यह चाँद है या काँच है जो पहर बेपहर चमक रहा है

कुछ साल पहले युवा कवि तुषार धवल का कविता संग्रह राजकमल प्रकाशन से आया था ‘पहर यह बेपहर का’. अपनी भाव-भंगिमा से जिसकी कविताओं ने सहज ही ध्यान खींचा था. उसी संग्रह की कविताओं पर कुछ कवितानुमा लिखा है वरिष्ठ कवि बोधिसत्त्व ने. समीक्षा के शिल्प में नहीं- जानकी पुल. 
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यह चाँद है या काँच है जो पहर बेपहर चमक रहा है कविता के देहाकाश में  तिरछा धंसा।
1-
कविता शब्दों में नहीं होती। शब्दों से बनती भी नहीं। एक तत्त्व है कविता।
कविता सिर्फ वहां संभव होतीहै, जहाँ शब्दों के वाहन हमें ले जा कर छोड़ देते हैं-तुषार धवल 
किसी कवि के आत्म कथ्य से उसकी कविता पर बात शुरू करना पता नहीं कैसा होगा, लेकिन यह मैं कर रहा हूँ। मैं तुषार धवल के संग्रह पहर यह बेपहर का पर अपनी टूटी-फूटी राय रख रहा हूँ। इससे उनकी कविता का कोई मूल्यांकन भले न हो लेकिन मेरी उनकी कविता को लेकर समझ का एक प्रमाण माना जा सकता है। यह वह समझ है जो उनको पिछले कुछ सालों में उनको पढ़के, उनसे मिल के बनी है। या कह सकते हैं जो बनते-बनते बनी है। या कहें कि एक दिन में अचानक नहीं बनी है।

2-
कविता शब्दों में नहीं होती। शब्दों से बनती भी नहीं। एक तत्त्व है कविता।
कविता सिर्फ वहां संभव होतीहै, जहाँ शब्दों के वाहन हमें ले जा कर छोड़ देते हैं। तो देखते हैं कि तुषार के कवि को शब्दों के वाहन कहाँ छोड़ गए हैं। यदि हम कविताओं के शीर्षकों को एक स्थान माने तो क्या कवि वहाँ खड़ा है। या कविता में जो दर्ज है वो संसार शब्द कवि को वहाँ छोड़ गए हैं। कवि ऐसे कितने ठिकानों पर शब्दों द्वारा उतारा-छोड़ा गया है, क्या वे सारे ठिकाने कवि दर्ज कर पाया होगा। क्या जिस पुल पर कवि कविता लिखते समय खड़ा था उस पर उसे अभी भी पाया जा सकता है। फिर
शब्द कोई मांगने
उन्ही पेड़ों के
घर जाता हूँ
यानी जो शब्द कवि को किसी मुकाम तक छोड़ गए हैं वे उसने खुद किसी पेड़ से मांगे हैं। क्या कवि का पेड़ से, उसके आस-पास से यह एक अलग अपनापे का संबंध नहीं बनाती यह भावना। यह किसी से नम्र हो कर कुछ झुक कर माँग लेने की सहजता तुषार की ही नहीं हिंदी कविता की एक विरल संरचना है।

3-
एक दंगल है
जो चलता ही रहता है
एक जंगल है
जो जलता ही रहता है
यह दंगल कहाँ चल रहा है, यह जंगल कहाँ जल रहा है। विस्थापन, उत्पीड़न, उपेक्षा और संघर्ष के बहुतेरे वृत्तांत इधर लिखे गए हैं। लेकिन उस संघर्ष का लोकल कभी दर्ज नहींहो पाता। यह नहीं पता चलता कि लड़ाई का केंद्र कहाँ है। हालाकि कोई कवि राडार तो होता नहीं, या उसके हाथ में कोई दूरबीन तो नहीं कि वह अपने उद्वेगों का पता ठिकाना बताता चले। लेकिन तुषार की कविता में दर्ज यह दंगल भारत का दंगल भी हो सकता है और मिस्र का भी यह जल रहा जंगल झारखण्ड का जंगल भी हो सकता है और युगांडा का भी। यह डूबी हुई टिहरी का दंगल भी हो सकता है और पुल पर मौन खड़े प्रिय के मन में जल रहा जंगल भी हो सकता है। कविता में कितनी ही बातें केवल झिलमिलाती रहती हैं। कविता किसी की भी हो वह आख्यान तो नहीं। शब्दों का दंगल और शब्दों का जंगल भी तो नहीं कविता। वे कवि बड़े अभागे होते हैं जिन्हें सब कुछ कह देना पड़ता है।

4-
अभी कल ही किसी से बात हो रही थी कि कविता को नामने-जोखने या तौलने का क्या कोई पैमाना गढ़ा जा सकता है। क्या हम कह सकते हैं कि किसी कविता को पढ़ कर यह रस पाया जा सकता है। क्या कविता चूरन की गोली या रस की मटकी हो सकती है। क्या उसका होना मेरे मन के भाव और दशा पर निर्भर नहीं करता। क्या मौन का अंतर्मन कवि तुषार की अकेले की खोज है। क्या उनकी कविता में उस मौन की यह अकेली खोज है। क्या लाल फकीरी कविता में दर्ज राकेश ठाकुर अब केवल कवि का अपना ठाकुर है। क्या उसमें वे असंख्य लोग समाहित नहीं हो गए हैं जो
सिगरेट थे हम कई
एक ही डिब्बी में
की तरह एक दूसरे के साथ समाए रहते हैं और फिर काल और अवधि के गुणा-गणित से विलग हो जाते हैं।

5-
नदी के उस पार जो गाँव है
वहाँ भी एक मंदिर है
घंटे हैं
क्या यह नरसोवा ची वाड़ी की छवियाँ भारत के आम जन-मन की छवियाँ नहीं है। क्या जनता के मन के वे कोमल और उदार भाव तत्व मिटा देने योग्य हैं। क्या उनको किसी तरह भास्वर करना कोई काव्यात्मक दुर्घटना है। क्या नरसोबा ची वाड़ी कविता की भाव छवियाँ मन को अनेक कोमल उपाख्यानों से संपृक्त नहीं करतीं। क्या यह कविता हिंदी की कुछ अलग और अनुपम रागात्मक संवेग से सुविन्यस्त कविता नहीं है।

6-
तो क्या तुषार को उनके शब्दों के वे वाहन जो वे पेड़ों से मांग कर लाए थे किसी नरसोवा ची वाड़ी में छोड़ गए। या तुषार वहाँ से कहीं और खोजने गए-
चीखती आवाजों के बीच
खोजने आँसू का
नमक
तुम्हारी छाया
यह क्या है कभी शब्द मांगने जाता है कवि कभी आँसू का नमक। फिर उसके पास क्या है जो उसका अपना है। क्या किसी कवि के पास उसका अपना कुछ भी होता है। जो कवि कहते हैं कि उनके पास उनका सब कुछ उनका अपना है वे कितने रिक्त होते हैं भीतर से।
मैं अपनी छोर पर खड़ा हूँ
नि:शब्द
और
तुम्हारे शब्द
मुझे बयाँ कर रहे हैं
जो शब्द कवि को कवि बना रहे हैं वह भी उसने किसी से अर्जित किए हैं। आभार स्वीकार का यह एक अलग काव्य पर्व है।  

7-
माँ
तू मेरी माटी की गाड़ी
तू मेरे आटे की लोई
माँ तू मेरी बेटी है
कवि घोल देता है रंगों को, वह पूरब के आसमान में पश्चिम के डूबे दिन को उठा कर टांक देता है। वह पहर बेपहर सब को घंघोलता आगे बढ़ता जाता है। वह सवाल तो करता है कि
यह चाँद है
या काँच है
लेकिन वह यह नहीं भूलता कि-
पहर यह बेपहर का
जिसमें
असंख्य उल्काओं-सा
बरस रहा मैं तप्त
तुम धरती हुई जा रही।
बहुत सारी कोमल-जटिल भाव भंगिमाएँ बसरती दमकती धर से उधर चली गईं। पिता के स्वप्न में पिता आए, कवि पुल पर मौन खड़ा रहा, पत्नी-प्रिया के पाँव के बिछुए अब तक मेरी आँखों को उजाले से भर रहे हैं। कविता और कवि दोनों एक दूसरे के देहाकाश में तिरछे धंसे हैं । मैं विदा लेता हूँ। 

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