इत्ती-इत्ती किताबें किसके लिए छपती हैं?

हिंदी में किताबों की दुनिया का विस्तार हो रहा है. यह बड़ी सुखद बात है. लेकिन कंटेंट को लेकर घालमेल बढ़ता जा रहा है यह चिंता की बात है. शिक्षाविद कौशलेन्द्र प्रपन्न का लेख इन्हीं चिंताओं को लेकर है- मॉडरेटर 
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पुस्तकें होती ही हैं पाठकों के लिए। और लेखक भी पाठकों के लिए ही लिखता है। यह अलग बात है कि आज जिस रफ्तार से किताबें लिखी और छापी जा रही हैं उसका एक उद्देश्य ख़ास पुरस्कार, सम्मान पाना भी प्रकारांतर से लेखकीय मंशा होती है। मंशा तो यह भी होता है कि किस तरह अपनी किताब का प्रमोशन करूं कि ज्यादा से ज्यादा प्रतियां बिकें और अखबारों में उसकी समीक्षा की झड़ी लग जाए। लेकिन लेखक भूल जाता है कि किताबें अपनी कंटेंट और शिल्प की वजह से ख़्याति हासिल करता है न कि हथकंड़े अपनाने से।

हथकंड़ों से कुछ प्रतियां तो लाइब्रेरी में खरीदवाई जा सकती हैं, लेकिन वह पाठकों की पहुँच से दूर ही होती हैं। महज विश्व पुस्तक मेले में बहुतायत मात्रा में पुस्तकों के लोकार्पण का भी मामला नहीं है बल्कि हर पुस्तक मेले में इस तरह की कवायदें हुआ करती हैं। लेकिन इस हकीकत से भी मुंह नहीं फेर सकते कि जिस रफ्तार से किताबों का लोकार्पण पुस्तक मेले में हुआ करते हैं वे उसी तेजी के साथ काल के गाल में भी समा जाती हैं।

कोई भी किताब अपनी गुणवत्ता और कंटेट के बदौलत वर्षों-वर्षों तक पढ़ी और पुनर्व्यखायायित होती रही हैं। ईदगाह, उसने कहा था, दो बैलों की कथा, सूखा, चित्रलेखा, स्मृति की रेखाएं, चीफ की दावत, दोपहर का भोजन, जिंदगी और जोंक आदि हमारे सामने उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत हैं। इनके लेखकों ने तथाकथित कोई चलताउ प्रयास अपनी रचना को लेकर नहीं की। बल्कि उनकी रचना खुद अपनी पठनीयता की पैरवी करती हैं। लेखक के प्रयास किताब की कथानक के आगे कम पड़ जाती हैं। लेखक का वास्ता महज लिखने तक होता है। लिख लिए जाने के बाद किताब पर हक और दावेदारी लेखक से ज्यादा पाठक-समाज की हो जाती है। पाठक – और प्रबुद्ध समाज उस लिखे हुए शब्द-विचार समाज को ही सच्चाई मान कर चलता है। लेखक लिख लिए जाने के बाद दूसरी किताब पर काम शुरू कर देता है। निर्मल वर्मा के साथ इन पंक्तियों के लेखक ने सरस्वती सम्मान मिलने पर बातचीत की थी तो उन्होंने कहा था कि लेखक के तौर पर मुझे जो कहना था वह मैंने अपनी किताबों में लिख चुका हूं। एक बार पुस्तक लिख लेने के बाद मैं अपनी अगली किताब की परिकल्पना में जुट जाता हूं। एक लेखक के तौर पर क्योंकि पूर्व किताब में उसे जो और जितना कहना था वह कह चुका। अब उसके हाथ से वह किताब निकल चुकी। हां यह अलग विमर्श का मुद्दा हो सकता है कि लेखक अपनी पूर्व स्थापनाओं को पुनर्परिभाषित करना चाहता है तब वह पूरक किताब लिखता है।

आज लेखन भी बाजार का हिस्सा बन चुका है। जो जितना और जिस गंभीरता के साथ बाजार के अर्थशास्त्र को समझते हुए लेखन करता है उसकी लिखी किताब उसी अनुपात में लेखक को अर्थ एवं ख्याति को लौटाता है। यहां बाजार को ध्यान में रखकर लेखन का अर्थ यह है कि पाठक जिस तरह के लेखन को पढ़ना चाहता है लेखक उसी तरह का लेखन करता है। ऐसे लेखक अब हिन्दी में भी तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे लेखकों को बाजार भी हाथों हाथ लेती है। ऐसे लेखन का मूल्यांकन होना अभी शेष है। जब इतिहास ऐसे लेखन का मूल्यांकन करेगा तब पता चलेगा कि अमुक लेखक की कृति कितना सार्थक है व समय के प्रवाह में लिखी गई तात्कालिक रचना है।

कविता, कहानी, उपन्यास, व्यंग्य आदि ऐसी खुली जगह और संभावनाएं हैं जिस क्षेत्र में अमूमन लेखक हाथ आजमाता है। कविता की भूमि इस दृष्टि से ज्यादा उर्वरा है। इस क्षेत्र में लेखनी तेजी से चल रही है। जैसा कि कहा जा चुका है कि रचना किस स्तर की है और उसकी प्रासंगिकता कितनी है इसका विश्लेषण करने पर ही मालूम चल सकता है। लेकिन एक प्रवृत्ति व जल्दबाजी देखी जाती है कि किसी भी पुस्तक मेले में जब कोई पुस्तक लोकार्पित होती है मंचासीन लेखक, अतिथि, वक्ता बड़ी ही विकल होकर किताब और लेखक की तुलना या तो पूर्व के बड़े लेखकों से कर लेखक को खुश करने की कोशिश करते हैं या फिर पहली ही किताब पर लानत मलानत देने लग जाते हैं। निराशा, कुंठा, अकेलापन आदि भावदशाओं के दबावों में लिखने से बचने के टोटके और मंत्र भी बतलाने से नहीं हिचकते। पहली बात तो यही कि फलां ने लिखने की कोशिश तो की। उसकी इस कोशिश की सराहना करने की बजाए उसके उत्साह पर मट्ठा डालना उचित नहीं है। आज की तारीख में लेखक के पास छपने और प्रकाशन के कई सारे विकल्प उपलब्ध हैं। एक ओर लेखक या तो अपनी जेब से खर्च कर 10 हजार से 15 हजार में किताब छपा लेता है और उसका लोकार्पण खर्च भी वहन करता है। इस तरह से उसकी किताब और लेखन तो रोशनी में आ गई। लेकिन अपनी लिखी हुई संपदा पर ठहर कर सोचना का वक्त नहीं मिल पाता। ऐसी किताबें अमूमन परिचितों, स्वजनों को उपहार देने की काम आया करती हैं।

एक स्थिति तो स्पष्ट है कि लेखक को जैसे ही प्रकाशन के विकल्प सोशल मीडिया एवं अन्य प्रकाशक का मिला प्रकाशन जगत के एकछत्र राज्य से मुक्ति महसूस किया। क्योंकि जैसे ही प्रकाशन का विकेंद्रीकरण हुआ एक लाभ तो यह हुआ ही कि छोटे-मोटे प्रकाशकों की दुकानें भी चल पड़ीं। लेखकों को भी छपने की संभावनाएं खुलीं। एक अलग बात है कि बड़े प्रकाशकों की संपादकीय टीम की लंबी लाईन से मुक्ति तो  मिली। लेकिन इसका असर किताबों की गुणवत्ता पर दिखायी देने लगा। ऐसी ऐसी किताबें कविता, कहानी, आलोचना व उपन्यास की भी छपने लगीं जिन्हें देखपढ़कर लगता है कि यह विधा के साथ न्याय नहीं हुआ।

लिखना अपने आप में एक श्रमसाध्य कर्म है। इसके साथ ही लिखना एक गंभीर चुनौती भी है। हमारे समाज और समय में जो भी लेखन कर रहे हैं और जिन्हें गंभीर माना जाता है वो छपवाने से ज्यादा लेखन पर ध्यान देते हैं। यूं तो माना जाता है कि यदि कोई चीज लिखी जा रही है तो वह छपे भी ताकि पाठकों तक लेखन पहुंचे। जो लिखेगा वो छपेगा। जो छपेगा वो लिखेगा इससे किसे गुरेज हो सकता है कि लिखा वही जाए जिसकी पाठनीयता हो और लिखे हुए शब्द की सार्थकता एंव लेखन बयां करे।

लिखने के लिए लेखक के पास खुला आसमान है। वह कागज पर लिखे और छपवाए या आभासीय मंच पर लिखे। लिखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। आज हजारों हजार गीगाबाइट में रोज दिन लिखे हुए शब्द प्रकाशित और प्रसारत हो रही हैं। पाठकों के सामने मुश्किल घड़ी यह है कि कौन सी चीज पढ़े और किसी न पढ़े। देखा जो यह भी गया है कि लेखक अपने क्षेत्र के अलावा दूसरी चीजें नहीं पढ़ते। उसपर तुर्रा यह वजह बताई जाती हैं कि पढ़ने का वक्त नहीं मिलता व आज कल बहुत स्तरहीन लेखन हो रहा है। यदि थोड़ा पीछे जाएं और पुराने लेखकों की बातचीत पर गौर करें तो वे लोग जितना ध्यान लिखने पर दिया करते थे उतना ही ध्यान पढ़ने पर भी देते थे। अपने क्षेत्र और विधा में क्या चीजें लिखी जा रही हैं यदि इसका इल्म नहीं है तो उसकी आलोचना और दशा-दिशा की जानकारी नहीं मिल पाती। 

कौशलेंद्र प्रपन्न
भाषा विशेषज्ञ एवं शिक्षा सलाहकार
अंतःसेवाकालीन शिक्षक संस्थान

टेक महिन्द्रा फाउंडेशन

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