सजी थी बज़्म, मगर टूट गया साज़ का तार

पं जश करण गोस्वामी एक मूर्घन्य सितार वादक थे. राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार एवं एम0 पी0 बिरला फाउंडेशन कला सम्मान जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित पं गोस्वामी ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता श्री गोविन्द लाल गोस्वामी से ली. तत्पश्चात सितार वादन का गहन प्रशिक्षण आपने प्रसिद्ध सरोद  वादक उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब से ली. उनके आज उनकी जयंती है। उस कला साधक को याद करते हुए यह लेख लिखा है श्री अमित गोस्वामी ने। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित सिद्धहस्त सरोद वादक अमित गोस्वामी ने संगीत की शिक्षा अपने पिता पं0 जश करण गोस्वामी से ली. आकाशवाणी, दूरदर्शन में लगभग 30 सालों से प्रसारित होने के अतिरिक्त देश के कई प्रतिष्ठित समारोहों में शिरकत कर चुके हैं. संगीत के अलावा अमित साहित्य में भी गहरी रुचि रखते हैं और उर्दू में ग़ज़लें और नज्म़ें भी लिखते रहते हैं. बक़ौल अमित –‘मौसीक़ी मेरी माँ है, और शायरी महबूबा’-

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आँखों में आँसू छलक रहे हैं, और ज़हन में क़ैफ़ी आज़मी का शेर गूँज रहा है..

उस वक़्त क्या था रूह पे सदमा, न पूछिए

याद आ रहा है उनसे बिछड़ना, न पूछिए

ऐसे किसी शख़्स के बारे में औपचारिक रूप से कुछ कहना या लिखना बहुत मुश्किल है, जिससे आपके रिश्तों में औपचारिकता के लिए कोई जगह ही नहीं रही हो. पिताजी, पं0 जश करण गोस्वामी, जिन्हें हम पापाजी और लोग गुरूजी कहते थे, से हमारा ऐसा ही अनौपचारिक रिश्ता था. आम तौर पर पिता-पुत्र के रिश्तों में दोनों ही और से एक अनकही और ज़्यादातर ग़ैर ज़रूरी औपचारिकता देखने को मिलती है. हम दोनों भाइयों के साथ उनका रिश्ता केवल पिता-पुत्र का ही नहीं था. वे हमारे गुरु होने के साथ ही एक बेहद सहृदय दोस्त भी थे. बहुधा कई लोगों ने इस बात की और इशारा भी किया है, कि हम बाप-बेटे नहीं ‘भायले’ ज़्यादा लगते हैं. कई बार लगता है कि एक बाप और दोस्त होने के कारण ही एक गुरु के रूप में वे उतने कठोर नहीं हो सके, जितने अमूमन उस्ताद हुआ करते हैं.

उनके बारे में लिखना अगर मुश्किल है, तो क्या ज़रूरी है की कुछ लिखा ही जाए? उनके संगीत, खाने-पीने के शौक़, उनके व्यक्तित्व और चलते-फिरते बीकानेर-एन्साइक्लोपीडिया होने के बारे में हम में से ज़्यादातर लोग जानते हैं. उनकी क़िस्सागोई, बात-बात पर लतीफ़े और हर सन्दर्भ पर शेर सुनाने का उनका अंदाज़ और कमाल की याद्दाश्त को सभी याद करते हैं. फिर उनके बारे में ऐसा क्या है, जो लोग नहीं जानते?

उनकी यादों के औराक़ उलटते-पलटते उनकी शख़्सियत का एक पहलू बार-बार सामने आता है—उनकी बेफिक्री. “हो रहेगा कुछ न कुछ, घबराएँ क्या?” वाला ग़ालिबी अंदाज़ आखिर तक उनके साथ रहा. इसी बेफिक्री के चलते उन्होंने अपने कुछ महत्त्वपूर्ण और दुर्लभ दास्तावेज़ और फ़ोटोज़ संभाल कर रखने का वैसा जतन नहीं किया, जैसा कि आम तौर पर लोग करते हैं. ऐसे एक दुर्लभ फोटो के खो जाने का ज़िक्र उन्होंने एक बार किया था, जिसमें उस्ताद अली अकबर ख़ान उस्ताद विलायत ख़ान, पंडित निखिल बनर्जी, पंडित रवि शंकर के साथ वे स्वयं भी थे. लेकिन यह बेफिक्री उन्होंने केवल अपने लिए रख छोड़ी थी, वरना वे एक बेहद ज़िम्मेदार पति, पिता, गुरु और सबसे अहम् एक बेहद ज़िम्मेदार और सजग संगीतकार थे.

संगीत के क्षेत्र में घुसपैठ कर गए बाज़ारवाद पर वे चिंतित रहते थे. अंतिम समय तक रियाज़ के मामले वे हम दोनों से कहीं आगे थे. बड़े दिलचस्प अंदाज़ में वे कहते थे कि “तुम्हारी पीढ़ी ज़रुरत से ज़्यादा प्रोफेशनल हो गई है, और तुम रियाज़ भी इसीलिए नहीं करते, कि तुम्हें बिना पारिश्रमिक बजाने की आदत नहीं रह गई है.” उन्होंने कभी रियाज़ को लेकर समझौता नहीं किया और अंतिम बीमारी के लिए जयपुर जाने से ठीक पहले तक भी वे घंटों रियाज़ करते रहे.

लम्बी बीमारी किसी को भी अन्दर से तोड़ सकती है. फिर उनकी बीमारी ने तो शरीर को अन्दर-बाहर से पूरी तरह झकझोर दिया था. फिर भी उनकी भीतरी ताक़त अंतिम समय तक पेट के जानलेवा कैंसर का कड़ा प्रतिरोध करती रही. छः महीने के अंतराल में हम में से किसी ने भी उनके अन्दर कोई झुँझलाहट नहीं देखी. जयपुर के ‘संतोकबा दुर्लभजी अस्पताल’ के सर्जरी विभाग के सभी मरीज़ों में सबसे गंभीर अवस्था में होने के बावजूद वे सबसे शांत और संयमित मरीज़ थे.

पूरी बीमारी के दौरान वे सिर्फ एक बार व्यथित दिखाई दिए थे. पहले ऑपरेशन के बाद उन्हें एक छोटी सी जाँच के लिए दोबारा ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया. जाँच के दौरान पता चला कि कुछ जटिलता के चलते एक बड़ा ऑपरेशन और करना पड़ेगा. सर्जन ने हमारी स्वीकृति लेते हुए और स्तब्ध कर देने वाली सूचना देते हुए बताया कि ऑपरेशन टाला नहीं जा सकता है, और इसमें उनके बचने की संभावना केवल पंद्रह से बीस प्रतिशत ही है. इस दूसरे ऑपरेशन से उबार जाने के बाद जब उन्हें इस बारे में बताया गया तो बोले—“जब मेरे बेटों को बताया गया होगा कि इस ऑपरेशन में मेरा बच पाना मुश्किल है, तो उन पर क्या बीती होगी!!” – और पहली बार उनकी आँखों में आँसू छलक आए.

अस्पताल में गंभीर अवस्था में भी उनकी क़िस्सागोई और लब-ओ-लहजा उनके साथ था. ऑपरेशन के बाद सीने का घाव कई दिनों तक खुला रहने पर उन्होंने कहा –

शक हो गया है सीना, ख़ुशा लज़्ज़त-ए-फ़राग़

तकलीफ़-ए-पर्दादारी-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर गई

(ख़ुशकिस्मती है और इसमें भी मुक्त हो जाने का आनंद है, कि मेरा सीना फट गया है, अब जिगर के ज़ख़्म को छुपाए रखने की तकलीफ़ नहीं रही)

इसी तरह बेहद कमजोरी और ख़ून की कमी के दौरान जाँच के लिए ख़ून निकालने की नाकाम कोशिश करती हुई नर्स को देखकर उन्होंने कहा

मेरे फ़िग़ार बदन में लहू ही कितना है?

चिराग़ हो कोई रौशन, न कोई जाम भरे

दूसरे और तीसरे ऑपरेशन के बीच कुछ दिन की छुट्टी के बाद जब वे फिर अस्पताल पहुँचे, तो डॉक्टर ने कहा –“आइये गोस्वामीजी! आप फिर आ गए?” वे फ़ौरन बोले—

शायद मुझे निकाल के पछता रहे हैं आप

महफ़िल में इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं

उनके आसपास के लोगों को ये एहसास हो गया था, कि वे अब ज़्यादा दिन नहीं रहेंगे. इससे उनके जाने का ग़म हमारे लिए और ज़्यादा कष्टदायक हो गया था. लेकिन इस अंदेशे की वजह से हम उनकी कुछ महत्त्वपूर्ण रिकॉर्डिंग्स कर सके. ऐसी ही एक रिकॉर्डिंग में उनके भतीजे सुधीर तैलंग ने उनसे पूछा है कि जीवन के इस पड़ाव में अब आपकी क्या इच्छा है? हलकी सी साँस लेकर वे कहता हैं-“जब दिन भर में बमुश्किल आधी रोटी ही मिला करती थी, तब भी कभी पूरी की इच्छा नहीं की, आज भगवान् का दिया सब कुछ है. अब क्या इच्छा करूँ?”

अस्पताल में उनका हाल-चाल जानने के लिए हर रोज़ बीसियों फोन आते थे. एक दिन मेरे मोबाइल पर उनके मित्र वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मी नारायण रंगा जी का फोन आया. मैं उन्हें फोन देकर थोड़ी दूर बैठे रेजिडेंट डॉक्टर से बात करने लगा. मैंने देखा बात करते वक़्त उनकी आँखों में आँसू छलके हुए हैं. न जाने क्यों? पर मैंने उस दिन उनसे इसकी वजह नहीं पूछी.

उनकी मृत्यु के बाद उनकी स्मृति में हुए एक कार्यक्रम में रंगा जी ने बताया “अस्पताल में मैंने उनसे बात की तो कहने लगे कि मैं कभी कभी ईश्वर से शिकायत करता था, कि जो मुझे मिलना चाहिए था, वो नहीं मिला….. पर अब मुझे कोई शिकायत नहीं है.. उसने मुझे दो बेटे ऐसे दिए हैं, जिन पर मुझे नाज़ है”

कानों में अब तक रंगा जी के शब्द गूँज रहे हैं…. और आँखों में अब तक आँसू छलक रहे हैं.

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अमित गोस्वामी

7 ब 35, पवनपुरी,

साउथ एक्सटेंशन

बीकानेर

फोन  9414324405

            7014601647

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