कुछ कविताएं आजादी के नाम

आज स्वतंत्रता दिवस पर आजादी की कुछ कविताओं के साथ जानकी पुल की तरफ से सभी आजादी मुबारक. कवि हैं त्रिपुरारि कुमार शर्मा– मॉडरेटर
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आज़ादी
जुबां तुम काट लो या फिर लगा दो होंठ पर ताले
मिरी आवाज़ पर कोई भी पहरा हो नहीं सकता
मुझे तुम बंद कर दो तीरग़ी में या सलाख़ों में
परिंदा सोच का लेकिन ये ठहरा हो नहीं सकता
अगर तुम फूँक कर सूरज बुझा दोगे तो सुन लो फिर
जला कर ये ज़ेह्न अपना उजाला छाँट लूँगा मैं
सियाही ख़त्म होएगी कलम जब टूट जाएगी
तो अपने ख़ून में ऊंगली डुबा कर सच लिखूँगा मैं

सवाल
फ़लक पर दूर तक छाई हुई है नूर की चादर
ज़मीं पर सुब्ह उतरी है कि जैसे मिट गए सब ग़म
सुना है जश्न आज़ादी का हम सबको मनाना है
मगर एक बात तुमसे पूछता हूँ ऐ मिरे हमदम
जहाँ पे जिस्म हो आज़ाद लेकिन रूह क़ैदी हो
तो क्या ऐसी रिहाई को रिहाई कह सकोगी तुम
जहाँ पे बात हो आज़ाद लेकिन सोच क़ैदी हो
तो क्या ऐसी ख़ुदाई को ख़ुदाई कह सकोगी तुम
चलो माना कि रोशन हैं सभी राहें तरक़्क़ी की
मगर तारीक गलियों में अभी कुछ लोग जीते हैं
ये ऐसे लोग हैं जिनसे हमारी भूख मिटती है
हमारे वास्ते ये लोग यानी ज़ह्र पीते हैं
अगर ये ना रहें तो ज़िंदगी की नीव हिल जाए
इन्हीं के दम से दुनिया के हर एक घर में उजाला है
कभी फ़ुर्सत मिले तो देखना तारीक गलियों में
कि बस इनके घरों की रोशनी का मुँह काला है
ये मुमकिन है मिरी बातें तुम्हें नाशाद कर देंगी
मगर इनके लिए आख़िर यहाँ पर कौन सोचेगा
अगर आला तुम्हीं हो और अव्वल भी तुम्हीं हो तो
कहो ना तुम कि तुम से आज बेहतर कौन सोचेगा
ये मत समझो कि शायर हूँ तो मेरा काम है रोना
मुझे भी ख़ूब भाता है सितारों से भरा दामन
मिरी आँखों मे आकर तितलियाँ आराम करती हैं
सुकूँ मिलता है जब देखूँ नज़ारों से भरा दामन
नई सड़कें सजी गलियाँ शहर के बीच फ्लाईओवर
ज़मीं से उठ रही बिल्डिंग हवा में तैरती खिड़की
ये मंज़र ख़ूबसूरत है बहुत ही ख़ूबसूरत है
हवा की सब्ज़ आँखों में धनक सी बोलती लड़की
फ़िज़ाओं में अजब हलचल मचाता अब्र का टुकड़ा
मुझे डर है ये सूरज टूट कर नीचे न आ जाए
बहार आई अगर अब के तो बाग़ों के परिंदों पर
ग़लत क्या है कि ख़ुशबू का नशा सौ बार छा जाए
कहीं जुगनू किसी पेड़ों के बाज़ू में चमक उट्ठे
महकती चाँदनी शाख़ों को छू ले तो बुरा क्या है
अगर इस रात की आगोश में दिल भी बहक जाए
कली कोई कहीं वादी में चटके तो बुरा क्या है
ये सब बातें मुझे भी शाद करती हैं मगर हमदम
मैं जब भी देखता हूँ बाँझ खेतों को तो रोता हूँ
उदासी से भरी आँखों से कैसे मोड़ लूँ आँखें
झुलस जाते हैं ज़िंदा फूल तो दामन भिगोता हूँ

तुम्हीं बोलो कि ऐसे में अज़ादी क्या मनाऊँ मैं
अगर ये रस्म है तो फिर मुआफ़ी माँगता हूँ मैं
अगर फ़रमान है तो फिर कभी मुझसे न होगा ये
किसे कहते हैं आज़ादी यक़ीनन जानता हूँ मैं 

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