बिहार चुनाव के तनाव से बचना चाहते हैं तो पढ़िए ‘इश्कियापा’

बिहार में चुनाव का मौसम है, आरोप-प्रत्यारोप का मौसम है, मान-मनुहार का मौसम है, जय बिहार का मौसम है! ऐसे में अपने उपन्यास ‘इश्कियापा’में पंकज दुबे बिहारी(पटनिया) प्यार का मौसम लेकर आये हैं. स्वीटी-लल्लन की प्रेम कहानी. स्वीटी जिसके होंठ मेजेंटा रेड हैं, जिसका सपना है ब्रिटनी स्पीयर्स बनना, लल्लन जिसका सपना है एक दिन बड़ा व्यापारी बनना. जिसके लिए वह हिंदी मीडियम से एमबीए कर रहा है. वह स्वीटी को कार सिखाने आता है और बस गियर बदलते-बदलते, क्लच दबाते-दबाते प्यार हो जाता है.

पंकज दुबे का यह दूसरा उपन्यास है. उनका पहला उपन्यास था ‘लूजर कहीं का’, जिसमें एक बिहारी की डीयू कथा थी. वह उपन्यास ट्रेंड सेटर बना, उसके बाद अंग्रेजी के दो लोकप्रिय उपन्यासकारों ने डीयू के बिहार कनेक्शन को लेकर कथा कही. एक चेतन भगत का उपन्यास ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ और दूसरे रवीन्द्र सिंह के उपन्यास ‘योर ड्रीम्स आर मैं नाऊ’ में. फर्क बस इतना था कि रवीन्द्र सिंह के उपन्यास में बिहार से डीयू में पढने आने वाली लड़की की कहानी थी.

बहरहाल, पंकज अपने दूसरे उपन्यास में अधिक पुख्ता, जटिल जमीन पर खड़े दिखाई देते हैं. कहानी की पृष्ठभूमि राजनीतिक है. काली पाण्डे नामक अपहरण माफिया चलाने वाले की बेटी है स्वीटी, जो बाद में अपने धन-बल से मंत्री बन गया है, दूसरी तरफ उसका राजनीतिक प्रतिद्वंदी है राधेश्याम यादव, जो राजनीति में अपनी जमीन मजबूत बनाने के लिए काली पाण्डे को चुनौती देता है. लेखक ने इन दोनों पात्रों के माध्यम से बिहार की राजनीति के उस ट्रांजिशन को दिखाने की कोशिश की है जिसने वहां की जातिगत राजनीति को बदल कर रख दिया, उच्च जातियों के हाथ से राजनीतिक कमान खिसककर यादवों के हाथ में आ गई. लेकिन यह उपन्यास की मूल कथा नहीं है, यह सब पृष्ठभूमि में है.

असली कथा तो स्वीटी की है. काली पाण्डे की बेटी स्वीटी, जो जब जो करना चाहती है तब वही करती है. उसके रूप में पंकज दुबे ने कथा जगत को एक मजबूत स्त्री पात्र दिया है. वह अपने पिता के घर की धुरी है और कहानी की भी. वह स्वीटी जिसके सात बॉयफ्रेंड थे. जो ब्रेक अप के बाद अपने हर बॉयफ्रेंड के नाम पर एक कुत्ता पाल लेती है. लल्लन आठवां है, जिसके साथ वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए किडनैपिंग का नाटक रचाकर सपनों की नगरी मुम्बई भाग जाती है.  

असल में यह कहानी स्वीटी, लल्लन आदि पात्रों के माध्यम से नए बिहार के सपनों की कहानी कहता है जिसमें भरपूर महत्वाकांक्षाएं हैं, जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना भी जानता है, जुगाड़ लगाना भी जानता है, जो जात-पात से ऊपर उठकर सोच रहा है. यही वह पीढ़ी है जो बिहार के भविष्य को बनाएगा.

पंकज दुबे दो भाषाओं-अंग्रेजी और हिन्दी- में लिखने वाले पहले लेखक हैं. वे पहले लेखक हैं जो दोनों भाषाओं में मूल रूप से लिखते हैं. यानी उनके उपन्यासों के अनुवाद नहीं होते हैं. लेकिन दोनों भाषाओं में मूल रूप से उनका जो ‘विट’ है, जो व्यंग्यबोध है वह उनको बाकी चालू लेखकों की जमात से अलग करता है. उपन्यास का कलेवर जरूर एक हलकी फुलकी रीडिंग वाला रखा गया है लेकिन इसकी हर पंक्ति में कुछ पंच है. अगर आपने एक भी लाइन छोड़ी तो आप कुछ मिस करेंगे. जैसे गंगा नदी में एक के बाद एक लहर आ रही हो, व्यंग्य की लहर.

नाम से भले यह उपन्यास युनिवर्सल फील देता हो, लेकिन इसका कलेवर स्थानीय है. ऐसे मौसम में जब पूरे देश की नजर बिहार पर है, उसके चुनावों पर है, मेरे जैसा विस्थापित बिहारी ‘इश्कियापा’ के बिहारी फील से पूरा नौस्टेलजिक हो रहा है. भरपूर इंतजाम है इसमें.

यकीन मानिए एक बार पढना शुरू करेंगे रुकना मुश्किल हो जायेगा. पंकज दुबे की भाषा शैली में वह प्रवाह है. यह देर तक और दूर तक जाने वाला लेखक है- इश्कियापा ने यह साबित कर दिया है. इसमें कोई संदेह नहीं कि पंकज दुबे ने अंग्रेजी-हिंदी लोकप्रिय धारा के लेखन का मिजाज बदल दिया है, अंदाज बदल दिया है. मैं तो पढ़-लिखकर फारिग हो गया, आप भी पढ़िए. बिहार चुनाव के तनाव से मुक्त होना चाहते हैं तो इश्कियापा पढ़िए. एकदम चूड़ा-दही वाली फील है!

‘इश्कियापा’ का प्रकाशन पेंगुइन बुक्स ने किया है. उपन्यास की कीमत 150 रुपये है.  

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