‘कादम्बिनी’ पत्रिका के दिसंबर अंक में गंभीर साहित्य बनाम लोकप्रिय साहित्य पर मेरा लेख प्रकाशित हुआ है. आपके लिए- प्रभात रंजन =============================
हिंदी में सौभाग्य या दुर्भाग्य से गंभीरता को ही मूल्य मान लिया गया है. जबकि आरम्भ में यह मुद्रा थी. हिंदी गद्य के विकास में दोनों की समान भूमिका रही है- हमज़ाद की तरह. इस साल जब दिल्ली विश्वविद्यालय ने हिंदी विभाग में पाठ्यक्रम में ‘लोकप्रिय साहित्य’ का पत्र शामिल किया है तो इस साहित्य की उस महान परम्परा की तरफ ध्यान गया जिसे हिंदी के कैनन निर्माण से हमेशा ही दूर रखा गया, घरों में जिसे ‘पाप के दस्तावेज’ की तरह पढ़ा गया. मुझे याद आता है जब मैं स्कूल में पढता था तो जिसे गंभीर साहित्य कहा जाता है उसे मेज के ऊपर रखकर निर्धोक होकर पढता था. जबकि राजन-इकबाल सीरिज के उपन्यास, मनोज, रानू के उपन्यास टेबुल के नीचे रखकर पढता था. पढ़ते हुए इधर-उधर देखता था.
मैं अपनी भाषा के ऊपर अपने पाप के उन दिनों का बड़ा प्रभाव देखता हूँ. लेकिन ऐसा नहीं है लोकप्रिय साहित्य का समर्थन करना गंभीर साहित्य का विरोध करना हो जाता है. यह सर्वविदित तथ्य है कि देवकी नन्दन खत्री के उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता’ को पढने के लिए लोगों ने हिंदी भाषा सीखी. जिस दौर में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ‘अंग्रेजी ढंग के उपन्यास’ के आधार पर गद्य का कैनन बना रहे थे उस दौर में ‘चन्द्रकांता’ देशी ढंग का मौलिक उपन्यास था. क्या कभी इस बात को लेकर चर्चा हुई कि ‘तिलिस्मी-ऐयारी’ ढंग की शैली में राजे-रजवाड़ों में चल रहे षड्यंत्रों की कहानी के माध्यम से देवकीनंदन खत्री ने हिंदी को सर्वथा नया मॉडल दिया था, किस्सागोई की परम्परा के आधार पर एक वाचिक मॉडल.
बहरहाल, एक दूसरे को लोकप्रियता बनाम गंभीरता की बहस परम्परा कि भी अपनी ऐतिहासिकता है. जब चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ ने ‘चन्द्रकान्ता’ को बेजान कहकर ख़ारिज करके लोकप्रियता बनाम गंभीरता के बहस की शुरुआत की थी तब हिंदी के कैनन निर्माण का दौर था, हिंदी को विश्व साहित्य के बरक्स खड़ा करने की चुनौती थी. हिंदी का एक ‘क्लास’ बने उसकी चुनौती थी. लोकप्रिय साहित्य ने हिंदी का जो ‘मास’ बनाया था उसको उच्च साहित्यिक संस्कार देने की चुनौती थी. लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदी में पाठकों से अधिक विचार को महत्व देने का चलन शुरू हो गया. लगभग सौ साल बाद उनको लेकर देश के एक बड़े विश्वविद्यालय में सुगबुगाहट शुरू हुई है. साहित्य के नए मानकों को लेकर बहस की भूमिका तैयार हुई है. लेकिन दुर्भाग्य से उस बहस के लिए हिंदी समाज इस समय तैयार नहीं है. अब वे ध्रुवांत ही धुंधले पड़ते जा रहे हैं शायद.
आजादी से पहले और बाद में भी लोकप्रिय साहित्य को लेकर हिंदी आलोचना में एक तरह की हिकारत का भाव रहा है. 1929 में ‘विशाल भारत’ के सम्पादकीय में बनारसीदास चतुर्वेदी ने पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की कहानी ‘चॉकलेट’ के बहाने लोकप्रिय साहित्य को ‘घासलेटी साहित्य’ कहकर विभूषित किया. आजादी के बाद जब हिन्द पॉकेट बुक्स ने 1-1 रुपये में पाठकों के लिए पुस्तकें प्रकाशित करनी शुरू की और ‘घरेलू लाइब्रेरी योजना’ के माध्यम से उनको घर-घर पहुंचाने की मुहिम शुरू की तो लोकप्रिय साहित्य के लिए ‘सस्ता साहित्य’ विशेषण चलाया जाने लगा. बाद में ‘पल्प लिटरेचर’ का हिन्दीकरण करते हुए इस तरह के साहित्य को ‘लुगदी साहित्य’ कहा जाने लगा. इसे हमेशा कमतर समझा गया, हेय. हीनतर.
लेकिन हिंदी के जासूसी साहित्य और रोमांटिक साहित्य की धारा ने हिंदी के पाठकों को भाषा के साहित्य से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता. कुशवाहा कान्त, गुलशन नन्दा, वेद प्रकाश काम्बोज, ओमप्रकाश शर्मा जैसे लेखकों ने हिंदी का परचम ऊँचा उठाये रखा, समाज के आधार से उसको जोड़े रखा. बाद में यह काम वेदप्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसे लेखकों ने इस धारा को उसके उरूज पर पहुंचाया. राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मरकज़ दिया.
इस धारा को महज लोकप्रिय बनाम गंभीर के आधार पर ही नहीं बल्कि देशी बनाम विदेशी मानक के रूप में भी देखा जाना चाहिए. जिसे हम गंभीर साहित्य की धारा कहते हैं उसके केंद्र में ‘अंग्रेजी ढंग का साहित्य’ था यानी ऐसी कहानी, ऐसी कविता, ऐसे उपन्यास जिनका मॉडल अंग्रेजी साहित्य की विधाएं हों जबकि लोकप्रिय साहित्य में इसी विदेशीपन का निषेध था. यहाँ एक छोटा सा प्रसंग इब्ने-सफी से जुड़ा साझा कर रहा हूँ. इब्ने सफी इस बात से बहुत दुखी रहते थे कि उर्दू में जो जासूसी उपन्यास अंग्रेजी से अनूदित होकर प्रकाशित हो रहे हैं उनमें अश्लीलता बहुत होती है. इससे पढ़ने वाले युवाओं के ऊपर गलत असर पड़ेगा. उनके उस दोस्त ने कहा कि आप कहते रहते हैं बस, कुछ ऐसा लिखकर दिखाइये जो अश्लील न हो और मनोरंजक भी हो. इब्ने-सफी के बेहद लोकप्रिय सीरिज ‘जासूसी दुनिया’ की शुरुआत इसी आधार पर हुई. इस प्रसंग से साबित होता है कि जिस दौर में गंभीर साहित्य उच्च कला के मानक के रूप में अंग्रेजी के मानकों को, साहित्य रूपों को आँख मूंदकर आदर्श के रूप में अपना रहा था उस दौर में लोकप्रिय साहित्य कथा के देशी मॉडल गढ़ने में लगा था. और बड़ी बात है कि वे भी समाज के एक तबके में बेहतर संस्कार का प्रसार करना चाहते थे.
यहाँ एक प्रसंग जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का साझा करना चाहता हूँ. वे बिड़ला मिल में मजदूर थे और कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी. उन्होंने जासूसी उपन्यास लिखना शुरू किया तो उनकी नजर में उनका अपन मजदूर वर्ग था जो शाम को या तो शराब पीकर पैसे बर्बाद करता था या फ़िल्में देखकर. वे चाहते थे उनके लिए कुछ रोमांचक साहित्य लिखा जाए जिसमें देशभक्ति की भावना भरी हुई हो, और जो कम कीमत पर उनको उपलब्ध भी हो जाए. वे अपने जमाने में बहुत लोकप्रिय थे, लेकिन वे कभी फिल्मों में लिखने नहीं गए. वे सिनेमा को इसलिए अच्छा माध्यम नहीं मानते थे क्योंकि वहां लेखक का सम्मान नहीं था.
वास्तव में, लोकप्रिय साहित्य का यह बहुत बड़ा योगदान है कि जिस दौर में गंभीर साहित्य और लेखक समाज में उच्च मूल्य का प्रसार करने की कोशिश कर रहे थे, हिंदी के मध्यवर्ग को केंद्र में रखकर लेखन कर रहे थे. उस दौर में हिंदी समाज से गहरे जुड़कर हमारे जासूसी-रोमांटिक धारा के लेखक समाज के उस वर्ग के पात्रों को किरदार बना रहे थे जो किसी न किसी रूप में वंचित रहा गया. इनके जासूस, अपराधी उस विशिष्ट शिक्षा के लैस नहीं हो पाए जिससे मध्यवर्ग का हिस्सा बना जाता है लेकिन वे विशिष्ट योग्यता से लैस हो गए. वेदप्रकाश शर्मा का एक किरदार है ‘केशव पंडित’ जो डिग्रीधारी वकील नहीं है मगर जो बड़े-बड़े वकीलों के कान काट सकता है. एक जासूसी किरदार विक्रांत है जो कई जासूसी लेखकों के उपन्यासों में आता है जो शीत युद्ध के जमाने में बड़े बड़े मुल्कों के जासूसों से भी अधिक तेज था. समाज का बहुत बड़ा तबका जो है वह सपनों में ही जीता रह जाता है, उन सपनों को पूरा करने से वंचित रह गया. मुझे लगता है कि यह एक सार्थक योगदान है इस धारा का कि उसने हाशिये के लोगों के अकेलेपन में कुछ देर साथ देने का काम किया.
बहरहाल, अब हालात बदल गए हैं. साहित्य का वह कैनन संकटग्रस्त हो गया है जिसमें मुख्यधारा के नाम पर बहुत सारा साहित्य अपदस्थ कर दिया गया. लेकिन चिंता की बात यह है इस कैनन की जगह बाजार मानक बनता जा रहा है. वह भी एकमात्र मानक. सौ सालों से अधिक साझा इतिहास में दोनों धाराओं का संतुलन बना रहा है. यानी श्रेष्ठ साहित्य और बिकाऊ साहित्य का अंतर स्पष्ट रहा है. पहली बार ऐसा लग रहा है कि लोकप्रियता ही मानक बनता जा रहा है. यह हिंदी के साहित्यिक इतिहास में पहली बार होता दिखाई दे रहा है. इसे हिंदी की बेहतरी के लिए मैं उचित नहीं समझता. साहित्य लिखने वालों के लिए हो न हो पढने वाले में अच्छे-बुरे का विवेक बना रहना चाहिए. बिक्री अगर पैमाना बन गया तो यह रेखा धूमिल हो जाएगी. साहित्य वही फलता-फूलता है जिसमें घुलनशीलता, मिलनशीलता होनी चाहिए. आज लोकप्रिय लेखक गंभीर लेखकों की तरह प्रकाशित हो रहे हैं और गंभीर लेखक लोकप्रिय लेखक की तरह.
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