क्यों लिखता हूँ?…
जाने क्यों इस सोच के साथ मुझे मुझे अक्सर नवगीतकार रामचंद्र चंद्रभूषण याद आते हैं. डुमरा कोर्ट, सीतामढ़ी के रामचंद्र प्रसाद जो नवगीतकार रामचंद्र चंद्रभूषण के नाम से नवगीत लिखते थे. जब ‘तार सप्तक की तर्ज़ पर शम्भुनाथ सिंह के संपादन में नवगीतकारों का संकलन ‘नवगीत दशक’ तैयार हुआ तो उसके पहले खंड के दस गीतकारों में सोम ठाकुर, ठाकुर प्रसाद सिंह, नईम, शम्भुनाथ सिंह जैसे प्रसिद्ध गीतकारों के साथ रामचंद्र चंद्रभूषण को भी शामिल किया गया था. उस दौर की शायद ही कोई ऐसी पत्र-पत्रिका रही हो जिसमें उनके गीत-गज़ल, कविताएँ न प्रकाशित हुए हों. मैंने भी पहली बार धर्मयुग में उनका एक छोटा-सा गीत पढ़ा था- ‘फिर दखिनइया झूम के/ बाँध गई माथे पर सेहरा यूँ नरगिसी मुहीम के/ नाज़ुक क़दमों मेहर आई/ चुपके पास सलीम के’. पत्रिका में पता छपा था जिसके सहारे मैंने उनको ढूँढना शुरु किया. पत्रिका में केवल डुमरा कोर्ट लिखा था, किसी मोहल्ले का नाम नहीं था. अब उस उतने बड़े कस्बे में केवल नाम से अफसरों-वकीलों-डॉक्टरों-सेठों-रईसों-बाहुबलियों को ही ढूंढा जा सकता है, किसी कवि को नहीं- यह उसी दौरान समझ आया. कवि होना बड़ा आदमी होना नहीं होता है यह तभी समझ में आया था.
बहरहाल, जब डाकघर में जाकर उनके बारे में पूछा तो एक पोस्टमैन ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा, ‘के? कविजी?’ उसी से उनकी गली, उनके घर का पता चला. ढूंढता हुआ पहुंचा, एक नई उठी दीवारों से घिरा बनता-सा घर, जो अगले कई सालों तक बनता ही रहा. बाद में पता चला कि करीब ३० साल कलेक्टेरियट में क्लर्क की नौकरी करने वाले कवि जी ने इसे रिटायरमेंट के बाद बनवाना शुरु किया था. जब उनसे सामना हुआ तो मैंने अपने हाथ मोड़कर रखा हुआ ‘धर्मयुग’ का वह अंक सामने कर दिया और कहा कि मैं इसमें छपी उनकी कविता पढकर उनसे मिलने आया था. उनके चेहरे पर जो खुशी का भाव आया था उसका मैं बयान नहीं कर सकता और मुझे कैसा महसूस हुआ था मैं बता नहीं सकता.
यह किस्सा इसलिए सुनाना पड़ा क्योंकि वे पहले ‘बड़े’ लेखक थे जिनसे मैं साक्षात मिला था. बाद में वे मेरे पहले साहित्य-गुरु भी बने और आरम्भ में उनकी तरह मैंने भी गीत लिखने शुरु किये, मैं भी झूम, धूम, घूम के साथ बूम की तर्ज़ मिलाने लगा, लेकिन गीतों में वह रवानी नहीं पैदा कर पाया, जो चंद्रभूषणजी जैसे गीतकार पैदा कर देते थे. मैं कभी उस विधा को साध नहीं सका. उनके कहने पर ग़ज़लों में हाथ आजमाया. उसमें रदीफ-काफिया तो जमाना आ गया लेकिन गज़लें… एक दिन रामचंद्र जी ने मेरी ग़ज़लों को पढकर कहा कि दुष्यन्त कुमार के प्रभाव को जब तक दूर नहीं करोगे गज़लों में पहचान नहीं बन पायेगी. उसके बाद उस विधा से भी मन हट गया. धीरे-धीरे रामचंद्र बाबू से भी. मुझे लगता कि वे मुझे ठीक से सिखा नहीं रहे इसीलिए मैं ठीक से लिख नहीं पा रहा हूँ. उन दिनों मैं इसलिए लिखना चाहता था कि अपने भाइयों, अपने सहपाठियों से कुछ अलग दिख सकूँ और इस तरह खुद को इसके माध्यम से कुछ विशिष्ट प्रमाणित कर सकूँ. क्योंकि वे सब हर उस माध्यम में मुझसे बेहतर थे जिनमें मैं खुद को आजमाना चाहता था- क्रिकेट खेलने से लेकर पहनने-ओढने तक और यहाँ तक कि पढ़ाई तक में. मैं लिखने के माध्यम से अपनी आज़ादी कि घोषणा करना चाहता था लेकिन गीत-गज़ल विधाओं की पाबंदी मुझे रास नहीं आई. बाद में रामचंद्र चंद्रभूषण अपने गांव रहने चले गए और फिर उनसे कभी मिलना नहीं हुआ. उनकी कोई किताब भी नहीं छपी. अब यह भी नहीं पता कि वे जिंदा हैं या नहीं. लेकिन बहुत दिनों तक मैं जब भी कुछ लिखता रामचंद्र जी के बारे में सोचता और कभी-कभी यह भी कि आखिर वे किसलिए लिखते थे? क्यों लिखते थे? आखिर कोई लिखता ही क्यों है?
मैं अक्सर इस सवाल से परेशान होने लगता हूँ कि आखिर मैं क्यों लिखता हूँ तो किताबों में ढूंढने लगता हूँ कि आखिर बड़े-बड़े लेखकों ने इस सवाल के क्या जवाब दिए हैं, उन्होंने अपने लेखन-कर्म को किस तरह ‘जस्टिफाई’ किया. याद आता है गाब्रियल गार्सिया मार्केस का लिखा कि लिखना एक आत्मघाती पेशा है. अगर तात्कालिक लाभ के सन्दर्भ में देखें तो इतना समय, इतनी मशक्कत, इतने लगन की मांग किसी और पेशे में नहीं की जाती. उसे इसके बदले में मिलता क्या है? फिर सवाल यह उठता है कि आखिर लेखक लिखता क्यों है? जवाब में यही कहा जा सकता है कि कोई व्यक्ति उसी तरह लेखक होता है जिस तरह कोई यहूदी होता है या कोई अश्वेत होता है या कोई किसी और पहचान का हिस्सा होता है. सफलता से उत्साह बढ़ता है, पाठकों की प्रतिक्रिया से जोश आता है, लेकिन ये सब केवल इसके अतिरिक्त लाभ हैं, क्योंकि कोई लेखक लिखते समय शायद ही इन बातों का ध्यान रखता हो. वह तो वैसे भी लिखता रहेगा, चाहे उसके जूते मरम्मत की मांग कर रहे हों या उसकी किताबें नहीं बिक रही हों, चाहे उसे कोई नहीं पढ़ रहा हो.
हिंदी का लेखक हूँ लेखन से कोई बड़ी महत्वाकांक्षा नहीं रखता, विशेषकर कहानियों से. यह भी नहीं कि कितने लोग पढेंगे या पता नहीं पढेंगे भी या नहीं. मनोहर श्याम जोशी कहा करते थे उन्होंने अपने कई उपन्यास उस दौर में लिखे जब वे गहरे अवसाद के दौर से गुज़र रहे थे, लेखन उनके लिए उस अवसाद से मुक्ति का साधन बना. इतना ज़रूर है कि निराशा में आशा की किरण की तरह मैं लेखन की दिशा में बढ़ता हूँ. कुछ भी स्पष्ट नहीं होता, कुछ वाक्य, गड्ड-मड्ड से प्रसंग…
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लफ्जों में बोलता है रगे-अस्र का लहू
लिखता है दस्ते-गैब कोई इस किताब में
लिखने के बाद जब अपनी रचना को पढ़ता हूं तो कई बार नासिर काज़मी के इस शेर की तरह मुझे खुद ऐसा लगता है जैसे मैं किसी और की कहानी पढ़ रहा हूं। बार-बार अपनी कहानियों के माध्यम से मैं वास्तव में अपने आपको, अपनी समझ को, अपनी पहचान कोई रूपाकार देने की कोशिश करता हूं, मगर पाता हूं कि हर बार वह कुछ और, कुछ और ही हो जाती है। हमारे दौर का शायद यही यथार्थ है… सब कुछ गड्डमड्ड.. हमें अक्सर लगता है जैसे सब कुछ हमको समझ में आ गया है लेकिन फिर न जाने क्या हो जाता है कि लगता है कुछ भी समझ में नहीं आता है. शायद इसीलिए वर्गास ल्योसा ने कथात्मक साहित्य को ‘वैकल्पिक संसार’ कहा है जो वास्तविक संसार के जैसा नहीं होता बल्कि अक्सर उसमें वैसा कुछ होता है जो शायद संसार में नहीं होता. हमें वह इसलिए यथार्थवादी लगता है क्योंकि हमें उसमें कुछ दुनियावी समतुल्यताएं दिख जाती हैं. नहीं तो असल में वह लेखक का अपना संसार होता है. लेखक जिसका राजा होता है.
मेरी कहानियों में कस्बे का जीवन विस्तृत रूप में आया है, मगर वास्तविकता यह है कि मैं ज्यादातर उस कस्बे सीतामढ़ी से दूर ही रहता आया हूं जहां का ‘लोकेल’ अक्सर मेरी कहानियों में आ जाता है। पहले पढ़ाई और बाद में नौकरी के कारण अपनी जन्मभूमि में मैं रह नहीं पाया। मैं यह जानता हूं कि इसके अलावा मेरी और कोई पहचान नहीं हो सकती कि मैं सीतामढ़ी का रहनेवाला हूँ मैं उसकी पहचान से अपने आपको ठीक से जोड़ नहीं पाता, क्योंकि यह सच्चाई है कि अपने जीवन का सबसे कम समय मैंने वहीं बिताया है. शायद यही कारण हो कि मेरे कथा-पात्रों की पहचान अक्सर उस कस्बे से जुड़ जाती है। मुझे भले अपने कस्बे के जीवन का विस्तृत अनुभव न हो, मेरे पात्रों में उस कस्बे के जीवनानुभव भरपूर हैं। अपनी स्मृतियों में बसी जन्मभूमि को मैं अपने लेखन में साकार करने की कोशिश करता हूं। बार-बार मैं अपनी कहानियों में उस सीतामढ़ी को साकार करने की कोशिश करता हूँ. शायद यही कथात्मक समतुल्य होता है. एक सीतामढ़ी मेरे मन में भी बसा है जो मेरी कहानियों के माध्यम से अपनी यात्रा कर रहा है. शायद इसी से मेरे विस्थापित मन को कुछ सुकून मिलता हो. अपनेपन से जुड़े होने का अहसास होता हो और यह भरोसा भी कि मेरा भी कोई मूल है और मैं जिससे जुड़ा हुआ भी हूँ. क्या पता शायद मैं बार-बार इसी संतोष का अनुभव पाने के लिए बार-बार कहानियां लिखता हूँ. मैं जैसे ही कोई कहानी लिखना शुरु करता हूँ अपने आप सीतामढ़ी का ‘लोकेल’ आ जाता है. मुझे हमेशा लगता है कि हिंदी ‘पिछड़े’ समाज की भाषा है और सीतामढ़ी देश के सबसे पिछड़े इलाकों में है. शायद मेरी कहानियों में सीतामढ़ी हिंदी समाज का रूपक बनकर आता है. कहानियां लिखता हूँ तो मुझे लगता है कि मैं अपने उस समाज के थोड़ा करीब आ गया हूँ जिससे मैं दूर, बहुत दूर होता चला गया हूँ. आखिरी बार जब कई साल पहले मैं अपने गांव गया था तो मेरे रिश्ते के एक बड़े भाई ने कहा था कि आदमी को अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलना चाहिए, ‘रूटलेस’ आदमी किसी का नहीं होता. जब मैं कहानियां लिखता हूँ तो लगता है मेरा भी कोई अपना ‘रूट’ है. कोई ऐसी जगह है जहाँ कोई मुझे प्रवासी नहीं कहेगा.
मैं यह तो नहीं कहता कि लेखन को स्वान्तः सुखाय होना चाहिए लेकिन यह भी सच है कि अपने लेखन से सबसे अधिक आनंद लेखक को ही मिलता है. कम से कम मैं अपने सन्दर्भ में तो यह कह ही सकता हूँ. जिस रचना को लिखकर मुझे आनंद आता है मैंने पाया है कि उसे जब दूसरे पढते हैं तो उनको भी आनंद की अनुभूति होती है. लिखना कुछ पाने के लिए नहीं करता हूँ. वैसे हिंदी के लेखक को मिलता भी क्या है. मनोहर श्याम जोशी एक किस्सा सुनाते थे. किस्सा यों है कि एक बार वे अपने घर में प्रसिद्ध लेखक अज्ञेय के साथ बैठकर बातें कर रहे थे. उसी दरम्यान उनके एक रिश्तेदार उनसे मिलने आये. उन्होंने अपने रिश्तेदार से बताया कि ये प्रसिद्ध लेखक अज्ञेय हैं. ‘सो तो ठीक है लेकिन करते क्या हैं’, रिश्तेदार का जवाब था. यानी हिंदी समाज में केवल लेखक होना कोई सम्मान की बात नहीं समझी जाती.
रोजी-रोटी के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग स्तरों पर काम करने के अवसर मिले। संपादन, पत्रकारिता, अनुवाद, पटकथा-लेखन से लेकर प्रूफ-पठन से लेकर अध्यापन तक अनेक स्तरों पर, अनेक रूपों में काम किया। इसका और कोई लाभ हुआ हो या न हुआ हो कथाकार के तौर पर लाभ जरूर हुआ। इससे मेरा अपना अनुभव-संसार समृद्ध हुआ, जटिल होते जाते समाज के अलग-अलग स्तरों की समझ विकसित हुई। मेरे जीवन के यह अनुभव भी मेरी कथाभूमि है। कभी कोई बात याद आ जाती है, कभी कोई सूत्र ध्यान आ जाता है और मेरी कहानी शुरु हो जाती है। जब भी किसी कहानी की शुरुआत करता हूं तो अक्सर मुझे खुद नहीं पता होता कि आगे यह कहानी किस रूप में सामने आएगी। सब कुछ धुंधला-धुंधला सा होता है। जिन दिनों हवाओं में ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे की गूंज थी, मुझे एक दिन ध्यान आया कि करीब 20 साल पहले मेरे गांव में एक पुल का शिलान्यास हुआ था-कहानी की शुरुआत यहीं से हुई, जो बाद में जानकी पुल के रूप में सामने आई। पहले से तैयारी करके, किसी खास तरह के विचार या फॉर्मूला को ध्यान में रखकर मैं कहानी नहीं लिखता. नहीं लिख पाता.
कभी लेखक बनने के बारे में सोचा नहीं था, लेकिन कहानियों के जादुई आकर्षण का अनुभव मुझे बचपन में ही हुआ था। बचपन की यादों में एक गांव में अपने दादाजी के किस्से सुनाने की है। सर्दियों की रात बाहर दरवाजे पर घूरे(अलाव) के ढेर के आगे वे कुर्सी पर बैठ जाते थे। चारों ओर खेत-खलिहानों में काम करने वाले जन-मजदूर… और उनकी लंबी-लंबी कहानियों का दौर चलता। आग तापने के बहाने मैं भी अक्सर वहां बैठता था। आजादी के पहले के दौर की अनेक ऐसी कहानियां मुझे आज भी याद हैं जो स्थानीय परंपरा के उन नायकों की होती थीं जिनका इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं आता, लेकिन अंग्रेजों से मोर्चा लेने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। सेठ हरसुखलाल, जिन्होंने अंग्रेजी राज के खिलाफ छंद लिखने वालों के लिए ईनाम मुकर्रर कर रखा था। बखरी मठ के महंथ की रखैल सोना कहारिन, जिसने पांच हजार के इनामी क्रांतिकारी भोगेन्द्र पाठक को महीनों अपने घर में पनाह दी थी। ऐसे न जाने कितने किस्से वे सुनाते थे जिनके आकर्षण में रात होते ही घूरे के पास लोग आ जुटते थे। उनके मरने के बाद गांव के बड़े-बूढ़े कहते उनकी कहानियों में नशा होता था। बड़े होने के बाद यह भी पता चला कि उन्होंने जिन कहानियों को सच्ची बताकर सुनाया था उनमें से अधिकतर की सत्यता का कोई प्रमाण कहीं नहीं था. जैसे उफनती बाढ़ में दस मील तैरकर दूसरे गांव में अपनी बीमार बहनोई को दवा पहुंचाना. बाद में छोटे दादाजी यानी मेरे दादाजी के छोटे भाई ने उनकी इस कहानी की हवा निकलते हुए बताया था कि असल में दादाजी को तो तैरना ही नहीं आता था. कुछ तो भांग की पिनक होती थी कुछ बयान की रवानी। बहुत बाद में जब कहानी लिखना शुरु किया तो मैंने पाया कि उसी तरह रोचक शैली में मैं लिखने की कोशिश करता हूं जिस अंदाज में मेरे दादा कहानियां सुनाया करते थे। बहरहाल, उनकी कहानियों को सुनने के उत्साह में हमारी आँखों की नींद न जाने कहाँ चली जाती थी. जबकि बाद में परीक्षाओं के वक्त पढ़ाई के लिए मैंने जब भी रात में जगने की कोशिश की कमबख्त नींद आ जाती थी.
दिल्ली आने के बाद लेखक मनोहर श्याम जोशी जी के संपर्क में आया। उन दिनों टेलिविजन धारावाहिकों के लेखक के रूप में उनकी धूम थी। मैं भी फिल्मी लेखन के गुर सीखने की आस में उनके यहां जाने लगा, लेकिन आज अगर इल्मी लेखक के रूप में मेरी थोड़ी बहुत पहचान बनी है तो इसमें उनका बहुत बड़ा योगदान है। उनसे मैंने सीखा कि बहुत रोचक और पठनीय अंदाज में भी जबरदस्त साहित्यिक रचनाएं लिखी जा सकती हैं। अपने दादाजी की कहानियों से अगर मुझे कथा-लेखन की आरंभिक प्रेरणा मिली तो जोशी जी के प्रोत्साहन ने मुझे लेखक बनाया। वे परफेक्शनिस्ट थे। अपनी कोई रचना तभी प्रकाशन के लिए देते थे जब वे उसके बेहतर होने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हो जाते थे। आरंभ में मैं कोई कहानी लिखकर उनको दिखाता तो वे उसे पढ़ते और अगर अच्छी नहीं लगती तो वहीं फाड़कर डस्टबिन में फेंक देते थे। उनसे मैंने सीखा कि अपने लेखन को लेकर निर्मम होना चाहिए, लेखक के रूप में ‘ग्रो’ करने के लिए यह बहुत आवश्यक होता है। बाद में जब जनसत्ता में पत्रकारिता करने और सम्पादकीय लिखने का अवसर मिला तो अपने लिखे को लेकर मोह और कम होता गया. वहां यह बात समझ में आई कि असली लेखन वह होता है जो पढ़ने वालों तक सही तरीके से संप्रेषित हो जाए तथा जिसके पीछे समाजहित की भावना हो.
प्रसिद्ध लेखक मार्केस ने लिखा है कि वे इसलिए लिखते है कि उनको पढ़कर अधिक से अधिक लोग उनको प्यार करें। हिन्दी के लेखक को और कुछ तो मिलता नहीं है अपनी रचनाओं को कुछ पाठकों का प्यार मिल सके यही मेरी कोशिश होती है। मैं बार-बार कोशिश करता हूं कि कुछ ऐसा लिख सकूं जो पढ़नेवालों को अपना-अपना सा लगे, उनको अपने जीवन का कुछ अक्स उसमें नज़र आये. अपने लेखन की सार्थकता मैं इसी में मानता हूं। आखिर में कतील शिफाई का यह शेर-
यूं ही नहीं मैं कहता रहता ग़ज़लें, गीतें, नज़्म कतील
यह तो उनकी महफिल तक जाने का एक वसीला है।


