90 के दशक के आरंभिक वर्षों में जिस कविता संग्रह की कविताओं ने बहुत प्रभावित किया था वह संग्रह करीब 20 साल बाद वाणी प्रकाशन से दुबारा प्रकाशित हुआ है- ‘लो का सांबरी‘. तेजी ग्रोवर का यह कविता संग्रह कल खरीदा. उसकी कुछ कविताएं. इसी संग्रह की कविता पर उनको भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला था. आप भी पढ़िए- प्रभात रंजन
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जुदाई गीत-1
मैं ऐसे लिख रही हूँ
जैसे अनाथालय में बहुत साल बाद
अपने अंधे बच्चे से मिल रही हूँ
तुम्हारे जाने के बाद
क्या कद निकल आया है उनका
कितने छोटे पड़ गए हैं शब्द
जो पहनाने लायी हूँ
जुदाई गीत-2
तुम गए बुआई के बाद
और मैं भूल गई गेंहूँ उग रहा है
बैलों को भूख लगती है
तो सांकल खोल देती हूँ
बच्चे आते हैं
भूंजती ही रहती हैं बालियाँ पूरी शाम
मींड-मींड उन्हें फांकते रहेंगे मस्त गाँव के छुट्टन
घोंसले गुनती हुई
दूर-अंदाज
चिड़ियाँ भी इसी जगह उतरती हैं
पीढ़ियों तक उनके अण्डों में
दर्ज रहेगी मेरे खेत की निडरता
अब उत्सवी हो रही हैं बालियाँ
लबालब पके हुए हैं परिंदों के सुर
सुनती हूँ इतना
और याद रहता है
फिर बरसने लगता है आसमान
कीचड़ में घोपते हुए पाँव
मेरे होशगुम भाई भागते हैं
बारिश पर थूकते हुए
अधबनी कुठरियों के अनाजों की ओर
कुरलाते और भागते हैं
अचरज है तुम नहीं हो
तब भी इतना तो जान पाती हूँ
जान पाती हूँ
लेकिन सपना सोख लेता है हर बार
इस बरस
अनाज के साथ
मेरा जानना भी डूब जाता है
लोग आते हैं
दवार को धकियाते पागल फकीरों के हुजूम से
उनकी बाँहें अजाने अनाजों से भरी हैं
वे सीले पूसों को
अफ़सोस की तरह मेरी गोद में डाल देते हैं
मैं देखती हूँ
बावेर से बंधी बालियों में
लेट गए हैं दाने
मिटटी ने उन्हें बीज समझ
एक बार फिर हरिया दिया है
कुवेली बरसात में
दानों का दोहरा फूट कर निकलना
तुम्हारे जाने के बाद का मौसम है
मैं नहीं जानती
बाहर
मेरे भाइयों का रुदन किसलिए है
जुदाई गीत-3
मुझसे अक्सर पूछते हैं हमारे दोस्त
एक हजार एक सौ एक दिन होने को आये
कहो
अब भी तुम्हारी याद आती है मुझे
मैं मानती हूँ
पसीने की बूँद ही को मानती हूँ
जो सरक रहा है इस समय
मेरे कान के पीछे
पता नहीं बाबू
यह उनके सवाल की ऊब है
या मेरा बुखार उतर रहा है
जुदाई गीत-4
तेरे सपने में थोड़े हूँ पगली
मैं तो बैठा हूँ
टाट पर
सजूगर
अचार भरी उंगलियाँ चाटता हुआ
मैं टाट पर थोड़े हूँ
झूलती खाट में
सो रहा हूँ तेरे पास
इतने पास
कि मेरा पेट गुड़गुड़ाया
तो मैंने सोचा मेरा है
भोर तक यहीं हूँ
तू साँस छोड़ेगी
तो भींज उठेगी मेरी कोंपलें
मेरी खुरदुरी उंगलियाँ
नींद की रोई तेरी आँखों पर
काँप-काँप जाएँगी
और तू
झपकी भर नहीं जगेगी रात में
मैं जा रहा हूँ पगली
तेरे खुलने से पहले
उजास में घुल रही है मेरी आँख
छोना मटका तो मान लेना
मैं आया था
घोर अँधेरे तपते तीर की तरह आया था
रात भर प्यासा रहा


