखते दृश्यों से मन-प्राण भी जुड़ा गए पर इस यात्रा ने यह सुख देने के साथ-साथ सारी कसर भी निकाल ली। हाई आल्टीट्यूड सिकनेस की वजह से यह बयालीस किलो की लड़की, कुछ ही समय में ढह गई। लेह की सैर शुरू भी नहीं हुई थी कि उसी दिन गंभीर सनबर्न हुआ और उसकी मार से सांवला रंग और भी स्याह हो गया। पिछली बार लेह आई थी तो हम मनाली-लेह सड़क मार्ग से आए थे। रास्ते में, रात को केलांग में रुकने से इतनी परेशानी नहीं हुई थी। लेह पहुँचने तक शरीर कम ऑक्सीज़न में साँस लेने का अभ्यस्त हो गया था।

मानुष का स्वभाव ठहरा, एकबारगी तो मन हारना ही था। सजने-सँवरने को इतनी पोशाकें और टूम-छल्ले बैग में भर लाई थी और किसे पता था कि जाते ही बिस्तर से लग जाऊँगी। संजय जी और बेटे का चेहरा उतर गया। अक्सर हम औरतों के पास एक अतींद्रिय शक्ति पाई जाती है जो ज़रूरत पड़ने पर स्वयं ही आगे आ जाती है। कुछ घंटों के आराम, गर्म कॉफ़ी और टोमैटो सूप के बाद, मैं उन दोनों के साथ चलने को तैयार थी। एक्लाइमेटाइजे़शन की प्रक्रिया अपनी गति से जारी थी। हालांकि कमजोरी की वजह से चेहरा बुरी तरह से मुरझा गया था। अब आप डेढ सौ ग्राम भर के चेहरे को भी कुम्हलाने का मौका दे दें तो खु़द ही अंदाज़ लगाया जा सकता है कि पीछे चुहिया का चेहरा बचा होगा या फिर चींटी का!!

मुझसे न पूछें कि चली कितने कोस, कितने मोड़, कितने पहाड़, कितना पैदल, कितनी गाड़ियों में हुई सवार! दिन, महीने, घंटे, अब कौन रखे हिसाब उन बातों का जिनका बेहिसाब होते जाना ही बेहतर है। हिसाब रखती अँगुलियों के पोर अक्सर घिस जाते हैं और उन्हीं घिसे हुए पोरों से समय की रेत सरसराती हुई निकल जाया करती है। इन्हीं रेत के कणों के साथ बह जाते हैं यादों के छोटे-छोटे झिलमिलाते कण, जिनके सहारे रोशन होते हैं हमारी ज़िन्दगी के अंधेरे। कुछ बेहिसाबियाँ ज़िन्दगी का हिसाब बिठाने में मदद करती हैं क्योंकि यादें किसी हिसाब की मोहताज़ नहीं।

कौन रखे हिसाब कि मैं कम ऑक्सीज़न की मार झेलते फेफड़ों के संग, थिकसे मठ की कितनी सीढ़ियाँ हाँफते-हाँफते चढ़ी और क्यों मैंने कार से मठ के प्रवेश द्वार तक जाने से इंकार कर दिया। क्यों याद रखा जाए कि कितने पहाड़ी पठारों से चढ़ते-उतरते हाथों-पैरों में उभरी खरोंचें, जाने कितने मठों के निर्जन एकांत में बने कक्षों में पीले और सफ़ेद रंगों के वस्त्रों में बँधी प्राचीन पांडुलिपियों में छिपे तिब्बती मंत्रों ने बड़ी ललक से बाँहें पसारे मेरी आत्मा को छुआ होगा।

बड़े चाव से गहरे हरे रंग की सूती साड़ी और संतरी रंग का क्रॉप टॉप पहनने को रखे थे और मैं खु़द आईने में अपना चेहरा नहीं पहचान पा रही थी। संजय जी से कलात्मक तस्वीरें उतरवाने की सारी साधें अधूरी लगती जान पड़ रही थीं। तैयार तो हुई पर मन मरा-मरा सा था। साड़ी के रंग से मेल खाता चेहरा लिए उस ख़ूबसरत गोम्पा की छत तक पहुँची तो मन का मलाल जैसे चुटकियों में दूर हो गया।

तिब्बती शैली में बने बौद्ध मठ के भवन गोम्पा कहलाते हैं। इन्हें तिब्बती भाषा में ‘दगोन पा’कहते हैं यानी ‘एकांत स्थान। इन्हें प्रायः किसी ऊँचे पहाड़ या चट्टान पर बनाया जाता है। ज्यामितीय धार्मिक मंडल के आधार पर बने गोम्पा के केंद्र में बुद्ध की मूर्ति अथवा उन्हें दर्शाने वाली थांका चित्रकला पाई जाती है।

प्रकृति के उस विशाल प्रांगण में पल-पल रंग बदलते, बादलों से अठखेलियाँ करते पहाड़ों के बीच तिब्बत के पोताला महल के आधार पर बने थिकसे मठ की छत पर पहुँचते ही सिंधु घाटी के बाढ़ के मैदानों का जो अप्रतिम और अभूतपूर्व दृश्य दिखा तो जैसे कुछ पल के लिए अवाक् हो उठी।

अपनी छब बनाई के जो मैं पी के पास गई

जो छब देखि पीऊ की तो मैं अपनी भूल गई

मैं उस विराट महाप्राण उपस्थिति के आगे कितनी छोटी थी। उस सुंदरता के आगे क्या मेरी छब और मैं! बस एक वह क्षण और उसके बाद एक क्षण के लिए भी मन में अपनी उस अस्थायी कुरूपता के लिए हीनभावना नहीं आई। मैं माँ की गोद में खिलखिलाती बच्ची बन गई जिसके स्नेह और हार्दिकता के आगे बाक़ी सब कुछ गौण हो जाता है। आज भी उन तस्वीरों में भले ही अपना चेहरा अनचीन्हा लगता है पर आँखों में एक ऐसी चमक दिखती है जो कुछ अलौकिक, दिव्य और भव्य दिख जाने पर अनायास उभर आती है।

पूरे नौ बरस बाद लेह की धरती पर फिर से कदम रखे थे और ऐसा लग रहा था कि पहली बार तो देख रही थी उसका अनछुआ सौंदर्य! कौतूहल का अंत नहीं था। शहर के आधुनिक सुविधाओं से युक्त बाज़ार में देसी-विदेसी पर्यटकों की भीड़ के बीच हम तेज़ी से अपनी मंज़िल की ओर बढ़े जा रहे थे क्योंकि दिन ढलने को था और हमें लेह पैलेस जाना था।

फ़ोन की गैलरी में एक तस्वीर सेव थी जो पिछली लेह पैलेस यात्रा के दौरान खींची गई थी और पहले से तय था कि ठीक उसी जगह पर, लेह पैलस के सातवें तल से उसी टाईटैनिक पोज़ में एक और तस्वीर उतारी जाएगी जिसकी पृष्ठभूमि में पूरा लेह शहर दिखाई देता था। बेटे ने ठीक वैसी ही एक तस्वीर खींच दी।

दोनों तस्वीरें एक ही फ्रे़म में सैट करके देखी गईं। बेशक़ तस्वीरों में अंतर तो था, क्यों नहीं होगा। पूरे नौ बरस के फ़ासले में इस जीवनरूपी यात्रा में जाने कितने मानसिक संघर्ष झेले होंगे, जाने कितनी चुनौतियों से पार पाया होगा जिनके बारे में हमें सब भूल चुका था पर देह पर उन्हीं ज़्यादतियों के निशान उभर आए थे।

बालों में हल्की सफ़ेदी, चेहरे पर गहरी होती झुर्रियाँ… बहुत कुछ बदला हुआ था। बस नहीं बदला था तो दोनों तस्वीरों में संजय जी और मेरे हाथों का स्पर्श। इतने बरस बाद भी हाथों की छुअन उसी नेह और भरोसे से स्नेहासिक्त थी जो पहले थी। उस कंधे का स्पर्श आज भी उतना ही संबल दे रहा था जितना तब दिया होगा। हम अक्सर जीवन की भागदौड़ के बीच इन छोटी-छोटी नियामतों को जाने क्यों नज़रंदाज़ कर जाते हैं? इन बीते नौ बरसों में हमारे प्रेम ने लेह में बिताए उन पलों की एक-एक याद को ताजा़ रखा था। हम उन्हीं गलियों में अपने छूटे हुए कदमों के निशान खोज रहे थे और ‘गोटुल (पारंपरिक शैली में बने पुराने घर) के दरवाज़े नाराज़गी दिखाते हुए पूछ रहे थे, ‘कहाँ रही, जुगल जोड़ी इतने बरस?’ हमारे पास उन उपालंभों का कोई उत्तर नहीं था। जीवन के कड़े पाठ्यक्रम के बीच हम इसकी अचानक सामने आ जाने वाली परीक्षाएँ पार करते-करते भूल जाते हैं कि हम किसी से कोई वादा कर आए थे जिसे निभाने के लिए उसके पास लौटना होगा।

लेह से लगभग पैंतालीस किलोमीटर की दूरी पर, एक बहुत बड़ी पहाड़ी पर रमणीक प्राकृतिक परिदृश्य के बीच स्थित है, ’हेमिस गोम्पा।

यह मठ तिब्बती स्थापत्य शैली में बना है जो बौद्ध जीवन व संस्कृति का प्रदर्शन करते हैं। मठ में भगवान बुद्ध की तांबे से बनी विशाल प्रतिमा के दर्शन किए जा सकते हैं। इस मठ की देख-रेख द्रुपका संप्रदाय द्वारा की जाती है। तिब्बत में द्रुक का अर्थ है ‘ड्रैगन’। यह संप्रदाय बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय की वज्रयान शाखा का अनुयायी है।

तिब्बती कैलेंडर के अनुसार यहाँ हर बारह वर्ष के बाद नरोपा उत्सव का आयोजन होता है। हज़ारों बौद्ध अनुयायी, दार्शनिक व विद्वान नरोपा के जीवन का उत्सव मनाने के लिए सांस्कृतिक आयोजन करते हैं। पिछली बार वर्ष 2016 में इसे मनाया गया था परंतु सन् 2018 में इसे एक विशेष उत्सव के रूप में आयोजित किया गया था।

 हेमिस मठ में भारी चहल-पहल दिखाई दे रही थी। हम मठ के रेस्ट हाउस में ठहरे भिक्षुओं के साथ उनके मनोरंजन के कुछ क्षणों के सहभागी हुए।

हेमिस मठ के निकट ही एक खुले मैदान में नरोपा फेस्टीवल देखने का अवसर मिला, जिसे ‘हिमालय का कुंभ’नाम दिया गया था। किसी स्थान की कला, संस्कृति, इतिहास, धर्म व परंपराओं को जानना हो तो इससे बेहतर कोई जगह क्या हो सकती है। …और हम पूरा दिन नरोपा फेस्टीवल में विविध मठों से आए बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों, स्कूली बच्चों, ग्रामीण स्त्री-पुरुषों, माला पर निरंतर घूमती अंगुलियों के साथ बौद्ध मंत्र बुदबुदाती बूढ़ी आमाओं और हाथ में लिए मणि चक्र घुमाते अधेड़ बौद्ध अनुयायियों, रॉक स्टार्स की तरह गिटार लटकाए लंबे बालों वाले किशोरों और स्थानीय वेशभूषा में सजी युवतियों के बीच रमते रहे।

एक सुबह पहाड़ों पर बिखरी मीठी-मीठी धूप और आँख-मिचौली खेलते बादलों के संग रंग बदलते पहाड़ों की निगहबानी के बीच हम शे गोम्पा पहुँचे। शे गोम्पा लेह से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ स्थित बुद्ध की मूर्ति को लद्दाख में दूसरी सबसे बड़ी मूर्ति माना जाता है जिस पर ताँबे और सोने का पानी चढ़ा है। इस मठ का निर्माण राजा देल्दन नामग्याल ने वर्ष 1655 में करवाया था। पहले इसे लद्दाख की ग्रीष्मकालीन राजधानी माना जाता था। हालांकि अब यह स्थान जर्जर अवस्था में है परंतु गोम्पा के प्रबंधन के लिए भिक्षु उपस्थित रहते हैं।

शे गोम्पा मुख्य सड़क के किनारे पर ही स्थित है परंतु इस स्थान पर एक अनूठा सा पुरातन आकर्षण अनुभव होता है। भिक्षुओं ने बहुत ही क़ायदे से जगह को संरक्षित कर दिया है। मठ की छत पर तिब्बती बौद्ध मंत्र अंकित पाषाणों की क़तारें मन बाँध लेती हैं। मठ में दीपदान कक्ष में सैंकड़ों प्रकाशित दीपों के बीच हाथ जोड़ कर खडे़ होते ही लगता है मानो एक दिव्य और पवित्र वातावरण की सृष्टि हो गई हो। प्रकृति स्वयं एक-एक कण को अलौकिकता का अमृतपान करवा रही हो।

 हम भी उसी परिवेश में मंत्र-मुग्ध हुए खड़े थे कि बाहर से आते कोलाहल और हो-हल्ले के स्वर से तंद्रा टूटी। लगा किसी ने दैवीयलोक से खींच कर यथार्थ के धरातल पर ला पटका को। मेरे दोनों साथी चुपचाप अपने कैमरे की नज़रों से आसपास दिखते नज़ारों को कैद करने में मग्न थे। अचानक सीढ़ियों से छह-सात पर्यटकों का रेला धड़धड़ाता हुआ ऊपर आ गया।

‘ओ वाह! यार जगह मस्त है!’

‘ख़ाक़ मस्त है। सारी मोनेस्ट्री एक जैसी दिखती हैं? और कुछ घूमने को है नहीं? हम तो बोर ही हो गए आ कर। ऐसे ही हवा बना रखी है।’

बाकी लोगों के शिकायती सुर के बीच बेचारे प्रकृति प्रेमी पर्यटक की आवाज़ दब कर रह गई। उन लोगों ने ताबड़तोड़ सेल्फियों के दौर के बीच टॉफी-चॉकलेट और चिप्स चबा कर, रैपर वहीं छत पर फेंके और इस बहस में पड़ गए कि सीधा होटल जा कर कोई मूवी देखनी है या फिर एक और मोनेस्ट्री देखने का धीरज शेष है।

हम तीनों ने चुपचाप एक भी अक्षर कहे बिना, उनके फैलाए रैपर और खाली पैकेट बीनने शुरू कर दिए और उन्हें एक खाली लिफाफ़े में डाल दिया। हमें देख कर उनमें से एक सज्जन की आँखें शर्म से झुकीं और वे अपनी अंग्रेज़ी में घिघियाते हुए सॉरी का राग अलापने लगे। उन्होंने हमसे वह लिफाफ़ा लिया और वादा किया कि वे स्वयं उसे कूड़ेदान के हवाले कर देंगे।

पर्यटक दल के विदा होते ही उस स्थान की शांति और पवित्रता लौट आई और हम आपस में देख कर मुस्कुराए। जो बात कही नहीं जा सकती थी, हमने बिन कहे उन्हें समझा दी और उम्मीद थी कि शायद वे आगे से सार्वजनिक स्थानों और पर्यटन स्थलों पर इस तरह कचरा डालने से बाज़ आएँगे।

राह पर क्या चलना, बस खु़द रास्ता हो जाओ जी!

 ‘अरी देख, अरी देख… आँखें खोल के देख। जी भर कर देख न। मैं कार की खिड़की से लगातार गर्दन बाहर लटकाए खुद को कहती रही. देखते ही देखते गाड़ी ने काटा मोड़ और पहाड़ महाराज ने बदला रूप। लेह से नुब्रा घाटी की यात्रा के दौरान पहाड़ों ने इतने रूप बदले कि क्या कहा जाए। छलिए एक पल को भी तो टिकते नहीं। जितने पहाड़, उतने क्षण-प्रतिक्षण नए रूप। दृष्टि की एक सीमा ठहरी, किस ठौर तक जाएगी। इसकी भला इतनी कुव्वत, ये कु़दरत के हर नज़ारे को पी पाएगी? पी भी लिया तो क्या पचा लेगी? पचा भी गई तो क्या गुन सकेगी? न जी, क़ुदरत के महारहस्यमी रूपों में से एक, ‘पहाड़’ के आगे बौने हैं हम…

फिर भी अपनी अक्ल पर ज़ोर डालते हुए बड़े ही घमंड से पूछा मैंने…

कौन सा पहाड़ लेंगे जनाब?

ममेरे चचेरे भाईयों के दिलों में आ गई दूरियों से छितराए हुए पहाड़!

अमीरी-गरीबी की विषमता दर्शाते छोटे-बड़े पहाड़!

सेना में भर्ती नए रंगरूटों से सीना ताने गर्व से फूले पहाड़!

हसीन नदियों की निगरानी को सहोदर से खड़े चिंतालु पहाड़!

लाल-लाल सेबों से लदे पेड़ों को किसी जलनखोर पड़ोसी सा तकते भुक्खड़ पहाड!

वाई-फाई कनेक्शन न मिलने की तड़प में मुरझाए टीनएजर से झींक-झींक कर बड़े-बड़े पत्थर लुढ़काते पहाड़!

किसी पहाड़ी नदी से गोल-सफ़ेद पत्थरों को सड़क पर बिछा देने को आतुर पहाड!

अपनी पीठ पर तिब्बती मन्त्रों की खुदाई लिए किसी लामा से ध्यानमग्न खड़े पहाड!

धुर शिखर पर गोद में पुरातन गोम्पा लिए बैठी माँ से सहनशील पहाड़!

किसी पहाड़ी छोकरी की लटों में गुंथी बारीक चोटियों सी काली पतली सड़कें लिए इतराते पहाड़!

प्रकृति के विशाल प्रांगण में किसी एकांत कोने में आँखें मूंदे विश्व का कल्याण साधते गौतम से पहाड़!

किसी निपूते बाप से, संतान की किलकारी सुनने को मन ही मन घुलते बंजर पहाड!

घर में सुखाए मेवों के पैकेट बेचने को बैठी, दो चोटियों वाली बुढ़िया आमा की इंतज़ार में पसरी नज़र से उदास पहाड़!

हाईवे किनारे बने मॉर्डन पहाड़ों पर शेल्फ़ों पर सजे पैकेटबंद चिप्सों व पेय पदार्थों को बेबसी से तकते प्राचीन पहाड़!

अपनी ही नज़रों के आगे क़ुदरत की आब को पिघलती पतली बर्फ़ सा गलता देख बिसूरते पहाड!

किसी संगदिल आशिक की कठोर छाती पर उगे मुलायम काले बालों से झक्क काले पहाड!

किसी स्कूल गर्ल की आँखों से नाजु़क, छूते ही भरभरा कर बरसने को तैयार पहाड़!

 किसी घुमक्कड़ विदेशी के जटाजूट से उलझे, विस्फारित नेत्रों से निहारते भूरे-तांबई पहाड!

कहीं पास ही बलखाती रूपहली नदी की छुअन भर से लजाते-सकुचाते लाल पहाड!

 भयंकर हरहराती वेगवती नदी को जोड़ने वाले पुल की जीत में जश्न में झूम-झूम कर नाचते, मदमाते पहाड!

धुंधलके में किसी मानुष को निपट अकेला जान, किसी गुंडे-मवाली से चारों ओर से आ कर अचानक घेरते भयावह पहाड!

अपनी कंदराओं में सदियों से किसी रहस्य को छिपाए, रहस्यदर्शी से मंद-मंद मुस्कुराते मौन खड़े पहाड़!

नरम भुरभुरी माटी लिए, इंक्रेडीबल इंडिया के स्लोगन से, पर्यटकों को लुभाते और अपनी ओर खींचते पहाड़!

ओम मणि पदमे हुम की रंगीन लिखावट के बीच सभी रंगों को आस्था का सबक सिखाते गुरुजन से अडोल पहाड़!

पचपन बरस के बूढ़े के खल्वाट पर उगे चंद बालों से छिटपुट हरे बूटे लिए झेंपते पहाड़!

पीली-गुलाबी जंगली बेलों की लताओं को किसी मैराथन में मिले मैडल सा बार-बार पेश करते पहाड!

किसी अजूबे राक्षस के पंजों के निशान अपने पेट पर लिए, हर तकलीफ़ को अकेले ही पीते पहाड़!

किसी हिट फिल्मी अदाक़ारा से बारंबार रूप-रंग बदलते तमाशाई पहाड!

हर दृष्टि को एक नए कोण से दिखते, ज्यामिति की किसी प्रमेय से जटिल पहाड़!

चांद की रोशनी में नहाए, अवलोकितेश्वर के रत्नजटित मुकुट से झिलमिलाते पहाड!

स्याह रात से मिलन को उमड़ती वाहनों की टिमटिमाती बत्तियों से अपना श्रृंगार रचाती अलबेली पहाड़ी युवती से पहाड!

आसमान के कैनवस पर किसी स्वयंसिद्ध पेंटर से भूरे के हल्के, गाढ़े, मटमैले, धूसर, सब्ज़, पीले, हरे और जाने कितने शेड्स बनाते-मिटाते और बिखेरते पहाड!

कुशल बहुमुखी प्रतिभा के धनी निर्देशक से, केवल एक ही टेक में खूबसूरती का पैमाना रचते पहाड!

 सीने पर इत-उत बिखरी बर्फ़ संग, केक पर आईसिंग शुगर जैसे दिखते पहाड!

नकारात्मक शक्तियों से जूझते किसी तांत्रिक से काला चोला पहने तंद्रा में गोल-गोल झूमते पहाड!

चंदा और इक्का-दुक्का तारों की अगुवाई में किसी पहाड़ी मेजबान से बिछ-बिछ जाते पहाड़!

नज़ाकत से बिजली और इंटरनेट के टॉवर संभाले, पकी उम्र में कंप्यूटर सीखते किसी बूढ़े से उत्साही पहाड!

 किसी चरवाहे के उजाड़ फटेहाल तंबू में दुबकी सर्दी से कठोर व जनशून्य पहाड़!

अपनी ही असंभव सीमाओं से रोमांचित किसी पर्वतारोही को चुनौती देते, अंगूठा दिखाते, किसी शरारती बच्चे से खिल-खिल कर दांत निपोरते पहाड!

 किसी मंझे हुए कैरेक्टर आर्टिस्ट से हर बार नए क़िरदार के साथ दर्शकों को अचंभित करते पहाड!

हरी सब्जी पर मुंह बिचकाते, पिज्ज़ा खाने के हठ पर अड़े किसी बच्चे से अड़ियल टट्टू पहाड़!

बौद्ध भिक्षुओं की प्रार्थनाओं से धीमे-धीमे गुंजरित अनाम झींगुरों के समूह राग अलाप भरते रसिक पहाड़!

रंगीन पताकाओं की लड़ियों से लहराते, नीम अंधेरे की हल्की उजास में आशा का दामन थामे श्रद्धालु व आस्थावान पहाड़!

हर दूसरे-तीसरे मोड़ पर कुशल वाहन चालक के हुनर की परख़ करते, बोर्ड की परीक्षा में अचानक आ धमकी फ्लाइंग के ऑफ़िसर से गुस्सैल पहाड!

दिन के उजाले में अपने सलोने रूप में ललचाते और संझा ढलते ही कटी नाक वाली शूर्पणखा से डराते पहाड!

सभी विधाओं से परे, अनूठी श्रेणियों में रचते, किसी पुरस्कार के मोह से दूर, सज्जन साहित्यकार से खड़े विनीत पहाड़!

चेतना की सतह  पर सभी तो प्रतिबिंबित हैं, बस यही नहीं समझ पा रही कि जितना लेने गयी थी, उससे कहीं ज़्यादा अपना-आप छोड़ कैसे आई ?

क्रमशः

                                                                                                                          -रचना भोला ‘यामिनी’

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